जब 'डोलियों' में सज कर आई मौत, भेष बदल कर खिलजी की जिहादी फौज को उनके ही कैंप में घुसकर काटने वाले 'गोरा और बादल', रानी पद्मिनी की रक्षा के लिए दो हिंदू शेरों का महा-तांडव

जब ‘डोलियों’ में सज कर आई मौत, भेष बदल कर खिलजी की जिहादी फौज को उनके ही कैंप में घुसकर काटने वाले ‘गोरा और बादल’, रानी पद्मिनी की रक्षा के लिए दो हिंदू शेरों का महा-तांडव

साल 1303 ईसवी में दिल्ली के तख्त पर एक ऐसा खूंखार और अय्याश सुल्तान बैठा था, जिसकी हवस और दरिंदगी के किस्से सुनकर ही लोगों की रूह कांप जाती थी, और वो था अलाउद्दीन खिलजी!

ये कोई ऐसा राजा नहीं था जो सिर्फ अपने साम्राज्य की सीमाएं बढ़ाना चाहता हो, बल्कि ये वो जिहादी भेड़िया था जिसकी गंदी और नीच नज़रें मेवाड़ की महारानी, मां पद्मिनी की सुंदरता पर गड़ी हुई थीं।

खिलजी अपनी पूरी जिहादी फौज और बड़े-बड़े कमांडरों को लेकर चित्तौड़गढ़ किले के बाहर आ धमका।

महीनों तक खिलजी की उस लाखों की जेहादी फौज ने चित्तौड़ के किले को बाहर से घेरे रखा। लेकिन राजपूती तलवारों और चित्तौड़ की उन अभेद्य दीवारों के सामने खिलजी की एक न चली।

तो खिलजी ने बड़ी चालाकी से मेवाड़ के राजा रावल रतन सिंह को ‘दोस्ती’ और ‘शांति समझौते’ का झांसा दिया। उसने कहा की वो सिर्फ एक बार राजा से निहत्थे मिलना चाहता है और फिर वापस दिल्ली लौट जाएगा।

रावल रतन सिंह उस कायर की बातों में आ गए। जैसे ही राजा रतन सिंह खिलजी के कैंप में उससे मिलने पहुंचे, खिलजी के जिहादी कुत्तों ने उन पर हमला कर दिया।

उस नीच सुल्तान ने धोखे से रतन सिंह को बंदी बना लिया और उन्हें भारी ज़ंजीरों में जकड़ कर अपने तंबू में डाल दिया। खिलजी को लगा की अब चित्तौड़ बिना राजा के टूट जाएगा और महारानी पद्मिनी उसकी हवस का शिकार बनेंगी।

महारानी पद्मिनी की रक्षा के लिए खौला राजपूती खून, ‘गोरा और बादल’ ने रची जिहादियों को उनके तंबू में काटने की खौफनाक साज़िश

रावल रतन सिंह को बंदी बनाने के बाद अलाउद्दीन खिलजी के अहंकार की कोई सीमा नहीं रही। उस हवस के अंधे सुल्तान ने चित्तौड़ के किले में एक ऐसा ज़लील फरमान भेजा, जिसे सुनकर पूरे राजपूताना का खून खौल उठा।

खिलजी ने संदेश भिजवाया की “अगर अपने राजा को ज़िंदा देखना चाहते हो, तो तुरंत रानी पद्मिनी को मेरे हरम में सौंप दो। अगर महारानी मेरे पास नहीं आई, तो तुम्हारे राजा का सिर काटकर किले के दरवाज़े पर लटका दूंगा।”

ये फरमान सुनते ही मेवाड़ के सेनापति ‘गोरा’ और उनके युवा भतीजे ‘बादल’ ने अपनी तलवारों की मूठ पर हाथ रखा। ये दोनों जालौर के चौहान वंश के वो खूंखार हिंदू शेर थे जिनकी रगों में सिर्फ और सिर्फ जिहादियों का खून पीने की प्यास दौड़ रही थी।

गोरा और बादल ने पूरे दरबार में कसम खाई की-

“जब तक हमारे शरीर में खून की आखिरी बूंद बाकी है, जब तक हमारे धड़ पर हमारा सिर टिका है, किसी जिहादी कुत्ते की परछाईं भी हमारी महारानी पद्मिनी को छू नहीं सकती। हम अपने राजा को उस शैतान के जबड़े से भी वापस खींच कर लाएंगे।”

रानी पद्मिनी, गोरा और युवा बादल ने मिलकर एक ऐसा ‘मास्टरप्लान’ तैयार किया, जिसकी भनक खिलजी के जासूसों को भी नहीं लग पाई।

चित्तौड़ से खिलजी के कैंप में संदेश भेजा गया की-

“महारानी पद्मिनी आ रही हैं। लेकिन वो अकेली नहीं आएंगी, उनके साथ उनकी 700 खास दासियां भी पालकियों (डोलियों) में सज कर आएंगी। और जब तक महारानी अपने राजा से आखिरी बार मिल नहीं लेतीं, कोई भी सैनिक उनकी डोलियों के आसपास नहीं फटकेगा।”

खिलजी अपनी हवस और जीत के नशे में इतना अंधा हो चुका था की उसने बिना कुछ सोचे-समझे इस शर्त को मान लिया। उसे लगा की राजपूतों ने घुटने टेक दिए हैं।

औरतों के लिबास में मौत बनकर निकले ‘गोरा और बादल’, 700 डोलियों से शुरू हुआ खिलजी की फौज का भयंकर कत्लेआम

