जब साक्षात चंडी बनकर मैदान में उतरी 'महारानी भवाशंकरी', बंगाल की मिट्टी को अफगानी पठानों की लाशों से लाल करने वाली हिन्दू वीरांगना, खौफ से अकबर उन्हें बुलाता था 'राजसी बाघिन'

जब साक्षात चंडी बनकर मैदान में उतरी ‘महारानी भवाशंकरी’, बंगाल की मिट्टी को अफगानी पठानों की लाशों से लाल करने वाली हिन्दू वीरांगना, खौफ से अकबर उन्हें बुलाता था ‘राजसी बाघिन’

हमारे हिन्दू इतिहास में ऐसी-ऐसी खूंखार और महान वीरांगनाएं हुई हैं, जिनकी सिर्फ कहानी सुन लो तो शरीर का रोम-रोम फड़कने लगता है।

आज मैं आपको ऐसी ही एक हिंदू शेरनी के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसे साक्षात चंडी का अवतार कहा जाता था! हम बात कर रहे हैं महारानी भवाशंकरी की।

ये बंगाल के ‘भूरिश्रेष्ठ’ हिन्दू साम्राज्य की वो रानी थी जिसने बंगाल में जिहादियों को जानवरों की तरह काटा था।

जब मुगलों और अफगानी पठानों की सेनाएं पूरे देश में मार-काट मचा रही थीं, तब इस हिन्दू शेरनी ने अपनी तलवार से पठानों का वो भयंकर संहार किया था की जिहादी बंगाल की तरफ देखने भर से खौफ से कांप जाते थे।

तलवार के दम पर जिहादियों का खून पीने वाली वो ब्राह्मण शेरनी जिसका नाम सुनकर कांपती थी मुगलिया सल्तनत

अगर आप सोच रहे हैं की रानी भवाशंकरी बचपन से ही रेशमी कपड़ों और महलों में पली-बढ़ी कोई आम राजकुमारी थीं, तो आप बिल्कुल गलत हैं!

16वीं सदी का वो दौर था जब बंगाल की धरती पर भूरिश्रेष्ठ नाम का एक बेहद ताकतवर और स्वतंत्र हिन्दू साम्राज्य हुआ करता था।

ये साम्राज्य आज के हावड़ा, हुगली, बर्धमान और मिदनापुर तक फैला हुआ था। इसी राज्य के एक गाँव ‘पेंडो’ में एक बहुत ही शूरवीर ब्राह्मण सेनापति दीनानाथ चौधरी रहा करते थे।

भवाशंकरी इन्हीं दीनानाथ चौधरी की बेटी थीं।

लोग कहते हैं की ब्राह्मण का काम तो सिर्फ शास्त्र पढ़ना और पूजा-पाठ करना है। लेकिन जब-जब धर्म पर संकट आता है, तो यही ब्राह्मण भगवान परशुराम का रूप लेकर शास्त्र छोड़कर शस्त्र उठा लेता है और दुश्मनों का काल बन जाता है।

भवाशंकरी के पिता ने अपनी बेटी को गुड़ियों से खेलना नहीं सिखाया। उन्होंने उसे बचपन से ही घुड़सवारी, भयंकर तलवारबाज़ी, तीरंदाजी और युद्ध की ऐसी खूंखार ट्रेनिंग दी थी की अच्छे-अच्छे योद्धा उसके सामने पानी भरते थे।

उनके बचपन का एक किस्सा तो इतना खतरनाक है की सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। एक बार भवाशंकरी अपने पिता के साथ घने जंगल में शिकार पर गई थीं।

अचानक झाड़ियों को चीरता हुआ एक भीमकाय जंगली भैंसा (Wild Buffalo) उनकी तरफ दौड़ा। उस पागल और खूंखार जानवर को देखकर अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं।

लेकिन वो ब्राह्मण शेरनी अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिली। उसने अपनी आँखों में रत्ती भर भी खौफ नहीं आने दिया।

जैसे ही वो भैंसा उनके नज़दीक आया, भवाशंकरी ने पूरी ताकत से अपना भाला सीधा उस जानवर के शरीर के आर-पार कर दिया! एक ही वार में उस भीमकाय जानवर की लाश ज़मीन पर तड़प रही थी।

उनकी इस खौफनाक ताकत और बेजोड़ बहादुरी के चर्चे जंगल की आग की तरह पूरे बंगाल में फ़ैल गए।

जब भूरिश्रेष्ठ के हिन्दू सम्राट महाराज रुद्रनारायण ने इस शूरवीर लड़की के बारे में सुना, तो वो इतने प्रभावित हुए की उन्होंने खुद भवाशंकरी के पिता के पास जाकर शादी का प्रस्ताव रख दिया।

