दोस्तों कभी बैठकर इत्मीनान से सोचा है की आप सुबह उठकर रात तक गधों की तरह मेहनत क्यों कर रहे हैं?
सुबह 9 बजे की लोकल ट्रेन या खचाखच भरी बस में धक्के खाते हुए ऑफिस जाते हैं। महीने के आखिर में जब वो सैलरी हाथ में आती है, तो उसमें से एक बहुत बड़ा हिस्सा इनकम टैक्स के नाम पर सरकार काट लेती है।
सड़क पर गाड़ी निकालें तो टोल टैक्स का मीटर चालू हो जाता है। एक ईमानदार टैक्सपेयर की ज़िन्दगी बस इसी कोल्हू के बैल की तरह घूम रही है।
लेकिन क्या कभी दिमाग में ये सवाल आया है की आपके खून-पसीने की इस गाढ़ी कमाई का ये सिस्टम आखिर करता क्या है? आप तो सोच रहे होंगे की देश के विकास में पैसा लग रहा है, सड़कें बन रही हैं, सेना को हथियार मिल रहे हैं।
लेकिन सच तो ये है की आपके इसी टैक्स के पैसे से अब शांतिदूतों के ‘शरिया’ वाले शौक पाले जाएंगे। जी हां, बिल्कुल सही सुन रहे हैं आप!
पटना हाई कोर्ट का अगस्त 2026 में जो नया फरमान आया है ना, उसने पूरे देश के सेक्युलर सिस्टम की पोल खोल कर रख दी है।
सरकारी खजाने से अब मुसलमानों की दूसरी और तीसरी बीवियों को ‘फैमिली पेंशन’ (Family Pension) बांटी जाएगी! मतलब, हिंदू अपनी कमर तोड़कर टैक्स भरेगा, और इन शांतिदूतों की बेगमें उस पैसे पर ताउम्र मौज उड़ाएंगी।
देश का कानून सेक्युलर लेकिन मलाई बंटेगी शरिया के हिसाब से, और बिल फाड़ा जाएगा हिन्दू टैक्सपेयर्स पर
सच कहूं तो इस देश का सेक्युलरिज्म अब दुनिया का सबसे बड़ा भद्दा मज़ाक बन चुका है। हमें बचपन से घुट्टी पिलाई जाती है की “भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, यहां कानून सबके लिए बराबर है।”
लेकिन भाई, ये बराबरी दिखती कहां है? ये तथाकथित बराबरी और सेक्युलरिज्म सिर्फ तब याद आता है जब हिंदू के किसी त्योहार पर पाबंदी लगानी हो या दिवाली के पटाखों पर ज्ञान बांचना हो।
लेकिन जब बात मलाई काटने की आती है, सरकारी खजाने से पैसा लूटने की आती है, तो अचानक से इस सिस्टम का सेक्युलरिज्म खिड़की से बाहर कूद जाता है और वहां धमाकेदार एंट्री होती है ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ की।
मामला बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग का है। वहां एक मुस्लिम कर्मचारी नौकरी करता था। उस भाईसाहब ने अपनी पहली बीवी के ज़िंदा होते हुए दूसरी शादी रचा ली।
ये दूसरी बीवी थी नजमा खातून। जब पहली पत्नी की मौत हो गई, तो इस महाशय ने पेंशन वाले कागज़ातों में अपनी इस दूसरी बीवी (नजमा) का नाम घुसाने की अर्जी डाल दी।
अब यहां स्वास्थ्य विभाग और एजी (AG) ऑफिस के अधिकारियों ने बिल्कुल सही काम किया। उन्होंने कानून का डंडा चलाते हुए साफ कह दिया की भई, तुम्हारी इस दूसरी बीवी को कोई पेंशन-वेंशन नहीं मिलेगी।
उन्होंने बाकायदा ‘बिहार गवर्नमेंट सर्वेंट्स कंडक्ट रूल्स 1976’ का हवाला दिया।
ये नियम बहुत साफ शब्दों में चीख कर कहता है की कोई भी सरकारी कर्मचारी, चाहे वो किसी भी धर्म का हो, सरकार की परमिशन लिए बिना दूसरी शादी नहीं कर सकता।
