जब एक अकेली हिंदू शेरनी ने लकड़ी के 'मूसल' से पहुंचाया जिहादियों को जहन्नुम, 'चित्रदुर्ग' के किले में सुल्तान 'हैदर अली' की सेना की लाशें बिछाने वाली सनातनी वीरांगना 'ओनाके ओबाव्वा'

जब एक अकेली हिंदू शेरनी ने लकड़ी के ‘मूसल’ से पहुंचाया जिहादियों को जहन्नुम, ‘चित्रदुर्ग’ के किले में सुल्तान ‘हैदर अली’ की सेना की लाशें बिछाने वाली सनातनी वीरांगना ‘ओनाके ओबाव्वा’

हमारे इतिहास में सिर्फ राजाओं ने ही नहीं, बल्कि साधारण सनातनी शेरनियों ने भी वो खौफनाक तांडव किया है जिसे सुनकर आज भी इस्लामियों की रूह कांप जाती है।

आज मैं आपको उस वीरांगना की कहानी बताने जा रहा हूँ जिसके हाथ में कोई तलवार या बंदूक नहीं थी, बल्कि रसोई में इस्तेमाल होने वाला एक मामूली सा लकड़ी का ‘मूसल’ था।

और उसी मूसल से इस हिंदू शेरनी ने वो गदर मचाया था की खूंखार सुल्तान हैदर अली की पूरी की पूरी जिहादी फौज उस दिन अपने पैदा होने पर पछता रही थी।

बात 18वीं सदी के आस-पास की है। दक्षिण भारत के कर्नाटक में एक बहुत ही विशाल और अजेय हिंदू किला हुआ करता था- चित्रदुर्ग (Chitradurga)। उस वक्त इस किले पर एक बेहद शूरवीर हिंदू शासक ‘राजा मदकरी नायक’ का राज था।

लेकिन उसी दौर में दक्षिण भारत में एक बहुत ही क्रूर और जिहादी आक्रांता पैदा हो चुका था- सुल्तान हैदर अली।

जी हां, टीपू सुल्तान का बाप! हैदर अली की नज़रें पूरे दक्षिण भारत को निगलने और हर एक हिंदू रियासत को तबाह करके वहां अपना मज़हबी झंडा गाड़ने पर टिकी थीं।

उसने अपनी लाखों की फौज को चित्रदुर्ग की तरफ कूच करने का आदेश दे दिया। उसने किले पर कई बार सीधे हमले किए, अपनी तोपों से आग बरसाई।

लेकिन अंदर बैठे राजा मदकरी नायक और उनके हिंदू शूरवीरों ने जो भयानक पलटवार किया, उसने हैदर अली के उन जिहादियों को काटकर खदेड़ दिया।

आमने सामने की जंग में हैदर अली की जिहादी सेना बनी फिसड्डी, पीठ पीछे दरार से किले में घुसने की रची साजिश

अब जब मर्दों की तरह लड़कर जीतने की औकात नहीं बची, तो हैदर अली ने अपनी उस पुरानी कायरता और गद्दारी का सहारा लिया जिसके लिए ये जिहादी हमेशा से जाने जाते हैं।

उसने किले की घेराबंदी कर ली ताकि अंदर राशन-पानी खत्म हो जाए। इसी बीच हैदर अली के जासूसों को किले की एक बहुत ही खुफिया और कमज़ोर कड़ी का पता चल गया।

चित्रदुर्ग की उन विशाल चट्टानों के बीच एक बहुत ही संकरी और छिपी हुई दरार थी जिसे ‘किंडी’ (Kindi) कहा जाता था।

ये सुराख इतना छोटा था की वहां से एक बार में सिर्फ एक ही इंसान बड़ी मुश्किल से रेंगकर अंदर आ सकता था।

हैदर अली ने अपने सैनिकों को आदेश दिया की एक-एक करके सांप की तरह उस सुराख से रेंगकर किले के अंदर घुसो और वहां कत्लेआम मचाकर किले के मुख्य दरवाज़े अंदर से खोल दो।