और इस तरह, एक ब्राह्मण सेनापति की बहादुर बेटी पूरे भूरिश्रेष्ठ साम्राज्य की महारानी भवाशंकरी बन गई।

जब राजा की मौत के बाद भवाशंकरी ने राजपाठ संभाला और अफगानी पठानों ने सोचा की एक औरत क्या ही कर लेगी

शादी के कुछ सालों तक तो भूरिश्रेष्ठ में सब कुछ बहुत शानदार चलता रहा। महाराज रुद्रनारायण और रानी भवाशंकरी मिलकर अपने हिन्दू साम्राज्य को और भी मज़बूत कर रहे थे।

लेकिन फिर वक़्त ने एक क्रूर करवट ली। महाराज रुद्रनारायण का अचानक निधन हो गया। पूरे राज्य में शोक की लहर दौड़ गई।

पर भवाशंकरी वो औरत नहीं थीं जो कोने में बैठकर अपनी किस्मत पर रोतीं। उन्होंने तुरंत अपने आंसुओं को पोछा और पूरे हिन्दू साम्राज्य की बागडोर अपने हाथों में ले ली।

उन्होंने कसम खाई की जब तक उनके शरीर में खून का एक भी कतरा बाकी है, भूरिश्रेष्ठ पर कभी कोई आंच नहीं आने देंगी।

अब यहीं से कहानी में एंट्री होती है उन खूंखार जिहादियों की, जिन्हें लगता था की एक ‘औरत’ के राज में हिन्दू राज्य को लूटना बहुत आसान होगा।

उस वक्त बंगाल और उड़ीसा के कुछ हिस्सों पर अफगानी पठान सुल्तानों का कब्ज़ा था।

कतलू खान नाम का सुल्तान और उसका सबसे क्रूर, दरिंदा और वहशी सेनापति उस्मान खान लोहानी- ये दोनों मिलकर बंगाल में हिन्दुओं पर कहर बरपा रहे थे।

जब इन जिहादी पठानों को खबर मिली की भूरिश्रेष्ठ के राजा मर चुके हैं और अब गद्दी पर एक ‘विधवा औरत’ बैठी है, तो इनकी बांछें खिल गईं।

इन जिहादियों की मानसिकता हमेशा से औरतों को कमज़ोर और भोग की वस्तु समझने वाली रही है। उस्मान खान को लगा की भवाशंकरी जैसी औरत को तो वो चुटकियों में हरा देगा।

इन जिहादियों ने एक बहुत ही गंदा और खौफनाक प्लान बनाया। इनका मक़सद सिर्फ भूरिश्रेष्ठ के खजाने को लूटना और वहां के हिन्दुओं का नरसंहार करना ही नहीं था, बल्कि इनका सबसे बड़ा टारगेट था महारानी भवाशंकरी को ज़िंदा पकड़ना!

उस्मान खान चाहता था की वो इस हिन्दू रानी को बंदी बनाकर अपने हरम में डाल दे और पूरे हिन्दू समाज का मनोबल हमेशा के लिए तोड़ दे।

लेकिन इस वहशी दरिंदे को अंदाज़ा ही नहीं था की वो जिस आग से खेलने जा रहा है, वो आग उसे और उसकी पूरी पठान फौज को जलाकर राख कर देगी।

जयचंदों की गद्दारी और हिन्दू साधुओं के भेष में घुसे जिहादी उस्मान खान की वो खौफनाक साजिश

हमारे हिन्दू समाज का एक बहुत कड़वा सच है। हमें कभी भी सामने वाले दुश्मनों ने नहीं हराया, हमें हमेशा हमारे ही घर में बैठे जयचंदों ने मारा है।

जब उस्मान खान और उसके पठानों ने भूरिश्रेष्ठ पर हमला करने की सोची, तो उन्हें एक बात बहुत अच्छे से पता थी की आमने-सामने की लड़ाई में इस हिन्दू साम्राज्य की सेना को हराना बच्चों का खेल नहीं है।

भूरिश्रेष्ठ के किले की दीवारें बहुत मज़बूत थीं और रानी की सेना शेर की तरह लड़ती थी।

तो इन जिहादियों ने क्या किया? उन्होंने वही अपना पुराना गद्दारी वाला खेल खेला। उस्मान खान ने रानी भवाशंकरी के ही मुख्य सेनापति ‘चतुर्भुज चक्रवर्ती’ को पैसे और सत्ता का लालच देकर खरीद लिया।

चतुर्भुज चक्रवर्ती… नाम से हिन्दू, लेकिन करम से एकदम नीच गद्दार! इस इंसान ने अपने ही धर्म, अपनी धरती और अपनी रानी की पीठ में खंजर घोंप दिया।

चतुर्भुज ने रानी के किले की हर एक गुप्त जानकारी, सेना की कमज़ोरियां और राज्य के सारे खुफिया रास्ते उस्मान खान को बता दिए।

