एक आम हिंदुस्तानी को इस बात की सज़ा क्यों मिलनी चाहिए की दुनिया के किसी कोने में दो देश आपस में लड़ रहे हैं? ज़रा आज जून के माहौल को देखिए। पूरा का पूरा मिडिल ईस्ट यानी खाड़ी देश इस वक्त बारूद के ढेर पर बैठे हैं।
कभी ईरान और अमेरिका आपस में मिसाइलें दागने लगते हैं, तो कभी लाल सागर में जहाज़ों पर हमले शुरू हो जाते हैं। वहां बम गिरता है और यहाँ भारत में बैठे आम आदमी की सांसें अटक जाती हैं की अब फिर से कच्चे तेल के दाम आसमान छूने लगेंगे।
दशकों से यही तो खेल चल रहा है! इन अरब देशों और खाड़ी के शेखों ने अपने तेल के कुओं के दम पर पूरी दुनिया की नस दबा के रख दी है।
इन खाड़ी देशों की हेकड़ी और अमेरिका की दादागिरी की कीमत भारत अपनी जेब कटवा कर क्यों चुकाए? नया भारत अब अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए इन लड़ते-मरते रहने वाले देशों के आगे हाथ फैलाये नहीं खड़ा रहेगा।
हमारे पास एक ऐसा स्वदेशी ब्रह्मास्त्र आ गया है जो हमारी इन अरब देशों के तेल पर निर्भरता को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर देगा। उस ब्रह्मास्त्र का नाम है- ‘एथेनॉल’ (Ethanol)।
गन्ने के रस और मक्के से बनने वाला ये एथेनॉल हमारे किसानों के खेतों से निकलता है और इसमें इतनी ताकत है की ये खाड़ी देशों के तेल वाले घमंड को हमेशा के लिए मिट्टी में मिला सकता है।
लेकिन एथेनॉल को पूरे देश में बड़े पैमाने पर लागू करने से पहले सबसे बड़ी और पहली शर्त ये है की हमें अपनी गाड़ियों के इंजनों को इस नए फ्यूल के लायक बनाना पड़ेगा, वरना गाड़ियां कुछ ही दिनों में बीच सड़क पर झटके खाकर बंद हो जाएंगी।
खाड़ी देशों पर तेल की निर्भरता का इलाज जरुरी, स्वदेशी ‘एथेनॉल’ भारत की अहम आर्थिक जरुरत
अब ज़रा इस तेल के खेल का वो आर्थिक सच समझिए जो हमारी और आपकी जेब को सीधे तौर पर काटता है। इतने सालों से हो क्या रहा है? हम हर साल लाखों करोड़ रुपये का विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) सिर्फ और सिर्फ कच्चा तेल खरीदने में फूंक देते हैं।
हमारा वो डॉलर, जो देश में अस्पताल, स्कूल और बुलेट ट्रेन बनाने के काम आ सकता था, वो अरब देशों के शेखों की तिजोरियों में जा रहा था ताकि वो अपनी लग्ज़री ज़िंदगी जी सकें।
और सबसे बड़ी परेशानी तो तब हो जाती है जब इन खाड़ी देशों में युद्ध की वजह से तेल की सप्लाई चेन ही भगवान भरोसे चले जाती है। एक झटके में हमारे देश का बजट हिल जाता है और महंगाई बढ़ जाती है।
लेकिन एथेनॉल ब्लेंडिंग से इस पूरी विदेशी निर्भरता का परमानेंट इलाज हो सकता है। हम हर साल हज़ारों करोड़ रुपये का विदेशी मुद्रा भंडार बचा सकते हैं। जो पैसा हम अरब देशों को तेल खरीदने के लिए देते हैं, वही पैसा हमारे भारत के आर्थिक विकास में इस्तमाल होगा।
कुछ साल पहले जब सरकार ने कहा था की हम पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल (E20) मिलाएंगे, तो हमारे देश में बैठे जयचंद हंस रहे थे। उन्होंने कहा था की भारत जैसा बड़ा देश इतना एथेनॉल कहां से लाएगा, और इन्फ्रास्ट्रक्चर कैसे बनाएगा।
सरकार ने खुद 2030 तक का टारगेट रखा था। लेकिन हमने बिना कोई शोर मचाए, बिना किसी ढिंढोरे के 2025-2026 में ही इस E20 के ऐतिहासिक टारगेट को ज़मीन पर उतार दिया!
