पंडित ब्रह्मदत्त द्विवेदी- जो अपनी मुंहबोली दलित बहन मायावती को बचाने के लिए स.पा. के माफिया अतीक अहमद और उसके गुंडों से अकेले ही भिड़ गया था

पंडित ब्रह्मदत्त द्विवेदी- जो अपनी मुंहबोली दलित बहन मायावती को बचाने के लिए सपा के माफिया अतीक अहमद और उसके गुंडों से अकेले ही भिड़ गया

इतिहास में कुछ लम्हे ऐसे आते हैं जो सियासत का सारा शोर-शराबा चीरकर रख देते हैं। तब जाकर पता चलता है की असल में कौन किस मिट्टी का बना है। 2 जून 1995 की वो रात भी कुछ ऐसी ही थी। लखनऊ के मीराबाई मार्ग पर स्थित गेस्ट हाउस में फर्रुखाबाद का एक ब्राह्मण, खून के प्यासे और पागल हो चुके समाजवादी पार्टी के माफिया अतीक अहमद के गुंडों के बीच अकेला घुस गया था।

उसके हाथ में सिर्फ एक लाठी थी, शरीर में संघ की दी हुई ट्रेनिंग, और सीने में वो आग- की चाहे जो हो जाए, अपनी दलित बहन मायावती को यूं घिनौनी सियासी दुश्मनी की भेंट नहीं चढ़ने दूंगा।

वो शख्स थे पंडित ब्रह्मदत्त द्विवेदी। पांच बार के विधायक, कैबिनेट मंत्री, कद्दावर बीजेपी नेता, पक्के आरएसएस स्वयंसेवक और वो नेता जिन्हें असल में उस समय उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री होना चाहिए था। लेकिन अफ़सोस, नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। इसके दो साल से भी कम समय बाद, उन्हें बीच सड़क पर घेरकर गोलियों से भून दिया गया। ये मर्डर उसी समाजवादी पार्टी के माफिया ने करवाया था जो उस मनहूस जून की रात मायावती को मारने में नाकाम रहा था।

ये उनकी कहानी है। और सच कहूं तो, इसे बिना किसी लाग-लपेट और उस कायरता भरी चुप्पी को तोड़कर सुनाया जाना चाहिए, जिसने इतने सालों तक उनके नाम को दबाए रखा है।

पंडित ब्रह्मदत्त द्विवेदी के शुरुआती दिन- गंगा-यमुना की मिट्टी में पला फर्रुखाबाद का वो बागी ब्राह्मण 

ब्रह्मदत्त द्विवेदी का जन्म 1938 में फर्रुखाबाद के एक छोटे से कस्बे अमृतपुर में हुआ था। एक ब्राह्मण परिवार… वही बिरादरी जिसे आज़ाद भारत में अक्सर ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर बस एक पंचिंग बैग की तरह इस्तेमाल किया गया।

गंगा-यमुना के दोआब में बसा फर्रुखाबाद हमेशा से ही एक बेहद पेचीदा ताने-बाने वाला जिला रहा है। यहां ब्राह्मण ज़मींदार और व्यापारी, यादवों और पिछड़े वर्ग की एक बड़ी आबादी के साथ घुल-मिलकर रहते आए हैं। यहीं पर युवा ब्रह्मदत्त पले-बढ़े। अपने इलाके की मिट्टी, वहां के लोगों और संस्कृति से उनका ऐसा गहरा जुड़ाव हुआ, जिसने आगे चलकर उन्हें यूपी का सबसे अजेय नेता बना दिया।

उनकी पढ़ाई-लिखाई एकदम ज़मीन से जुड़ी थी। वो एक ऐसे इंसान थे जिनमें गज़ब की दिमागी तेज़ी और जिस्मानी ताक़त का लाजवाब कॉम्बिनेशन था। और आरएसएस (जिससे वो अपनी युवावस्था में ही जुड़ गए थे) बहुत अच्छे से जानता है की ऐसे टैलेंट को कैसे तराशा जाता है।

संघ की शाखाओं और लाठी विद्या की भट्टी में तपा हुआ फौलाद 

ऐसा तो बिल्कुल नहीं था की एक सुबह अचानक सोकर उठे और चुनाव लड़ने का मन बना लिया। द्विवेदी जी कोई सियासी अवसरवादी नहीं थे। वो एक पक्के ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ (RSS) के स्वयंसेवक थे- जमीन से जुड़े एक ऐसे राष्ट्रवादी, जिन्हें चुनाव लड़ने से बहुत पहले ही संघ के कड़े अनुशासन ने फौलाद बना दिया था।