उसी गुप्त दरार के पास चित्रदुर्ग के एक वफादार ‘काहले मुड्डा हनुमा’ की ड्यूटी थी। दिन के दोपहर का वक्त था और मुड्डा हनुमा खाना खाने के लिए अपने घर गया हुआ था।

मुड्डा हनुमा की पत्नी ‘ओनाके ओबाव्वा’ एक बहुत ही साधारण हिंदू महिला थी। जब ओबाव्वा पानी भरने के लिए उस गुप्त दरार के पास बने तालाब की तरफ गई, तो अचानक उनके कानों में पत्थरों पर किसी के रेंगने की आवाज़ पड़ी।

ओबाव्वा ने चुपचाप एक चट्टान की आड़ में छुपकर देखा। हैदर अली के हथियारबंद जिहादी सैनिक एक-एक करके उस सुराख से रेंगकर किले के अंदर घुसने की कोशिश कर रहे थे।

ओबाव्वा के सामने दो ही रास्ते थे। या तो वो चीखते हुए भागकर अपने पति को बुला लाएं, जिससे बाहर वालों को शक हो जाता और वो एक साथ अंदर घुसने की कोशिश करते।

उस वक्त उनके पति अकेले और निहत्थे थे। उस एक पल में उस आम सी हिंदू औरत के अंदर साक्षात ‘रणचंडी’ का वो रौद्र रूप जाग उठा, जो इस देश की हर एक सनातनी बेटी की रगों में सो रहा है।

वो बिना कोई आवाज़ किए वापस अपने घर की तरफ भागीं, ताकि वो हथियार ला सकें जो उस दिन इतिहास का सबसे खौफनाक संहार करने वाला था।

बिना किसी खौफ के रसोई का ‘मूसल’ उठाकर हिन्दू शेरनी ‘ओनाके ओबाव्वा’ ने तोड़े जिहादियों के सिर और बिछा दिया लाशों का पहाड़

ओबाव्वा के घर में कोई तलवार या बंदूक नहीं रखी थी। ओबाव्वा ने धान कूटने वाला एक भारी-भरकम लकड़ी का मूसल उठाया जिसे कन्नड़ भाषा में ‘ओनाके’ (Onake) कहा जाता है।

ओबाव्वा उस ओनाके को अपनी मजबूत मुट्ठी में कसकर उस संकरी दरार के बिल्कुल बगल में, दीवार से सटकर खड़ी हो गईं।

सुराख के बाहर हैदर अली के सैनिक इस गलतफहमी में थे की अंदर सब सो रहे हैं।

जैसे ही पहले जिहादी सैनिक ने सुराख से रेंगते हुए अपना सिर किले के अंदर निकाला, दीवार से सटी हुई ओबाव्वा ने पूरी ताकत से हवा में वो भारी मूसल लहराया और सीधे उस जिहादी की खोपड़ी पर दे मारा!

मूसल के एक ही प्रहार से उस खूंखार सैनिक का सिर तरबूज़ की तरह बीच से फट गया। वो बिना एक भी चीख निकाले वहीं ढेर हो गया।

ओबाव्वा ने बिना एक पल गंवाए उस खून से लथपथ भारी लाश को कॉलर से घसीटा और सुराख से दूर एक तरफ छिपा दिया। सुराख फिर से खाली हो गया।

बाहर खड़े दूसरे जिहादी को लगा की पहला वाला अंदर महफूज़ पहुंच गया है। अब दूसरे ने अपना सिर अंदर डाला। ओबाव्वा फिर से मूसल ताने तैयार खड़ी थीं।

जैसे ही सिर अंदर आया, फिर से वही खौफनाक प्रहार! दूसरे जिहादी की खोपड़ी भी चकनाचूर हो गई। ओबाव्वा ने उसकी लाश को भी घसीट कर पहले वाले के ऊपर फेंक दिया।

