हमारी थाली में जिहाद का जहर, बिस्किट से लेकर दवाइयों पर भी 'हलाल' का ठप्पा, अपनी ही बर्बादी और PFI आतंकियों की फंडिंग कर रहा सोता हुआ हिंदू समाज

हमारी थाली में जिहाद का जहर, बिस्किट से लेकर दवाइयों पर भी ‘हलाल’ का ठप्पा, अपनी ही बर्बादी और PFI आतंकियों की फंडिंग कर रहा सोता हुआ हिंदू समाज

समझ में ही नहीं आ रहा की हमारा हिंदू समाज आखिर किस गहरी नींद में सो रहा है। हम दिन-रात ‘सेक्युलरिज्म’ की अफीम चाटकर घोड़े बेचकर सो रहे हैं, और हमारे ही पीठ पीछे एक ऐसा खौफनाक इकोनॉमिक जिहाद हमारी नस-नस में जहर घोल रहा है, जिसकी भनक तक आम आदमी को नहीं है।

आप सुबह उठकर जो चाय-बिस्किट खाते हैं, जो नमकीन अपने बच्चों को खिलाते हैं, यहाँ तक की बीमार पड़ने पर जो कफ सिरप या दवाई पीते हैं- क्या आपने कभी उनके पैकेट पलटकर देखे हैं? ज़रा ध्यान से देखिएगा। इसके बहुत ज्यादा संयोग हैं की उन पर आपको एक छोटा सा हरा निशान या ‘हलाल’ का ठप्पा मिल जाएगा।

अब मुझे ये समझ में नहीं आ रहा है की एक शुद्ध शाकाहारी नमकीन, मैदा, चीनी या लिपस्टिक का इस्लाम और हलाल से क्या लेना-देना? हलाल तो मांस काटने का एक क्रूर और मजहबी तरीका होता है ना, जिसमें जानवर को तड़पा-तड़पा कर मारा जाता है।

तो फिर ये बिस्किट और कॉस्मेटिक्स कब से हलाल होने लगे? असल में ये कोई धार्मिक आस्था का मामला नहीं है। ये सीधे-सीधे हम हिंदुओं की गर्दन पर छुरा रखकर वसूला जा रहा आधुनिक ‘जज़िया टैक्स’ है।

ये एक ऐसा भयंकर सिंडिकेट है जिसके तार सीधे तौर पर पीएफआई (PFI) जैसे खूंखार आतंकी संगठनों और देशद्रोही ताकतों से जुड़े हुए हैं। और सबसे बड़ी विडंबना देखिए, अपनी मौत का सामान खरीदने के लिए पैसा भी हम ही दे रहे हैं!

ये लेख उसी हलाल इकॉनमी का पूरा कच्चा चिट्ठा है, जिसे पढ़कर शायद आपकी बंद आंखें खुल जाएं।

शाकाहारी खाने पर मुल्लों का ठप्पा! ये कैसा ‘हलाल जिहाद’ है भाई

शुरुआत में जब ये ‘हलाल’ का खेल शुरू हुआ था, तो सेक्युलर कीड़ों ने हमें ये पट्टी पढ़ाई की अरे ये तो सिर्फ मीट-मछली वालों के लिए है। पर अब बात सिर्फ मीट-वीट तक नहीं रुकी है। इन जेहादियों की भूख बहुत बड़ी है।

इन्होंने एक पैरेलल इकॉनमी खड़ी कर दी है। आप मार्केट में जाइए। हल्दीराम हो, बीकानेर हो, च्यवनप्राश हो, पतंजलि के कुछ प्रोडक्ट हों, या फिर हिमालया कंपनी का फेस वॉश।

इन सब पर हलाल का सर्टिफिकेट चिपका हुआ है। अब सोचिए, एक हिंदू व्यापारी जो सालों से अपनी मेहनत से शुद्ध शाकाहारी सामान बना रहा है, उसे अचानक किसी मौलाना या इस्लामिक ट्रस्ट से सर्टिफिकेट लेने की क्या ज़रूरत पड़ गई?

