इतिहास का सबसे बड़ा चमत्कार या मुगलों की औकात? केवल 5 घुड़सवारों और 25 सैनिकों के दम पर छत्रसाल बुंदेला ने कर दिया औरंगज़ेब की सल्तनत का महा-विनाश

हमारे स्कूलों और कॉलेजों में बैठे उन वामपंथी कसाइयों और लिबरल गैंग ने हमारे बच्चों के दिमाग में ऐसा ज़हर घोल दिया है की मुगलों को तो कोई हरा ही नहीं सकता था। 

हमें बचपन से यही रटाया गया की मुगलों की फौज लाखों की थी, उनके पास बारूद था, बड़ी-बड़ी तोपें थीं, और हम हिंदू तो बस हमेशा पिटते ही रहे। इन जेएनयू (JNU) छाप इतिहासकारों ने उस खूंखार और जेहादी औरंगज़ेब को एक ऐसा ‘अजेय सुपरहीरो’ बनाकर पेश किया, जिससे पूरा देश खौफ खाता था।

अरे भाई, ये सबसे बड़ा और सबसे गंदा सफेद झूठ है! अगर मुगलों की लाखों की फौज इतनी ही ताकतवर थी, तो फिर कैसे एक 22 साल के नौजवान ने सिर्फ 5 घोड़ों और 25 पैदल सैनिकों के साथ उस औरंगज़ेब की पूरी मुगलिया सल्तनत की ईंट से ईंट बजा दी थी? जी हां, सिर्फ 5 घुड़सवार और 25 सैनिक!

बात उस खौफनाक दौर की है जब दिल्ली के तख्त पर वो जल्लाद औरंगज़ेब बैठा था। उस जिहादी राक्षस के हाथों रोज़ हजारों हिंदुओं का जबरन खतना किया जा रहा था, काशी-मथुरा के हमारे पवित्र मंदिरों को गिराया जा रहा था। पूरे देश में एक अजीब सा खौफ और मातम पसरा था। ऐसा लग रहा था जैसे सनातन धर्म की लौ अब बुझने ही वाली है।

लेकिन कहते हैं ना की जब-जब असुरों का आतंक बढ़ता है, तब-तब इसी मिट्टी से कोई ना कोई परशुराम या भवानी का भक्त जन्म लेता है। बुंदेलखंड की उस ऊबड़-खाबड़ और तपती हुई माटी से एक ऐसा हिंदू शेर उठा, जिसने मुगलों की उस ‘अजेय’ होने की गलतफहमी को उन्हीं के खून से धो डाला। 

उस शेर का नाम था- महाराजा छत्रसाल बुंदेला। वो छत्रसाल जिसने औरंगज़ेब को दिन में तारे दिखा दिए और बता दिया की जेहादियों की असली औकात क्या होती है जब कोई सनातनी अपनी तलवार पर खून का तिलक लगा लेता है। 

ये लेख उसी शौर्य की धधकती हुई गाथा है, जिसे सेक्युलर ईकोसिस्टम ने जानबूझकर इतिहास की किताबों में दफना दिया।

मुगलों की गद्दारी से अनाथ हुए 12 साल के छत्रसाल बुंदेला, उनकी प्रतिज्ञा जिसने औरंगज़ेब के गुरूर को जूतों तले कुचल दिया

महाराजा छत्रसाल के खून में मुगलों के खिलाफ वो बगावत कोई रातों-रात पैदा नहीं हुई थी। ये बगावत उन्हें अपने शूरवीर माता-पिता से विरासत में मिली थी। 

उनके पिता चंपत राय बुंदेला और माता रानी लाल कुंवर (सारंधा) वो योद्धा थे, जिन्होंने औरंगज़ेब की नींदें हराम कर रखी थीं। 

चंपत राय जी ने बुंदेलखंड के बीहड़ों में मुगलों की फौज को चने चबवा दिए थे। मुगलों के बड़े-बड़े सिपहसालार चंपत राय का नाम सुनकर ही कांपने लगते थे।

