मांग 'बुलेट ट्रेन' और 'हाई-क्लास' सुविधाओं की, लेकिन नीयत ट्रेन से 'कंबल' और 'तकिये' चुराने की! सरकारी संपत्ति को अपनी 'जागीर' समझते भारतीयों की रेलवे में '104 करोड़' की डकैती

मांग ‘बुलेट ट्रेन’ और ‘हाई-क्लास’ सुविधाओं की, लेकिन नीयत ट्रेन से ‘कंबल’ और ‘तकिये’ चुराने की! सरकारी संपत्ति को अपनी ‘जागीर’ समझते भारतीयों की रेलवे में ‘104 करोड़’ की डकैती

सच कहूं तो हम भारतीयों की नैतिकता एकदम खत्म हो गयी है। हम ठसक से कहते हैं की “अरे यार, भारत में जापान जैसी बुलेट ट्रेन कब आएगी? ये वंदे भारत में तो मज़ा नहीं आ रहा, इसमें ये कमी है, वो कमी है।”

हम दिन-रात टैक्स का रोना रोते हैं और नेताओं को भ्रष्ट बताकर खुद को दुनिया का सबसे ईमानदार और ज़िम्मेदार नागरिक साबित करने की कोशिश करते हैं।

लेकिन ज़रा रुकिए! जब आईना खुद की तरफ घूमता है ना, तो सच्चाई इतनी गंदी निकलती है की किसी भी सच्चे इंसान का सिर शर्म से ज़मीन में गड़ जाए।

हम वो लोग हैं जो बाहर से तो लंदन और अमेरिका जैसी हाई-क्लास सुविधाओं की डिमांड करते हैं, लेकिन अंदर से हमारी नीयत इतनी सड़ी हुई है की हम ट्रेन में मिलने वाले 100-150 रुपये के उस तौलिये के लिए अपनी ज़मीर बेच देते हैं।

ये कोई हवा-हवाई बातें नहीं हैं। अभी हाल ही में जो आरटीआई (RTI) का खुलासा हुआ है ना, उसने पूरे देश के इस दोगलेपन को बीच चौराहे पर नंगा कर दिया है।

पता चला है की इस देश की जनता ने, हाँ भाई आप और हम जैसे आम नागरिकों ने, रेलवे को पूरे 104.51 करोड़ रुपये का चूना लगा दिया है!

और ये डकैती किसी नेता या बड़े उद्योगपति ने नहीं की, बल्कि AC बोगियों में सफर करने वाले उन ‘पढ़े-लिखे’ लोगों ने की है, जो दिन-रात देश सुधारने का ज्ञान पेलते हैं।

ये हमारी मरी हुई Civic Sense और उस भीखमंगी मानसिकता का सबसे कड़वा सच है, जहाँ हम सरकारी संपत्ति को अपने बाप की जागीर या दहेज में मिला हुआ माल समझ लेते हैं।

1 करोड़ 27 लाख तौलिये, कंबल, चादरें और तकिये गायब, भारतीय रेलवे को 104.51 करोड़ का चूना लगाने वाली बेशरम ‘पढ़ी-लिखी’ जनता

अब ज़रा इन आंकड़ों पर गौर फरमाइए, दिमाग सुन्न पड़ जाएगा आपका। द इंडियन एक्सप्रेस ने जब आरटीआई से रेलवे का पूरा कच्चा चिट्ठा निकलवाया, तो जो डेटा सामने आया वो दिमाग घुमा देने वाला है।

जनवरी 2022 से लेकर मई 2026 तक के बीच, भारतीय रेलवे के AC कोचों से 1 करोड़ 27 लाख (1.27 Crore) से भी ज्यादा बेडरोल के आइटम हवा हो चुके हैं!

मतलब लोगों ने 1 करोड़ 27 लाख बार अपने सूटकेस खोलकर उसमें रेलवे का तौलिया, चादर या कंबल ठूंसा है।

ज़रा इस चोरी का पूरा हिसाब तो देखिए। फेस टॉवल (Face Towels) सबसे ज्यादा डिमांड में रहे। करीब 46 लाख 54 हज़ार छोटे तौलिये लोग अपने बैग में डाल ले गए। 41 लाख 13 हज़ार चादरें गायब हो गईं। 23 लाख 59 हज़ार Pillow Covers चोरी हो गए।

12 लाख 95 हज़ार मोटे-मोटे कंबल लोग चुपचाप उड़ा ले गए। हद तो तब हो गई जब 2 लाख 76 हज़ार पूरे के पूरे तकिये ही लोग अपने घर ले गए!

