आज मैं इतिहास के उस पन्ने की धूल झाड़ने जा रहा हूं जिसमें हमारे सनातनी साधुओं के हाथों जिहादियों की वो ज़िल्लत भरी हार दर्ज है, जिसे पढ़कर आज भी उनके वंशजों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
बात मार्च 1757 की है। भारत पर उस खूंखार और वहशी अफगानी लुटेरे ‘अहमद शाह अब्दाली’ का कहर टूट पड़ा था। दिल्ली को पूरी तरह लूटने के बाद भी इस जिहादी दरिंदे की भूख नहीं मिटी थी।
अब्दाली ने अपने सबसे खूंखार और बेरहम कमांडरों- सरदार जहान खान और नजीब-उद-दौला, को 40,000 जिहादियों की एक विशाल फौज देकर मथुरा और वृंदावन की तरफ भेज दिया।
उसने अपने जिहादियों से कह दिया था की “मथुरा और वृंदावन काफिरों के सबसे पवित्र शहर हैं, वहां जाओ और एक भी काफिर ज़िंदा नहीं बचना चाहिए। जो जितने काफिरों के सिर काटकर लाएगा, उसे उतना ही बड़ा इनाम दिया जाएगा।”
1 मार्च 1757 को इन जिहादियों की फौज ने मथुरा पर हमला कर दिया। वो इस्लाम के नाम पर किया गया एक ऐसा जिहादी कत्लेआम था जिसकी कल्पना करके आज भी रूह कांप जाती है।
इतिहासकार जदुनाथ सरकार लिखते हैं कि मथुरा की सड़कों पर लाशों के इतने ऊंचे ढेर लग गए थे की चलने की जगह नहीं बची थी।
इन जिहादियों ने हमारे भव्य मंदिरों को आग लगा दी, हमारी मूर्तियों को तोड़ा और उन खंडित मूर्तियों को गेंद की तरह पैरों से मारते हुए गलियों में घूमे।
अब्दाली के खूंखार कमांडरों की नज़र हमारे कान्हा के गोकुल पर और गोकुलनाथ मंदिर को राख करने का जिहादी फरमान
मथुरा और वृंदावन को एक धधकते हुए श्मशान में बदलने के बाद भी इन जिहादी भेड़ियों की मज़हबी हवस शांत नहीं हुई थी। अब अब्दाली के कमांडर सरदार जहान खान की नज़र पड़ी हमारे कन्हैया की सबसे पवित्र नगरी ‘गोकुल’ पर।
गोकुल वल्लभ संप्रदाय का सबसे बड़ा केंद्र और हमारे आराध्य गोकुलनाथ जी का वो भव्य मंदिर था जहाँ हज़ारों सनातनी अपना सिर झुकाते थे।
जहान खान ने फैसला किया की जब तक इस गोकुलनाथ मंदिर को ज़मीनदोज़ करके राख में नहीं मिला दिया जाता, तब तक उसका जिहाद पूरा नहीं होगा।
खून की प्यासी और तोपों से सजी 40,000 अफगानी जिहादियों की उस खूंखार फौज ने गोकुल की तरफ अपना रूख कर लिया।
जहान खान के अंदर गुरूर था की जब दिल्ली का तख्त और मथुरा के राजा उसके सामने नहीं टिक पाए, तो इस छोटे से गांव गोकुल की क्या औकात है?
इनका प्लान था की कुछ ही घंटों में गोकुल में घुसेंगे, पुजारियों का सिर काटेंगे, मंदिर को आग लगाएंगे और सारा खज़ाना लूटकर अब्दाली के कदमों में डाल देंगे।
ना कोई राजा ना कोई शाही फौज, कान्हा की नगरी बचाने के लिए जब त्रिशूल उठाकर खड़े हुए 4000 भस्म धारी ‘नागा साधु’
उस वक्त गोकुल की बेबसी दिल को सहमा देने वाली थी। गोकुल को बचाने के लिए वहां कोई मराठा सेना, कोई राजपूत राजा या कोई शाही फौज मौजूद नहीं थी।
सामने मौत खड़ी थी और बचने का कोई रास्ता नहीं था। लेकिन जब धर्म पर संकट आता है, तो भगवान साक्षात धरती पर उतर आते हैं।
जब गोकुलनाथ मंदिर पर ये जिहादी संकट मंडरा रहा था, तभी कुंभ का स्नान करके लौट रहे ‘दशनामी संप्रदाय’ के 4000 नागा साधु अचानक से गोकुल में इकट्ठे हो गए।
अरे भाई, ये नागा साधु कोई साधारण संन्यासी नहीं थे जो सिर्फ माला जपते हों! ये आदि शंकराचार्य द्वारा तैयार की गई सनातन धर्म की वो खूंखार फौज थी जिसे सिर्फ और सिर्फ धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करने की ट्रेनिंग दी गई थी।
ज़रा उस मंज़र की कल्पना कीजिए! शरीर पर कोई कपड़े नहीं, छाती पर तीर और तलवार रोकने के लिए लोहे का कोई कवच नहीं।
पूरे नंगे बदन पर सिर्फ शमशान की भस्म लिपटी हुई, सिर पर जटाजूट, और हाथों में भारी लोहे के चिमटे, त्रिशूल, भाले और नंगी तलवारें!
