ईद में बकरियों के खून से लाल होती सड़कों पर गूंगे बैठे PETA और NGOs, हिन्दू त्योहारों पर ज्ञान बांटने में रहते सबसे आगे, पर्यावरण से नहीं सनातन से इन लिबरल कीड़ों को परेशानी

ईद में बकरियों के खून से लाल होती सड़कों पर गूंगे बैठे PETA और NGOs, हिन्दू त्योहारों पर ज्ञान बांटने में रहते सबसे आगे, पर्यावरण से नहीं सनातन से इन लिबरल कीड़ों को परेशानी

ज़रा याद कीजिए, जैसे ही हमारे हिन्दू त्योहारों का सीज़न शुरू होता है, ये पूरा का पूरा सेक्युलर और लिबरल इकोसिस्टम अचानक से बिल से बाहर निकल आता है। टीवी चैनल और सोशल मीडिया पर ज्ञान की ऐसी उल्टियां की जाती हैं जैसे हिन्दू अपना त्यौहार मानाने में कोई पाप कर रहा हो।

बॉलीवुड के वो नचैनिये और दलाल, जो अपनी फिल्मों में जिहादियों को हीरो बताते हैं, वो अचानक से टीवी पर आकर हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं और हमें सिखाते हैं की दीवाली कैसे मनानी चाहिए और होली कैसे खेलनी चाहिए।

इनके साथ जुड़ जाते हैं पेटा (PETA) जैसे विदेशी एनजीओ और अर्बन नक्सल, जो पर्यावरण और जानवरों का नाम लेकर सीधा हमारे धर्म पर हमला कर देते हैं।

अरे भाई, ये कोई पर्यावरण बचाने की मुहिम नहीं है! अगर किसी को लगता है की ये लोग सच में हवा, पानी को बचाना चाहते हैं, तो वो इंसान दुनिया का सबसे बड़ा बेवकूफ है। ये विशुद्ध रूप से एक ‘इको-जिहाद’ है।

इनका इकलौता और खौफनाक एजेंडा ये है की हिंदू बच्चों के दिमाग में बचपन से ही ये ज़हर भर दिया जाए की तुम्हारी जो सनातन संस्कृति है, तुम्हारे जो त्योहार हैं, वो पिछड़े हुए हैं और उन्हीं की वजह से पर्यावरण और दुनिया बर्बाद हो रही है।

ये चाहते हैं की हमारा बच्चा खुद अपने ही धर्म से नफरत करने लगे और अपने त्योहारों को मनाना छोड़ दे। और सबसे बड़ा खून तो तब खौलता है जब यही ज्ञान बांटने वाले सेक्युलर गिद्ध किसी जिहादी त्योहार पर अपनी जुबान हलक में डाल लेते हैं और अंधे-बहरे होकर बैठ जाते हैं।

दिवाली के पटाखों पर सुप्रीम कोर्ट जाने वाले ये लिबरल कीड़े बकरीद में बहते खून की नदियों पर हो जाते गूंगे और अंधे

ज़रा इस पूरे लिबरल इकोसिस्टम के खौफनाक दोगलेपन को देखिए। दीवाली आने से एक महीने पहले ही इन सेक्युलर कीड़ों का रोना-धोना शुरू हो जाता है।

ये सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाते हैं और बड़ी-बड़ी याचिकाएं (PIL) डालते हैं की “माई लॉर्ड, दीवाली के पटाखों से प्रदूषण हो रहा है, ग्लोबल वार्मिंग आ रही है, और हमारे पालतू कुत्तो-बिल्लियों को डर लग रहा है, इसलिए पटाखों पर बैन लगाओ।”

और हमारी अदालतें भी इन वामपंथियों की दलीलें सुनकर दीवाली पर अजीबोगरीब बैन ठोक देती हैं।

लेकिन भाई, जब बकरीद का दिन आता है, तब इन कुत्तों-बिल्लियों से प्यार करने वालों का वो जानवरों वाला प्रेम कहां जाकर मर जाता है? बकरीद के दिन पूरे देश की सड़कों पर लाखों बेज़ुबान बकरियों, भैंसों को सरेआम बेरहमी से काटा जाता है।

उन बेज़ुबानों की चीखें आसमान चीर रही होती हैं। उनके गले पर छुरी चलती है और वो तड़प-तड़प कर जान दे देते हैं। क्या उन जानवरों को दर्द नहीं होता? क्या उन कटते हुए जानवरों की चीखें इन पेटा (PETA) वालों के कानों तक नहीं पहुंचतीं?

