श्रीरंगम से अयोध्या तक: के. परासरन का अद्भुत जीवन और राम लला के प्रति उनकी पवित्र भक्ति

एक विनम्र वकील की आस्था, न्याय और भगवान राम के अटूट प्रेम की यात्रा।

जहां कानून मिला धर्म से, और एक साधारण भक्त बन गए राम लला की आवाज।

कल्पना कीजिए, वर्ष 2019 का एक गर्म अगस्त का दिन। दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट का खचाखच भरा कोर्ट रूम। सभी बेंच भरी हुई हैं। वरिष्ठ वकील अपनी जगह पर हिल रहे हैं। पांच जजों की बेंच ध्यान से देख रही है। बीच में खड़े हैं 92 वर्षीय एक बुजुर्ग, नंगे पैर ठंडे संगमरमर के फर्श पर। उनके साधारण सफेद धोती और कुर्ते में कोई दिखावा नहीं। फिर भी हर नजर उन्हीं पर टिकी हुई है।

वे हैं के. परासरन, भारत के सबसे सम्मानित कानूनी विद्वानों में से एक। कई घंटों तक वे शांत लेकिन दृढ़ स्वर में बोलते हैं, कोई नोट्स नहीं, बल्कि दशकों के अध्ययन और जीवन भर की भक्ति से। वे केवल कोई जमीन का विवाद नहीं लड़ रहे थे। वे बोल रहे थे एक बालक देवता, राम लला विराजमान, भगवान राम के बाल स्वरूप के लिए।

जब जज उन्हें कुर्सी देने की पेशकश करते हैं, तो वे मुस्कुराते हुए विनम्रता से मना कर देते हैं। “मैंने अपने पूरे जीवन में अपने मुवक्किलों के लिए खड़े होकर बहस की है,” वे धीरे से कहते हैं, “अपने स्वामी, श्री राम के लिए बहस करते हुए कैसे बैठ सकता हूं?”

वह पल पूरे भारत के दिल को छू गया। वह केवल कानून नहीं था। वह आस्था का जीवंत रूप था। के. परासरन का जीवन श्रीरंगम की प्राचीन परंपराओं और अयोध्या के आधुनिक न्यायालयों के बीच एक सुंदर पुल है। बचपन में रामायण पढ़ने वाले बालक से लेकर अपने समय की सबसे बड़ी कानूनी लड़ाई लड़ने वाले योद्धा तक, उनकी कहानी सरलता, विनम्रता और पवित्र कर्तव्य की मिसाल है।

यह है उस महान पुरुष की कहानी, जिन्होंने हर दिन धर्म जिया और दुनिया को दिखाया कि सच्ची ताकत शुद्ध हृदय और अटूट विश्वास से आती है।

श्रीरंगम में बचपन और जड़ें

केशव परासरन का जन्म 9 अक्टूबर 1927 को तमिलनाडु के पवित्र नगर श्रीरंगम में हुआ। यह प्राचीन तीर्थस्थल अपने भव्य श्री रंगनाथ स्वामी मंदिर के लिए विश्व प्रसिद्ध है। मंदिर की विशाल गलियां, ऊंचे गोपुरम, मंदिर की घंटियों की मधुर आवाज, आरती की सुगंध और वैष्णव भक्ति की लहरें हर कोने में व्याप्त रहती हैं। भगवान विष्णु यहां शेषशय्या पर विराजमान हैं और ऐसा लगता है जैसे पूरी भूमि भक्ति से ओत-प्रोत है। यहीं की पावन मिट्टी ने परासरन के जीवन की नींव रखी और उनके व्यक्तित्व को आकार दिया।

परासरन एक ऐसे पारिवारिक वातावरण में बड़े हुए जहां आस्था और विद्या एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़ी हुई थीं। उनके पिता श्री केशव अय्यंगर मद्रास हाई कोर्ट के सम्मानित वकील और गहरे वैदिक विद्वान थे। वे न केवल कानून के मर्मज्ञ थे बल्कि वेदों, उपनिषदों और पुराणों के भी पारंगत विद्वान थे। शाम होते ही घर में एक दिव्य माहौल बन जाता। पूरा परिवार इकट्ठा होता और पिता जी रामायण, महाभारत या भगवद्गीता के श्लोकों का पाठ करते। छोटे परासरन, मात्र सात वर्ष की कोमल आयु में, आंखें फाड़कर सुनते, हर शब्द को अपने हृदय में उतारते। जल्द ही वे स्वयं श्लोकों का पाठ करने लगे। रामायण उनके जीवन का अभिन्न अंग बन गई।

