क्या हो जब रक्षा करने वाले ही भक्षक बन जाएं? क्या हो जब न्याय की कसम खाने वाली पुलिस ही सरेआम सड़कों पर जज और जल्लाद दोनों बन जाए?
जब एक आम आदमी के टैक्स से खरीदी गई गोलियां उसी आम आदमी के सीने में बेदर्दी से उतार दी जाएं, तो समझ लीजिए की उस देश का सिस्टम और लोकतंत्र दोनों मर चुके हैं!
अभी हाल ही में, 17 जून को बिहार के भोजपुर ज़िले के शाहपुर इलाके में स्थित बिलौटी गांव में जो हुआ, वो कोई पुलिस की बहादुरी का किस्सा नहीं है। वो खाकी वर्दी में छुपे अहंकार और सत्ता के नशे का एक क्रूर चेहरा है।
30 साल के एक नौजवान, भरत भूषण तिवारी को पुलिस और एसटीएफ (STF) की भारी-भरकम फौज ने चारों तरफ से घेर लिया और फिर उसे गोलियों से छलनी कर दिया।
कहा गया की ये ‘एनकाउंटर’ था। अरे लानत है ऐसे एनकाउंटर पर! 50 से 100 पुलिस वालों की भारी-भरकम और हथियारों से लदी फौज एक अकेले, निहत्थे और सरेंडर कर चुके लड़के को ज़िंदा नहीं पकड़ पाती और सीधे उसके सीने में पीतल उतार देती है।
इसे एनकाउंटर नहीं, सरेआम किया गया ‘मर्डर’ कहते हैं।
आज हम सीधे तौर पर इस अंधी, बहरी और मगरूर सत्ता की आंखों में आंखें डालकर अपने वो 5 सुलगते हुए सवाल पूछेंगे, जिनका जवाब देते हुए इस भ्रष्ट सिस्टम के पसीने छूट जाएंगे।
क्या बिहार पुलिस इतनी नाकाबिल और डरपोक, की एक अकेले निहत्थे को ज़िंदा नहीं पकड़ सकी
ज़रा उस घटना वाले दिन की कल्पना कीजिए। एक 30 साल का लड़का, जो कोई खूंखार इंटरनेशनल डॉन नहीं है, जो कोई दाऊद इब्राहिम नहीं है।
उसे पकड़ने के लिए पूरे ज़िले की पुलिस फोर्स, थानों की गाड़ियां और एसटीएफ (STF) के स्पेशल कमांडो की भारी-भरकम फौज पहुंच जाती है। 50 से 100 पुलिस वालों का वो जमावड़ा एक अकेले आदमी को घेर लेता है।
तो यहाँ हमारा सबसे पहला और सबसे तीखा सवाल इस सिस्टम के मुंह पर पड़ता है- क्या बिहार की पुलिस और एसटीएफ के वो ट्रेनिंग पाए हुए जवान इतने नाकाबिल, कमज़ोर और डरपोक हो चुके थे की वो एक अकेले आदमी को ज़िंदा नहीं पकड़ सकते थे?
क्या पुलिस के जवानों के बाजुओं में इतनी भी ताक़त नहीं बची थी की वो उसे ज़मीन पर पटक कर उसके हाथों में हथकड़ी डाल सकें?
अरे भाई, पुलिस के पास लाठियां होती हैं, आंसू गैस के गोले होते हैं, रबर की गोलियां होती हैं। अगर वो लड़का काबू में नहीं आ रहा था, तो 50 पुलिस वाले मिलकर उसे डंडों से मार-मार कर अधमरा कर सकते थे। उसे पकड़ कर घसीटते हुए पुलिस वैन में डाल सकते थे।
जो ताज़ा खुलासे हो रहे हैं, वो बताते हैं की एसटीएफ के एक जवान अक्षय कुमार ने निहत्थे भरत तिवारी पर पहली गोली सीधे उसकी जांघ में मारी थी।
जब एक इंसान बिना किसी हथियार के तुम्हारे सामने खड़ा है, वो भाग भी नहीं रहा, तो उस पर सीधा फायर क्यों झोंका गया?