बिल्कुल पहुंचती हैं! लेकिन इन लिबरल कीड़ों को पता है की अगर वहां जाकर ज्ञान बांटा, तो वो जिहादी भीड़ इनकी गर्दन भी बकरे की तरह काट देगी। इसलिए ये लोग बकरीद पर एकदम गूंगे और अंधे हो जाते हैं।

और ज़रा प्रदूषण वाले इनके फ्रॉड को भी समझ लीजिए। जब बकरीद पर लाखों जानवरों का खून सड़कों पर बहता है, वो खून नालियों में जाकर सड़ता है, जानवरों की ओझड़ियां और बची हुई हड्डियां खुलेआम हमारी नदियों और तालाबों में फेंक दी जाती हैं।

तो उससे जो भयंकर बदबू और बीमारियां फैलती हैं, क्या वो प्रदूषण नहीं है? क्या उस सड़े हुए मांस और बहते खून से हवा में कोई ताज़ी ऑक्सीजन पैदा हो रही होती है?

बिल्कुल नहीं! उससे शहर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं, लेकिन तब कोई NGO सुप्रीम कोर्ट नहीं जाता। तब कोई वामपंथी पत्रकार टीवी पर डिबेट नहीं करता की “बकरीद से पर्यावरण को नुकसान हो रहा है।”

मतलब, हिंदू का बच्चा साल में एक दिन फुलझड़ी भी जला ले तो पूरा ब्रह्मांड खतरे में आ जाता है, और ये जिहादी लाखों जानवरों का खून बहाकर सड़कों को लाल कर दें, तो वो ‘धार्मिक आज़ादी’ और ‘त्योहार’ बन जाता है? लानत है ऐसे दोगले पर्यावरण-प्रेमियों पर और इनके इस बिकाऊ सिस्टम पर!

जल्लीकट्टू को क्रूरता बताने वाले PETA का असली डर, फतवों और जिहादी धमकियों के आगे कैसे घुटने टेक देता ये विदेशी NGO

अगर आपको इस लिबरल और विदेशी NGO इकोसिस्टम का सबसे कायर और डरपोक चेहरा देखना है, तो पेटा (PETA – People for the Ethical Treatment of Animals) की करतूतों पर नज़र डालिए। ये वो विदेशी संस्था है जिसका काम सिर्फ और सिर्फ हिंदू परंपराओं को टारगेट करना है।

तमिलनाडु में पोंगल के समय होने वाला हमारा प्राचीन और पवित्र ‘जल्लीकट्टू’ (Jallikattu) हो, या कर्नाटक का ‘कंबाला’ (Kambala) भैंसा दौड़… इन पेटा वालों ने कोर्ट में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया था की इन त्योहारों को बैन कर दिया जाए।

इनकी दलील थी की “ये जानवरों पर क्रूरता है, बैलों को तकलीफ होती है।” अरे बेशर्मों, जल्लीकट्टू में किसी जानवर को मारा नहीं जाता, वहां बैलों की पूजा होती है, उन्हें भगवान की तरह पाला जाता है। लेकिन इन विदेशी कीड़ों ने उसे क्रूरता बताकर सालों तक बैन लगवाए रखा।

लेकिन जब बात जिहादियों के त्योहार की आती है, तो इन पेटा वालों की पैंट कैसे गीली होती है, उसका सबसे बड़ा उदाहरण 2020 में लखनऊ में देखने को मिला था।

उस साल पेटा वालों ने थोड़ी सी हिम्मत दिखाते हुए लखनऊ की सड़कों पर बकरीद से पहले एक होर्डिंग लगा दिया। उस बोर्ड पर सिर्फ इतना लिखा था की “इस बार जानवरों की जान बचाइए, वीगन ईद (Vegan Eid) मनाइए।”

बस! इतना छपना था की पूरे शहर के मौलानाओं और कट्टरपंथियों के बदन में आग लग गई। तुरंत मदरसों से फतवे निकलने शुरू हो गए।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और मौलवियों ने खुली धमकी दे दी की “हमारी मज़हबी आज़ादी में दखल मत दो, ये हमारे इस्लाम का हिस्सा है। ये बोर्ड तुरंत हटना चाहिए वरना अंजाम बहुत बुरा होगा।”

भाई साहब, जिहादियों की उस एक धमकी ने पेटा के उस सारे ‘जानवर प्रेम’ को जूतों के नीचे कुचल दिया। जिस पेटा को सुप्रीम कोर्ट में हिंदू त्योहारों के खिलाफ लड़ने में शर्म नहीं आती थी, वो पेटा मौलानाओं की धमकी सुनकर थर-थर कांपने लगा।

रातों-रात, बिना कोई पुलिस केस किए, पेटा ने डर के मारे वो बोर्ड खुद ही उतार लिए और बड़ी बेशर्मी से अपने बिल में जाकर छुप गए। दोबारा कभी पेटा की हिम्मत नहीं हुई की वो बकरीद पर ऐसा कोई ज्ञान दे सके।

यही इन लिबरल्स की असली औकात है! ये सिर्फ उन सहिष्णु और शांत हिंदुओं को ही ज्ञान झाड़ सकते हैं जो इनकी बकवास सुनकर भी चुप रहते हैं।

लेकिन जैसे ही सामने से किसी कट्टरपंथी का फतवा या जिहादी की तलवार चमकती है, इनकी सारी सेक्युलरिज्म और इनका सारा पशु-प्रेम हवा हो जाता है। ये विदेशी NGO सिर्फ और सिर्फ सनातन को मिटाने के लिए फंड किए जाते हैं, इन्हें पर्यावरण या जानवरों से धेले भर का प्यार नहीं है!