उन्होंने आजीवन रोजाना रामायण का पाठ जारी रखा चाहे दिन कितना व्यस्त क्यों न हो, चाहे वे दिल्ली के व्यस्त कोर्ट रूम में हों या मद्रास के घर में। “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” रामायण का यह अमर श्लोक उन्होंने बचपन से ही हृदय में बसाया। माता और मातृभूमि की महत्ता उनके पूरे व्यक्तित्व का आधार बन गई।

श्रीरंगम का जीवन अत्यंत सरल और संस्कारी था। घर में मंदिर की घंटियों की आवाज, सुबह-शाम की आरती और भजनों का गान गूंजता रहता। परासरन मंदिर जाते समय अक्सर नंगे पैर चलते। उन्हें लगता था कि जूतों के बिना भगवान के और निकट पहुंचा जा सकता है। यह बचपन की साधारण-सी आदत दशकों बाद 2019 में सुप्रीम कोर्ट के शीतल फर्श पर राम लला के लिए नंगे पैर खड़े होने के रूप में फिर से जीवंत हो उठी।

उनकी माता श्रीमती रंगनायकी एक साध्वी स्वभाव की, अत्यंत स्नेहिल और करुणामयी महिला थीं। उन्होंने बच्चों में सेवा, सत्य, विनम्रता और आत्मसंयम के गहरे संस्कार बोए। परिवार में कभी दिखावा नहीं होता था। भोजन सादा, जीवन सरल और भक्ति निरंतर रहती।

शिक्षा की यात्रा भी जड़ों से गहराई से जुड़ी रही। परासरन ने श्रीरंगम के स्थानीय स्कूलों में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। 1942 में हिंदू हाई स्कूल से एसएसएलसी उत्तीर्ण की। फिर मद्रास के प्रसिद्ध प्रेसीडेंसी कॉलेज से 1946 में अर्थशास्त्र में बीए किया और शास्त्री संस्कृत पदक से सम्मानित हुए। 1949 में मद्रास लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री पूरी की। यहां उन्होंने हिंदू कानून में जस्टिस वी. भाष्यम अय्यंगर गोल्ड मेडल, संस्कृत में जस्टिस सी.वी. कुमारस्वामी शास्त्री पदक और बार काउंसिल परीक्षा में जस्टिस के.एस. कृष्णस्वामी अय्यंगर मेडल जीते।

पिता का मार्गदर्शन उनका सबसे बड़ा खजाना था। पिता उन्हें कानूनी दस्तावेजों में मदद करने के साथ-साथ धर्म, न्याय, करुणा और नैतिकता का गहरा पाठ पढ़ाते। परासरन अक्सर कहा करते थे, “मेरे पिता मेरे पहले गुरु थे।” उन्होंने न केवल कानून सिखाया बल्कि यह भी सिखाया कि कानून और धर्म एक-दूसरे के पूरक हैं।

1949 में 22 वर्ष की आयु में उनका विवाह सरोजा से हुआ। सरोजा एक स्नेही, दानवीर और परिवार को समर्पित महिला थीं। दोनों का वैवाहिक जीवन पूर्ण समर्पण, समझ और साझा भक्ति का सुंदर उदाहरण था। उन्होंने पांच संतानें पालीं; तीन पुत्र मोहन, सतीश, बालाजी और दो पुत्रियां। तीनों पुत्र पिता की राह पर चले और कानून के क्षेत्र में नाम कमाया। मोहन परासरन भारत के सॉलिसिटर जनरल भी रहे। आज परिवार की चौथी पीढ़ी भी बार में सक्रिय है।

श्रीरंगम की मिट्टी ने परासरन को वह सब कुछ दिया जो बाद में उनके जीवन की सबसे बड़ी ताकत बनी; अटूट आस्था, अनुशासन, विनम्रता, सेवा का भाव और राम के प्रति गहरी लगन। मंदिर की छाया में बिताए बचपन के दिन उन्हें निरंतर सिखाते रहे कि सच्ची सफलता बाहरी चमक या पदवी में नहीं, बल्कि हृदय की शुद्धता, भक्ति और सत्यनिष्ठा में छिपी है।

कानूनी दिग्गज बनने की यात्रा

ये जड़ें कभी नहीं सूखीं। चाहे वे मद्रास हाई कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे हों, दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट में बहस कर रहे हों या राज्यसभा में भाषण दे रहे हों, श्रीरंगम की याद, मंदिर की घंटियां और रामायण की शिक्षा हमेशा उनके साथ रहीं। यही गहरी जड़ें एक दिन उन्हें अयोध्या पहुंचाकर राम लला की सेवा का सौभाग्य प्रदान करेंगी।