अगर वो ऐसा करता है, तो उसकी दूसरी शादी सरकारी रिकॉर्ड में मान्यता नहीं पाएगी। स्वास्थ्य विभाग ने तो एकदम डंके की चोट पर सही और सेक्युलर फैसला लिया था।
लेकिन फिर ये मामला पहुंचा पटना हाई कोर्ट। और वहां जो हुआ, उसने पूरे देश के होश उड़ा दिए। जज साहब ने स्वास्थ्य विभाग के उस सेक्युलर सरकारी नियम को सिरे से खारिज कर दिया।
कोर्ट ने दलील दी की देश में अभी ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) तो लागू है ही नहीं। इसलिए, मुसलमानों के शादी-ब्याह और परिवार के मामले उनके ‘मोहम्मडन पर्सनल लॉ’ (Muslim Personal Law Board) से ही तय होंगे।
हिन्दुओं के टैक्स के पैसो से शांतिदूतों की अय्यासी, पटना हाई कोर्ट का ये कैसा दोगला फैसला
फिर पटना हाई कोर्ट ने कहा की मुस्लिम पर्सनल लॉ में एक आदमी को 4-4 शादियां करने की खुली छूट है, इसलिए इस सरकारी कर्मचारी की दूसरी शादी को किसी भी सूरत में ‘अवैध’ (Illegal) नहीं ठहराया जा सकता।
और इसी आधार पर स्वास्थ्य विभाग (सिविल सर्जन) को आदेश दे दिया गया की अगले 2 हफ्ते के अंदर नजमा खातून की पेंशन चालू करो!
लो कर लो बात! मतलब जो कंडक्ट रूल 1976 से चला आ रहा था, वो शरिया के एक झटके में हवा हो गया। जिस सरकारी नियम को तोड़कर दूसरी शादी की गई, कोर्ट ने उसे ही दरकिनार करके पर्सनल लॉ को सबसे ऊपर बिठा दिया।
ये कैसा दोगलापन है? जब आप एक सेक्युलर देश की सरकारी नौकरी कर रहे हैं, सरकार से तनख्वाह ले रहे हैं, तो आप पर उस देश का सेक्युलर कानून लागू होना चाहिए ना?
लेकिन नहीं, यहां तो ‘मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू’ वाला हिसाब चल रहा है। पटना हाई कोर्ट का ये फैसला चीख-चीख कर बता रहा है की हमारे सिस्टम ने शरिया कानून के आगे पूरी तरह घुटने टेक दिए हैं।
जिस सरकारी खजाने में 80 प्रतिशत से ज़्यादा योगदान इस देश के बहुसंख्यक हिंदू समाज का है, उस खजाने को अब किसी की चार शादियों का शौक पूरा करने के लिए खोला जा रहा है।
आप ज़रा इस पाखंड की गहराई को समझिए। जब ड्यूटी करने और तनख्वाह लेने की बारी थी, तब वो कर्मचारी भारत सरकार का था।
लेकिन जब उसकी मौत के बाद उसकी दूसरी बीवी को पेंशन देने की बारी आई, तो अचानक से वो ‘मोहम्मडन’ बन गया और उस पर भारत का नहीं, बल्कि शरिया का कानून लागू हो गया।
और सबसे ज़्यादा खून खौलाने वाली बात ये है की इस पूरे ड्रामे का बिल किसके माथे फाड़ा जा रहा है? उस आम हिंदू टैक्सपेयर के माथे, जो बेचारा एक पत्नी और दो बच्चों का खर्चा उठाने में दिन-रात पिस रहा है।
एक हिन्दू सरकारी नौकरी में दूसरी शादी करे तो सीधे जेल पर शांतिदूतों के लिए खुल जाते हैं सरकारी खजाने
अब ज़रा इस देश के ‘सेक्युलर’ सिस्टम का वो सच देखिए जो किसी भी सनातनी का खून खौलाने के लिए काफी है। इस देश में बहुसंख्यक हिंदुओं के लिए कानून की किताब अलग है और विशेष समुदाय के लिए एकदम अलग।
अगर आप एक हिंदू हैं और सरकारी नौकरी कर रहे हैं, तो ज़रा अपनी पहली पत्नी के होते हुए दूसरी शादी करने की भूल करके देखिए। फिर देखिए की ये सेक्युलर सिस्टम आपके साथ क्या भयानक सुलूक करता है!
