जब तक सांस चली तब तक हाथों में लहराता रहा तिरंगा... 73 की उम्र में अपनी शहादत से ब्रिटिश हुकूमत का तंबू उखाड़ फेकनी वाली मतवाली वीरांगना 'मातंगिनी हाजरा'

जब तक सांस चली तब तक हाथों में लहराता रहा तिरंगा… 73 की उम्र में अपनी शहादत से ब्रिटिश हुकूमत का तंबू उखाड़ फेकनी वाली मतवाली वीरांगना ‘मातंगिनी हाजरा’

आज 15 अगस्त है। भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। सुबह से ही चारों तरफ देशभक्ति के तराने बज रहे हैं, छतों पर तिरंगे लहरा रहे हैं, और टीवी पर आज़ादी के जश्न की तस्वीरें चल रही हैं।

लेकिन दोस्तों इस आज़ादी की असली कीमत उन लाखों गुमनाम वीरों और वीरांगनाओं ने अपने खून से चुकाई है, जिनका नाम हम जानते भी नहीं।

आज हमारा ये फर्ज़ बनता है की हम उन चेहरों को याद करें जिनकी चिताओं की राख से ये मुल्क खड़ा हुआ है।

आज हम बात करेंगे भारत मां की एक ऐसी खूंखार और बागी शेरनी की, जिसके पास ना तो कोई बड़ी डिग्री थी, ना कोई फौज थी और ना ही कोई हथियार।

वो महज़ 73 साल की एक अनपढ़, गरीब विधवा थीं। लेकिन जब वो सफेद साड़ी पहनकर, अपने कांपते हाथों में तिरंगा लिए सड़कों पर उतरीं, तो सात समंदर पार लंदन में बैठी ब्रिटिश हुकूमत की कुर्सियां बुरी तरह डोल गई थीं।

उस मतवाली वीरांगना का नाम था- मातंगिनी हाजरा!

18 साल की उम्र में झेला विधवा होने का दर्द और फिर उसी सफेद साड़ी को बना लिया अंग्रेजों का कफ़न

मातंगिनी हाजरा जी का जन्म 9 अक्टूबर 1870 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले (तामलुक) के एक बेहद छोटे और पिछड़े से गांव ‘होगला’ में हुआ।

उनका परिवार इतना गरीब था की दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ करना भी पहाड़ तोड़ने जैसा लगता था। पढ़ाई-लिखाई तो दूर की बात थी, उनके नसीब में बचपन भी नहीं लिखा था।

उस ज़माने में समाज में बाल विवाह जैसी कुरीतियां अपने चरम पर थीं। जब मातंगिनी महज़ 12 साल की एक छोटी सी बच्ची थीं, तब उनकी शादी 60-62 साल के एक बूढ़े आदमी से कर दी गई।

उस आदमी का नाम त्रिलोचन हाजरा था और उसका पहले से एक बेटा भी था। 12 साल की बच्ची को एक बूढ़े आदमी के पल्ले बांध दिया गया।

ज़िंदगी ने उनके साथ जो भद्दा मज़ाक किया था, वो यहीं नहीं रुका। शादी के महज़ 6 साल बाद, जब मातंगिनी की उम्र सिर्फ 18 साल थी, उनके पति त्रिलोचन हाजरा का निधन हो गया। वो बिना किसी अपनी संतान के विधवा हो गई थीं।

उस दौर का समाज विधवा औरतों के लिए किसी नर्क से कम नहीं था। कदम-कदम पर ताने और मनहूस होने के ठप्पे। लेकिन मातंगिनी हाजरा ने समाज के इन तानों के आगे घुटने टेकने से साफ इंकार कर दिया।

वो अपने गांव होगला लौट आईं और अपनी पूरी ज़िंदगी, अपनी हर एक सांस वहां के गरीब, बेसहाय और बीमार लोगों की सेवा में झोंक दी।

जो ममता उन्हें अपने बच्चे पर लुटानी थी, वो उन्होंने पूरे गांव पर लुटा दी। लेकिन उन्हें भी नहीं पता था की नियति ने उन्हें गांव की एक बेसहारा विधवा से भारत मां की सबसे बड़ी बागी वीरांगना बनने के लिए चुन लिया था।

अनपढ़ और गरीब होते हुए भी कैसे बन गई बंगाल की ‘गांधी बुढ़ी’ जिसने हिला दी थी लंदन की नींव