परासरन 1950 में मद्रास बार में वकील के रूप में पंजीकृत हुए। मात्र 23 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी कानूनी यात्रा शुरू की। शुरुआती दिन आसान नहीं थे। वे सुबह जल्दी उठकर मंदिर जाते, रामायण का पाठ करते और फिर कोर्ट पहुंच जाते। उनके पास कोई बड़ा ऑफिस या प्रभावशाली कनेक्शन नहीं था, केवल पिता से मिली नैतिकता, मेहनत और आशीर्वाद थे।

वे बहुत ही शांत स्वभाव के वकील थे। कोर्ट में कभी आवाज नहीं उठाते, न ही नाटकीय अंदाज अपनाते। उनकी दलीलें तथ्यों, कानूनी सिद्धांतों और नैतिकता पर आधारित होती थीं। मुवक्किल जल्दी ही उनकी ईमानदारी और गहरी तैयारी से प्रभावित होने लगे। वे छोटे-छोटे मुकदमों से शुरू करके धीरे-धीरे महत्वपूर्ण मामलों तक पहुंचे।

1958 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की। मद्रास से दिल्ली की यात्राएं अब नियमित हो गईं। परिवार को अकेला छोड़कर जाना आसान नहीं था, लेकिन सरोजा ने हमेशा पूर्ण समर्थन दिया। वे घर संभालतीं, बच्चों की पढ़ाई देखतीं और पति को प्रोत्साहित करतीं। परासरन अक्सर कहते, “सरोजा मेरी सबसे बड़ी शक्ति हैं।”

1975 में उन्हें सीनियर एडवोकेट का सम्मानित दर्जा मिला। अगले ही वर्ष तमिलनाडु में राष्ट्रपति शासन के दौरान वे राज्य के एडवोकेट जनरल नियुक्त हुए। इस पद पर उन्होंने बिना किसी पक्षपात के काम किया। सभी राजनीतिक दलों ने उनकी निष्पक्षता की सराहना की।

1980 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें भारत का सॉलिसिटर जनरल बनाया। तीन वर्ष बाद 1983 में वे देश के अटॉर्नी जनरल बन गए; यह कानूनी क्षेत्र का सर्वोच्च पद था। 1989 तक उन्होंने इंदिरा गांधी और राजीव गांधी दोनों के कार्यकाल में सेवा की। इस दौरान उन्होंने संवैधानिक मामलों, महत्वपूर्ण विवादों और राष्ट्रहित के कई मुकदमों को संभाला। उनकी दलीलें इतनी स्पष्ट और नैतिक होती थीं कि जज भी उन्हें ध्यान से सुनते।

फिर भी सफलता ने उन्हें कभी अहंकारी नहीं बनाया। वे हमेशा साधारण सफेद धोती-कुर्ता पहनते, सादा भोजन करते और जूनियर वकीलों को अपने पुत्र की तरह मानते। कई युवा वकील उन्हें “आचार्य” कहकर पुकारते। वे जूनियर्स को न केवल कानून सिखाते बल्कि जीवन के मूल्यों— विनम्रता, धैर्य और सत्य का भी पाठ पढ़ाते।

उनकी एक खास आदत थी; वे कानूनी दस्तावेज या ब्रीफ केवल शुभ मुहूर्त में ही खोलते। यह छोटी-सी रस्म दिखाती थी कि उनके लिए कानून भी भक्ति का एक रूप था। एक बार उन्होंने मित्रों से हल्के-फुल्के अंदाज में कहा, “1949 में मैंने अपनी पहली पत्नी सरोजा से विवाह किया। लेकिन बार में नामांकन के बाद मैंने दूसरी पत्नी ‘कानून’ से विवाह कर लिया।”

उनकी निष्ठा और योगदान को राष्ट्र ने भी स्वीकार किया। वर्ष 2003 में उन्हें पद्म भूषण और 2011 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। 2012 में राष्ट्रपति ने उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया, जहां उन्होंने 2018 तक शांत गरिमा के साथ सेवा की।

सभी उपलब्धियों के बीच परासरन अपनी जड़ों को कभी नहीं भूले। वे रोज रामायण का पाठ करते रहे। वे चुपचाप गरीब मुवक्किलों के मुकदमे बिना फीस के लड़ते। उनकी विनम्रता इतनी प्रसिद्ध थी कि सहयोगी कहते थे, “वे गरीब मुवक्किल से लेकर मुख्य न्यायाधीश तक, हर व्यक्ति के साथ समान सम्मान रखते हैं।”

एक जूनियर वकील ने याद किया, “परासरन साहब हमें गलती पर डांटते नहीं, बल्कि प्यार से समझाते। वे हमें अपने बच्चों जैसा महसूस कराते थे।”