‘हिंदू मैरिज एक्ट’ और आईपीसी की धारा 494 (IPC 494) का ऐसा डंडा पड़ेगा की आपकी सात पुश्तें याद रखेंगी।
जैसे ही आपके विभाग को भनक लगेगी की आपने दूसरी शादी की है, सबसे पहले तो आपको कॉलर पकड़कर नौकरी से सस्पेंड किया जाएगा।
उसके बाद आप पर क्रिमिनल केस चलेगा और आपको सीधे जेल की हवा खानी पड़ेगी।
आपकी सारी सरकारी सुविधाएं, आपका पीएफ (PF), आपकी ग्रेच्युटी और आपकी जीवन भर की पेंशन… सब कुछ एक झटके में ज़ब्त कर लिया जाएगा।
आप समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे, सड़क पर आ जाएंगे और आपका पूरा करियर तबाह हो जाएगा।
लेकिन वहीं दूसरी तरफ ज़रा तस्वीर देखिए। उसी सरकारी दफ्तर में, उसी कुर्सी के बगल में बैठा हुआ एक ‘शांतिदूत’ अगर अपनी पहली बेगम के होते हुए दूसरी, तीसरी या चौथी शादी भी कर ले, तो इस सेक्युलर सिस्टम के माथे पर एक पसीना तक नहीं आता।
किसी की हिम्मत नहीं है की उसे सस्पेंड कर दे! क्यों? क्योंकि भाई साहब ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ की मज़बूत चादर ओढ़े बैठे हैं! उनके लिए कोई सस्पेंशन नहीं, कोई जेल नहीं, कोई कार्रवाई नहीं।
नौकरी तो छोड़िए, मरने के बाद भी उनकी इन दूसरी, तीसरी बीवियों को बाकायदा ‘सम्मान’ के साथ हमारे और आपके टैक्स के पैसों से पेंशन बांटी जाएगी।
ये कैसा अंधेर राज है यार? क्या हिंदुओं ने इस देश में Second Class का नागरिक बनकर जीने का ठेका ले रखा है? जब दफ्तर एक है, सरकार एक है, देश एक है और अपराध एक है, तो फिर सज़ा और मलाई में इतना भयंकर भेदभाव क्यों?
सच कहूं तो इससे बड़ा और घिनौना दोगलापन दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश में देखने को नहीं मिलेगा।
तुम्हारी गाढ़ी कमाई और टैक्स के पैसों से पलेगा चार शादियों वाला शौक, ये है हमारे सिस्टम का सबसे कड़वा सच
अब बिहार सरकार के फाइनेंस डिपार्टमेंट का 2011 का वो सर्कुलर भी जान लीजिए, जो इस तुष्टिकरण के खेल का सबसे बड़ा मोहरा बना हुआ है।
उस सर्कुलर में साफ-साफ शब्दों में लिखा है की अगर मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत किसी सरकारी कर्मचारी की एक से ज़्यादा पत्नियां हैं, और उसके मरने के बाद वो सब ज़िंदा हैं, तो जो फैमिली पेंशन का पैसा होगा, वो उन सभी ज़िंदा बीवियों में बराबर-बराबर बांट दिया जाएगा।
ज़रा अपने दिमाग पर ज़ोर डालिए और सोचिए! एक कर्मचारी, एक तनख्वाह, लेकिन पेंशन के हकदार 2, 3 या 4 घर!