ये साफ दिखाता है की पुलिस वहां उसे पकड़ने गई ही नहीं थी। उनकी नीयत ही हत्या करने की थी। उन्होंने पहले से मन बना लिया था की आज इस लड़के की लाश ही गांव में गिरेगी।
जब हथियार फेंक के कर दिया सरेंडर, तो भरत तिवारी को गोलियों से भूनने का किसने दिया खूनी ऑर्डर
अब ज़रा पुलिस की उस सड़ी हुई और फर्जी थ्योरी का पोस्टमार्टम करते हैं जो उन्होंने अपनी FIR में लिखी है।
पुलिस कहती है की “भरत तिवारी बहुत गुस्से में था। उसने हम पर 8-10 राउंड फायर किए और फिर हमने अपनी जान बचाने (आत्मरक्षा) के लिए उस पर 4-5 गोलियां चलाईं।”
क्या बकवास और सफेद झूठ है ये! घटना वाले दिन भरत तिवारी ने फेसबुक पर लाइव आकर पुलिस को चुनौती ज़रूर दी थी। हाथ में कट्टा था, ये बात कोई नहीं नकार रहा।
लेकिन उसके बाद ज़मीन पर क्या हुआ, असली खेल तो वहां छुपा है! ज़मीन पर मौजूद चश्मदीद गवाह, गांव वाले और वो लोग जो अपनी आंखों से ये खूनी खेल देख रहे थे, वो चीख-चीख कर कह रहे हैं की पुलिस सरासर झूठ बोल रही है।
असली सच ये है की एनकाउंटर से ठीक पहले भरत तिवारी ने अपना वो देसी कट्टा ज़मीन पर फेंक दिया था। उसने अपने दोनों हाथ हवा में उठा लिए थे और सरेंडर कर दिया था।
उसकी बूढ़ी मां, जो वहां मौजूद थी, वो रो-रो कर कह रही है की “मेरे बेटे ने हथियार डाल दिया था, वो निहत्था था!” तो यहाँ हमारा दूसरा खौफनाक सवाल पैदा होता है- जब एक आदमी ने अपना हथियार ज़मीन पर फेंक कर सरेंडर कर दिया था, तो फिर उसे गोलियों से क्यों भूना गया?
क्या कोई इंसान निहत्था होकर पुलिस पर हमला कर सकता है? ये सीधा-सीधा एक ‘फर्जी एनकाउंटर’ है। और जानते हैं इस हत्या के पीछे की असली वजह क्या है? भरत तिवारी कोई अपराधी नहीं था, वो जवईनिया गांव के विस्थापित लोगों की लड़ाई लड़ रहा था।
वो निचले स्तर के प्रशासनिक भ्रष्टाचार, ज़मीन और बालू माफिया के घिनौने खेल के खिलाफ एक बेबाक आवाज़ था। पुलिस ने एक निहत्थे को इसलिए मारा क्योंकि वो उस भ्रष्ट तंत्र की पोल खोलने वाला था।
खुद पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे जैसे बड़े नेताओं ने इसे एक ‘सोची-समझी हत्या’ करार दिया है।
DGP कह रहे ‘मानसिक बीमार’, और पुलिस कह रही ‘खूंखार अपराधी’, आखिर इस खूनी खेल में कौन बोल रहा ‘झूठ’
जब ये बवाल बढ़ा और गांव वालों का गुस्सा सड़क पर उतरा, तो लीपापोती का दौर शुरू हुआ। बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का एक बयान सामने आया, जिसने इस पूरे केस की धज्जियां उड़ा कर रख दीं।
सम्राट चौधरी ने खुद कैमरों के सामने कहा की “मैं भी हैरान था की मेरी पुलिस ने एक आदमी को तब क्यों नहीं पकड़ा जब वो कट्टा दिखा रहा था?” उन्होंने आगे जो बताया, वो इस सिस्टम के मुंह पर सबसे बड़ा तमाचा है।
सम्राट चौधरी ने कहा की जब मैंने बिहार के सबसे बड़े पुलिस अफसर यानी डीजीपी (DGP) से इस बारे में पूछा, तो डीजीपी साहब ने जवाब दिया की “सर, वो लड़का ‘मेंटली डिस्टर्ब’ (मानसिक रूप से बीमार) था, उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं थी।”
लो जी! खुद राज्य का पुलिस मुखिया कह रहा है की लड़का मानसिक रूप से बीमार था। तो यहाँ से हमारा तीसरा और सबसे बड़ा सवाल इस पूरी सरकार की छाती पर बजता है-
अगर आज बिहार पुलिस और STF की ये थ्योरी है की भरत तिवारी ने 10-12 गोलियां चलाईं, वो बहुत बड़ा क्रिमिनल था, उसने पुलिस पर जानलेवा हमला किया… और उसी पुलिस महकमे के DGP कह रहे हैं की वो मानसिक रूप से बीमार था… तो फिर इस खूनी खेल में झूठ कौन बोल रहा है?
क्या ज़मीन पर एनकाउंटर करने वाले पुलिस वाले अपने ही डीजीपी को बेवकूफ बना रहे हैं? या डीजीपी साहब उपमुख्यमंत्री को बेवकूफ बना रहे हैं? या फिर ये पूरी की पूरी सरकार और पुलिस महकमा मिलकर बिहार की 13 करोड़ जनता को बेवकूफ बना रहा है?
