Pahalgam Terror Attack: कायर पाकिस्तान की 'नापाक' करतूत का एक साल और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से शौर्य का नया इतिहास

Pahalgam Terror Attack: कायर पाकिस्तान की ‘नापाक’ करतूत का एक साल और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से शौर्य का नया इतिहास

आज से ठीक एक साल पहले, इसी दिन, 22 अप्रैल, 2025 की सुबह पहलगाम में वसंत के किसी भी आम दिन जैसी ही थी। हफ्तों से टूरिस्टों की भीड़ वादियों में उमड़ रही थी। गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, बंगाल और ना जाने कहां-कहां से परिवार वहां पहुंचे थे। वहां नई-नवेली शादियों वाले जोड़े थे। अपनी एनिवर्सरी मना रहे बुजुर्ग दंपत्ति थे। और कुछ ऐसे मां-बाप थे जो अपने बच्चों को दिखाने लाए थे की धरती पर जन्नत कैसी दिखती है।

दोपहर 1:00 बजे से 2:45 बजे के बीच, सब कुछ बदल गया।

घाटी के चारों ओर मौजूद घने जंगलों से तीन से सात आतंकी बाहर निकले। उनके हाथों में M4 कार्बाइन और AK-47 जैसी बंदूकें थीं।

आतंकियों ने बड़े ही ठंडे दिमाग से भीड़ को छांटना शुरू किया। उनका निशाना कोई भी रैंडम इंसान नहीं था। वे एक सिस्टम से चल रहे थे। वो ढूंढ रहे थे तो बस एक ख़ास धर्म के लोगों को- हिन्दुओं को। 

ज़िंदा बचे लोगों ने बताया की कैसे औरतों और मर्दों को अलग किया गया। आदमियों को शर्ट उतारने को कहा गया ताकि जनेऊ चेक किया जा सके। कुछ से कलमा पढ़ने को कहा गया। जो लड़खड़ा गए, जो पढ़ नहीं पाए- उन्हें वहीं मौके पर ही मार दिया गया। किसी के सिर में गोली मारी गई, तो किसी के सीने में। उनके परिवार उनके आस-पास चीखते-चिल्लाते रहे और उन्हें बैसरन की उसी हरी घास पर तड़प-तड़प कर खून से लथपथ मरने के लिए छोड़ दिया गया।

मारे गए 26 लोगों में वो आदमी भी थे जिन्होंने इस ट्रिप के लिए अपनी ज़िंदगी भर की गाढ़ी कमाई जोड़ रखी थी। वो पति थे जिन्होंने अपनी पत्नियों से कश्मीर की वादियों का वादा किया था। नौजवान प्रोफेशनल, रिटायर हो चुके सरकारी कर्मचारी। हमला दो घंटे भी नहीं चला। लेकिन इसके दिए गए ज़ख्म पीढ़ियों तक रिसते रहेंगे।

2008 के 26/11 मुंबई हमले के बाद से, भारतीय नागरिकों पर हुआ ये सबसे खौफनाक आतंकी हमला था। ये गुस्से में उठाया गया कोई अचानक का कदम नहीं था।

ये पूरी तरह से सोच-समझकर, मज़हब के नाम पर की गई हत्याएं थीं- ताकि हिंदुओं में खौफ पैदा किया जा सके, कश्मीर की पटरी पर लौटती टूरिज़्म इकॉनमी को बर्बाद किया जा सके, और भारत को ये मैसेज दिया जा सके की अब जन्नत में भी कोई हिंदू सुरक्षित नहीं है।

पहलगाम आतंकियों के पीछे छिपा पाकिस्तान और हिंदुओं के कत्ल का वो खौफनाक इस्लामी फरमान

पहलगाम को समझने के लिए, आपको उस पूरी मशीनरी को समझना होगा जिसने इसे अंजाम दिया।

द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) कोई आज़ाद संगठन नहीं है। ये बस एक मुखौटा है- जिसे सीधे तौर पर लश्कर-ए-तैयबा ने इसलिए खड़ा किया ताकि वो कश्मीर में हमले कर सके और पाकिस्तान की मिलिट्री को बचने का रास्ता मिल जाए। लश्कर के कारनामे दुनिया जानती है, उसे UN ने आतंकी संगठन घोषित कर रखा है। इसलिए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI ने TRF को जन्म दिया- वही पुरानी सोच, वही फंडिंग, वही नेटवर्क, बस एक नया नाम जो सुनने में थोड़ा “लोकल” लगे और दुनिया की नज़रों में कम खटके।