अस्सी वर्ष की आयु पार करने के बाद भी वे भारतीय बार के “पितामह” कहलाने लगे। फिर भी वे खुद को हमेशा एक साधारण भक्त और न्याय का सेवक ही मानते थे। उन्हें यह नहीं पता था कि उनके जीवन की सबसे बड़ी और सबसे पवित्र परीक्षा अभी आगे थी— राम लला की सेवा की पुकार।

आस्था और धर्म में रचा-बसा जीवन

के. परासरन के लिए कानून और आस्था कभी अलग नहीं थे। वे श्रीरंगम के कावेरी नदी की तरह एक साथ बहते थे। उनके पूरे जीवन में भक्ति और कर्तव्य एक-दूसरे में घुले-मिले रहे।

बड़े वकील बनने के बाद भी उनकी दिनचर्या भक्ति से शुरू होती थी। हर सुबह ब्रह्म मुहूर्त में वे उठते, स्नान करते और वाल्मीकि रामायण के श्लोकों का पाठ करते। यह आदत बचपन से चली आ रही थी और उन्हें हर चुनौती में असीम शक्ति प्रदान करती थी। वे भगवान राम को अपना एकमात्र सच्चा स्वामी मानते थे। बाद में एक अटॉर्नी जनरल ने उनके बारे में कहा, “सर का केवल एक ही स्वामी है — भगवान राम।”

उनका घर दिल्ली या मद्रास में हो, हमेशा भक्ति का छोटा-सा मंदिर सा लगता। दीवारों पर भगवान राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान की सुंदर तस्वीरें और मूर्तियां सजी रहतीं। लेकिन इसमें कोई दिखावा या आडंबर नहीं होता था। परासरन गृहस्थ आश्रम में रहते हुए भी संन्यासी हृदय रखते थे। उन्होंने एक बार कहा था, “आसक्ति में आसक्त और आसक्ति से विरक्त।” अर्थात् परिवार और संसार में रहते हुए भी उनसे ऊपर उठकर भगवान में लीन रहना।

सरोजा के 2010 में स्वर्गवास के बाद उनकी भक्ति और गहरी हो गई। वे बच्चों और नाती-पोतों के साथ अधिक समय बिताते और उन्हें रामायण की कहानियां सुनाते। परिवार की चौथी पीढ़ी भी अब बार में आ चुकी है। परासरन अक्सर बच्चों को बताते, “रामायण केवल एक ग्रंथ नहीं, जीवन जीने की कला है।”

वे दृढ़ता से मानते थे कि सच्चा धर्म ही कानून की नींव है। संविधान को वे सूखा दस्तावेज नहीं, बल्कि न्याय, समानता और करुणा का जीवंत दर्शन मानते थे। राज्यसभा में भाषण देते समय या कोर्ट में बहस करते समय उनकी दलीलों में धर्म और नैतिकता की झलक साफ दिखती।

उनकी सरलता देखकर लोग हैरान रह जाते। वे महंगे कपड़े या लग्जरी कारों से दूर रहते। भोजन सादा— चावल, दाल, सब्जी और दही। विलासिता से पूरी तरह दूर। छोटी-छोटी खुशियों में उन्हें आनंद आता; सुबह की शांत सैर, परिवार के साथ समय या मंदिर में कुछ पल बिताना। जब कोई उनकी सफलता का राज पूछता तो वे मुस्कुराकर कहते, “सब भगवान की कृपा है। मैं तो केवल एक साधारण सेवक हूं।”

यह गहरा आंतरिक जीवन उन्हें सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र लड़ाई के लिए तैयार करता रहा। अयोध्या मामले में राम लला का प्रतिनिधित्व करने का अवसर जब आया, तो उन्होंने इसे पेशेवर काम नहीं, बल्कि भगवान का दिव्य आदेश माना। वे पिछले चालीस वर्षों से चुपचाप इस मामले का अध्ययन कर रहे थे। रामायण के ज्ञान और भक्ति की शक्ति ने उन्हें अदालत में भी अजेय बना दिया।

के. परासरन का जीवन सिखाता है कि सच्ची महानता बाहरी पदों या सम्मानों में नहीं, बल्कि निस्वार्थ सेवा और अटूट भक्ति में है। सुप्रीम कोर्ट की बहस हो या घर की पूजा, वे हर पल भगवान राम में रमे रहते थे।

सबसे बड़ी लड़ाई: राम लला के लिए नंगे पैर खड़े होना

वर्ष था 2019। भारत का सुप्रीम कोर्ट लंबे समय से चले आ रहे अयोध्या संपत्ति विवाद की सुनवाई कर रहा था। निचली अदालतों से गुजरने के बाद मामला सर्वोच्च पीठ तक पहुंचा। 92 वर्ष की आयु में के. परासरन राम लला विराजमान की ओर से मुख्य वकील के रूप में आगे आए।