पर हमारे हिंदू समाज का सबसे बड़ा दुर्भाग्य क्या है? गद्दारी! जब मुगल चंपत राय जी को आमने-सामने की लड़ाई में नहीं हरा पाए, तो उन्होंने हमारे ही बीच के कुछ जयचंदों और गद्दारों को रुपयों का लालच देकर खरीद लिया। 

अपने ही रिश्तेदारों की गद्दारी और धोखेबाज़ी के चलते चंपत राय जी और रानी लाल कुंवर मुगलों की एक बहुत बड़ी फौज के बीच घिर गए। 

जब उन्हें लगा की अब मुगलों के उन नापाक और जेहादी हाथों में पड़ना तय है, तो उन दोनों पति-पत्नी ने एक-दूसरे की छाती में कटार उतार कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। उन्होंने हंसते-हंसते मौत को गले लगा लिया, लेकिन मुगलों के आगे घुटने नहीं टेके।

ज़रा उस मंज़र की कल्पना कीजिए! उस वक्त छत्रसाल की उम्र मुश्किल से 11 या 12 साल रही होगी। एक 12 साल का मासूम बच्चा, जिसके सामने उसके शूरवीर मां-बाप के कटे हुए शीश पड़े हों। 

मुगलों ने उनके माता-पिता के शवों का जो अपमान किया, उसे देखकर उस 12 साल के बच्चे की रगों में बहने वाला खून एकदम खौल उठा। 

कोई और आम बच्चा होता तो डर कर किसी कोने में दुबक जाता या रो-रो कर अपनी जान दे देता। लेकिन छत्रसाल कोई आम मिट्टी के नहीं बने थे।

उसी दिन, अपने माता-पिता की चिता की राख माथे पर लगाकर उस अनाथ बच्चे ने एक खौफनाक प्रतिज्ञा ली। 

उसने कसम खाई की जब तक वो बुंदेलखंड की धरती से एक-एक मुगल को काटकर बाहर नहीं फेंक देगा, जब तक वो औरंगज़ेब के उस जेहादी गुरूर को जूतों तले नहीं कुचल देगा, तब तक वो चैन से नहीं सोएगा। 

ये कोई बच्चों का खेल नहीं था। ये एक ऐसे महा-विनाश की शुरुआत थी जिसने आगे चलकर मुगल साम्राज्य की जड़ें उखाड़ दीं। 

अपने मामा के घर छुपकर रहते हुए छत्रसाल ने तलवारबाज़ी सीखी, घुड़सवारी सीखी और अपनी उम्र से कई गुना बड़े मुगलों के गले काटने की खौफनाक तैयारी शुरू कर दी।

सिर्फ 5 घुड़सवारों और 25 पैदल सैनिकों के दम पर छत्रसाल बुंदेला ने लिखा मुगलों की सल्तनत का महा-विनाश

जब छत्रसाल 22 साल के गठीले और आग उगलते हुए नौजवान बन गए, तो उनके अंदर की ज्वाला और भड़क उठी। 

उस वक्त दक्षिण भारत में छत्रपति शिवाजी महाराज नाम का एक ही हिंदू सूरज चमक रहा था जिसने मुगलों की छाती पर अपना भगवा झंडा गाड़ रखा था। छत्रसाल को लगा की उन्हें शिवाजी महाराज की सेना में शामिल होकर मुगलों को काटना चाहिए।

यही सोचकर वो 1668 में दक्षिण के बीहड़ों में छत्रपति शिवाजी महाराज से मिलने पहुंच गए। वो मुलाकात कोई आम मुलाकात नहीं थी भाई! 