साल 1905 में जब अंग्रेजों ने ‘बंगाल विभाजन’ का दांव चला, तो पूरे बंगाल में आज़ादी की आग भड़क उठी। इसी दौरान मातंगिनी हाजरा की ज़िंदगी में एक बहुत बड़ा भूचाल आया।

उन्होंने महात्मा गांधी के बारे में सुना। गांधी जी के विचारों का उनके दिमाग पर ऐसा असर हुआ जैसे सूखे बारूद को चिंगारी मिल गई हो।

उन्होंने तय कर लिया की अब इस देश को आज़ाद कराने के लिए वो भी अपनी जान की बाज़ी लगाएंगी। मातंगिनी जी ने महात्मा गांधी की तरह ही खुद सूत कातना शुरू कर दिया।

वो दिन-रात चरखा चलाती थीं और अपने हाथ का बुना हुआ खुरदरा खादी ही पहनती थीं। उनका ये जज़्बा, उनकी ये सादगी और देश के लिए उनका ये पागलपन देखकर पूरे बंगाल के लोग हैरान थे।

धीरे-धीरे लोग उन्हें इतना प्यार और सम्मान देने लगे की उनका नाम ही ‘गांधी बुढ़ी’ (Gandhi Buri) पड़ गया। बांग्ला भाषा में इसका मतलब होता है ‘बूढ़ी गांधी’।

जब 1930 में गांधी जी ने ‘नमक सत्याग्रह’ (दांडी मार्च) का बिगुल फूंका, तो अंग्रेजों ने सोच भी नहीं था की मिदनापुर के एक छोटे से गांव की ये ‘गांधी बुढ़ी’ उनकी नाक में दम कर देगी।

मातंगिनी जी ने आज़ादी के दीवानों के साथ मिलकर छिपकर नमक बनाना शुरू कर दिया। जब गोरी पुलिस को इस बात की भनक लगी, तो उन्होंने इस बुजुर्ग महिला को गिरफ्तार कर लिया।

जब काले झंडे का खौफ देखकर कांप गया था बंगाल का क्रूर गवर्नर और 6 महीने तक काटी जेल की खौफनाक सज़ा

नमक सत्याग्रह की उस गिरफ़्तारी ने मातंगिनी हाजरा के अंदर के डर को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर दिया था। अब उन्हें मौत से नहीं, बल्कि अंग्रेजों की उस सड़ी हुई हुकूमत से नफरत हो गई थी।

बात 1933 की है। ब्रिटिश हुकूमत ने मिदनापुर के गरीब किसानों और आम जनता पर एक बहुत ही घटिया ‘चौकीदारी टैक्स’ थोप दिया। मतलब, गांव के गरीब लोग अपने ही गांव में पुलिस की चौकीदारी का खर्चा उठाएं!

अब भला ये ‘गांधी बुढ़ी’ ये अत्याचार कैसे बर्दाश्त कर लेती? 63 साल की इस शेरनी ने पूरे इलाके के लोगों को इकट्ठा किया और अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। गोरी पुलिस तो वैसे ही बौखलाई बैठी थी।

उन्होंने फिर से तुरंत मातंगिनी जी को गिरफ्तार कर लिया। अंग्रेजों ने उन्हें 6 महीने की कड़ी सज़ा सुनाकर ‘बहरामपुर जेल’ की काल कोठरी में फेंक दिया।

उन्हें लगा की 6 महीने की जेल की यातनाएं इस बुढ़िया का दिमाग ठिकाने लगा देंगी। लेकिन वो बेवकूफ ये नहीं जानते थे की सोना आग में तपकर ही कुंदन बनता है।

जेल से छूटने के बाद मातंगिनी हाजरा ने वो कांड कर दिया जिसने पूरे बंगाल प्रशासन की हवा टाइट कर दी। बंगाल का सबसे क्रूर और घमंडी गवर्नर ‘सर जॉन एंडरसन’ तामलुक के दौरे पर आ रहा था।

अंग्रेजों को डर था की कहीं बगावत न हो जाए, इसलिए पूरे इलाके में चारों तरफ पुलिस का कड़ा पहरा था, बंदूकें तनी हुई थीं।

लेकिन भाईसाहब, ये मातंगिनी हाजरा थीं! वो इस भारी सिक्योरिटी, पुलिस की बंदूकों और खुफिया तंत्र को ऐसा गच्चा देकर निकलीं की सीधे गवर्नर के मंच तक जा पहुंचीं।

सोचिए उस मंज़र को… एक बूढ़ी औरत सफेद साड़ी पहने हुए अचानक पुलिस का घेरा तोड़कर गवर्नर के सामने खड़ी हो जाती है और अपनी साड़ी के नीचे से एक ‘काला झंडा’ निकालकर उस क्रूर अफसर के मुँह पर लहरा देती है!