संघ की शाखाओं में उन्हें जो शारीरिक और वैचारिक ट्रेनिंग मिली, वो कमाल की थी। इसी दौरान उन्होंने ‘लाठी विद्या’ में महारत हासिल की। ये कोई आजकल का जिम-विम वाला शौक नहीं था।

लाठी विद्या जब संघ के लेवल की गंभीरता के साथ सीखी जाती है, तो वो एक इंसान को एक साथ कई हथियारबंद लोगों से लड़ने के क़ाबिल बना देती है। इसके लिए गज़ब का बैलेंस, टाइमिंग और सबसे ज़रूरी चीज़- डर का नाम-ओ-निशान न होना- चाहिए होता है।

और 2 जून 1995 को, इसी ट्रेनिंग का एक-एक सेकंड काम आने वाला था।

राजनीति में उनकी एंट्री एकदम ज़मीनी स्तर से हुई। 1971 में, वो फर्रुखाबाद नगरपालिका के वार्ड नंबर 6 से कॉर्पोरेटर (पार्षद) चुने गए। ये एक बहुत ही मामूली सी शुरुआत थी, जो बताती है की उन्हें शॉर्टकट में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उन्होंने अपना बेस एक-एक ईंट, एक-एक घर और एक-एक इंसान से जुड़कर बनाया।

असल नेता ऐसे ही तो बनते हैं! एयर-कंडीशंड न्यूज़रूम या JNU की कैंटीन में बैठकर नहीं, बल्कि यूपी की धूल-फांकती सड़कों पर, जहां एक नेता को हर एक वोट अपनी मेहनत से कमाना पड़ता है।

यूपी के गुंडाराज में सीना ताने खड़ा फर्रुखाबाद का अजेय पंडित शेर 

एक बार जब पंडित ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने यूपी विधानसभा में कदम रखा, तो वो ऐसी आंधी बन गए जिसे कोई सियासी गठजोड़ हिला नहीं सका। उन्होंने 1977 और 1985 में फर्रुखाबाद से जीत दर्ज की। और उसके बाद तो कमाल ही हो गया- जब भारतीय राजनीति अपने सबसे भयंकर और जातिवादी दौर से गुज़र रही थी, तब उन्होंने 1991, 1993 और 1996 में जीत की हैट्रिक लगा दी!

पांच विधानसभा चुनाव। एक ही सीट से लगातार पांच जीत। यूपी जैसे राज्य में जहां हवा का रुख मौसम की तरह बदलता है, वहां ये सिर्फ एक रिकॉर्ड नहीं था, ये जनता के अटूट भरोसे का सुबूत था।

वो महज़ वोट बटोरने वाले नेता नहीं थे। यूपी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहते हुए, उन्होंने अपनी ताक़त का इस्तेमाल अपनी जनता और पार्टी के लिए किया। उनका रुतबा एक ऐसे बेखौफ और सख्त प्रशासक का था, जो न तो किसी माफिया के दबाव में आता था, न ही क्रिमिनल्स को पनाह देता था।

वो दौर ही कुछ ऐसा था जब यूपी की राजनीति में क्रिमिनल और MLA का फर्क तेज़ी से मिट रहा था- गुंडे विधायक बन रहे थे और विधायक गुंडे। उस भयानक दौर में ब्रह्मदत्त द्विवेदी जैसी प्रजाति बहुत दुर्लभ थी: एक ईमानदार, क़ाबिल और निडर हिंदू नेता।

अटल-आडवाणी की पहली पसंद थे ब्रह्मदत्त द्विवेदी जिन्हें यूपी का मुख्यमंत्री बनना ही था 

90 के दशक के आते-आते अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे दिग्गजों ने पंडित जी में यूपी का अगला मुख्यमंत्री देखना शुरू कर दिया था। ये कोई छोटी-मोटी बात नहीं थी।

भारत के सबसे बड़े और सबसे पेचीदा सूबे के मुख्यमंत्री पद के लिए राइट-विंग के दो सबसे बड़े नेताओं की नज़र में चढ़ना- इसके लिए सिर्फ चुनाव जीतना काफी नहीं होता। इसके लिए कद्दावर पर्सनैलिटी, जनता से जुड़ाव, विचारधारा के प्रति समर्पण और विरोधियों से सीना तानकर लड़ने का जज़्बा चाहिए होता है। द्विवेदी जी में ये सब कूट-कूट कर भरा था।