अब सबसे बड़ा सवाल ये उठता है की ये चोरियां कर कौन रहा है? ये सारी चोरियां थर्ड AC, सेकंड AC और फर्स्ट एसी में सफर करने वाले उन पढ़े-लिखे, सूट-बूट वाले ‘वीआईपी’ यात्रियों की देन हैं।

एक आदमी जो हज़ारों रुपये का एसी का टिकट खरीद सकता है, जिसके हाथ में आईफोन है, जो ब्रांडेड कपड़े पहनकर ट्रेन में चढ़ा है, वो सुबह उठते ही सबसे पहले क्या करता है?

वो चुपके से देखता है की कोई अटेंडेंट तो नहीं आ रहा, फिर बड़ी सफाई से उस रेलवे की चादर और तौलिये की तह बनाता है और अपने महंगे बैग में ठूंस लेता है। कितनी गिरी हुई हरकत है ये!

और फिर यही लोग ट्रेन से उतरकर चाय वाले को ज्ञान देंगे की “देश में भ्रष्टाचार बहुत है यार, सिस्टम एकदम सड़ गया है।”

आपका चुराया हुआ एक तौलिया उस गरीब अटेंडेंट की छीन लेता है रोटी, हमारी बेशर्मी की कीमत चुका रहा एक लाचार मजदूर

अब इस चोरी का सबसे डरावना और दर्दनाक हिस्सा सुनिए। जब कोई सूट-बूट वाला यात्री अपनी AC बोगी से उतरते वक्त वो सफेद तौलिया या चादर अपने बैग में ठूंस रहा होता है, तो उसके दिमाग में बस एक ही फितूर चलता है-

“अरे यार, सरकार का माल है। सरकार के पास तो बहुत पैसा है, एक तौलिये से रेलवे का क्या ही उखड़ जाएगा!”

यही सोचते हैं ना आप? तो आज अपनी गलतफहमी दूर कर लीजिए। भारतीय रेलवे कोई बेवकूफ संस्था नहीं है जो अपना 104 करोड़ का नुकसान अपनी जेब से भरेगी।

रेलवे का सीधा सा रूल है- जितना माल कम हुआ है, उसकी वसूली उस प्राइवेट कॉन्ट्रैक्टर (Contractor) से की जाएगी जिसे ट्रेन के रख-रखाव का ठेका मिला है।

और वो कॉन्ट्रैक्टर क्या करता है? वो कॉन्ट्रैक्टर अपनी जेब से एक धेला नहीं देता। वो सीधा उस पैसे को उन गरीब ‘कोच अटेंडेंट्स’ (Coach Attendants) की पगार से काट लेता है, जिनकी ड्यूटी उस कोच में लगी थी।

वो लाचार कोच अटेंडेंट जो नीली या ग्रे रंग की यूनिफॉर्म पहने, 10-15 हज़ार रुपये की मामूली पगार पर दिन-रात आपकी सेवा करता है।

वो जो पूरी रात जागकर आपको कंबल देता है, आपकी कंप्लेंट पर जाकर टॉयलेट साफ करवाता है, आप उसी के पेट पर लात मारकर घर चले जाते हैं।

ज़रा सोचकर देखिए, कितनी नीचता है ये! आपने तो अपने झूठे शौक या लालच के लिए 100 रुपये का तौलिया चुरा लिया, लेकिन उस गरीब अटेंडेंट की सैलरी से 500 रुपये कट गए।

एक अमीर या मिडिल क्लास यात्री की इस ‘दो कौड़ी की नीयत’ की वजह से एक लाचार मजदूर के बच्चे को भूखा सोना पड़ रहा है।

क्या यही हमारी इंसानियत है? क्या इसी बेशर्मी को हम पढ़े-लिखे लोगों का ‘स्टेटस’ कहते हैं? इस पाप की कोई माफी नहीं है भाई!