वो भारत के इतिहास का वो ज्वालामुखी था जिसे वामपंथियों ने बड़ी चालाकी से हमसे छुपा लिया। जब शिवाजी महाराज ने उस नौजवान की आंखों में वो खून और वो प्रतिज्ञा देखी, तो उन्होंने छत्रसाल को अपनी सेना में एक मामूली सिपाही बनाने से साफ इंकार कर दिया।

शिवाजी महाराज ने छत्रसाल को अपनी ही ‘भवानी’ तलवार भेंट की और एक ऐसी दहाड़ लगाई जिसने छत्रसाल के रोम-रोम में आग भर दी। 

शिवाजी ने कहा- “हे वीर बुंदेले! तुम मेरी सेना में रहकर मुगलों से क्यों लड़ना चाहते हो? जाओ, वापस अपने बुंदेलखंड जाओ। वहां जाकर अपना खुद का हिंदू स्वराज्य खड़ा करो। मुगलों की छाती पर अपना झंडा गाड़ो और बता दो की हम हिंदू किसी के गुलाम नहीं हैं!”

शिवाजी की वो ललकार सुनकर छत्रसाल बुंदेलखंड लौट आए। लेकिन उनके पास था क्या? ना कोई खज़ाना था, ना कोई सेना थी, ना कोई किले थे और ना ही कोई बड़ी रसद। उनके साथ सिर्फ उनके बचपन के 5 दोस्त थे जिनके पास घोड़े थे, और 25 आम पैदल सैनिक थे। ज़रा सोचिए इस पागलपन को!

दिल्ली में बैठे उस खूंखार औरंगज़ेब के पास लाखों की फौज, हज़ारों तोपें और अथाह खज़ाना था। और उसके खिलाफ बग़ावत का झंडा किसने उठाया? एक अनाथ 22 साल के लड़के ने, जिसके पास कुल जमा 5 घोड़े और 25 सैनिक थे!

आज के लिबरल और डरपोक लोग इसे ‘सुसाइड मिशन’ कहते। लेकिन छत्रसाल ने जो किया, उसने मुगलों की अजेयता के उस सफेद झूठ के चिथड़े उड़ा दिए। 

उन्होंने विंध्य के पहाड़ों और घने जंगलों को अपना हथियार बनाया। इसे कहते हैं ‘गुरिल्ला युद्ध’। रातों-रात मुगलों की चौकियों पर धावा बोलना, उनके सिपाहियों की गर्दनें काटना, मुगलों का खज़ाना लूटना और वापस जंगलों में गायब हो जाना। मुगलों की समझ में ही नहीं आ रहा था की ये भूत है या इंसान!

छत्रसाल ने उन गरीब किसानों, मज़दूरों और वनवासियों को अपनी सेना में जोड़ा जिन्हें मुगलों ने सताया था। धीरे-धीरे वो 5 घुड़सवार 50 में बदले, 50 से 500 हुए और देखते ही देखते बुंदेलखंड की घाटियों में मुगलों की लाशों के अंबार लगने लगे। 

औरंगज़ेब जो समझ रहा था की चंपत राय के मरने के बाद बुंदेलखंड शांत हो गया है, अब उसी बुंदेलखंड से उसे रोज़ अपने कमांडरों के कटे हुए सिरों का तोहफा मिलने लगा।

गुरु प्राणनाथ का ईश्वरीय आशीर्वाद और बुंदेलखंड में छत्रसाल बुंदेला ने बिछा दिया औरंगजेब कमांडरों का कब्रगाह

लेकिन सिर्फ तलवारों और जज़्बे से इतनी बड़ी मुगलिया सल्तनत को लंबे समय तक नहीं रोका जा सकता था। युद्ध लड़ने के लिए पैसा चाहिए होता है, हथियार चाहिए होते हैं। 

छत्रसाल की सेना बढ़ रही थी, लेकिन खज़ाना खाली था। मुगल पूरी ताकत से बुंदेलखंड पर टूट पड़े थे। ऐसे में जब छत्रसाल को लगा की अब शायद सब कुछ खत्म हो जाएगा, तब उनके जीवन में साक्षात ईश्वर का आशीर्वाद बनकर आए महामति स्वामी प्राणनाथ जी!