उनका मुख्यमंत्री पद का दावेदार होना इसलिए भी बहुत अहम था क्योंकि वो बीजेपी के लिए ‘ब्राह्मण लामबंदी’ का सबसे बड़ा चेहरा थे। ये वो समय था जब मंडल कमीशन ने ओबीसी राजनीति में आग लगा रखी थी और सपा-बसपा जैसी पार्टियां हिंदू समाज को जातियों में बुरी तरह बांट रही थीं।

बीजेपी के लिए द्विवेदी जी सिर्फ एक उम्मीदवार नहीं थे- वो यूपी जैसे राज्यों में उन सवर्ण हिंदुओं के हाशिए पर धकेले जाने का एक करारा जवाब थे, जिन्हें जान-बूझकर ‘ज़ुल्मी’ बताकर निशाना बनाया जा रहा था। आगे चलकर हम देखेंगे की कैसे उनके मर्डर ने बीजेपी के अंदर ऐसा ब्राह्मण लीडरशिप वैक्यूम पैदा किया, जिसे भरने में सालों लग गए।

मीराबाई गेस्ट हाउस में मायावती की जान का प्यासा वो समाजवादी पार्टी माफिया अतीक अहमद का गुर्गा 

ब्रह्मदत्त द्विवेदी उस गेस्ट हाउस में मौत के मुंह में क्यों घुसे, इसे समझने के लिए आपको जानना होगा की 2 जून 1995 की वो रात असल में थी क्या।

मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली सपा-बसपा की गठबंधन सरकार तब ताश के पत्तों की तरह बिखर रही थी। 1 जून 1995 को, बीएसपी ने मुलायम सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। ये कोई रातों-रात लिया गया फैसला नहीं था- बसपा कार्यकर्ता महीनों से सपा के यादव बाहुबलियों के हाथों जलील हो रहे थे, मार खा रहे थे और सियासी तौर पर उनका दम घोंटा जा रहा था।

इसके बाद जो हुआ, वो अचानक भड़का हुआ गुस्सा हीं था। वो पूरी प्लानिंग के साथ की गई एक क्रिमिनल हिंसा थी, जिसका निशाना वो अकेली औरत थी जिसने यूपी के सबसे बड़े गुंडाराज को चुनौती देने की हिम्मत की थी।

2 जून की रात को, सैकड़ों सपा कार्यकर्ता और माफिया अतीक अहमद के गुंडे लखनऊ के मीराबाई स्टेट गेस्ट हाउस में घुस गए, जहां मायावती मौजूद थीं। वहां जो नंगा नाच हुआ, वो किसी आतंकी हमले से कम नहीं था। उन्होंने पूरी बिल्डिंग की बिजली-पानी काट दी। बसपा विधायकों को कमरों से घसीट-घसीट कर खून से लथपथ कर दिया।

उन्होंने मायावती को वो गंदी-गंदी जातिसूचक गालियां दीं, जिन्हें यहां लिखना भी शर्मनाक है। वो चीख रहे थे की इन चर्मकारों के पर कुछ ज्यादा ही निकल आए हैं और इन्हें ‘सबक सिखाने’ की ज़रूरत है। ये महज़ सियासी बदला नहीं था, ये एक निहायती नफरत से भरा, जातिवादी और महिला-विरोधी पागलपन था।

मायावती ने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया। बाहर खड़ी भीड़ दरवाज़ा तोड़ने पर आमादा थी। जो पुलिस वाले वहां मौजूद थे, वो या तो गिनती में कम थे, या दबाव में थे, या फिर जान-बूझकर कायरों की तरह तमाशा देख रहे थे। अगर वो दरवाज़ा टूट जाता, अगर वो भीड़ मायावती तक पहुंच जाती, तो उस रात भारत के राजनीतिक इतिहास के पन्ने खून से लिखे जाते।

इस पूरे हमले का मास्टरमाइंड था अतीक अहमद- जो उस समय सपा के बैकअप से एक उभरता हुआ डॉन था। मायावती खुद कई बार ऑन-रिकॉर्ड ये बात कह चुकी हैं की उस रात उन्हें जान से मारने की साज़िश अतीक अहमद ने ही रची थी। ये कोई हवा-हवाई इल्ज़ाम नहीं था।