लश्कर-ए-तैयबा को किसी भारतीय को बताने की ज़रूरत नहीं है। ये वही संगठन है जिसने नवंबर 2008 में दस आतंकियों को मुंबई भेजा था और चार दिन तक भारत की आर्थिक राजधानी को बंधक बनाए रखा था, जिसमें 166 बेगुनाह मारे गए। इसका हेडक्वार्टर पाकिस्तान के लाहौर के पास मुरीदके में है- बिल्कुल खुलेआम और बेखौफ।

क्यों? क्योंकि पाकिस्तानी सत्ता ने हमेशा इन्हें पाल-पोस कर बड़ा किया है। इसका फाउंडर हाफिज़ सईद पाकिस्तान में सालों तक आराम से घूमता रहा, जबकि उस पर UN का बैन और 1 करोड़ डॉलर का इनाम था। पाकिस्तान की असलियत ही यही है। उसका काम ही यही है।

TRF के सरगना सज्जाद अहमद शेख- जिसे सज्जाद गुल के नाम से जाना जाता है- को पहलगाम हमले का मुख्य मास्टरमाइंड बताया गया। वो किसी दूर-दराज़ की गुफा में नहीं छिपा है। वो पाकिस्तान में ही रहता है। NIA ने अप्रैल 2022 में ही उसे आतंकी घोषित कर दिया था। हमले के बाद कश्मीर में उसकी संपत्तियां भी ज़ब्त कर ली गईं। फिर भी पाकिस्तान ने ना तो उसे गिरफ्तार किया और ना ही भारत को सौंपा- क्योंकि सज्जाद गुल जैसे लोग पाकिस्तान के दुश्मन नहीं, उनकी पूंजी हैं।

पहलगाम हमले की टाइमिंग कोई इत्तेफाक नहीं थी। इससे ठीक पहले दो बड़ी घटनाएं हुई थीं। 10 अप्रैल, 2025 को भारत ने अमेरिका से तहव्वुर हुसैन राणा का प्रत्यर्पण हासिल किया था- जो पाकिस्तानी सेना का पूर्व अफसर और 2008 मुंबई हमलों का मुख्य साज़िशकर्ता था। ये भारत के लिए एक बहुत बड़ी खुफिया और कानूनी जीत थी, और पाकिस्तान के लिए एक करारी बेइज़्ज़ती। पाकिस्तानी सेना को इसका जवाब देना ही था। 

उन्हें ये दिखाना था की भारत की जीतों की एक कीमत चुकानी पड़ेगी। और फिर, हमले से ठीक छह दिन पहले, 16 अप्रैल को पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने इस्लामाबाद में एक भाषण दिया। उसने कश्मीर को पाकिस्तान की “शह-रग” बताया और खुलेआम टू-नेशन थ्योरी का राग अलापा- ये कहते हुए की हिंदू और मुसलमान बुनियादी तौर पर अलग हैं और एक साथ नहीं रह सकते। 

छह दिन बाद, उसी के पाले हुए लोगों ने बैसरन जाकर अपनी गोलियों से साबित कर दिया की वो हिंदुओं की जान को कितनी ‘अलग’ नज़र से देखते हैं।

कश्मीर के मुस्लिम गद्दार जो इन पाकिस्तानी जिहादियों के सबसे बड़े पनाहगार और मददगार बने

22 अप्रैल की सुबह वो आतंकी हवा में से अचानक नहीं टपक पड़े थे। हमले से एक रात पहले, 21 अप्रैल को उन्हें सिर छिपाने की जगह चाहिए थी। बैसरन के करीब एक सेफ हाउस- जहां वो रात काट सकें, अपने प्लान को आखिरी रूप दे सकें और सुबह का इंतज़ार कर सकें। और उन्हें वो जगह मिल भी गई।

दो लोकल कश्मीरियों- परवेज़ अहमद जोथर और बशीर अहमद जोथर- ने उन्हें पनाह दी। बैसरन से लगभग दो किलोमीटर दूर एक झोपड़ी में। NIA ने इन दोनों को 22 जून, 2025 को गिरफ्तार किया और स्पेशल कोर्ट में पेश किया। पूछताछ में इन्होंने आतंकियों से जुड़ी ऐसी-ऐसी बातें उगलीं जो बाद के ऑपरेशन्स के लिए ब्रह्मास्त्र साबित हुईं। बाद में सेना द्वारा मारे गए आतंकियों के सामान से मिलाने के लिए इनके DNA सैंपल भी लिए गए।