बीकानेर से लेकर दिल्ली और मुंबई तक तौलिया चोरों का दबदबा, पूरे देश में फैल चुकी सरकारी माल मुफ्त में डकारने की ये सड़ी हुई बीमारी

अब अगर आपको लग रहा है की ये चोरियां सिर्फ किसी एक इलाके या राज्य के लोग कर रहे हैं, तो ये आरटीआई (RTI) रिपोर्ट आपका ये भ्रम भी तोड़ देगी।

भाई, ये सरकारी माल मुफ्त में डकारने की जो बजबजाती हुई बीमारी है ना, ये पूरे देश में फैल चुकी है।

रिपोर्ट बताती है की 2022 से लेकर 2026 तक ट्रेनों में तौलिये और चादरें चुराने के मामलों में 56 प्रतिशत का भारी उछाल आ गया है।

मतलब हम सुधरने के बजाय दिन-ब-दिन और ज्यादा बेशर्म होते जा रहे हैं। रेलवे के 7 अलग-अलग ज़ोन के 10 डिवीजनों में पूरे देश की 67 प्रतिशत चोरियां दर्ज की गई हैं।

जानते हैं तौलिया चुराने में सबसे टॉप पर कौन है? राजस्थान का बीकानेर डिवीजन इस मामले में सबसे आगे चल रहा है!

इसके बाद झारखंड का रांची, देश की राजधानी दिल्ली, मायानगरी मुंबई, गुजरात का अहमदाबाद, राजस्थान का ही जोधपुर और बिहार का दानापुर डिवीजन तौलिया चोरों का गढ़ बन चुका है।

पूरे देश का डेटा निकालें तो पता चलता है की हर 1,000 AC यात्रियों में से कम से कम 1 यात्री पक्का चोर है जो रेलवे का सामान अपने घर ले ही जाता है।

उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूरब से लेकर पश्चिम तक, हम भारतीयों की मानसिकता एक ही जैसी सड़ी हुई है।

हमें लगता है की अगर हमने टिकट के पैसे दे दिए हैं, तो ट्रेन के अंदर जो कुछ भी रखा है, वो सब हमारे बाप का है या हमें दहेज में मिला है।

मग्गा, तौलिया, चादर, नल की टोंटी… जो हाथ लगा, सब उखाड़ कर बैग में डाल लो। यही हमारी असली औकात बन कर रह गई है!

टैक्स देने का घमंड और नीयत दो कौड़ी की, जब तक हमारी सिविक सेंस गटर में रहेगी तब तक विश्वगुरु बनने का सपना सिर्फ एक मज़ाक

अब आते हैं पते की बात पर। आज देश में एक अजीब सा फैशन चल पड़ा है। हर आदमी सीना तानकर कहता है, “मैं टैक्सपेयर (Taxpayer) हूँ, मैं टैक्स भरता हूँ, सरकार मुझे वर्ल्ड-क्लास सुविधाएं क्यों नहीं देती?”

अरे भाई, मान लिया आप टैक्स भरते हैं, लेकिन क्या टैक्स भरने से आपको देश की संपत्ति लूटने या उसे बर्बाद करने का लाइसेंस मिल जाता है?

जब सरकार नई चमचमाती ‘वंदे भारत’ (Vande Bharat) ट्रेनें चलाती है, तो यही टैक्स देने वाले लोग उसकी सीटों पर ब्लेड मार देते हैं। जो ऑटोमैटिक दरवाज़े लगे हैं, उनके सेंसर्स पर पान और गुटखा थूक कर उन्हें खराब कर देते हैं।

हेडफोन्स चुरा लेते हैं, स्क्रीन तोड़ देते हैं। और फिर अगले ही दिन चाय की दुकान पर खड़े होकर ज्ञान पेलेंगे की “भाई, इंडिया में यूरोप जैसी फील क्यों नहीं आती!”

लंदन और जापान जैसी फील तब आएगी ना, जब तुम्हारी अपनी हरकतें लंदन या जापान के नागरिकों जैसी होंगी। वहां का आदमी अगर गलती से कचरा भी गिरा देता है, तो उसे उठाकर डस्टबिन में डालता है।

और हमारे यहाँ? हमारे यहाँ ट्रेन के एसी डिब्बे में बैठकर लोग मूंगफली खाकर छिलके वहीं सीट के नीचे फेंक देते हैं और तौलिया चुराकर उसे अपनी ‘स्मार्टनेस’ समझते हैं।

इसलिए अगली बार सरकार को गाली देने या सुविधाओं का रोना रोने से पहले, अपने गिरेबान में झांक कर देख लेना की कहीं तुम्हारे बैग में उस गरीब अटेंडेंट की रोटी और रेलवे का वो चुराया हुआ तौलिया तो नहीं छुपा है?

क्योंकि याद रखना, जब तक खुद को नहीं बदलोगे, तब तक ये देश कभी नहीं बदलेगा!

जय हिंद!

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