अतीक, जिस पर आगे चलकर 100 से ज्यादा क्रिमिनल केस दर्ज हुए, जिसके डी-कंपनी और आईएसआई से तार जुड़े थे (जैसा उसने 2023 के अपने एनकाउंटर से पहले कुबूला था)- वही वो माफिया था जिसे सपा की पॉलिटिकल लीडरशिप ने उस रात खुली छूट दे रखी थी। यही वो खूंखार भेड़िया था, जिसका सामना उस रात ब्रह्मदत्त द्विवेदी को करना था।

फिर माफिया अतीक अहमद के गुंडों से एकेले भिड़ गए  ब्राह्मण शेर ब्रह्मदत्त द्विवेदी

गेस्ट हाउस पर हमले की खबर पूरे लखनऊ में आग की तरह फैल गई। नेता गुणा-गणित लगा रहे थे, पुलिस बगलें झांक रही थी, अफसर मुंह फेर कर खड़े थे। लेकिन एक इंसान ऐसा था जिसने बिना पलक झपकाए अपना फैसला ले लिया।

ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने खुद गाड़ी उठाई और सीधे उस गेस्ट हाउस के कंपाउंड में घुस गए, जो ऐसे हुजूम से खचाखच भरा था जो गिनती में उनसे सैकड़ों गुना ज्यादा था।

उनके हाथ में सिर्फ उनकी लाठी थी- और दशकों की वो संघ की ट्रेनिंग। और उनके चेहरे पर था वो गज़ब का कॉन्फिडेंस जो सिर्फ उसी इंसान में हो सकता है जिसने ज़िंदगी में कभी किसी की धमकी के आगे घुटने न टेके हों।

उन्होंने उस भीड़ से कोई बातचीत नहीं की। पुलिस फोर्स के आने का कोई इंतज़ार नहीं किया। किसी को फोन करके परमिशन नहीं मांगी। वो सीधा उन पर टूट पड़े!

बरसों से मांजी हुई उनकी लाठी विद्या ने उन्हें उस पल एक चलते-फिरते किले में तब्दील कर दिया था। वो अकेले ही एक साथ कई हमलावरों से भिड़ गए और उन्हें ऐसी बुरी तरह खदेड़ा की वहां मौजूद सब लोग सन्न रह गए।

उस भीड़ ने अपने नशे में ऐसा कुछ होने की तो बिल्कुल उम्मीद नहीं की थी! उन्हें लगा था की वही यूपी वाली राजनीति होगी: थोड़ी देर होगी, कन्फ्यूजन फैलेगा और फिर सब सरेंडर कर देंगे। लेकिन उनके पल्ले पड़ गया था एक ऐसा ब्राह्मण स्वयंसेवक, जो पीछे हटना जानता ही नहीं था।

भीड़ के कदम पीछे हटने की एक और बड़ी वजह द्विवेदी जी का अपना भारी सियासी रुतबा था। वो कोई गली-मोहल्ले के छुटभैये नेता नहीं थे। वो पांच बार के विधायक, कैबिनेट मंत्री और आने वाले संभावित मुख्यमंत्री थे। उन पर हाथ उठाने का मतलब था यूपी में एक ऐसा सियासी भूकंप लाना, जिसे झेलने की औकात 90 के दशक के उन बेलगाम सपा नेताओं में भी नहीं थी।

कुल मिलाकर- उनकी शारीरिक ताक़त, उनका फौलादी जिगरा और उनका सियासी वज़न- ये सब उस भीड़ को पीछे धकेलने के लिए काफी था। वो मायावती तक पहुंचे। और उन्हें सुरक्षित वहां से बाहर निकाल लाए।

अगले ही दिन, 3 जून 1995 को मायावती पहली बार बीजेपी के समर्थन से उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। अगर एक रात पहले ब्रह्मदत्त द्विवेदी वहां नहीं पहुंचते, तो शायद ये ऐतिहासिक पल कभी आ ही नहीं पाता।

मुंहबोले भाई- जातिवाद की चिता पर पनपा एक दलित बहन और ब्राह्मण भाई का अटूट रिश्ता 

द्विवेदी जी के इस दिलेरी भरे कदम के बाद एक ऐसा रिश्ता कायम हुआ, जिसने यूपी के हर जातिवादी समीकरण और पार्टी लाइन को धता बता दिया।