आज देश के कोने-कोने में मौजूद पेट्रोल पंपों पर E20 फ्यूल (जिसमें 80% पेट्रोल और 20% एथेनॉल है) धड़ल्ले से बिक रहा है। इसका असर पता है क्या हुआ है? सबसे पहली बात तो हमारा 20 प्रतिशत विदेशी तेल का खर्चा एक ही झटके में कम हो गया।
दूसरी सबसे बड़ी बात, हमारे शहरों का वो ज़हरीला प्रदूषण जो लोगों का दम घोंट रहा था, उसमें भारी गिरावट आई है। एथेनॉल जब जलता है तो वो पेट्रोल के मुकाबले कहीं ज़्यादा साफ जलता है और कार्बन कम छोड़ता है।
खैर, भारत सरकार ने अब अगला टारगेट सेट कर दिया है। जो E27 (27% एथेनॉल) और E30 (30% एथेनॉल) का है, जिसे सरकार 2030 तक पूरा करना चाहती है।
जोश के साथ होश खोना होगा खतरनाक, बिना इंजन बदले 27 प्रतिशत एथेनॉल भी डाला तो रातों रात कबाड़ बन जाएंगी हमारी गाड़ियां
अब यहाँ तक तो बात हो गई हमारी देशभक्ति और अरब देशों को सबक सिखाने की। सुनकर छाती गर्व से चौड़ी हो जाती है। लेकिन भाई, राष्ट्रवाद और जज़्बात अपनी जगह हैं, और गाड़ी के इंजन का विज्ञान अपनी जगह।
अगर हम सिर्फ भावनाओं में बहकर ये सोच लें की “हटाओ ये अरब का तेल, कल से ही मैं अपनी पुरानी गाड़ी में 27 प्रतिशत एथेनॉल डालूंगा”, तो यकीन मानिए, आप अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेंगे।
ये बात हर भारतीय को समझनी होगी। आज जो आपके और हमारे घरों के बाहर मारुति, होंडा, हुंडई की कारें या हीरो-बजाज की बाइक खड़ी हैं, उनके इंजन पुराने तरीके से डिज़ाइन किए गए हैं।
ये इंजन पेट्रोल के लिए बने थे। E20 (20% एथेनॉल) तक तो हमारी BS6 गाड़ियां हंसते-खेलते बर्दाश्त कर लेती हैं, कोई खास दिक्कत नहीं आती।
लेकिन अगर किसी ने जोश में आकर कल को अपनी उसी पुरानी गाड़ी में 27 प्रतिशत (E27) या 30 प्रतिशत (E30) एथेनॉल डाल दिया, तो गाड़ी बीच सड़क पर झटके खाकर बंद हो जाएगी और उसका पूरा का पूरा इंजन सीज़ हो जाएगा।
एक आम मिडिल क्लास आदमी अपनी पूरी ज़िंदगी की गाढ़ी कमाई लगाकर, बैंक से सालों का लोन लेकर 10 या 15 लाख की एक कार खरीदता है। वो 1-2 लाख की बाइक खरीदता है।
अगर सिर्फ गलत तेल डालने की वजह से उसकी गाड़ी कबाड़ बन गई, तो उस बेचारे आम आदमी का तो पूरा घर हिल जाएगा! हमें इस एथेनॉल क्रांति को सफल बनाना है, लेकिन अपने आम नागरिक की खून-पसीने की कमाई को आग लगाकर नहीं।
एथेनॉल बहुत बढ़िया चीज़ है, लेकिन इसकी कुछ ऐसी खतरनाक और कड़वी तकनीकी सच्चाइयां हैं, जिन्हें समझे बिना अगर हम 30% एथेनॉल पर शिफ्ट हुए, तो ये देश का सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल डिज़ास्टर बन जाएगा।