ये 4000 नागा साधु साक्षात कालभैरव लग रहे थे। इन्होंने कसम खा ली की जब तक इनके नंगे बदन में खून की आखिरी बूंद बाकी है, दुनिया की कोई भी जिहादी ताकत गोकुलनाथ मंदिर की सीढ़ियों को छू भी नहीं पाएगी।
ये साक्षात यमराज बनकर उन 40 हज़ार अफगानियों का इंतज़ार करने लगे।
16 मार्च का वो खौफनाक महासंग्राम जब जिहादियों की तोपों और तलवारों से जा टकराए नंगे बदन वाले साक्षात महाकाल
16 मार्च 1757! जहान खान अपनी 40,000 जिहादियों की उस विशाल फौज को लेकर गोकुल के दरवाज़े पर पहुंच गया।
एक तरफ वो अफगानी लुटेरे जिनके पास बारूद, बंदूकें, तोपें और लोहे के मज़बूत कवच थे। और दूसरी तरफ सिर्फ 4000 नंगे बदन वाले हमारे नागा साधु।
जहान खान ने सोचा की इन नंगे साधुओं को देखकर उसके सैनिक हंसेंगे और एक ही झटके में इन्हें काटकर मंदिर में घुस जाएंगे।
लेकिन जैसे ही जिहादियों ने गोकुल की सीमा में कदम रखा, उन 4000 नागा साधुओं ने एक साथ अपने चिमटे हवा में लहराए और ‘हर हर महादेव’ का ऐसा खौफनाक जयघोष किया की ज़मीन कांप उठी।
वो जयघोष इतना भयानक था की अफगानियों के घोड़ों ने डर के मारे पीछे हटना शुरू कर दिया। और फिर शुरू हुआ वो रक्तरंजित महासंग्राम जिसने मुगलों की अजेयता के उस वहम के चिथड़े उड़ा दिए।
नागा साधुओं ने किसी तोप या बंदूक का इंतज़ार नहीं किया। वो अपनी जान की परवाह किए बिना आंधी की तरह सीधे उन 40 हज़ार जिहादियों की फौज के बीच में घुस गए! वो मौत का एक अंधाधुंध तांडव था।
चिमटों और त्रिशूलों से फाड़ दी अफगानी जिहादियों की छाती, नागा साधुओं का वो खूंखार तांडव जिसे देखकर अब्दाली की निकल गयी हवा
नागा साधुओं ने पास जाकर अपने भारी भरकम लोहे के चिमटों से अफगानियों के सिरों पर ऐसा खौफनाक प्रहार किया की उनके लोहे के टोप पिचक गए और सिर तरबूज की तरह फट कर बिखर गए।
त्रिशूलों ने अफगानियों के लोहे के कवच फाड़ दिए और सीधे उनकी छातियों के पार निकल गए।
नागा साधुओं की युद्धनीति में जान बचाने का कोई कॉन्सेप्ट था ही नहीं। वो तो अपने इष्ट के नाम पर जान कुर्बान करने आए थे।
अफगानियों की तलवारें नागाओं के नंगे शरीर को काट रही थीं, खून के फव्वारे फूट रहे थे, लेकिन दर्द का कोई निशान इन संन्यासियों के चेहरे पर नहीं था।
वो एक तलवार खाते, लेकिन ज़मीन पर गिरने से पहले चार अफगानी जिहादियों की गर्दनें धड़ से अलग कर देते।
ये एकतरफा कत्लेआम देखकर अब्दाली के उन खूंखार लुटेरों की पैंट गीली हो गई। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था की ये इंसान हैं या साक्षात मौत के देवता जो बिना किसी डर के हथियारों के बीच में घुसकर उन्हें तरह काट रहे हैं।
2000 नागा साधुओं का वो सर्वोच्च बलिदान जिसने 40 हज़ार की जिहादी फौज को दुम दबाकर भागने पर मजबूर कर दिया
इस खूनी मारकाट में हमारे नागा साधुओं ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उस पवित्र गोकुलनाथ मंदिर को बचाने के लिए 4000 में से हमारे 2000 नागा साधु वहीं रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हो गए।
उन्होंने अपने सीनों पर गोलियां खाईं, लेकिन मंदिर की तरफ एक इंच भी किसी जिहादी को बढ़ने नहीं दिया।
शहीद होने से पहले इन भस्म धारी शेरों ने 2000 से भी ज़्यादा अफगानी जिहादियों की लाशें वहीं गोकुल की मिट्टी में बिछा दी थीं।
जब अब्दाली के कमांडर जहान खान ने अपने सबसे खूंखार सैनिकों को कुत्तों की मौत मरते देखा, तो उसका पूरा गुरूर टूट गया।
उसके सैनिक खौफ के मारे पीछे भागने लगे थे। जहान खान को समझ में आ गया की अगर हमने मंदिर की तरफ बढ़ने की कोशिश की, तो ये नागा साधु हमारे एक भी सैनिक को ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे।
ये भारत के इतिहास में किसी भी विदेशी आक्रांता की सबसे ज़िल्लत भरी हार थी! 40 हज़ार तोपों वाली जिहादी फौज, 4000 नंगे बदन वाले साधुओं से हारकर गोकुल से दुम दबाकर भाग खड़ी हुई।
नागा साधुओं ने अपनी लाशें बिछाकर सनातन धर्म के उस पवित्र मंदिर पर आंच तक नहीं आने दी।