जब एक बड़े अधिकारी और ज़मीनी पुलिस की बातों में इतना भयंकर विरोधाभास है, तो ये साफ ज़ाहिर करता है की ये लोग एक फर्जी कहानी गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन झूठ के पांव नहीं होते, इसलिए इनकी कहानी आपस में ही टकरा कर टूट रही है।
मानसिक बीमार इंसान को अस्पताल की जगह सीधा शमशान भेजने वाली ये कौन सी सरकारी गुंडागर्दी
अब ज़रा इस सरकार और डीजीपी साहब के उस बयान का पोस्टमार्टम करते हैं, जिसे सुनकर किसी भी पढ़े-लिखे इंसान का खून खौल उठेगा। थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं की बिहार के डीजीपी सच बोल रहे हैं और भरत तिवारी सच में मानसिक रूप से बीमार या ‘मेंटली डिस्टर्ब’ था।
तो यहाँ से हमारा चौथा और सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है- अगर कोई इंसान दिमागी रूप से बीमार है, उसका अपनी हरकतों पर कंट्रोल नहीं है, तो देश का कानून और इंसानियत क्या कहती है?
क्या एक बीमार इंसान को पकड़कर किसी अच्छे अस्पताल या पागलखाने में भर्ती कराया जाता है, या उसे सरेआम सड़क पर गोलियों से भूनकर सीधा शमशान घाट पहुंचा दिया जाता है?
अगर सड़क पर कोई पागल कुत्ता भी घूम रहा होता है, तो नगर निगम वाले उसे पकड़ने के लिए जाल लेकर आते हैं, बेहोश करने वाले इंजेक्शन लाते हैं। लेकिन यहाँ तो एक जीता-जागता इंसान खड़ा था!
क्या बिहार पुलिस के पास कोई मेडिकल टीम नहीं थी? क्या इस 50-100 पुलिस वालों की फौज के पास आंसू गैस के गोले नहीं थे? क्या उनके पास रबर की गोलियां नहीं थीं जिससे उसे बेहोश करके पकड़ा जा सके?
अगर पुलिस को पता था की वो लड़का मानसिक रूप से बीमार है, तो उन्होंने उसके परिवार वालों को आगे करके उसे शांत क्यों नहीं करवाया? एक बीमार आदमी को इलाज देने के बजाय सीधे उसकी छाती में गोली उतार देना और उसे मौत की सज़ा मुकर्रर कर देना, ये किस किताब का कानून है भाई?
खूंखार आतंकवादियों को बिरयानी और एक आम युवा को सीधी मौत, सड़ा हुआ देश का सिस्टम
जब भी हम टीवी पर देखते हैं तो इस देश का कानून बड़ा दयालु नज़र आता है। बड़े-बड़े अंडरवर्ल्ड के गुर्गे, खूंखार अलगाववादी जो बम फोड़ते हैं, या वो दुर्दांत नक्सली जो हमारे 50-50 जवानों को बारूदी सुरंगों से उड़ा देते हैं… जब पुलिस उन्हें घेरती है, तो क्या होता है?
पुलिस बाकायदा लाउडस्पीकर लेकर खड़ी होती है। घंटों तक माइक पर चिल्ला-चिल्ला कर कहा जाता है की “भाइयों, हथियार डाल दो, हम तुम्हें कुछ नहीं करेंगे, सरेंडर कर दो।”
उन्हें बिरयानी खिलाई जाती है, उन्हें अदालतों में पेश करके उनके सुधार की बातें की जाती हैं। सालों-सालों तक कोर्ट में उनके लिए करोड़ों रुपये खर्च करके केस लड़े जाते हैं।
लेकिन बिहार के उस छोटे से बिलौटी गांव के एक आम लड़के के लिए ये सारा मानवाधिकार और कानून का ज्ञान कहां जाकर मर गया?
यहाँ से निकलता है हमारा पांचवां और इस पूरे सिस्टम को नंगा कर देने वाला सवाल- भारत का सुप्रीम कोर्ट और उसके बनाए गए नियम साफ-साफ कहते हैं की ‘एनकाउंटर’ किसी भी पुलिस फोर्स के पास सबसे आखिरी रास्ता होना चाहिए।
जब जान पर बन आए और कोई दूसरा रास्ता ना बचे, तभी गोली चलानी चाहिए। तो फिर भरत तिवारी के केस में उस आखिरी नियम को पहला नियम क्यों बना दिया गया?
जिस देश में खूंखार देशद्रोहियों तक को सरेंडर करने का पूरा मौका और वक्त दिया जाता है, वहां एक आम लड़के को, जिसने कट्टा फेंक दिया था, उसे सरेंडर करने का मौका क्यों नहीं दिया गया? उसे अदालत के सामने पेश करके ट्रायल का सामना करने का हक क्यों नहीं दिया गया?
इसका सिर्फ एक ही जवाब है! भरत तिवारी उस गांव के विस्थापितों की लड़ाई लड़ रहा था। वो वहां के बालू माफिया, ज़मीन हड़पने वालों और पुलिस के उस नेक्सस के खिलाफ खड़ा हो गया था, जो आम जनता का खून चूस रहा था।
पुलिस को पता था की अगर इसे ज़िंदा पकड़ लिया, तो ये कोर्ट में जाकर सिस्टम की ऐसी पोल खोलेगा की कई बड़े चेहरों के नकाब उतर जाएंगे। इसीलिए, पुलिस ने जज और जल्लाद दोनों का काम खुद ही कर लिया।