जुलाई 2025 में एक तीसरे मददगार, शफात मकबूल वानी को भी हंदवाड़ा से UAPA के तहत धर दबोचा गया।

ये वो कड़वी सच्चाई है जिसे पूरे भारत के AC रूम्स में बैठे लोग अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। कश्मीर के कुछ हिस्सों में स्थानीय मुस्लिम आबादी का एक तबका ऐसा इकोसिस्टम तैयार करता है जिसके बिना सीमा पार का आतंकवाद एक दिन भी नहीं टिक सकता।

सेफ हाउस। लॉजिस्टिक्स। टूरिस्टों की आवाजाही की खुफिया जानकारी। रास्तों की लोकल जानकारी। अगर परवेज़ और बशीर जोथर ना होते, तो पहलगाम के हमलावर उस रात खुले में होते और मारे जाते। सालों के ब्रेनवॉश से बनाए गए इस लोकल इस्लामिक सपोर्ट नेटवर्क के बिना लश्कर और TRF कश्मीर की वादियों में इतनी आसानी से नहीं घूम सकते।

पनाह देने वाले भी उतने ही गुनहगार हैं जितने की गोली चलाने वाले। NIA की ये गिरफ्तारियां सिर्फ कानूनी कार्रवाई नहीं थीं- ये एक साफ मैसेज था की भारत की सुरक्षा एजेंसियां अब इस खूनी खेल की हर एक कड़ी का हिसाब करेंगी।

हिंदुओं के नरसंहार पर खौलता देश और इस्लामाबाद तक गूंजती भारत की हुंकार

पहलगाम के कत्लेआम के बाद भारत में जो दुख की लहर दौड़ी, वैसी सालों में नहीं देखी गई थी। कैंडल मार्च निकले। प्रदर्शन हुए। आंसू बहे। लेकिन इन आंसुओं के बीच कुछ कठोर भी हो रहा था। एक गुस्सा- जो सदियों पुराना था, हमारी हिन्दू सभ्यता से जुड़ा था और एकदम जायज़ था- पूरे देश के हिंदुओं के दिलों में धधक उठा।

ये कोई आम आतंकी हमला नहीं था। ये सीधे-सीधे हिंदुओं को चुन-चुन कर मारने का अभियान था, वो भी उनकी अपनी पवित्र धरती पर। भारत के नेताओं को भी ये बात समझ आ गई थी की इस बार काम सिर्फ निंदा प्रस्तावों और कूटनीतिक बयानों से नहीं चलने वाला।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना विदेश दौरा बीच में ही रद्द कर दिया। वो फौरन भारत लौटे और कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की एक इमरजेंसी मीटिंग बुलाई। उनका मैसेज एकदम साफ था: जिन्होंने गोलियां चलाईं उन्हें पाताल से भी ढूंढ निकाला जाएगा, और जिन्होंने उन्हें भेजा था, उन्हें ऐसी कीमत चुकानी होगी जो उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोची होगी।

भारत का जवाब तुरंत आया, चौतरफा आया और ऐसा आया जो इतिहास में दर्ज हो गया। सिंधु जल संधि- वो 1960 का समझौता जिसके तहत भारत अपनी बेइंतहा उदारता दिखाते हुए साढ़े छह दशकों से पाकिस्तान के साथ नदियों का पानी साझा कर रहा था- उसे सस्पेंड कर दिया गया। ये कोई दिखावटी कदम नहीं था। पानी ही ज़िंदगी है, और पाकिस्तान की खेती-बाड़ी वाली अर्थव्यवस्था के लिए भारतीय नदियों का पानी किसी ऑक्सीजन से कम नहीं। यह एक ऐसा मैसेज था जो रावलपिंडी की समझ में बहुत अच्छी तरह आता है।

डिप्लोमेसी के मोर्चे पर भी भारत ने तेज़ी से काम किया और दुनिया को बता दिया की पहलगाम असल में था क्या- पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित हिंदू नागरिकों का नरसंहार। दुनिया का जवाब भी कड़ा था। फ्रांस, यूके, अमेरिका, इज़राइल, जापान, सऊदी अरब, श्रीलंका, नीदरलैंड्स- तमाम वैश्विक नेताओं ने भारत के साथ खड़े होने की बात कही और इस हमले की कड़े शब्दों में निंदा की।