अगर एक आदमी अपनी 4 शादियों का शौक पूरा करके मर गया, तो उसकी चारों बीवियों का खर्चा अब कौन उठाएगा? वो खर्चा उठाएगा बेचारा आम हिंदू टैक्सपेयर!
वो हिंदू, जो महंगाई की मार झेलते हुए, दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह पिसकर किसी तरह अपनी एक बीवी और दो बच्चों की स्कूल फीस भर पा रहा है।
ये क्या मज़ाक चल रहा है भाई? अगर आपको अपने मज़हब के हिसाब से चार-चार शादियां करने का इतना ही शौक है, अगर आपको शरिया कानून इतना ही प्यारा है, तो अपनी बेगमों का खर्चा भी शरिया के हिसाब से खुद उठाइए ना! आपकी अय्याशी का, आपके बहुविवाह का बिल इस देश का टैक्सपेयर क्यों फाड़े?
जब आप रिटायरमेंट के बाद वाली ज़िन्दगी और पेंशन का मज़ा ले रहे होते हैं, तब आपको शरिया याद नहीं आता?
तब आपको सेक्युलर भारत सरकार का पैसा बिल्कुल हलाल लगता है! लेकिन जैसे ही कानून मानने की बारी आती है, कंडक्ट रूल मानने की बारी आती है, तो आप पर्सनल लॉ का झंडा लेकर कोर्ट में खड़े हो जाते हैं और सिस्टम आपके सामने नतमस्तक हो जाता है।
ये हमारे सिस्टम की सबसे बड़ी विडंबना है की जो हिंदू इस देश की इकॉनमी को अपने कंधों पर खींच रहा है, उसे ही ये सिस्टम सबसे ज़्यादा निचोड़ रहा है।
हमारी गाढ़ी कमाई का पैसा अगर अस्पताल बनाने, स्कूल खोलने, सेना को मजबूत करने या इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने में लगे, तो किसी भी टैक्सपेयर को दर्द नहीं होगा।
लेकिन जब उसी टैक्स के पैसे से तुष्टिकरण की नीच राजनीति की जाती है, वोट बैंक को खुश किया जाता है और मुसलमानों की दूसरी-तीसरी बीवियों के घर चलाए जाते हैं, तो सीने में आग लगनी लाज़मी है।
यूनिफॉर्म सिविल कोड अब मांग नहीं बल्कि आस्तित्व की लड़ाई है वरना शरिया के नाम पर यूं ही लुटता रहेगा हिन्दू
अब सबसे बड़ा सवाल ये उठता है की इस भयंकर बीमारी का इलाज क्या है? क्या हम सिर्फ सोशल मीडिया पर बैठकर छाती पीटते रहेंगे, सरकार को कोसते रहेंगे, या इस कोढ़ का कोई पक्का बंदोबस्त भी है?
अगर आप पटना हाई कोर्ट के इस फैसले को बहुत ध्यान से पढ़ेंगे, तो जज साहब ने खुद अनजाने में ही सही, लेकिन इस बीमारी का अचूक इलाज बता दिया है।
कोर्ट ने अपने आदेश में साफ-साफ कहा है की, “देश में अभी यूनिफॉर्म सिविल कोड (समान नागरिक संहिता – UCC) लागू नहीं है, इसलिए मुसलमानों के मामले पर्सनल लॉ से ही चलेंगे।”
बस! यही वो एक लाइन है जो पूरे सनातनी समाज और हर टैक्सपेयर के लिए एक बहुत बड़ा अलार्म (Wake-up call) है।
ज़रा सोचिए, आज़ादी के 75 साल से भी ज़्यादा बीत चुके हैं। हम चाँद और मंगल पर पहुँच गए, लेकिन आज भी इस देश में एक ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ लागू नहीं हो पाया।
क्यों? क्योंकि वोट बैंक के लालची नेताओं ने हमेशा ‘शरिया’ को संविधान से ऊपर रखा।
अरे भाई, जब देश एक है, इस देश का प्रधानमंत्री एक है, संसद एक है, और टैक्स का खजाना एक है… तो फिर शादी, तलाक और पेंशन के कानून दो कैसे हो सकते हैं?