ज़बर्दस्ती! हां भाई, ये सरासर ब्लैकमेलिंग है। ये हलाल ट्रस्ट वाले कंपनियों को डराते हैं की अगर तुमने हमसे लाखों रुपये देकर ये ठप्पा नहीं लगवाया, तो हम तुम्हारे प्रोडक्ट को मुस्लिम इलाकों में और अरब देशों में बिकने नहीं देंगे।

कंपनियों को अपना धंधा चलाना है, तो वो चुपचाप इनके आगे घुटने टेक देती हैं और इन्हें भारी-भरकम फीस दे देती हैं। एक बार सर्टिफिकेट मिल गया, तो बात खत्म नहीं होती। हर साल इसे रिन्यू कराने के लिए लाखों रुपये का हफ्ता देना पड़ता है।

और ये सारा पैसा आपकी और हमारी जेब से ही निकाला जा रहा है। आप जब ₹100 का हलाल मार्क वाला कोई सामान खरीदते हैं, तो उसका एक हिस्सा सीधे इन मौलवियों के ट्रस्ट में चला जाता है। मतलब, अपना ही खून-पसीना लगाकर हम इन जिहादियों की तिजोरियां भर रहे हैं।

लिपस्टिक कॉस्मेटिक्स और अस्पतालों तक फैला हलाल का ये जेहादी मकड़जाल

आप सोच रहे होंगे की ये हलाल का कीड़ा सिर्फ खाने-पीने तक ही सीमित है। लेकिन आप बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं। इन मजहबी ठेकेदारों ने अब आपके बाथरूम और ड्रेसिंग टेबल तक घुसपैठ कर ली है।

आज मार्केट में जाइए और कॉस्मेटिक्स, लिपस्टिक, फेस पाउडर और साबुन उठाकर देखिए। आपको हैरानी होगी की बहुत सारे प्रोडक्ट्स पर आपको ‘हलाल सर्टिफाइड’ लिखा मिल जाएगा।

मतलब सोचिए ज़रा! एक फेस वॉश या लिपस्टिक का इस्लाम के शरिया कानून से क्या वास्ता? क्या अब लिपस्टिक लगाने से पहले भी कलमा पढ़ना पड़ेगा? असल में ये कोई क्वालिटी चेक नहीं है, ये एक विशुद्ध जेहादी माफिया है।

ये लोग कॉस्मेटिक्स कंपनियों की गर्दन पकड़कर कहते हैं की अगर तुमने अपने साबुन-शैंपू में सूअर की चर्बी या अल्कोहल नहीं होने का हलाल सर्टिफिकेट हमसे नहीं खरीदा, तो हम मुसलमानों को तुम्हारा माल खरीदने से रोक देंगे। और हमारी जो ये सेक्युलर कंपनियां हैं, वो चंद रुपयों के लालच में इनके आगे नतमस्तक हो जाती हैं।

बात यहीं खत्म नहीं होती। अब तो हलाल अस्पताल, हलाल हाउसिंग सोसायटी और हलाल टूरिज्म तक शुरू हो गया है। मतलब अस्पतालों में भी अब ये तय होगा की दवा हलाल है या नहीं, डॉक्टर मुसलमान है या नहीं।

ये सीधा-सीधा भारत के अंदर एक ‘पैरेलल इस्लामिक स्टेट’ बनाने की खौफनाक तैयारी है। ये हमारे ही सिस्टम के अंदर अपना एक अलग शरिया सिस्टम खड़ा कर रहे हैं।

आप कोई भी दवा खरीदते हैं, कफ सिरप लेते हैं, तो उसका कुछ पैसा इन हलाल वालों की झोली में जाता है। और फिर वही पैसा शाहीन बाग जैसी देश-विरोधी साजिशों को फंड करने, पत्थरबाज़ों को छुड़ाने और पीएफआई (PFI) के आतंकियों के लिए हथियार खरीदने में इस्तेमाल होता है।

हम हिंदू अपनी ही बर्बादी का पूरा बिल खुद अपनी जेब से चुका रहे हैं। इससे बड़ी मूर्खता और क्या होगी?