इज़राइल के राजदूत ने साफ-साफ कहा की इस्लामिक आतंकियों के छिपने की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। यूके के विदेश मंत्री ने कहा की भारत का गुस्सा एकदम जायज़ है। फ्रांस ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पूरी एकजुटता का भरोसा दिया।

उधर, पाकिस्तान अपने उसी पुराने नाटक पर उतर आया। नकारना। उल्टी कहानियां गढ़ना। पाकिस्तानी सीनेट ने तो एक प्रस्ताव भी पास कर दिया जिसमें कहा गया की ये हमला “पाकिस्तान को बदनाम करने की सोची-समझी साज़िश” थी। पाकिस्तान ने बड़ी ही बेशर्मी से UN सुरक्षा परिषद के बयान में TRF का नाम तक ब्लॉक करवा दिया। पाकिस्तान की मिलिट्री और उसके पाले हुए मोहरे हमेशा एक ही भाषा बोलते हैं: हमला करो, मुकर जाओ, और बात घुमा दो। लेकिन अब दुनिया बेवकूफ नहीं बनने वाली थी।

ऑपरेशन सिंदूर- यानी हिंदू सुहागिनों के उजड़े सुहाग का पाकिस्तान से खौफनाक इंतकाम

जब भारत के सुरक्षा रणनीतिकारों ने इस जवाबी मिलिट्री ऑपरेशन का नाम तय किया, तो उन्होंने ऐसा शब्द चुना जो सदियों की हिंदू चेतना से जुड़ा था। ‘सिंदूर’- वो लाल रंग जो एक हिंदू दुल्हन की मांग में सजता है, जो उसकी शादी की निशानी है, जो हिंदू परंपरा में उसके पति की ज़िंदगी का प्रतीक है। बैसरन में आतंकियों ने हिंदू पतियों को उनकी पत्नियों के सामने मारा था। उन्होंने, सबसे क्रूर और घिनौने तरीके से, भारत की बेटियों की मांग का सिंदूर पोंछ दिया था।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ भारत का वही जवाब था। ये सिर्फ एक मिलिट्री स्ट्राइक नहीं थी। ये एक ऐलान था। एक कसम थी। एक पूरा हिसाब-किताब था।

ये ऑपरेशन हमले के बाद के हफ्तों में कई एजेंसियों की दिन-रात की मेहनत का नतीजा था। भारत की सेना और खुफिया एजेंसियों ने लश्कर-ए-तैयबा और उसके नेटवर्क से जुड़े नौ अहम आतंकी ठिकानों की पहचान की।

टारगेट बिल्कुल सटीक और सोच-समझकर चुने गए थे- कोई आम नागरिक ठिकाने नहीं, शुरुआत में पाकिस्तानी सेना के बेस भी नहीं, बल्कि वो जगहें जो जिहाद की असली नर्सरी थीं: ट्रेनिंग कैंप, प्लानिंग सेंटर, लॉजिस्टिक हब, वो वैचारिक ठिकाने जहां पहलगाम जैसे हमलों की साज़िश रची जाती है, जहां पैसा आता है, जहां ट्रेनिंग दी जाती है और जहां से आतंकियों को भारत भेजा जाता है।

मिशन एकदम साफ था: तबाह करो, नेस्तनाबूद करो और दिखा दो। पाकिस्तान के आतंकी इकोसिस्टम को तबाह कर दो। उस ढांचे को मटियामेट कर दो जिसने पहलगाम के हत्यारों को पैदा किया। और पाकिस्तान को, उसकी सेना को, उसकी ISI को और पूरी दुनिया को ये दिखा दो की भारत ने अब एक ऐसी लकीर पार कर ली है जहां से वापसी नहीं है- की अब सिर्फ डिप्लोमैटिक निंदा करके आतंकी हमले सहने का वो दौर हमेशा के लिए खत्म हो चुका है।

इस्लामी आतंक के गढ़ मुरीदके और बहावलपुर पर कहर बनकर टूटती भारतीय मिसाइलें

7 मई, 2025 की सुबह होने से ठीक पहले, भारत ने वार किया।

नौ आतंकी ठिकानों को एक साथ, बेहद सटीक स्ट्राइक में निशाना बनाया गया। इन टारगेट्स में दो ऐसी जगहें भी शामिल थीं जिनका भारत के खिलाफ जिहाद के इतिहास में एक बहुत गहरा और काला महत्व है।