मायावती ने उन्हें अपना ‘मुंहबोला भाई’ मान लिया। ये कोई चुनाव के टाइम वाला फोटो-खिंचाऊ ड्रामा नहीं था। ये उस इंसान के प्रति दिल से निकला हुआ सम्मान था, जिसने अपनी जान पर खेलकर उनकी जान बचाई थी। यूपी की इस खूंखार और मतलबी सियासत में, जहां सब कुछ बिकता है और वफादारी की रोज़ बोलियां लगती हैं, वहां ये रिश्ता सबसे अलग और सच्चा था।

हर साल रक्षाबंधन के दिन मायावती उन्हें राखी भेजतीं। किसी पार्टी वर्कर के हाथों नहीं, कोई प्रेस रिलीज़ छापकर नहीं- बल्कि एक बहन की तरह। ज़रा सोचिए! जिस राज्य में उनकी पार्टी का नारा खुलेआम कहता हो- “तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार”- वहां मायावती ने एक ब्राह्मण के लिए अपने उसूल किनारे कर दिए। इसलिए नहीं की उससे उनका कोई सियासी फायदा था, बल्कि इसलिए क्योंकि उस आदमी ने तब उनके लिए अपनी जान दांव पर लगा दी थी, जब वो चाहता तो आराम से वहां से निकल सकता था।

मायावती के नेतृत्व वाली बसपा का एक पक्का उसूल बन गया था: फर्रुखाबाद सीट पर ब्रह्मदत्त द्विवेदी के खिलाफ कोई कैंडिडेट खड़ा नहीं किया जाएगा। और ये कोई गठबंधन या सीट-शेयरिंग की मजबूरी नहीं थी। ये उनका अकेले का फैसला था- जिसके ज़रिए मायावती पूरी राजनीतिक दुनिया को ये बता रही थीं की कुछ एहसान वोटों से नहीं चुकाए जाते, वो सिर्फ सम्मान देकर ही अदा किए जा सकते हैं।

10 फ़रवरी 1997: सरेआम ब्रह्मदत्त द्विवेदी जी पर चली वो गोलियां जिन्होंने यूपी की उस समय की आखिरी उम्मीद को भून डाला 

गेस्ट हाउस के उस तूफ़ान से वो ज़िंदा लौट आए थे। उस पूरे दशक की भयानक राजनीतिक उथल-पुथल में जहां अच्छे-अच्छे टूट गए, वो सीना ताने खड़े रहे। वो अपनी आगे की लड़ाई लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार थे।

फिर आई 10 फ़रवरी 1997 की वो मनहूस सुबह। पंडित ब्रह्मदत्त द्विवेदी फर्रुखाबाद के सिटी कोतवाली इलाके में एक तिलकोत्सव में गए हुए थे। एकदम आम सा कार्यक्रम जहां नेता अक्सर जाते-आते रहते हैं। वो अपनी गाड़ी में बैठे ही थे की तभी कातिलों ने हमला कर दिया।

गोलियों ने अपना काम कर दिया। ब्रह्मदत्त द्विवेदी को सरेआम मौत के घाट उतार दिया गया। उनके वफादार बॉडीगार्ड बीके तिवारी (बृजकिशोर तिवारी) भी उनके साथ मारे गए। ड्राइवर रिंकू बुरी तरह घायल होने के बावजूद बच गया।

जिन लोगों ने वो गोलियां चलाई थीं, उन्हें शायद अंदाज़ा नहीं था- या फिर वो बहुत अच्छे से जानते थे- की वो सिर्फ एक इंसान को नहीं मार रहे थे। वो यूपी में पल रही उस उम्मीद को मार रहे थे, जो कहती थी की ईमानदार और बेखौफ राजनीति अभी ज़िंदा है।

उनका जाना पूरे देश के लिए एक बहुत बड़ा सदमा था। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह और कलराज मिश्र- पूरी की पूरी बीजेपी की टॉप लीडरशिप उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने फर्रुखाबाद की सड़कों पर उतर आई। दिल्ली के इतने बड़े नेताओं का एक ज़िले में यूं इकट्ठा होना ही बताता है की उनके जाने से कैसा भयानक सूनापन आ गया था।

मायावती वहां फूट-फूट कर रोईं। वो औरत जिसकी जान उन्होंने बचाई थी, जो उन्हें अपना भाई मानती थी, जो हर साल उन्हें राखी भेजती थी- वो वहां एक ऐसे इंसान को आख़िरी विदाई देने आई थी जिसने अपना सब कुछ खोकर उसे नया जीवन दिया था। उनके वो आंसू कोई सियासी ड्रामा नहीं थे। वो एक ऐसी औरत का असली दर्द था जो किसी भी और से बेहतर ये जानती थी की आज इस दुनिया ने क्या खो दिया है।