जब तक हमारी गाड़ियां अंदर से इस नए स्वदेशी फ्यूल को पीने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हो जातीं, तब तक आंख मूंदकर कोई भी फैसला लेना बेवकूफी होगी।
एथेनॉल कैसे करता है इंजन के अंदर दीमक का काम, रबर और प्लास्टिक के पार्ट्स को पिघलाने वाले इस सच को समझिए
अब ज़रा उस साइंस और ज़मीनी हकीकत पर आते हैं जिसे कोई भी गाड़ी का मैकेनिक आपको बड़े आराम से समझा देगा। एथेनॉल कोई नॉर्मल पेट्रोल नहीं है। इसका वैज्ञानिक स्वभाव पेट्रोल से एकदम अलग होता है। सबसे बड़ी और डरावनी बात ये है की एथेनॉल हवा से नमी यानी पानी सोखता है।
अब ज़रा सोचिए, अगर आप अपनी पुरानी पेट्रोल वाली गाड़ी में प्योर एथेनॉल या बहुत ज़्यादा मात्रा वाला एथेनॉल (जैसे E27) डलवा लेते हैं, तो क्या होगा? आपकी गाड़ी के फ्यूल टैंक के अंदर धीरे-धीरे पानी जमा होना शुरू हो जाएगा।
और जहाँ पानी और लोहा एक साथ आते हैं, वहां सबसे पहले क्या लगता है? जंग (Rust)! ये एथेनॉल पुराने इंजनों के अंदरूनी लोहे वाले हिस्सों में ऐसा जंग लगाता है की पूरा का पूरा इंजन अंदर से खोखला होकर दीमक लगी लकड़ी की तरह झड़ने लगता है।
और तो और भाई, एथेनॉल एक बहुत ही तगड़ा ‘सॉल्वेंट’ होता है। सॉल्वेंट का मतलब है वो केमिकल जो चीज़ों को अपने अंदर गलाने या पिघलाने की ताकत रखता है।
हमारी जो पुरानी गाड़ियां हैं, उनके अंदर पेट्रोल को इंजन तक पहुंचाने के लिए रबर की पाइपलाइन, रबर के गैसकेट्स (Gaskets) और ढेरों प्लास्टिक के पार्ट्स लगे होते हैं। पेट्रोल इन रबर पार्ट्स का कुछ नहीं बिगाड़ पाता, लेकिन एथेनॉल? एथेनॉल इन रबर और प्लास्टिक के पार्ट्स का सबसे बड़ा दुश्मन है।
अगर आपने बिना इंजन बदले एथेनॉल डाला, तो ये एथेनॉल उन रबर के पाइप्स को धीरे-धीरे पिघला कर गला देगा। पाइप कट जाएंगे, फ्यूल लीक होने लगेगा और गाड़ी बीच सड़क पर आग पकड़ सकती है।
इसके अलावा, पुराने इंजनों में जो अल्युमीनियम के पार्ट्स और फ्यूल पंप होते हैं, उन पर भी एथेनॉल का बहुत बुरा असर पड़ता है। वो पार्ट्स घिसने लगते हैं और गाड़ी का कार्बोरेटर या फ्यूल इंजेक्टर रातों-रात चोक होकर कबाड़ बन जाता है।
‘फ्लेक्स फ्यूल इंजन’ इस परेशानी का अचूक समाधान, भारत सरकार को बदलना होगा गाड़ियों का पूरा सिस्टम
तो फिर सवाल ये उठता है की क्या हम इस इंजन खराब होने के डर से एथेनॉल की इस महान क्रांति को रोक दें? क्या हम वापस उन अरब देशों के आगे घुटने टेक कर उनका महंगा क्रूड ऑइल खरीदने लगें? बिल्कुल नहीं!
अगर हमारे सामने कोई तकनीकी चुनौती आती है, तो हमारे इंजीनियर्स उसका परमानेंट इलाज निकालने में सबसे आगे रहते हैं। और इस विदेशी तेल की गुलामी को जड़ से उखाड़ फेंकने का वो परमानेंट इलाज है- ‘फ्लेक्स फ्यूल इंजन’ (Flex-Fuel Engine)!