स्वामी प्राणनाथ जी कोई आम संत नहीं थे, वो सनातन धर्म के वो प्रखर रक्षक थे जिन्हें मालूम था की बिना शस्त्र उठाए इस धर्म को बचाया नहीं जा सकता। 

जब छत्रसाल ने अपने गुरु के चरणों में सिर रखा, तो गुरु प्राणनाथ ने उन्हें अपनी तलवार दी और एक ऐसी भविष्यवाणी की जो इतिहास के पन्नों में अमर हो गई-

“छत्ता तेरे राज में, धक-धक धरती होय। जित जित घोड़ा मुख करे, तित तित फत्ते होय॥” (यानी हे छत्रसाल! तेरे राज में ये मुगलों की धरती भी खौफ से कांपेगी। तेरा घोड़ा जिस भी दिशा में मुंह करेगा, वहां जीत सिर्फ और सिर्फ तेरी होगी!)

गुरु का आशीर्वाद खाली नहीं जाता भाई! स्वामी प्राणनाथ जी ने छत्रसाल को पन्ना की उन गुप्त हीरों की खदानों का रास्ता बता दिया, जिसके बारे में किसी को कानो-कान खबर नहीं थी। 

पन्ना की धरती से जैसे ही वो बेशकीमती हीरे निकले, बुंदेलखंड की उस बागी सेना की पूरी किस्मत ही बदल गई। अब छत्रसाल के पास सिर्फ जज़्बा नहीं था, अब उनके पास अथाह खज़ाना था। 

उन्होंने रातों-रात बेहतरीन अरबी घोड़े खरीदे, मारक हथियार बनवाए, तोपें खरीदीं और एक ऐसी खूंखार हिंदू सेना खड़ी कर दी जिसने मुगलों के सपनों में आना शुरू कर दिया।

अब छत्रसाल रक्षात्मक नहीं थे, वो पूरी तरह से आक्रामक हो चुके थे। औरंगजेब ने अपने सबसे खूंखार और ज़ालिम सेनापतियों को बुंदेलखंड भेजा। रुहेला खान, मुनव्वर खान, सदरुद्दीन, शेख अनवर- एक से बढ़कर एक जेहादी कमांडर आए। उनका घमंड था की वो इस ‘काफिर’ बुंदेले को ज़ंजीरों में बांधकर दिल्ली ले जाएंगे।

लेकिन बुंदेलखंड की माटी तो कुछ और ही तय करके बैठी थी। छत्रसाल ने इन मुगल सेनापतियों को आमने-सामने की लड़ाई में वो भयानक मौत दी की बाकी की मुगल फौज उल्टे पैर दिल्ली भाग खड़ी हुई। रुहेला खान को बीच मैदान में काट दिया गया। 

मुनव्वर खान अपनी जान बचाकर ऐसे भागा जैसे कोई कुत्ता अपनी दुम दबाकर भागता है। बुंदेलखंड के बीहड़ इन जेहादी मुगलों के लिए ऐसा कब्रगाह बन गए की दिल्ली में बैठे मुगल सिपाही बुंदेलखंड का नाम सुनते ही थर-थर कांपने लगते थे। 

मुगलों की छावनियों में आग लगा दी गई, उनके खज़ाने लूट लिए गए और जिन-जिन मंदिरों को मुगलों ने तोड़ा था, वहां छत्रसाल ने फिर से भगवा झंडा लहरा कर महादेव का जयघोष कर दिया।

52 युद्धों में छत्रसाल बुंदेला के हाथों मुगलों की कटी हुई लाशें और दिल्ली में छाती पीटता वो औरंगज़ेब