उन्होंने पूरी निष्ठा से तैयारी की। सुबह 10:30 से रात तक वे दस्तावेजों, ऐतिहासिक रिकॉर्ड और प्राचीन ग्रंथों में डूबे रहते। उन्हें भगवान राम का मार्गदर्शन महसूस होता।

अगस्त में सुनवाई शुरू हुई तो एक अद्भुत घटना घटी। परासरन नंगे पैर कोर्ट रूम में आए। वे बैठने को तैयार नहीं थे। लगातार पांच दिनों तक वे चार-पांच घंटे खड़े रहकर बहस करते। जज उनकी उम्र और भक्ति देखकर प्रभावित हुए और कुर्सी की पेशकश की। उन्होंने सम्मानपूर्वक मना कर दिया। “मैंने पूरे जीवन में मुवक्किलों के लिए खड़े होकर बहस की है,” उन्होंने समझाया, “अपने स्वामी श्री राम के लिए बहस करते हुए कैसे बैठ सकता हूं?”

उनका स्वर कोमल लेकिन प्रभावशाली था। उन्होंने कोर्ट रूम में हर दिल को छूने वाला संस्कृत श्लोक पढ़ा: “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।” माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बड़ी हैं। उन्होंने बताया कि विवादित स्थल सदियों से हिंदुओं द्वारा भगवान राम का जन्मस्थान माना जाता रहा है।

परासरन अत्यंत स्पष्टता से बहस करते। उन्होंने समझाया कि राम लला एक न्यायिक व्यक्ति हैं, संपत्ति रखने में सक्षम। उन्होंने स्थल पर निरंतर हिंदू पूजा के प्रमाण प्रस्तुत किए। “एक बार मंदिर, हमेशा मंदिर,” वे दृढ़ता से बोले। उन्होंने ऐतिहासिक साक्ष्य दिए कि राम जन्मभूमि का विश्वास किसी संरचना से भी पहले से था।

एक नाटकीय क्षण में जब विपक्षी वकील ने राम मंदिर के नक्शे की प्रति फाड़ दी, तो परासरन शांत और गरिमामय रहे। उन्होंने क्रोध नहीं किया। उनका ध्यान सत्य और न्याय पर केंद्रित रहा।

स्वास्थ्य उनकी बाधा नहीं बना। उम्र के बावजूद उन्होंने अद्भुत सहनशक्ति दिखाई। जब सहयोगी रोजाना की सुनवाई के तनाव की चिंता करते तो परासरन प्यार से कहते, “मेरी एकमात्र इच्छा है कि मरने से पहले ये बहस पूरी कर लूं।”

चालीस वर्ष से अधिक समय से वे इस मामले को हृदय में संजोए हुए थे। अब अपने करियर के अंतिम चरण में उन्होंने ज्ञान और भक्ति का हर कण इसमें झोंक दिया। वे राम लला के बारे में बोलते जैसे देवता सचमुच उपस्थित हों। उनकी दलीलें कानून, इतिहास, पुरातत्व और आस्था को सहजता से जोड़ती थीं।

कोर्ट रूम कई बार शांत हो जाता जब वे रामायण से उद्धरण देते या प्राचीन रीति-रिवाज समझाते। जूनियर वकील श्रद्धा से देखते। पूरे भारत की मीडिया उनके शब्दों को प्रसारित करती। लोग उन्हें केवल वकील नहीं, बल्कि धर्म के लिए लड़ने वाले आधुनिक ऋषि के रूप में देखते।

9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। भूमि राम लला की हुई। जन्मभूमि पर मंदिर बनेगा। जजों ने करोड़ों की आस्था और प्रस्तुत प्रमाणों को स्वीकार किया।

परासरन को खबर सुनकर आंखें नम हो गईं। उनके लिए यह व्यक्तिगत जीत नहीं थी। भगवान राम से किए गए पवित्र वादे की पूर्ति थी। इसके बाद उन्हें श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का प्रथम ट्रस्टी नियुक्त किया गया। वे कोर्ट में दिखाई गई विनम्रता के साथ मंदिर निर्माण की देखरेख करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट में वह नंगे पैर खड़े होना पूरे राष्ट्र का प्रतीक बन गया। इसने सबको याद दिलाया कि कुछ लड़ाइयां बल से नहीं, बल्कि आस्था, धैर्य और प्रेम से लड़ी जाती हैं। के. परासरन ने दुनिया को दिखाया कि एक वृद्ध भक्त कैसे शांत दृढ़ता से पर्वत हिला सकता है।

अयोध्या अध्याय उनके जीवन का भावुक केंद्र था। इसने उनके दो महान प्रेमों, कानून और भगवान राम को एक चमकते क्षण में जोड़ दिया।