अंग्रेज पुलिस के तो होश उड़ गए। उन्होंने तुरंत मातंगिनी जी पर लाठियां बरसानी शुरू कर दीं। उन्हें बुरी तरह पीटा गया, खून बहने लगा, लेकिन उस शेरनी के चेहरे पर खौफ की एक सिंगल लकीर नहीं थी। वो हंसते हुए लाठियां खा रही थीं और नारे लगा रही थीं।

1942 का वो खौफनाक दिन जब 6000 लोगों की फौज लेकर तामलुक पुलिस स्टेशन पर कब्ज़ा करने निकल पड़ी 73 साल की शेरनी

वक़्त बीतता गया और मातंगिनी जी का आज़ादी का ये पागलपन परवान चढ़ता गया। और फिर आया साल 1942!

8 अगस्त 1942 को जब बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान से महात्मा गांधी ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ (Quit India Movement) और ‘करो या मरो’ (Do or Die) का सिंहनाद किया, तो पूरे देश में भूचाल आ गया।

जब ये खबर मिदनापुर के तामलुक पहुंची, तो मातंगिनी हाजरा को समझ आ गया की अब अंतिम लड़ाई का वक़्त आ गया है। अब या तो आज़ादी मिलेगी, या फिर शहादत।

इतिहास के पन्नों में दर्ज़ वो खौफनाक दिन था 29 सितंबर 1942। ये वो दिन था जब तामलुक की धरती खून से लाल होने वाली थी।

मातंगिनी हाजरा, जिनकी उम्र अब 72-73 साल हो चुकी थी, उन्होंने एक ऐसा काम किया जिसे सुनकर आज भी अच्छे-अच्छे लोगों का कलेजा कांप जाए।

इस 73 साल की बुजुर्ग महिला ने एक विशाल बगावती जुलूस का नेतृत्व किया। कोई 100-200 लोग नहीं, बल्कि पूरे 6,000 लोगों की एक भारी भरकम फौज!

और सबसे हैरान करने वाली बात ये थी की इस फौज में सबसे ज़्यादा संख्या गांव की आम महिलाओं की थी, जो घरों से बर्तन-भांडे छोड़कर अपनी ‘गांधी बुढ़ी’ के पीछे मरने-मारने को निकल पड़ी थीं।

इस 6000 लोगों के जुलूस का सिर्फ एक ही मक़सद था- तामलुक के पुलिस स्टेशन और सरकारी कोर्ट पर धावा बोलना, अंग्रेजों का झंडा उतारना और वहां भारत का तिरंगा गाड़ देना।

जैसे ही ये विशाल जनसैलाब पुलिस स्टेशन के करीब पहुंचा, वहां पहले से ही हथियारों से लैस भारी पुलिस फोर्स खड़ी थी।

गोरे अफसरों ने तुरंत धारा 144 लगा दी और जुलूस को रुकने का आदेश दिया। पुलिस वालों ने अपनी बंदूकें लोड कीं और सीधे जनता की छाती पर तान दीं।

बंदूकों की वो तनी हुई नालें देखकर एक पल के लिए पूरी भीड़ सहम गई।

लेकिन तभी… उस सन्नाटे और खौफ को चीरती हुई वो 73 साल की सफेद साड़ी वाली विधवा आगे आई। उनके हाथों में भारत का वो तिरंगा झंडा था।

वो बिना किसी डर के, बिना किसी हिचकिचाहट के भीड़ को चीरते हुए बिल्कुल आगे, पुलिस की बंदूकों की सीध में आकर खड़ी हो गईं!

तीन गोलियां खाने के बाद भी खून से लथपथ हाथों से नहीं गिरने दिया तिरंगा और मरते दम तक गूंजता रहा वन्दे मातरम

जब 6000 लोगों की वो भारी-भरकम भीड़ पुलिस की तनी हुई बंदूकों को देखकर एक पल के लिए सहम गई थी, तब मौत की उस खामोशी को चीरती हुई 73 साल की ये ‘गांधी बुढ़ी’ बिल्कुल आगे आ गई।

तभी सामने खड़े एक अंग्रेज अफसर ने चिल्लाकर कहा- “एक कदम भी और आगे बढ़ाया, तो सीधा गोली मार दूंगा!”