फ्लेक्स फ्यूल इंजन एक बहुत ही शानदार और एडवांस इंजीनियरिंग है। ये वो इंजन है जिसे खास तौर पर इसी बात के लिए डिज़ाइन किया जाता है की वो 100 प्रतिशत पेट्रोल से लेकर 100 प्रतिशत एथेनॉल (E100) तक किसी भी अनुपात पर बिना खराब हुए फर्राटे से दौड़ सके।
इस इंजन के अंदर जो रबर और प्लास्टिक के पाइप्स होते हैं, वो स्पेशल केमिकल कोटिंग वाले होते हैं जिन्हें एथेनॉल गला नहीं सकता। इसके फ्यूल टैंक और फ्यूल पंप पर एंटी-कोरोसिव यानी जंग-रोधी परत चढ़ाई जाती है ताकि पानी सोखने के बाद भी इंजन में जंग न लगे।
और सबसे बड़ी बात, इसमें ऐसे स्मार्ट सेंसर लगे होते हैं जो खुद पढ़ लेते हैं की टंकी में कितना पेट्रोल है और कितना एथेनॉल, और उसी हिसाब से इंजन अपनी सेटिंग बदल लेता है।
अब वक्त आ गया है की भारत सरकार भी हमारे देश में सभी गाड़ियों के लिए ये फ्लेक्स फ्यूल सिस्टम अनिवार्य करे। और हाँ, सबसे ज़रूरी बात ये है की इन कंपनियों को ये नए इंजन बनाने के नाम पर आम आदमी की जेब नहीं काटनी चाहिए।
ऐसा ना हो की एथेनॉल वाला इंजन देने के नाम पर गाड़ी की कीमत दो लाख रुपये बढ़ा दें। सरकार को ये तय करना होगा की आम आदमी को ये गाड़ियां उसी सस्ती कीमत पर मिलें जिसपर वो अभी खरीदता है।
अब एक बहुत ही ज़मीनी सवाल पर आते हैं। चलो, नई गाड़ियां तो फ्लेक्स फ्यूल इंजन के साथ आ जाएंगी। लेकिन उन करोड़ों पुरानी गाड़ियों का क्या जो आज इस वक्त भारत की सड़कों पर दौड़ रही हैं?
क्या वो सब कबाड़ हो जाएंगी? इसके लिए हमारे पास एक पूरा मास्टरप्लान तैयार है, जो आम आदमी की जेब और देश की ऊर्जा सुरक्षा के बीच एकदम सटीक और परफेक्ट बैलेंस बनाएगा।
सबसे पहले तो सरकार को उन पुरानी गाड़ियों के लिए ‘रेट्रोफिटिंग किट्स’ (Retrofitting Kits) बाज़ार में उतारनी होंगी। ये बिल्कुल सीएनजी (CNG) किट लगवाने जैसा होगा।
आम आदमी थोड़ा सा पैसा खर्च करके किसी ऑथराइज़्ड मैकेनिक के पास जाएगा, अपनी पुरानी गाड़ी के रबर पाइप्स और फ्यूल पंप को अपग्रेड करवाएगा, एक नया सेंसर लगवाएगा और उसकी पुरानी गाड़ी भी फ्लेक्स फ्यूल के लिए तैयार हो जाएगी। इससे ना तो उसकी गाड़ी कबाड़ होगी और ना ही उसे नई गाड़ी खरीदने का भारी-भरकम कर्ज़ा लेना पड़ेगा।
दूसरी सबसे बड़ी और अहम चीज़ है हमारे पेट्रोल पंपों का नया और स्मार्ट इकोसिस्टम। सरकार को पूरे देश के पेट्रोल पंपों पर अलग-अलग कैटेगरी के नोज़ल देने होंगे।
एक नोज़ल E10 (10% एथेनॉल) का हो जो बहुत पुरानी गाड़ियों के लिए हो। दूसरा नोज़ल E20 का हो जो आज की BS6 गाड़ियों के लिए हो। और तीसरा नोज़ल E27 या E30 का हो, जो नई फ्लेक्स फ्यूल गाड़ियों के लिए हो।
इससे होगा ये की ग्राहक जब पंप पर जाएगा, तो वो अपनी गाड़ी की इंजन की क्षमता के हिसाब से सही तेल भरवा सकेगा। किसी की गाड़ी में गलती से गलत एथेनॉल ब्लेंड नहीं जाएगा, जिससे इंजन सुरक्षित रहे और ग्राहक का नुकसान न हो।