अब ज़रा उस खौफनाक जल्लाद औरंगज़ेब की हालत पर गौर कीजिए। वो दिल्ली के लाल किले में बैठकर खुद को ‘आलमगीर’ (दुनिया जीतने वाला) समझता था। लेकिन असलियत ये थी की बुंदेलखंड के बीहड़ों ने उसकी रातों की नींद और दिन का चैन दोनों हराम कर रखा था। 

जब भी बुंदेलखंड से कोई खबर आती, तो औरंगज़ेब के पसीने छूट जाते थे। उसे रोज़ यही सुनने को मिलता था की आज हमारे फलां सूबेदार का सिर काट दिया गया, आज हमारी फलां छावनी लूट ली गई, आज हमारे इतने हज़ार सैनिक बुंदेलों की तलवारों का चारा बन गए।

महाराजा छत्रसाल कोई एक-दो लड़ाइयां नहीं लड़े थे भाई! उन्होंने मुगलों के खिलाफ लगातार 52 युद्ध लड़े। और सबसे बड़ी बात क्या है? इन 52 के 52 युद्धों में उन्होंने मुगलों को कुत्तों की तरह खदेड़-खदेड़ कर पीटा। 

मुगलों की विशाल सेनाएं, उनके बारूद, उनकी तोपें और उनके हाथी बुंदेलखंड की उन संकरी और भूलभुलैया जैसी घाटियों में आकर एकदम कबाड़ बन जाते थे। 

छत्रसाल की सेना मुगलों को घेर कर ऐसा भयंकर कत्लेआम मचाती थी की जो मुगल सैनिक ज़िंदा बच जाते थे, वो वापस दिल्ली जाकर थर-थर कांपते हुए अपनी हार के किस्से सुनाते थे।

औरंगज़ेब जो ये सोच कर बैठा था की वो पूरे भारत को इस्लाम के रंग में रंग देगा, उसे बुंदेलखंड में एक ऐसी करारी और ज़िल्लत भरी हार मिली जिसे वो मरते दम तक भूल नहीं पाया।

छत्रसाल ने मुगलों की छाती पर पैर रखकर अपना ‘स्वतंत्र हिंदू स्वराज्य’ घोषित कर दिया। पन्ना को अपनी राजधानी बनाया और सबसे पहला काम क्या किया? वो खौफनाक और ज़ालिम ‘जज़िया टैक्स’ जो मुगलों ने हिंदुओं पर लगा रखा था, उसे एक ही झटके में उखाड़ कर फेंक दिया।

उन्होंने ऐलान कर दिया की बुंदेलखंड में अब किसी भी हिंदू को अपने धर्म का पालन करने के लिए मुगलों को कोई टैक्स नहीं देना होगा। यहाँ अब मुगलों का कानून नहीं, सनातन का झंडा लहराएगा। 

जिस औरंगज़ेब के खौफ से बड़े-बड़े राजा-महाराजा उसके दरबार में सिर झुकाकर खड़े रहते थे, वो औरंगज़ेब छत्रसाल के सामने बेबस होकर सिर्फ अपनी छाती पीटता रह गया। 

1707 में वो क्रूर दरिंदा उसी हताशा और ज़िल्लत में कीड़े-मकोड़ों की तरह मर गया, लेकिन जीते-जी वो बुंदेलखंड को कभी जीत नहीं पाया।

79 साल की उम्र में भी मुगलों का काल बने छत्रसाल बुंदेला और बाजीराव पेशवा की तलवार से हुआ आखिरी जेहादी खात्मा

खैर, औरंगज़ेब तो मर गया, लेकिन मुगलों की वो गंदी और जेहादी फितरत कहां बदलने वाली थी। साल आया 1728! इस वक्त तक महाराजा छत्रसाल 79 साल के एक वृद्ध हो चुके थे। 

उनका शरीर भले ही बूढ़ा हो गया था, लेकिन उनकी रगों में दौड़ने वाला वो हिंदू खून आज भी उबल रहा था। मुगलों को लगा की यही सही मौका है। दिल्ली के नए मुगल बादशाह ने अपने सबसे खूंखार और ज़ालिम सेनापति ‘मोहम्मद खान बंगश’ को बुंदेलखंड पर हमला करने के लिए भेजा।

बंगश खान एक बहुत बड़ी और भारी-भरकम फौज लेकर आया। उसने धोखे से, पीठ पीछे वार करके छत्रसाल को जैतपुर के किले में घेर लिया। मुगलों की पुरानी आदत! 