बहावलपुर – ये जैश-ए-मोहम्मद का हेडक्वार्टर है, पाकिस्तान के सबसे ज़हरीले आतंकी संगठनों में से एक। ये वही संगठन है जिसने 2019 का पुलवामा हमला करवाया था जिसमें हमारे 40 जवान शहीद हुए थे। ये एक ऐसा शहर है जिसे पाकिस्तानी हुकूमत ने एक्सपोर्ट होने वाले जिहाद की ‘राजधानी’ बनने की खुली छूट दे रखी है। भारत की मिसाइलों ने इस शहर के आतंकी इंफ्रास्ट्रक्चर को भयानक सटीकता के साथ तबाह कर दिया।

मुरीदके – ये लश्कर-ए-तैयबा के उस विशाल ‘मरकज़ तैयबा’ कॉम्प्लेक्स का घर है, जो उस संगठन का वैचारिक और ऑपरेशनल हेडक्वार्टर है जिसने 2008 के मुंबई हमलावरों को तैयार किया था, और जिसने पहलगाम के कातिलों को जन्म दिया। सालों से मुरीदके पाकिस्तान की इस ढिठाई का प्रतीक बना हुआ था-लाहौर के पास खुलेआम चलने वाली एक ‘टेरर यूनिवर्सिटी’, जहां से भारत में भेजने के लिए जिहादी तैयार किए जाते थे। भारत के हथियारों ने उसे भी ढूंढ निकाला।

इन हमलों में हवा से मार करने वाले सटीक हथियारों, ड्रोन्स और भारत की स्वदेशी डिफेंस टेक्नोलॉजी का भरपूर इस्तेमाल हुआ- जिसमें ‘ब्रह्मोस’ सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल सिस्टम भी शामिल था।

ब्रह्मोस, जिसे भारत और रूस ने मिलकर बनाया है, आवाज़ की गति से लगभग तीन गुना तेज़ चलती है और इसकी मार अचूक है। इसके इस्तेमाल ने सिर्फ पाकिस्तान को ही नहीं, बल्कि दूर से तमाशा देख रहे हर उस देश और दुश्मन को एक कड़ा मैसेज दिया की: भारत के पास वार करने की ताकत है, और वह इसे बेझिझक इस्तेमाल करेगा।

पाकिस्तान की फौज की जो बेइज़्ज़ती हुई, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। भारतीय स्ट्राइक पाकिस्तानी एयरस्पेस को चीरते हुए अंदर तक घुसी और बिल्कुल पाकिस्तानी ज़मीन के दिल में जाकर टारगेट्स को उड़ा दिया- बॉर्डर के पास नहीं, उस तथाकथित ‘आज़ाद कश्मीर’ में नहीं, बल्कि सीधे पाकिस्तानी मेन लैंड में।

पाकिस्तानी सेना, जो देश में अपनी सत्ता सिर्फ इस नाम पर चलाती है की वही पाकिस्तान की इकलौती रक्षक है, बुरी तरह एक्सपोज़ हो गई। वो अपनी ही ज़मीन नहीं बचा पाए। पाकिस्तान की सेना को लगा ये मनोवैज्ञानिक झटका उस तबाही से भी कहीं बड़ा था जो ज़मीन पर हुई थी।

पाकिस्तान का पलटवार जो बुरी तरह फ्लॉप रहा

तिलमिलाई और ज़लील हुई पाकिस्तानी सेना ने वही किया जो वो हमेशा से करती आई है- कायरता। 7, 8 और 9 मई की रातों को पाकिस्तान ने ड्रोन और मिसाइल हमले किए, जिनका निशाना भारत का सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर था। और उससे भी घटिया बात- उन्होंने भारत के धार्मिक स्थलों को निशाना बनाने की कोशिश की।

लेकिन उनके सारे हमले फेल हो गए। भारत के एयर डिफेंस नेटवर्क ने- जो देसी और विदेशी दोनों तकनीकों को मिलाकर बना एक बेहद मजबूत सिस्टम है-पाकिस्तानी ड्रोन्स और मिसाइलों को हवा में ही पकड़कर नेस्तनाबूद कर दिया। एक के बाद एक हर खतरे को मार गिराया गया। पाकिस्तान की वो कोशिश की वो भारतीय नागरिकों में खौफ पैदा करे और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाकर दंगे भड़का दे, ज़मीन पर तो नाकाम हुई ही, साथ ही उसका घिनौना चेहरा भी पूरी तरह बेनकाब हो गया।