क्या आप किसी ऐसे क्रिकेट मैच की कल्पना कर सकते हैं जहाँ एक टीम के 11 खिलाड़ी खेल रहे हों और दूसरी टीम के 15 खिलाड़ी मैदान में उतर आएं?
और जब अंपायर सीटी बजाए, तो वो 15 खिलाड़ियों वाली टीम कहे की “भई, हम तो अपने पर्सनल रूल से खेलेंगे!” क्या वो मैच फेयर होगा? बिल्कुल नहीं!
तो फिर ये देश कैसे फेयर तरीके से चल सकता है जहाँ हिंदुओं पर तो दुनिया भर के सेक्युलर कानूनों की बेड़ियां डाल दी गई हैं, और एक विशेष समुदाय को ‘शरिया’ के नाम पर खुलेआम अय्याशी और बहुविवाह की छूट दे दी गई है?
‘संविधान खतरे में है’ का रोना रोने वाला वो वामपंथी और कांग्रेसी इकोसिस्टम आज कहाँ दुबका बैठा है?
जब देश के संविधान की धज्जियां उड़ाकर पर्सनल लॉ के नाम पर सरकारी खजाना लूटा जा रहा है, तब इन्हें बाबा साहेब अंबेडकर का संविधान याद नहीं आता?
असल बात तो ये है की ये लोग कभी चाहते ही नहीं की इस देश में UCC लागू हो। क्योंकि जिस दिन देश में समान नागरिक संहिता आ गई, उस दिन से इनकी ये तुष्टिकरण वाली राजनीतिक दुकान हमेशा के लिए बंद हो जाएगी।
उस दिन से कोई किसी को चार-चार शादियां करके सरकारी मलाई लूटने का प्रिविलेज नहीं दे पाएगा।
आज देश का बहुसंख्यक हिंदू समाज एक बहुत ही भयानक दोराहे पर खड़ा है। आपको समझना होगा की यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) अब कोई राजनीतिक मांग या चुनावी जुमला नहीं रह गया है।
यह अब हिंदुओं के ‘अस्तित्व’ और उनके हक़ की लड़ाई बन चुका है।
आज ये आपसे आपके टैक्स का पैसा छीनकर उनकी दूसरी बीवियों को पेंशन बांट रहे हैं, कल को ये वक्फ बोर्ड की तरह आपकी ज़मीनों पर दावा ठोकेंगे, और परसों आपके बच्चों की नौकरियों में अपने पर्सनल लॉ का हिस्सा मांगेंगे।
ये तुष्टिकरण की आग है दोस्त, ये जब फैलती है तो सब कुछ भस्म कर देती है।
वक़्त आ गया है की सरकार का गिरेबान पकड़कर पूछा जाए की आखिर कब तक? कब तक हिंदुओं के टैक्स के पैसों पर शरिया का ये नंगा नाच चलता रहेगा?
देश की चुनी हुई राष्ट्रवादी सरकार को भी अब बिना किसी डर और दबाव के पूरे देश में एक झटके में ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ लागू कर देना चाहिए।
जो लोग इसका विरोध करें, उन्हें साफ बता देना चाहिए की अगर भारत में रहना है, भारत सरकार की सुविधाएं लेनी हैं और सरकारी खजाने से पेंशन उठानी है, तो तुम्हें भारत का संविधान मानना ही पड़ेगा।
अगर तुम्हें शरिया इतना ही प्यारा है, तो जाओ उन देशों में जहाँ शरिया कानून चलता है, वहाँ जाकर चार क्या, चालीस शादियां करो, हमें कोई ऐतराज़ नहीं।
लेकिन हिंदुस्तान के खजाने पर और हिंदुओं के खून-पसीने की कमाई पर डकैती डालने की इजाज़त अब किसी को नहीं दी जा सकती।