विरासत और शाश्वत प्रेरणा

आज के. परासरन करोड़ों को प्रेरित करते हैं। लगभग 99 वर्ष की आयु में भी वे आस्था और कर्तव्य से भरे जीवन का जीवंत उदाहरण हैं।

उनकी विरासत कोर्ट रूम से कहीं आगे तक फैली है। युवा वकील उनकी कोमल लेकिन प्रभावी वकालत शैली का अध्ययन करते हैं। भक्त उन्हें आधुनिक भक्त के रूप में देखते हैं जिनकी राम लला के प्रति भक्ति असीम थी। परिवार उनकी सरलता और सेवा के संदेश को याद रखते हैं।

अयोध्या का राम मंदिर अब एकता और भक्ति का प्रतीक बनकर खड़ा है। इसमें परासरन की भूमिका पीढ़ियों तक याद रहेगी। फिर भी उन्होंने कभी प्रशंसा नहीं चाही। उन्होंने बस वही किया जो उनका हृदय सही मानता था।

उनका परिवार उनके मूल्यों को आगे बढ़ा रहा है। पुत्र और नाती-पोते समान ईमानदारी से कानून का अभ्यास करते हैं। वे उनसे गहरे स्नेह और गर्व से बात करते हैं।

परासरन ने सिखाया कि धर्म जटिल नहीं है। यह सत्य जीना, निस्वार्थ सेवा करना और पूरे हृदय से भगवान से प्रेम करना है। एक विभाजित दुनिया में उनका जीवन शांत विश्वास की शक्ति दिखाता है।

वे बार के पितामह और राम लला के प्रिय भक्त बने हुए हैं। उनकी कहानी हर साधारण व्यक्ति को प्रोत्साहित करती है कि वह अपने आह्वान को असाधारण समर्पण से पूरा करे।

के. परासरन (केशव परासरन) की राम भक्ति एक अद्वितीय उदाहरण है, जिसमें कानूनी विद्वता और आध्यात्मिक समर्पण का अद्भुत मेल देखने को मिलता है। वे भारत के वरिष्ठतम वकीलों में से एक हैं (पूर्व महान्यायवादी) और राम जन्मभूमि मामले में रामलला विराजमान की ओर से प्रमुख वकील रहे। उनकी राम भक्ति केवल भावुकता नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक जुड़ाव और कर्म पर आधारित थी।

राम भक्ति के मुख्य पहलू

  • नंगे पैर अदालत में बहस: सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की सुनवाई के दौरान 90+ वर्ष की आयु में वे नंगे पैर खड़े होकर 4-5 घंटे तक लगातार दलीलें देते थे। वे कहते थे कि भगवान राम की ओर से बहस करते समय वे बैठ नहीं सकते। यह उनकी गहरी श्रद्धा का प्रतीक था।
  • आध्यात्मिक जुड़ाव: उन्होंने खुद कहा कि उन्हें हमेशा से भगवान राम के साथ आध्यात्मिक संबंध महसूस होता है। इसी वजह से उन्होंने यह केस लड़ा। वे प्रतिदिन वाल्मीकि रामायण के कुछ सर्ग पढ़ते थे।
  • राम मंदिर ट्रस्ट: राम मंदिर निर्माण के बाद बने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पहले ट्रस्टी बने। उनके घर का पता ही ट्रस्ट का आधिकारिक पता बना। वे अयोध्या जाकर रामलला के दरबार में पूजा-अर्चना भी करते रहे और परिवार सहित दर्शन करने जाते थे।

उनकी राम भक्ति के कुछ उल्लेखनीय उदाहरण

  • कोर्ट में दलीलें: उन्होंने कहा, “एक बार मंदिर हमेशा मंदिर रहता है” (Once a temple, always a temple)। भागवत गीता का हवाला देते हुए उन्होंने राम जन्मभूमि को देवता स्वरूप सिद्ध किया।
  • समर्पण: 93 वर्ष की आयु में भी वे रोजाना केस की तैयारी करते और अदालत में रामलला के लिए “पहाड़” बनकर खड़े रहते। उनकी भक्ति को “किसी उपमा की मोहताज नहीं” कहा गया।
  • अयोध्या दर्शन: फैसले के बाद वे परिवार और साथी वकीलों के साथ अयोध्या पहुंचे, रामलला को सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रति सौंपी और पूजा की।

परासरन जी की राम भक्ति केवल केस लड़ने तक सीमित नहीं थी, बल्कि जीवन भर की साधना थी। वे राम को अपना इष्ट मानते थे और कानूनी लड़ाई को भी भक्ति का हिस्सा बनाया। उनकी इस निष्ठा ने लाखों राम भक्तों को प्रेरणा दी।