मुस्कुराते चेहरों के पीछे छिपे गद्दार और ब्रह्मदत्त द्विवेदी के कत्ल की वो खौफनाक साज़िश 

सच कहूं तो, ऐसा उसूलों वाला, इतना ताक़तवर नेता उन सबके लिए सीधा खतरा था जिनकी दुकानें ही गुंडाराज से चलती थीं। ब्रह्मदत्त द्विवेदी का होना ही यूपी को खोखला कर रहे उन क्रिमिनल-पॉलिटिकल गठजोड़ों के मुंह पर तमाचा था।

उन्हें मारने की साज़िश बहुत गहरी रची गई थी। जब सीबीआई ने जांच की और चार्जशीट दाखिल हुई, तो उसमें मास्टरमाइंड के तौर पर पूर्व सपा विधायक विजय सिंह और शूटर के रूप में गैंगस्टर संजीव माहेश्वरी उर्फ़ ‘जीवा’ का नाम सामने आया। ये विजय सिंह कोई आम आदमी नहीं था- इस पर मर्डर समेत 20 से ज्यादा क्रिमिनल केस थे।

इसे कांग्रेस पार्टी में लाने वाला और फर्रुखाबाद से द्विवेदी जी के खिलाफ टिकट दिलाने वाला एक बड़ा कांग्रेसी नेता ही था। 90 के दशक में क्रिमिनल रिकॉर्ड वाले ऐसे आदमी को मेनस्ट्रीम पार्टी का टिकट मिलना ही बताता है की यूपी का सियासी सिस्टम कितना सड़ चुका था।

पर जो बात इस मर्डर को और भी भयानक बनाती है- और जिसका दर्द द्विवेदी परिवार ने हमेशा झेला है- वो ये है की इस पूरी साज़िश में बीजेपी से जुड़े एक नेता का नाम भी उछला था। सीबीआई की रिपोर्ट और जांच में ये बात सामने आई की इसमें ऐसे राजनेताओं का हाथ था जिनका बीजेपी से कनेक्शन होने की वजह से ये धोखा और भी गहरा घाव दे गया। एक असली हीरो को सिर्फ बाहर के दुश्मनों ने नहीं मारा था- पीठ में खंजर अपनों ने भी घोंपा था।

ये भारत की राजनीति की सबसे पुरानी और दर्दनाक कहानी है: एक सच्चा और ईमानदार इंसान सिर्फ खुले दुश्मनों का शिकार नहीं होता, बल्कि उन लोगों का भी शिकार हो जाता है जो पार्टी मीटिंग्स में तो सामने मुस्कुराते हैं, और अंधेरे में कातिलों से सौदे करते हैं।

मुख्तार के खूंखार शूटर के पीछे छिपे थे समाजवादी पार्टी नेता

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए केस की कमान ‘सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन’ (CBI) को सौंप दी गई। सबको पता था की ये केस यूपी पुलिस के बस का नहीं है, क्योंकि वहां तो ऊपर से नीचे तक सब मिला हुआ था।

मर्डर के छह साल बाद, 17 जुलाई 2003 को लखनऊ की सीबीआई कोर्ट ने गैंगस्टर संजीव माहेश्वरी ‘जीवा’ और पूर्व सपा विधायक विजय सिंह को उम्रकैद की सज़ा सुनाई। इस फैसले ने उस बात पर मुहर लगा दी जो द्विवेदी परिवार और बीजेपी शुरू से कह रहे थे: की ये एक पूरी तरह से राजनीतिक मर्डर था, जिसे एक बहुत ही पॉवरफुल सियासी नेटवर्क के इशारे पर पेशेवर कातिलों ने अंजाम दिया था, क्योंकि द्विवेदी जी उनके रास्ते का सबसे बड़ा कांटा बन गए थे।

संजीव माहेश्वरी ‘जीवा’ कोई गली-मोहल्ले का छुटभैया गुंडा नहीं था। वो सीधा मुख्तार अंसारी का राइट-हैंड था- वही मुख्तार जिसका उस समय पूर्वी और मध्य यूपी में खौफ बोलता था और जिसे सपा के सियासी हल्कों से पूरी पनाह मिली हुई थी।