सिस्टम और अदालतों का वो सेक्युलर दोगलापन, दही हांडी की ऊंचाई नापने वाले मुहर्रम की तलवारों पर मूंद लेते हैं आंखें

इस पूरे खेल में सबसे ज़्यादा खून तो तब खौलता है जब हम अपने देश की अदालतों, प्रशासन और उन बाल अधिकार आयोगों की तरफ देखते हैं। जो काम ये वामपंथी NGO करते हैं, हमारी सरकारें और सिस्टम भी उसी दोगलेपन में इनका पूरा साथ देते हैं।

ज़रा याद कीजिए, जब जन्माष्टमी का पवित्र त्योहार आता है, तो महाराष्ट्र से लेकर पूरे देश में ‘दही हांडी’ की धूम होती है। वो हमारे भगवान कृष्ण के बचपन का उत्सव है।

लेकिन तभी अचानक से हमारे देश की अदालतों और मानवाधिकार वालों की नींद टूट जाती है। कोर्ट में लंबी-लंबी बहसें होती हैं की “दही हांडी की ऊंचाई 20 फुट से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए, इसमें 18 साल से कम उम्र के बच्चे हिस्सा नहीं लेंगे, ये बहुत खतरनाक है।”

वाह रे सिस्टम! तुम्हें हिंदू बच्चों की सुरक्षा की बड़ी फिक्र हो रही है। लेकिन ज़रा ये बताओ, जब मुहर्रम का महीना आता है, तो तुम्हारी ये अदालतें, ये प्रशासन और ये बाल अधिकार वाले कौन सी भांग खाकर सो जाते हैं?

मुहर्रम के जुलूसों में 5 साल से लेकर 15 साल तक के छोटे-छोटे मुस्लिम बच्चों के हाथों में तेज़ धार वाली तलवारें, छुरियां और ब्लेड थमा दिए जाते हैं। वो बच्चे सरेआम बीच सड़क पर अपनी ही पीठ और सीने पर ब्लेड मार-मार कर खुद को लहूलुहान कर रहे होते हैं।

क्या वो क्रूरता नहीं है? लेकिन मजाल है की कोई पेटा वाला, कोई वामपंथी पत्रकार या कोई अदालत मुहर्रम के दिन स्वतः संज्ञान लेकर ये कह दे की “बच्चों के हाथ में तलवार देना गैरकानूनी है।”

वहां इनकी ज़ुबान पर ताला लग जाता है क्योंकि इन्हें पता है की अगर मुहर्रम पर ज्ञान बांचा, तो जिहादी भीड़ इनकी कोर्ट और इनके दफ्तरों की ईंट से ईंट बजा देगी।

यही हाल बकरीद का है। कानून कहता है की जानवरों को सिर्फ अधिकृत बूचड़खानों में ही काटा जाना चाहिए। लेकिन बकरीद के दिन क्या होता है?

खुलेआम हाउसिंग सोसायटियों में, पार्कों में और बीच सड़क पर जानवरों की गर्दनें रेती जाती हैं। पुलिस वहां खड़े होकर उन जिहादियों को सुरक्षा देती है की कहीं कोई हिंदू उन्हें टोक ना दे।

ये कैसा शरिया लागू कर रखा है तुमने इस देश में? जहाँ हिंदू अपने त्योहारों पर डर-डर कर जिए और ये जिहादी बीच सड़क पर खून बहाकर अपना खौफ कायम करें। इस बिकाऊ और दोगले सिस्टम ने भारत को हिंदुओं के लिए ही एक जेल बनाकर रख दिया है।

अगर इस देश में जिहादी खून बहाकर और सड़कों को लाल करके अपनी ‘धार्मिक आज़ादी’ मना सकते हैं, तो इस देश का असली मालिक, ये बहुसंख्यक हिंदू समाज भी अपने त्योहार सीना तानकर मनाएगा!

अगर किसी सेक्युलर कीड़े को इससे सांस लेने में दिक्कत होती है, तो वो अपना बोरिया-बिस्तर बांधे और किसी भी इस्लामिक या वामपंथी देश में जाकर बस जाए।

Scroll to Top