वो दिन आ गया। चित्तौड़ के किले से 700 सजी-धजी डोलियां (पालकियां) धीरे-धीरे खिलजी के कैंप की तरफ बढ़ने लगीं।

दूर से देखने पर ऐसा लग रहा था जैसे सच में औरतें उन डोलियों में बैठकर आ रही हैं। खिलजी का पूरा जिहादी कैंप जश्न में डूबा हुआ था।

सुल्तान के कमांडर और सैनिक शराब के नशे में चूर थे। उन्हें लग रहा था की आज रात तो दिल्ली के सुल्तान की सबसे बड़ी जीत होने वाली है।

लेकिन उन 700 डोलियों के अंदर कोई औरतें या दासियां नहीं बैठी थीं! उन डोलियों के अंदर छुपकर बैठे थे मेवाड़ के वो खूंखार और फौलादी राजपूत शेर, जो पूरी तरह से हथियारों से लैस थे।

जैसे ही ये 700 पालकियां खिलजी के उस सुरक्षित और अभेद्य माने जाने वाले तंबू के अंदर पहुंचीं, गोरा और बादल ने इशारा कर दिया। खिलजी अपने सिंहासन पर लार टपकाते हुए बैठा था, उसे लगा की किसी डोली से महारानी बाहर आएंगी।

तभी अचानक एक भयंकर आवाज़ के साथ पालकियों के पर्दे फाड़ दिए गए। औरतों के लिबास उतार कर फेंक दिए गए।

और उन डोलियों से मौत का तांडव करते हुए बाहर निकले गोरा, बादल और उनके 700 राजपूत योद्धा! ‘हर हर महादेव’ और ‘जय भवानी’ के नारों से खिलजी का वो पूरा तंबू गूंज उठा।

इससे पहले की नशे में धुत खिलजी के सिपहसालारों को कुछ समझ आता, राजपूती तलवारें हवा में लहराने लगीं। जिहादियों की गर्दनें धड़ से अलग होकर ज़मीन पर गिरने लगीं।

तंबू के अंदर ऐसा भयंकर कत्लेआम मचा की खिलजी के सैनिक अपनी जान बचाने के लिए एक-दूसरे के ऊपर गिरकर भागने लगे। राजपूत शेरों ने खिलजी की उस अजेय फौज को उन्हीं के कैंप में घुसकर काटा। पूरे कैंप में खून की नदियां बह निकलीं।

बिना ‘शीश’ के लड़ता रहा ‘गोरा’, और भतीजे ‘बादल’ ने दिखाई जिहादियों को औकात, राजपूती शौर्य का वो अजेय महा तांडव

उस खौफनाक अफरातफरी और मौत के नंगे नाच के बीच, गोरा और बादल का एक ही लक्ष्य था- रावल रतन सिंह को सही सलामत वहां से निकालना।

डोलियों में छुपकर आए लोहारों ने पलक झपकते ही रावल रतन सिंह की भारी ज़ंजीरें काट दीं। युवा बादल ने अपनी तलवार से जिहादियों का सीना चीरते हुए रास्ता बनाया और राजा रतन सिंह को तुरंत एक तेज़ घोड़े पर बिठाकर सुरक्षित चित्तौड़ किले की तरफ रवाना कर दिया।

राजा तो निकल गए, लेकिन अब असली धर्मयुद्ध शुरू होना था। लाखों की जिहादी फौज अब हथियारों के साथ तंबू के बाहर इकट्ठा हो गई थी। खिलजी बौखला गया था।

लेकिन राजा सुरक्षित किले तक पहुंच जाएं, इसके लिए उन्हें रोकना ज़रूरी था। ऐसे में चाचा गोरा ने वहीं रुकने का फैसला किया। गोरा ने अकेले ही खिलजी की उस भारी-भरकम फौज का रास्ता रोक लिया।

गोरा की तलवार उस दिन ऐसा खौफनाक कहर ढा रही थी की जिहादी सैनिक उनके पास फटकने से भी खौफ खा रहे थे।

जो भी गोरा के सामने आता, वो दो टुकड़ों में कटकर ज़मीन पर गिर जाता। अलाउद्दीन खिलजी अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था की मुट्ठी भर राजपूत उसकी इतनी विशाल सेना का ऐसा कचूमर निकाल सकते हैं।

खिलजी के सैनिक आमने-सामने की लड़ाई में गोरा को नहीं हरा पाए, तो उन्होंने फिर से कायरता दिखाई। पीछे से एक जिहादी ने धोखे से वार करके वीर गोरा का सिर धड़ से अलग कर दिया।

लेकिन राजपूती खून का उबाल तो देखिए! सिर कटने के बाद भी गोरा ज़मीन पर नहीं गिरे। बिना सिर के, वो खूंखार धड़ दोनों हाथों में तलवारें लेकर जिहादियों को काटता रहा!

ये वो चमत्कारी और खौफनाक दृश्य था जिसे देखकर जिहादी सेना में भगदड़ मच गई।

उधर युवा बादल भी मेवाड़ का गौरव बचाते हुए, अपनी मातृभूमि के लिए दुश्मनों को काटते-काटते वीरगति को प्राप्त हो गया।

लेकिन मरने से पहले इन दोनों चाचा-भतीजे ने जो महा-तांडव किया था, उसने खिलजी के उस जिहादी अहंकार को हमेशा के लिए जूतों तले कुचल दिया था।

गोरा और बादल का ये बलिदान इस बात का ऐलान था की हिंदू और राजपूताना कभी किसी के सामने घुटने नहीं टेकता।

हर हर महादेव! जय भवानी!

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