पाकिस्तानी सेना ने धार्मिक स्थलों को निशाना क्यों बनाया, इस पर दो टूक बात होनी चाहिए: पाकिस्तान, जो इस्लामी दुनिया में खुद को मुसलमानों का सबसे बड़ा ठेकेदार बताता है, उसने अपनी सेना को भारत के धार्मिक स्थलों पर बम गिराने का हुक्म दिया- महज़ इसलिए ताकि अराजकता फैल सके। ये उनकी हताशा और खोखली रणनीति का नतीजा था।

सबसे बड़ी बात तो ये रही की भारत ने पाकिस्तान की न्यूक्लियर धमकियों की हवा निकाल दी। दशकों से पाकिस्तान अपने न्यूक्लियर हथियारों का डर दिखाकर भारत के खिलाफ प्रॉक्सी वॉर लड़ता आया था- उसे लगता था की परमाणु युद्ध के डर से भारत कभी पलटवार नहीं करेगा। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने उस सारे घमंड को चकनाचूर कर दिया।

भारत ने पाकिस्तान के अंदर घुसकर उन जगहों पर वार किया जिन्हें पाकिस्तानी स्टेट हमेशा अपनी पहुंच से बाहर समझता था, और मानो पाकिस्तान को ललकारा की “कर लो जो करना है।” पाकिस्तान ने कुछ नहीं किया। उसका न्यूक्लियर ब्लफ सबके सामने आ गया- की वो हथियारों का डर सिर्फ एक कायरता की ढाल थी, आतंकियों को बचाने की एक स्कीम भर थी।

पूरी दुनिया के डिफेंस एनालिस्ट्स ने ये भी देखा की कैसे भारत की पारंपरिक सैन्य ताकत ने खुद को साबित किया। पाकिस्तान ने चाइनीज़ मिलिट्री हार्डवेयर का इस्तेमाल किया था। लेकिन भारत की देसी तकनीक और ब्रह्मोस जैसे भरोसेमंद हथियारों ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा। ये रावलपिंडी के साथ-साथ बीजिंग के लिए भी एक बहुत ही सीधा इशारा था।

ऑपरेशन महादेव के तहत कश्मीर के जंगलों में जानवरों की तरह मारे गए वो इस्लामी कातिल

जिस वक्त ‘ऑपरेशन सिंदूर’ सरहद पार आतंकियों के ठिकानों को राख कर रहा था, उसी वक्त जम्मू-कश्मीर के घने जंगलों में एक और मिशन चुपचाप चल रहा था- उन तीन कातिलों का शिकार जिन्होंने बैसरन में अपने हाथों से गोलियां चलाई थीं।

‘ऑपरेशन महादेव’ हमले वाले दिन- 22 अप्रैल, 2025- को ही शुरू हो गया था। सुरक्षा बलों को एकदम साफ हुक्म मिला था: ये लोग किसी भी कीमत पर ज़िंदा वापस पाकिस्तान नहीं लौटने चाहिए। लेकिन चुनौती बहुत बड़ी थी। बैसरन वादी लाइन ऑफ कंट्रोल से 220 किलोमीटर से भी ज़्यादा दूर है। बीच का इलाका दुनिया के सबसे मुश्किल रास्तों में गिना जाता है- घने जंगल, ऊंची पहाड़ियां, और जानलेवा मौसम।

लीड मिली टेक्नोलॉजी के ज़रिए। एक Huawei सैटेलाइट फोन- जिसका IMEI 86761204 से शुरू होता था- 22 अप्रैल से ही सर्विलांस पर था और Inmarsat-4 F1 सैटेलाइट को सिग्नल भेज रहा था। सुरक्षा एजेंसियां महीनों तक बड़े धैर्य से उसके मूवमेंट ट्रैक करती रहीं, आतंकियों को यही लगता रहा की किसी को उनके बारे में भनक तक नहीं है। 26 जुलाई, 2025 को इस डिवाइस से एक अजीब सी कॉल हुई, जिसने सिक्योरिटी ग्रिड के कान खड़े कर दिए। उस फोन की लोकेशन हरवान के जंगलों के चार-स्क्वायर-किलोमीटर के इलाके में ट्रेस कर ली गई।