लेकिन उस 73 साल की सफेद साड़ी वाली विधवा ने डरने या पीछे हटने की बजाय अपना तिरंगा और ऊंचा कर लिया। उन्होंने पूरी ताकत से नारा लगाया- “वन्दे मातरम!” और पुलिस की बंदूकों की सीध में अपने कदम आगे बढ़ा दिए।

गोरे अफसर का ईगो हर्ट हो गया। उसने फायर का आर्डर दे दिया!

पहली गोली सीधे मातंगिनी हाजरा के हाथ में लगी। वो हाथ जिससे उन्होंने तिरंगा पकड़ा हुआ था। उनका हाथ सुन्न हो गया, हड्डियां दरक गईं।

लेकिन भाईसाहब, इस बागी औरत की मिट्टी ही किसी और चीज़ की बनी थी। उन्होंने अपना हाथ खून से लथपथ होने के बावजूद झंडे को ज़मीन पर नहीं गिरने दिया।

पलक झपकते ही उन्होंने तिरंगे को अपने दूसरे हाथ से थाम लिया और उनका नारा पहले से भी कहीं ज़्यादा तेज़ हो गया- “वन्दे मातरम!”

ये नज़ारा देखकर अंग्रेज हैरान रह गए। बौखलाए हुए अंग्रेज पुलिसवालों ने अपनी बंदूकों के ट्रिगर फिर दबा दिए।

लगातार दो फायर और हुए। एक गोली सीधे उनके सीने को चीरती हुई निकल गई और दूसरी गोली ने उनके माथे को बेध दिया।

खून से लथपथ मातंगिनी हाजरा वहीं ज़मीन पर गिर पड़ीं। उनके प्राण पखेरू उड़ गए। लेकिन… लेकिन ज़रा ठहरिए!

वो ज़मीन पर गिर ज़रूर गईं, लेकिन उनके हाथों का वो तिरंगा ज़मीन पर नहीं गिरा! मौत के बाद भी उनकी उंगलियों ने उस तिरंगे के डंडे को इतनी ज़ोर से जकड़ रखा था की झंडा हवा में ही था।

खून से सनी हुई वो सफेद साड़ी और वो शान से लहराता तिरंगा… मौत भी कांप गई होगी उस खौफनाक और पवित्र मंज़र को देखकर।

जब तक उनके शरीर में खून की आख़िरी बूंद और आख़िरी सांस रही, तब तक उन्होंने तिरंगे को झुकने नहीं दिया।

शहादत की वो आग जिसने तामलुक से रातों-रात उखाड़ फेंका ब्रिटिश राज और आज भी 15 अगस्त पर ज़िंदा है इस मां का गुरूर

अपनी मां समान ‘गांधी बुढ़ी’ को खून से लथपथ ज़मीन पर पड़ा देखकर वो 6000 निहत्थे किसान और औरतों के अंदर का ज्वालामुखी फट पड़ा।

शहादत की उस आग ने पूरे मिदनापुर को सुलगा कर रख दिया। भीड़ पीछे मुड़ने की बजाय सीधे अंग्रेजों पर भूखे शेरों की तरह टूट पड़ी।

जो पुलिस स्टेशन और सरकारी इमारतें अंग्रेजों के गुरूर का प्रतीक थीं, उन्हें रातों-रात तहस-नहस कर दिया गया। पूरे तामलुक इलाके से ब्रिटिश हुकूमत के तंबू उखाड़ कर फेंक दिए गए।

और सबसे बड़ी बात तो ये है की वहां के लोगों ने अंग्रेजों को खदेड़ कर खुद की ‘ताम्रलिप्त राष्ट्रीय सरकार’ (Tamralipta Jatiya Sarkar) बना ली!

ये थी मातंगिनी हाजरा की शहादत की असली ताकत!

आज़ाद भारत के कोलकाता में जब साल 1977 में मैदान के बीचों-बीच किसी महिला की सबसे पहली मूर्ति स्थापित की गई थी, तो वो इसी मतवाली वीरांगना ‘मातंगिनी हाजरा’ की ही मूर्ति थी।

आज जब तिरंगा फहराएं, तो एक बार आसमान की तरफ देखकर उस 73 साल की ‘गांधी बुढ़ी’ को दिल से नमन ज़रूर कीजिएगा.. क्योंकि जो आज़ादी हमें मुफ्त की खैरात लगती है ना, वो दरअसल मातंगिनी हाजरा जैसी लाखों गुमनाम माताओं और बहनों के खून से सींची गई है।

पूरे देश का स्वतंत्रता दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं!

भारत माता की जय!

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