एक के बाद एक हैदर अली के वो खूंखार और बेरहम जिहादी सुराख से रेंगकर अंदर आते गए, और ओबाव्वा हर एक के सिर को नारियल की तरह फोड़-फोड़ कर उन्हें सीधे जहन्नुम का रास्ता दिखाती रहीं।

एक, दो, बीस, पचास… आंकड़ा बढ़ता जा रहा था। ओबाव्वा के हाथ दुखने लगे थे, माथे से पसीना बहकर खून में मिल रहा था, सांसें फूल रही थीं, लेकिन उस सनातनी शेरनी के मूसल की रफ्तार कम नहीं हुई।

उन्होंने उन जिहादियों की लाशों को घसीट-घसीट कर एक खूनी पहाड़ खड़ा कर दिया था। उस संकरी दरार के पास खून की नदी बहने लगी थी।

खून से सनी अपनी पत्नी और इस्लामियों की लाशें देखकर सन्न रह गया पति, फिर गूंजा हिन्दू सेना का शंखनाद

कुछ ही दूरी पर ओबाव्वा का पति मुड्डा हनुमा इंतज़ार कर रहा था की उसकी पत्नी पानी लेकर आएगी। जब बहुत देर हो गई, तो वो अपनी पत्नी को ढूंढने उसी तालाब की तरफ चल पड़ा।

जैसे ही मुड्डा हनुमा उस गुप्त दरार के पास पहुंचा, वहां का नज़ारा देखकर उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं।

उसने देखा की ज़मीन पर खून की एक मोटी लाल धार बह रही है और उस खून के बीचों-बीच उसकी अपनी पत्नी ओबाव्वा खड़ी है! उनके हाथ में वो भारी भरकम मूसल था जिससे अभी-अभी ताज़ा खून टपक रहा था।

और ओबाव्वा के पैरों के पास हैदर अली के सैकड़ों खूंखार जिहादी सैनिकों की लाशों का एक विशाल अंबार लगा हुआ था!

मुड्डा हनुमा को एक सेकंड में समझ आ गया की उसकी पत्नी ने आज अकेले अपने दम पर हैदर अली की उस खौफनाक साज़िश को मलबे में तब्दील कर दिया है।

उसने तुरंत अपना भोंपू (काहले) अपने होंठों से लगाया और पूरी ताकत से एक ऐसा खौफनाक शंखनाद कर दिया जिसकी गूंज से पूरा चित्रदुर्ग का किला हिल उठा।

भोंपू की आवाज़ सुनते ही चित्रदुर्ग के किले में मौजूद राजा मदकरी नायक की खूंखार हिंदू सेना अपनी तलवारें लेकर तूफान की तरह उस दरार की तरफ दौड़ पड़ी।

‘हर हर महादेव’ के जयकारों के साथ वो हिंदू शेर उस सुराख के बाहर छिपे हुए बाकी जिहादियों पर टूट पड़े।

चित्रदुर्ग की सेना ने किले के बाहर निकलकर उन बचे-खुचे जिहादियों को काट कर फेंक दिया। हैदर अली का वो गुरूर उस दिन एक आम हिंदू औरत के मूसल के आगे घुटनों के बल रेंगने पर मजबूर हो गया।

इस खूनी महासंग्राम में उस महान हिंदू शेरनी ने अपनी इंसानियत की सारी सीमाएं पार कर दी थीं। भारी मूसल को सैकड़ों बार चलाने और लाशों को घसीटने के कारण ओबाव्वा का शरीर पूरी तरह से टूट चुका था।

लड़ते-लड़ते ओबाव्वा ने वीरगति प्राप्त की। उसने अपनी जान दे दी, अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया, लेकिन अपनी आखिरी सांस तक हैदर अली के एक भी नापाक जिहादी को चित्रदुर्ग के पवित्र किले के अंदर कदम नहीं रखने दिया।

आज भी अगर आप कर्नाटक के चित्रदुर्ग किले में जाएंगे, तो उस गुप्त दरार को ‘ओबाव्वा किंडी’ (Obavvana Kindi) के नाम से जाना जाता है और उसे एक तीर्थ की तरह पूजा जाता है।

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