28 जुलाई, 2025 को फाइनली जाल बिछ गया। CRPF, जम्मू-कश्मीर पुलिस, राष्ट्रीय राइफल्स और पैरा स्पेशल फोर्सेज (Para SF) के एक जॉइंट ऑपरेशन में दाचीगाम के पास महादेव रिज के करीब हरवान के जंगलों में घेराबंदी कर दी गई। सुबह 8 बजे, विजुअल्स लेने के लिए ड्रोन्स उड़ाए गए। पैरा SF और राष्ट्रीय राइफल्स के जवानों ने महादेव की पहाड़ी चढ़कर अपनी पोज़िशन ले ली। इसके बाद जो मुठभेड़ हुई, उसमें तीन आतंकी मारे गए: सुलेमान शाह उर्फ फैज़ल जट्ट, अबू हमज़ा, और यासिर।

ये वही आदमी थे जो 22 अप्रैल को बैसरन के जंगलों से निकले थे, जिन्होंने हिंदू आदमियों से उनका मज़हब साबित करने को कहा था और फिर उन्हें मौत के घाट उतार दिया था- आज उनका अंत एक जंगल में ही हुआ। उन्हें जानवरों की तरह घेर कर मारा गया- उस देश के सैनिकों के हाथों, जिसने इंसाफ का संकल्प लिया था। NIA ने मारे गए आतंकियों के DNA सैंपल लिए और उन्हें हमले वाली जगह से मिले सुरागों से मैच किया, जिससे उनकी पहचान पर पुख्ता मुहर लग गई।

ये है इंडियन आर्मी। ये है CRPF। ये है J&K पुलिस। ये वो लोग हैं जो खुद बर्फीली ठंड में सोते हैं ताकि पूरा भारत चैन की नींद सो सके। ऑपरेशन महादेव सिर्फ एक काउंटर-टेरर ऑपरेशन नहीं था। ये निभाया गया एक वादा था। एक देश ने अपने मारे गए नागरिकों से कहा था: हम उन्हें ढूंढ निकालेंगे। और देश ने अपना वो वादा पूरा किया।

हिंदू सभ्यता का वो अटूट हौसला जिसे पाकिस्तानी आतंकवाद कभी नहीं तोड़ सकता

मौतों के आंकड़ों के पीछे हर एक नंबर एक ऐसा इंसान है जिसकी कहानी तबाह हो गई, एक ऐसा नुकसान है जिसकी कभी भरपाई नहीं हो सकती।

वहां वो पति थे जिन्होंने अपनी पत्नियों से कश्मीर घूमने का वादा किया था- वो हनीमून जो उन्होंने टाल दिया था, वो एनिवर्सरी ट्रिप जो उन्होंने आखिर ले ही ली थी। वहां वो पिता थे जो अपने टीनएजर बच्चों को अपने देश की खूबसूरती दिखाने लाए थे। 

वहां ढलती उम्र के वो जोड़े थे, जो एक साथ सुकून के पल बिता रहे थे। लेकिन पलक झपकते ही सब टूट कर बिखर गया। पत्नियां विधवा हो गईं। बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया। माता-पिता ने अपने ही जवान बेटों की अर्थियां उठाईं। और पूरे भारत में, न्यूज़ देख रहे एक अरब लोगों ने अपने भीतर कुछ टूटते हुए महसूस किया।

वो दुख सच्चा था। वो आंसू सच्चे थे। वो जनाज़े- जिनमें से कुछ लाइव स्ट्रीम हुए, कुछ में वो हज़ारों पड़ोसी शामिल हुए जो मारे गए लोगों से कभी मिले तक नहीं थे-सब सच्चे थे। पूरा देश एक साथ रोया था।

लेकिन उस शोक के साथ-साथ एक और चीज़ भी हुई। कुछ ऐसा जिसे भारत के दुश्मन अक्सर समझने में गलती कर बैठते हैं, वो हिंदू सभ्यता की रगों में दौड़ने वाली ताकत को कम आंक लेते हैं: कि ये सभ्यता कभी टूटती नहीं है। 

ये झुक सकती है, लहूलुहान हो सकती है, शोक मना सकती है- लेकिन फिर ये राख से उठ खड़ी होती है। पहलगाम के बाद जो आक्रोश सड़कों पर उतरा, वो किसी टूटी हुई या निराश कौम का नहीं था। वो एक ऐसी सभ्यता का गुस्सा था जिसके सब्र का बांध अब टूट चुका था। 