अब उस्मान खान ने चतुर्भुज के साथ मिलकर एक ऐसी खौफनाक साज़िश रची, जिसे सुनकर किसी का भी खून खौल उठेगा।

वो दिन था रानी भवाशंकरी के राज्याभिषेक और माँ चंडी की भव्य पूजा का। पूरे भूरिश्रेष्ठ में जश्न का माहौल था। लोग पूजा-पाठ में मगन थे।

उस्मान खान जानता था की यही वो दिन है जब राज्य की सुरक्षा सबसे कमज़ोर होगी क्योंकि सब लोग त्योहार मना रहे होंगे।

लेकिन किले के अंदर घुसना कैसे था? इसके लिए इस जिहादी दरिंदे ने जो तरीका अपनाया, वो हिन्दुओं के मुँह पर एक बहुत बड़ा तमाचा था।

उस्मान खान लोहानी और उसके 12 सबसे खतरनाक, खून के प्यासे जिहादी कमांडरों ने ‘हिन्दू साधुओं’ का भेष बना लिया! माथे पर तिलक, गले में मालाएं और गेरुआ वस्त्र।

और इन कपड़ों के अंदर उन्होंने छुपा रखी थीं अपनी खंजर और तलवारें।

साधुओं का भेष बनाकर ये 13 जिहादी बिना किसी रोक-टोक के भूरिश्रेष्ठ राज्य की सीमा में घुस गए। उन्होंने किले के पास जाकर अपना डेरा डाल लिया।

बाहर से देखने में वो ध्यान लगाते हुए सन्यासी लग रहे थे, लेकिन अंदर ही अंदर वो रानी की मौत का इंतज़ार कर रहे थे।

इन 13 साधुओं के पीछे खानकुल के घने जंगलों में 500 से ज़्यादा हथियारबंद और खूंखार अफगानी पठान छिपे बैठे थे। उस्मान खान का प्लान बिल्कुल सेट था।

रात के अँधेरे में जैसे ही रानी पूजा के लिए अकेली बाहर निकलेंगी, ये नकली साधु उन पर हमला करके उन्हें ज़िंदा पकड़ लेंगे।

और फिर इशारा मिलते ही जंगल में छिपे 500 पठान पूरे शहर में घुसकर भयंकर नरसंहार मचा देंगे। हिन्दुओं को काट दिया जाएगा और भूरिश्रेष्ठ का नामोनिशान मिटा दिया जाएगा।

गद्दार चतुर्भुज चक्रवर्ती ने पूरी तैयारी कर ली थी की किले के दरवाज़े खोल दिए जाएं ताकि पठान आसानी से अंदर आ सकें। सब कुछ उस्मान खान के प्लान के हिसाब से चल रहा था।

उसे लग रहा था की सुबह का सूरज निकलने से पहले वो बंगाल की इस ज़मीन पर पठानों का हरा झंडा गाड़ देगा और उस हिन्दू रानी को घसीटता हुआ अपने सुल्तान के पास ले जाएगा।

जब साक्षात रणचंडी बन गई महारानी भवाशंकरी और भूरिश्रेष्ठ की धरती को कर दिया जिहादी पठानों की लाशों से लाल

उस्मान खान को लगा था की उसका ‘साधु’ वाला भेस और जंगल में छिपे 500 पठान किसी को नज़र नहीं आएंगे। लेकिन वो भूल गया की भूरिश्रेष्ठ साम्राज्य कोई लावारिस रियासत नहीं थी।

रानी भवाशंकरी का खुफिया तंत्र इतना तगड़ा था की किले की दीवारों के बाहर पत्ता भी खड़कता, तो उसकी खबर सीधे रानी के कानों तक पहुँचती थी।

रानी के वफादार गुप्तचरों ने तुरंत आकर बता दिया की गद्दार चतुर्भुज चक्रवर्ती ने राज्य का सौदा कर लिया है और जंगल में जिहादियों की फौज घात लगाए बैठी है।

कोई आम औरत होती तो शायद घबरा जाती, रोने लगती या जान बचाकर भागने की सोचती। लेकिन भवाशंकरी की रगों में एक शूरवीर ब्राह्मण का खून दौड़ रहा था!