जय श्री राम! उनकी भक्ति सच्चे समर्पण का प्रतीक है।

के. परासरन (केशव परासरन) के अन्य प्रमुख केस उनकी लंबी कानूनी यात्रा (60+ वर्ष) को दर्शाते हैं। वे भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल (1983-1989) और सॉलिसिटर जनरल रहे, तथा संवैधानिक, धार्मिक और सार्वजनिक हित के कई महत्वपूर्ण मुकदमों में शामिल रहे। अयोध्या राम जन्मभूमि मामले के अलावा उनकी प्रसिद्धि मुख्य रूप से निम्नलिखित केसों से जुड़ी है:

  1. सबरीमाला मंदिर मामले (Sabarimala Case): परासरन जी ने नायर सर्विस सोसाइटी की ओर से भगवान अयप्पा (लॉर्ड अय्यप्पा) का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने 10-50 वर्ष की महिलाओं के मंदिर प्रवेश पर प्रतिबंध का बचाव किया। दलील: अयप्पा नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं। उन्होंने रामायण के श्लोकों का हवाला देकर देवता की ब्रह्मचर्य परंपरा को समझाया। यह केस धार्मिक स्वतंत्रता और मंदिर परंपराओं पर केंद्रित था।
  2. राम सेतु (सेतुसमुद्रम) मामले (Ram Setu / Sethusamudram Case): उन्होंने राम सेतु को धार्मिक महत्व का प्रतीक बताते हुए परियोजना का विरोध किया। तर्क: राम सेतु लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र है। इसे नुकसान पहुंचाना धार्मिक भावनाओं का अपमान है। उन्होंने कहा कि बड़े पैमाने पर विश्वास रखने वाले लोगों के लिए यह पवित्र स्थल है, इसलिए इसे छेड़ना उचित नहीं।
  3. अमरावती किसान मामले (Amaravati Farmers Case): आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा अमरावती को राजधानी बनाने के मामले में किसानों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में बहस की। उन्होंने किसानों के हितों की रक्षा के लिए न्यूनतम फीस (केवल ₹1) लेकर केस लड़ा। यह केस राज्य सरकार की नीतियों और किसान अधिकारों से संबंधित था।

अन्य उल्लेखनीय केस (संवैधानिक और महत्वपूर्ण)

परासरन जी ने कई ऐतिहासिक संवैधानिक मामलों में हिस्सा लिया, जैसे:

  • गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967): संसद की संशोधन शक्ति पर।
  • इंडियन एक्सप्रेस न्यूजपेपर्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1985): प्रेस की स्वतंत्रता पर क्लासिक केस।
  • इंदिरा साहनी (मंडल केस): OBC आरक्षण पर।
  • एस.आर. बोम्मई बनाम यूनियन ऑफ इंडिया: अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) पर।
  • टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन और पी.ए. इनामदार: निजी शैक्षणिक संस्थानों के अधिकार पर।
  • केहर सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया: राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति पर।
  • अंतर-राज्य नदी जल विवाद: (जैसे कावेरी जल विवाद)।

उनकी कानूनी शैली

परासरन जी की विशेषता गहन शोध, शास्त्रों (विशेषकर हिंदू धर्मग्रंथों) का ज्ञान और नैतिकता थी। वे कहते थे कि हर केस महत्वपूर्ण है, लेकिन बिना फीस वाले या पब्लिक इंटरेस्ट के केसों में वे विशेष रूप से समर्पित रहते थे। उनकी बहस में कानूनी तर्क के साथ धार्मिक और नैतिक आयाम भी जुड़ते थे।

परासरन जी को “भारतीय बार का पितामह” कहा जाता है। उनकी कानूनी विरासत संवैधानिक कानून, धार्मिक स्वतंत्रता और जनहित से जुड़ी हुई है। अयोध्या केस उनकी आध्यात्मिक भक्ति का प्रतीक था, जबकि अन्य केस उनकी व्यावसायिक निपुणता को दर्शाते हैं।

उनकी यात्रा युवा वकीलों के लिए प्रेरणा है।

के. परासरन जी की राम लला के प्रति समर्पण

के. परासरन जी की राम लला विराजमान के प्रति भक्ति और समर्पण एक अनुपम उदाहरण है, जिसमें कानूनी विद्वता, गहन आध्यात्मिकता और पूर्ण निष्ठा का अद्भुत संगम दिखता है। उन्होंने अयोध्या राम जन्मभूमि मामले को कभी मात्र कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि भक्ति का यज्ञ माना।