भारत के शहरों की सड़कों पर जो कैंडल मार्च और प्रदर्शन हुए, वो हार मानने वालों के नहीं बल्कि संकल्प लेने वालों के थे। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक पूरे देश की एक ही मांग थी: बहुत हो गया। अब और नहीं। इन्हें इन्हीं की भाषा में जवाब दो।

और भारत ने जवाब दिया।

पहलगाम के खून से जन्मा नया भारत जो पाकिस्तानी आतंकियों को उन्हीं के घर में घुसकर मारता है

22 अप्रैल, 2026. बैसरन की उस हरी घास को खून से लाल हुए पूरा एक साल बीत चुका है।

इस एक साल में, भारत ने रणनीतिक तौर पर खुद को ऐसा बदल लिया है की बड़े-बड़े एनालिस्ट्स आने वाले कई दशकों तक इसे स्टडी करेंगे। पहाड़ों की वादी में हुए एक कत्लेआम ने एक ऐसी चेन रिएक्शन शुरू की- कूटनीतिक, सैन्य और रणनीतिक मोर्चे पर- जिसने साउथ एशिया के पूरे सिक्योरिटी ढांचे को हिला कर रख दिया। 

पाकिस्तान ने इस साल की शुरुआत उसी पुराने वहम में की थी जो वो दशकों से पाले बैठा था: कि वो प्रॉक्सी जिहाद के ज़रिए भारत का खून बहा सकता है और कोई उसका बाल भी बांका नहीं कर पाएगा। लेकिन बहावलपुर और मुरीदके के मलबे ने उसके इस वहम को हमेशा के लिए चकनाचूर कर दिया- किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं, बल्कि ज़मीन पर।

हिंदुओं को निशाना बनाने वाला वो इस्लामी आतंकी नेटवर्क- जो लोगों को वादियों में भेजकर आदमियों से उनका मज़हब पूछता है और फिर गोली मारता है- उसे ऐसा गहरा घाव लगा है जिससे उबरने में उसे सालों लगेंगे। 

TRF, LeT, और उन्हें पालने वाली ISI की पूरी पाइपलाइन को पीछे धकेल दिया गया है। खत्म नहीं हुए हैं- क्योंकि पाकिस्तान उस इंफ्रास्ट्रक्चर को खुद से कभी खत्म नहीं करेगा जिसे बनाने में उसकी सेना ने पचास साल लगाए हैं। लेकिन उन्हें डैमेज कर दिया गया है। बेनकाब कर दिया गया है। और उन्हें उनकी औकात दिखा दी गई है।

पहलगाम के कातिलों को पनाह देने वाले वो लोकल गद्दार मुसलमान आज भारतीय अदालतों में इंसाफ का सामना कर रहे हैं। हत्यारे खुद मारे जा चुके हैं, जिन्हें हरवान के जंगलों में उन्हीं सैनिकों ने खत्म कर दिया जिनके नागरिकों का खून उन्होंने बहाया था। मास्टरमाइंड अभी पाकिस्तान में बैठे हैं- लेकिन भारतीय खुफिया एजेंसियों की पहुंच और भारतीय सत्ता की इच्छाशक्ति इतनी लंबी हो चुकी है की अब उन्हें भी अपनी परछाईं से डर लगने लगा होगा।

22 अप्रैल, 2025 को बैसरन में जो 25 हिंदू औरतों की मांग का सिंदूर मिटा, वो कभी वापस नहीं आ सकता। वो नुकसान हमेशा के लिए है, जिसकी भरपाई कोई भी मिलिट्री की जीत नहीं कर सकती। लेकिन उनके नाम पर जो वादा किया गया था- की भारत अपने लोगों की रक्षा करेगा, की आतंकियों को पाताल से भी ढूंढ निकाला जाएगा, की पाकिस्तान को वो कीमत चुकानी पड़ेगी जिसे वो कभी नज़रअंदाज़ नहीं कर पाएगा- वो वादा ज़रूर निभाया गया है।

बैसरन की वादियों से लेकर हरवान के जंगलों तक। पहलगाम से लेकर बहावलपुर तक। दुख से लेकर धधकती आग तक।

भारत ने अपना जवाब दे दिया है। दुनिया ने सुन लिया है।

भारत माता की जय।

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