सामने से लड़ने की औकात नहीं, तो धोखे से वार करो। छत्रसाल के पास उस वक्त सेना बहुत कम थी और उम्र भी 79 के पार थी। जब लगा की अब मुगलों का ये जेहादी घेरा तोड़ना मुश्किल है, तब उस वृद्ध शेर ने हार नहीं मानी।

छत्रसाल ने पुणे में बैठे मराठा साम्राज्य के सबसे खूंखार और अजेय योद्धा ‘पेशवा बाजीराव’ को एक खत लिखा। ये कोई आम खत नहीं था भाई! ये एक हिंदू शेर द्वारा दूसरे हिंदू शेर को दी गई धर्मरक्षा की आवाज़ थी। छत्रसाल ने लिखा-

“जो गति ग्राह गजेंद्र की, सो गति भई है आज। बाजी जात बुंदेल की, राखो बाजीराव लाज॥”

(जिस तरह मगरमच्छ ने गजराज (हाथी) का पैर पकड़ लिया था और भगवान विष्णु ने आकर उसकी जान बचाई थी, आज बुंदेलखंड पर वैसा ही संकट आ गया है। अब मेरी लाज तुम्हारे हाथ में है मेरे बच्चे बाजीराव!)

जैसे ही ये खत बाजीराव पेशवा के हाथ में पहुंचा, उस मराठा शेर का खून खौल उठा। बाजीराव ने खाना-पीना सब छोड़ दिया। उन्होंने कहा की “अगर मैंने आज छत्रसाल की मदद नहीं की, तो इतिहास मुझे कभी माफ नहीं करेगा।” 

और फिर जो हुआ, वो इतिहास का वो भयंकर तूफान था जिसने मुगलों की रूह कंपा दी। बाजीराव अपनी बिजली की गति वाली मराठा घुड़सवार सेना लेकर सीधे बुंदेलखंड पहुंच गए।

एक तरफ से मराठों की तलवारें चमक रही थीं और दूसरी तरफ से किले के दरवाज़े खोलकर 79 साल के छत्रसाल अपनी बुंदेली फौज के साथ मुगलों पर टूट पड़े। भाई साहब, उस दिन बंगश खान और उसकी मुगल सेना का जो हश्र हुआ, वो सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। 

दोनों हिंदू सेनाओं ने मिलकर मुगलों को ऐसा काटा जैसे खेत में गाजर-मूली काटी जाती है। बंगश खान की पैंट गीली हो गई। वो अपनी जान की भीख मांगते हुए और औरतों के कपड़े पहनकर वहां से किसी तरह अपनी जान बचाकर भागा। 

छत्रसाल और बाजीराव ने मिलकर मुगलों की उस गंदी इस्लामिक छाया को बुंदेलखंड से हमेशा-हमेशा के लिए मिटा दिया।

मुगलों की असली औकात बस इतनी सी थी की वो गद्दारों के दम पर राज करते थे। लेकिन जब-जब छत्रसाल जैसा कोई धर्मरक्षक अपनी धरती के लिए खड़ा हुआ, तब-तब मुगलों के तंबू उखड़ गए और उनके झंडे ज़मीन पर आ गिरे। यही सत्य है, यही हमारा इतिहास है, और इसे मिटाने की औकात किसी सेक्युलर कीड़े में नहीं है!

हर हर महादेव! जय भवानी! जय छत्रसाल! 

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