ज़रा सोचिए, एक ऐसा गैंगस्टर जो हथियारों की तस्करी, जबरन वसूली और राजनीतिक हत्याओं का पूरा नेक्सस चलाता था, उसे एक मौजूदा बीजेपी विधायक और कैबिनेट मंत्री को मारने के लिए इस्तेमाल किया गया। इससे साफ़ पता चलता है की द्विवेदी जी जैसे नेताओं के सामने खतरा कितना बड़ा और गहरा था।

इन दोनों मुजरिमों ने हाई कोर्ट में अपील की। लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी उम्रकैद की सज़ा को बरकरार रखा। हमारे देश के ढीले-ढाले सिस्टम में ये एक बड़ी राहत की बात थी की चलो, कम से कम ब्रह्मदत्त जी के कातिलों को आज़ाद तो नहीं घूमने दिया गया।

वैसे किस्मत का खेल देखिए! 2023 में जीवा का भी वही अंजाम हुआ जिसके वो लायक था। उसे लखनऊ कोर्ट के ठीक बाहर दिन-दहाड़े उसी बेशर्मी से गोलियों से भून दिया गया, जैसे उसने दूसरों को मारा था। आख़िरकार गैंगस्टर को भी उसी की भाषा में जवाब मिल ही गया।

सिस्टम की चौखट पर सालों तक दम तोड़ता एक अधूरा और खोखला इंसाफ 

खैर, कोई ये मुगालता न पाले की जीवा और विजय सिंह को सज़ा मिलने से पूरा इंसाफ हो गया। इस मर्डर के पीछे जो असल मास्टरमाइंड और साज़िशकर्ता थे, उन तक कानून के हाथ कभी पूरी तरह पहुंच ही नहीं पाए। जिन ‘अपनों’ ने इस मर्डर की ज़मीन तैयार की थी, उनसे कभी पब्लिकली सवाल-जवाब नहीं हुआ। कोर्ट में सालों-साल तारीखें पड़ती रहीं और कातिल सिस्टम के लूपहोल्स का मज़ा लेते रहे।

यही हमारे भारत की कड़वी सच्चाई है- जो इस क्रिमिनल-पॉलिटिकल गठजोड़ से पंगा लेता है, उसे इंसाफ या तो बहुत देर से मिलता है, या फिर अधूरा मिलता है। द्विवेदी जी का परिवार भी आज ढाई दशक से उन्हीं अनसुलझे सवालों का बोझ ढो रहा है।

प्रभा द्विवेदी- आंसुओं को हथियार बनाकर पति की जंग लड़ने उतरी एक निडर विधवा 

मर्डर के तुरंत बाद, बीजेपी ने एक ऐसा फैसला लिया जो राजनीतिक और नैतिक दोनों तौर पर एकदम सही था: उन्होंने ब्रह्मदत्त जी की पत्नी प्रभा द्विवेदी को फर्रुखाबाद से टिकट दे दिया।

ये कोई महज़ सहानुभूति बटोरने वाला फैसला नहीं था। प्रभा द्विवेदी ने जिस दर्द, दुख और भारी सामाजिक दबाव के बीच मैदान में उतरने का फैसला किया- वो अच्छे-अच्छों की कमर तोड़ कर रख देता है। पर वो टूटी नहीं, उन्होंने लड़ने का फैसला किया। उन्होंने उसी सीट से चुनाव लड़ने की ठानी जिसे उनके पति ने अपनी मेहनत से सींचा था।

और फिर चुनाव में जो हुआ, उसने इस पूरी लड़ाई को एक नया ही मोड़ दे दिया।

मायावती का ऐतिहासिक कदम- जब एक बसपा सुप्रीमो बीजेपी की विधवा के लिए प्रचार करने आई

मायावती प्रभा द्विवेदी के लिए प्रचार करने खुद फर्रुखाबाद पहुंच गईं!

ज़रा इस लाइन को फिर से पढ़िए। बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो- एक ऐसी पार्टी जिसका पूरा वजूद ही सवर्णों के खिलाफ दलितों और पिछड़ों को खड़ा करने पर टिका था, एक ऐसी पार्टी जिसका नारा ही ब्राह्मणों को जूतों से पीटने का था- वो खुद बीजेपी की एक ब्राह्मण कैंडिडेट के लिए वोट मांगने फर्रुखाबाद आ गई!