बचपन से शुरू हुई अनवरत राम भक्ति

परासरन जी का जन्म 9 अक्टूबर 1927 को तमिलनाडु के श्रीरंगम में हुआ। सात वर्ष की आयु से उन्होंने प्रतिदिन वाल्मीकि रामायण के कुछ सर्ग पढ़ने की परंपरा शुरू की, जो आज 97 वर्ष की आयु में भी बिना एक दिन छोड़े जारी है।

उनके पिता केशव अय्यंगर वैदिक विद्वान और वकील थे। घर में रामायण, वेद और पुराणों का पावन वातावरण था, जिसने बचपन से ही उनके हृदय में भगवान राम के प्रति गहरी आस्था जगा दी। वे राम को अपना इष्टदेव मानते थे और कहा करते थे कि “राम ने मेरे जीवन को परिभाषित और बदल दिया है।” यही बचपन की साधना बाद में राम लला के केस में उनके पूर्ण समर्पण का आधार बनी।

राम लला के प्रति अनन्य समर्पण

  • नंगे पैर खड़े होकर बहस: 92-93 वर्ष की उम्र में सुप्रीम कोर्ट में वे नंगे पैर खड़े होकर 4-5 घंटे तक लगातार दलीलें देते थे। बेंच ने कई बार बैठने को कहा, पर उन्होंने स्पष्ट मना कर दिया। उनका कहना था “भगवान राम लला की ओर से बहस करते समय मैं बैठ नहीं सकता।”
  • व्यक्तिगत भावना: उन्होंने भावुक होकर कहा था “राम मंदिर मामले में जो दलीलें मैंने दीं, वे मेरी आस्था, भक्ति और भगवान राम के प्रति समर्पण के कारण थीं। मैंने यह केस केवल राम लला के लिए लड़ा।”
  • अंतिम इच्छा: उन्होंने बार-बार कहा “मरने से पहले मेरी अंतिम इच्छा है कि यह केस पूरा हो जाए।” और “राम ने मेरे जीवन को परिभाषित किया है। मेरी अंतिम इच्छा है कि उनके जन्मस्थान पर मंदिर बने।”
  • अदालत में राम की उपस्थिति: सुनवाई के दौरान वे महसूस करते थे कि भगवान राम स्वयं अदालत में विराजमान हैं। वे कहते थे “राम हर जगह हैं घर में, बाहर और अदालत में भी।”
  • अयोध्या यात्रा: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद वे पूरे परिवार के साथ अयोध्या गए, राम लला को अदालत के आदेश की प्रति सौंपी और पूजा-अर्चना की। बाद में वे श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के प्रमुख ट्रस्टी बने।

उनकी भक्ति की विशेषताएँ

  • राम लला के केस को उन्होंने बिना फीस या न्यूनतम फीस पर लड़ा। इसे धन-लाभ से परे भक्ति का कार्य माना।
  • बहस के दौरान वेद, रामायण, गीता और हिंदू शास्त्रों का गहरा ज्ञान प्रस्तुत किया। उनकी प्रसिद्ध दलील थी “एक बार मंदिर, हमेशा मंदिर” (Once a temple, always a temple)।
  • उम्र और स्वास्थ्य की कोई परवाह नहीं की। उन्होंने लगातार 5 दिनों तक बहस की।

परासरन जी को “भारतीय बार का पितामह” और “राम लला के वकील” कहा जाता है। उनकी भक्ति केवल अदालत तक सीमित नहीं थी, बल्कि जीवन भर की तपस्या थी। उन्होंने खुद को “निमित्त मात्र” माना— राम की इच्छा का साधन।

जय श्री राम!

परासरन जी की बचपन से शुरू हुई और जीवन भर चली यह अनन्य राम भक्ति करोड़ों राम भक्तों के लिए सदा प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी। राम लला की कृपा उन पर सदैव बनी रहे।

निष्कर्ष और श्रद्धांजलि

जब श्रीरंगम के मंदिर के शिखरों पर सूर्यास्त होता है और अयोध्या के नए मंदिर पर सूर्योदय, तब के. परासरन की यात्रा पूरी होती महसूस होती है। रामायण की कहानियां सुनने वाले बालक से लेकर सर्वोच्च न्यायालय में राम लला की आवाज बनने वाले वकील तक, उन्होंने शुद्ध भक्ति का मार्ग तय किया।

उनका जीवन हमें बताता है कि आस्था से युवा हृदय रखने वाले के लिए उम्र कोई बाधा नहीं। विनम्रता सबसे बड़ी शक्ति है। और दिव्य प्रेम किसी भी चुनौती को पवित्र अर्पण बना सकता है।

हम इस अद्भुत आत्मा को नमन करते हैं। उनका उदाहरण सभी उन लोगों के लिए प्रकाश स्तंभ बने जो सत्य, न्याय और भगवान राम की कृपा की खोज में हैं।

जय श्री राम।

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