जब उन्हें पता चला की ये जिहादी उनकी आबरू और उनके राज्य पर गिद्ध की तरह नज़रें गड़ाए बैठे हैं, तो उनके अंदर की साक्षात भवानी जाग उठी।

उन्होंने तुरंत अपनी कुलदेवी ‘माँ चंडी’ (राजवल्लभी) के मंदिर में जाकर मत्था टेका और वहां रखी अपनी वो पवित्र और खूंखार तलवार उठा ली, जिसकी धार ने जाने कितने दुश्मनों के गले काटे थे।

रानी ने अपने राजसी कपड़े उतारे और लोहे का भारी सैन्य कवच पहन लिया। वो अपने घोड़े पर सवार हुईं और अपनी चुनिंदा ‘महिला रेजीमेंट’ तथा सबसे वफादार सैनिकों को लेकर रातों-रात निकल पड़ीं।

मंज़र कुछ ऐसा था… रात का भयंकर अँधेरा, आसमान से तेज़ बारिश हो रही थी और खानकुल (बाशुरी) के जंगलों में उस्मान खान के 500 पठान आराम से छिपे बैठे थे।

उन्हें तो लग रहा था की सुबह होते ही वो हिन्दुओं का कत्लेआम करेंगे। लेकिन अचानक, बिजली कड़की और उन पठानों के कैंप पर महारानी भवाशंकरी भूखे शेरनी की तरह टूट पड़ीं!

रानी की दोनों हाथों से चलने वाली तलवार हवा में ऐसे लहरा रही थी जैसे साक्षात काल नाच रहा हो। जो पठान सामने आया, उसका सिर धड़ से अलग हो गया।

रानी और उनकी सेना ने पठानों को बिल्कुल जानवरों की तरह काटा। उन वहशी दरिंदों को संभलने और अपनी तलवारें निकालने तक का मौका नहीं मिला।

बारिश के पानी में पठानों का खून ऐसे बहने लगा की भूरिश्रेष्ठ की पूरी मिट्टी लाल हो गई।

जब उस्मान खान ने देखा की उसकी 500 लोगों की फौज को एक औरत अपनी तलवार से बेरहमी से काट रही है, तो उसके पसीने छूट गए।

वो इतना डर गया की लड़ने के बजाय उसने मैदान छोड़कर भागने का फैसला किया। लेकिन भागता कैसे? रानी की सेना ने इलाका चारों तरफ से घेर रखा था।

अपनी जान बचाने के लिए इस खूंखार पठान सुल्तान ने औरतों के कपड़े पहने और मुँह छिपाकर दुम दबाकर वहां से भाग खड़ा हुआ! रानी ने जंगल में एक भी पठान को ज़िंदा नहीं छोड़ा।

उस नीच गद्दार चतुर्भुज चक्रवर्ती का भी वही हश्र किया गया जो बाकी पठानों का किया गया।

भवाशंकरी का वो खौफ जिसके आगे अकबर ने भी टेक दिए घुटने और कांपते हुए दी ‘राजसी बाघिन’ की उपाधि

अब आप सोच रहे होंगे की इस पूरी कहानी में मुगल कहाँ थे? भाई, उस वक्त दिल्ली के तख्त पर मुगल बादशाह अकबर बैठा था।

उसकी नज़रें भी हमेशा से बंगाल के इस आज़ाद हिन्दू साम्राज्य पर गड़ी हुई थीं। वो बस मौके की ताक में था।

लेकिन जब अकबर के दरबार में ये खबर पहुँची की भूरिश्रेष्ठ की एक विधवा रानी ने रातों-रात उस्मान खान और उसके 500 पठानों को काट कर फेंक दिया है, तो दिल्ली दरबार में भी सन्नाटा छा गया।

अकबर को अच्छे से पता चल गया था की अगर उसने भूरिश्रेष्ठ पर मुगलों की सेना भेजी, तो वो रणचंडी मुगलों का भी वही हाल करेगी जो उसने पठानों का किया है।

अकबर ने रानी से पंगा लेने की हिम्मत ही नहीं जुटाई! अपनी सेना भेजने के बजाय, अकबर ने बहुत ही चालाकी से अपने सबसे बड़े और भरोसेमंद सेनापति राजा मान सिंह को भूरिश्रेष्ठ भेजा।

वो भी लड़ने के लिए नहीं, बल्कि रानी के सामने ‘शांति समझौता’ का प्रस्ताव लेकर! मान सिंह ने रानी भवाशंकरी के दरबार में जाकर मुगलों की तरफ से दोस्ती का हाथ बढ़ाया।

अकबर ने डंके की चोट पर महारानी भवाशंकरी के स्वतंत्र हिन्दू साम्राज्य को मान्यता दी। उसने साफ कह दिया की मुगलों की सेना कभी भी भूरिश्रेष्ठ की सीमाओं के अंदर कदम नहीं रखेगी।

और महारानी की इस भयंकर और खूंखार वीरता के आगे नतमस्तक होते हुए, अकबर ने उन्हें “रायबाघिनी” की उपाधि दी।

रायबाघिनी का मतलब होता है ‘रॉयल टाइग्रेस’ यानी बंगाल की राजसी बाघिन! मुगलों की कभी हिम्मत नहीं हुई की वो इस बाघिन के इलाके में शिकार करने की भी सोचें।

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