उन्होंने फर्रुखाबाद की जनता के सामने खड़े होकर ब्रह्मदत्त द्विवेदी को खुलेआम ‘शहीद’ कहा। उन्होंने लोगों को बताया की इस आदमी ने अपनी जान सिर्फ इसलिए गंवाई क्योंकि वो राजनीतिक गुंडागर्दी के खिलाफ डटकर खड़ा था। उन्होंने जनता से अपील करी की उनकी पत्नी को जिताकर उनकी शहादत का सम्मान करें।

आज की भारतीय राजनीति में आपको ऐसी मिसाल दूसरी कहीं नहीं मिलेगी। ऐसा इतिहास में न पहले कभी हुआ था, न शायद आगे कभी होगा- की कोई बड़ा नेता महज़ एक इंसान का कर्ज़ चुकाने के लिए अपनी पूरी आइडियोलॉजी, अपने सियासी समीकरण और अपने जातिगत गणित को इस तरह दरकिनार कर दे!

मायावती ने ये सब किसी राजनीतिक फायदे के लिए नहीं किया था। सच पूछिए तो इसका उन्हें भारी नुकसान ही उठाना पड़ा। लेकिन उन्होंने ये इसलिए किया क्योंकि वो एक ऐसे इंसान की ‘मुंहबोली बहन’ थीं जिसने उनकी जान बचाई थी, और वो किसी भी कीमत पर अपने भाई की विधवा को यूं अकेला लड़ने के लिए नहीं छोड़ सकती थीं।

यही वो कहानी है जिसे आज का मेनस्ट्रीम मीडिया- जो हमेशा से ब्राह्मणों को ज़ालिम और दलितों को परमानेंट पीड़ित दिखाने के नैरेटिव पर पलता आया है-कभी आपको नहीं बताएगा। क्योंकि ये कहानी उस पूरे नैरेटिव को तार-तार कर देती है। ये कहानी है एक ऐसे ब्राह्मण आदमी की, जो एक दलित औरत की जान बचाने के लिए मौत के मुंह में कूद गया; और एक ऐसी दलित औरत की, जिसने मौत के बाद उस ब्राह्मण का सम्मान करने के लिए अपनी राजनीति की हर लक्ष्मण रेखा पार कर दी।

अपना धर्म निभाते हुए मौत के मुंह में जाने वाला वो ब्राह्मण योद्धा

सच कहूं तो, पंडित ब्रह्मदत्त द्विवेदी इसलिए नहीं मारे गए क्योंकि वो कमज़ोर थे। वो इसलिए मारे गए क्योंकि वो कुछ ज्यादा ही मज़बूत थे- वो हद से ज्यादा ईमानदार थे, उसूलों वाले थे, क़ाबिल थे और उस समाजवादी पार्टी के नेताओं के लिए बहुत बड़ा खतरा बन गए थे जिन्होंने अपना पूरा साम्राज्य खौफ, अपराध और समाज को बांटकर खड़ा किया था।

वो एक ऐसे ब्राह्मण थे जिन्होंने उस सच्ची ‘ब्राह्मणवादी बौद्धिक और आध्यात्मिक परंपरा’ को असल में जिया: चाहे जो हो जाए, अपने धर्म के साथ खड़े रहना; कमज़ोर को बचाने के लिए अपनी जान की बाज़ी लगा देना; और इंसानों को महज़ जाति के वोट बैंक वाले चश्मे से न देखना।

भारत के उन बुद्धिजीवियों ने जो ये झूठा नैरेटिव गढ़ा है की ‘सवर्ण हिंदू कभी जाति से ऊपर उठकर कुछ अच्छा नहीं कर सकते’- वो नैरेटिव 2 जून 1995 की उसी रात मीराबाई गेस्ट हाउस के दरवाज़े पर दम तोड़ देता है। वो उसी पल मर जाता है जब ब्रह्मदत्त द्विवेदी अपनी लाठी और संघ के उस जज़्बे को लेकर, सैकड़ों लोगों की भीड़ में एक ऐसी औरत की जान बचाने घुस जाते हैं, जो न उनकी जाति की थी, न उनकी पार्टी की थी और न ही उनकी राजनीतिक दुनिया की!

यूपी ने बहुत से नेता पैदा किए हैं, लेकिन योद्धा बहुत कम। पंडित ब्रह्मदत्त द्विवेदी दोनों थे- और उनकी सरेआम हत्या एक ऐसा गहरा घाव है जिसे बीजेपी, फर्रुखाबाद की जनता और इस देश के हर सच्चे नागरिक को इतिहास के पन्नों में कभी दबने नहीं देना चाहिए।

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