आपके खून पसीने की कमाई से ऐसे हो रही है आतंकियों और देशद्रोहियों की फंडिंग

अब सवाल ये उठता है की ये जो अरबों-खरबों रुपये की अंधाधुंध वसूली हो रही है, ये पैसा आखिर जा कहां रहा है? क्या ये पैसा देश के विकास में लग रहा है? बिल्कुल नहीं।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद हलाल ट्रस्ट, हलाल इंडिया, और हलाल काउंसिल ऑफ इंडिया जैसी संस्थाएं इस पूरे माफिया को चलाती हैं।

आपको जानकर हैरानी होगी की ये कोई सरकारी संस्थाएं नहीं हैं! जैसे FSSAI या आईएसआई (ISI) सरकार के बनाए नियम हैं, वैसे ये हलाल वाले सरकार से जुड़े हुए लोग नहीं हैं। ये प्राइवेट मज़हबी एनजीओ (NGOs) हैं जिन्होंने अपने खुद के नियम थोप रखे हैं।

अब ज़रा इनकी करतूतें सुन लीजिए। पिछले कुछ सालों में जितनी भी बड़ी आतंकी घटनाएं हुई हैं, चाहे वो मुंबई का 26/11 हमला हो, संकटमोचन मंदिर का धमाका हो, या दिल्ली-यूपी में पकड़े गए अल-कायदा और सिमी (SIMI) के आतंकी हों- जब इन आतंकियों को पुलिस पकड़ती है, तो इन्हें बचाने के लिए करोड़ों रुपये की फीस वाले देश के सबसे महंगे वकील कौन खड़े करता है? यही जमीयत उलेमा-ए-हिंद!

मतलब क्रोनोलॉजी समझिए आप। एक आम हिंदू दुकान पर जाता है, अपने बच्चों के लिए हलाल सर्टिफाइड बिस्किट या मिठाई खरीदता है। उस कमाई का हिस्सा जमीयत के पास जाता है।

और फिर वही जमीयत उस पैसे से उन आतंकियों को कोर्ट में बचाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाती है, जिन्होंने हमारे मंदिरों में बम फोड़े होते हैं! इससे बड़ी शर्म की बात हमारे लिए क्या हो सकती है की हम खुद ही अपने हत्यारों की गोलियों का खर्चा उठा रहे हैं?

ये पैसा पीएफआई (PFI) जैसे प्रतिबंधित संगठनों तक छुप-छुप कर पहुंचाया जाता है ताकि वो केरल से लेकर यूपी तक अपनी ‘गज़वा-ए-हिंद’ की फैक्ट्री चला सकें।

ये लव जिहाद में पकड़े गए मुजरिमों को लीगल सपोर्ट देते हैं। यूपी में जब योगी आदित्यनाथ जी की सरकार ने इस हलाल के खेल पर सर्जिकल स्ट्राइक की और एफआईआर (FIR) दर्ज करवाई, तब जाकर एसटीएफ (STF) की जांच में ये सारे खौफनाक सच सामने आने लगे।

योगी जी ने साफ कह दिया था की यूपी में अब ये हलाल-वलाल की गुंडागर्दी नहीं चलेगी। पर बाकी राज्यों का क्या? वहाँ तो आज भी ये जेहादी वसूली धड़ल्ले से चल रही है।

वामपंथी सिस्टम और दोगले नेताओं की मिलीभगत जो इस आतंकवाद को पाल रहे हैं

जब भी आप इस हलाल जिहाद के खिलाफ आवाज़ उठाएंगे, तो सबसे पहले ये वामपंथी कीड़े, ये लिबरल पत्रकार और टुकड़े-टुकड़े गैंग वाले बिलखते हुए सामने आ जाएंगे।

ये ज्ञान बांटना शुरू कर देंगे की “अरे, भारत एक लोकतांत्रिक देश है। किसी को क्या खाना है, ये उसकी अपनी पर्सनल चॉइस है। आप मुसलमानों की चॉइस को क्यों रोक रहे हैं?”

यहीं पर इनका दोगलापन नंगा हो जाता है। अरे हरामखोरों, कौन सी चॉइस? अगर मुसलमानों को हलाल खाने की चॉइस है, तो हम 100 करोड़ हिंदुओं की भी तो चॉइस है की हम हलाल नहीं खाएंगे?!! हमारी चॉइस का क्या?

आज स्थिति ये है की अगर एक हिंदू अपनी ही हिंदू बहुल बस्ती में झटके के मीट की दुकान खोल ले, या अपने होटल के बाहर लिख दे की “यहाँ सिर्फ हिंदुओं के लिए शुद्ध शाकाहारी खाना मिलता है”, तो यही सेक्युलर गैंग छाती पीटने लगता है। उसे सांप्रदायिक बताकर उस पर एफआईआर (FIR) दर्ज करवा दी जाती है।

लेकिन जब कोई मुस्लिम मौलाना McDonalds और हल्दीराम जैसी कंपनियों की गर्दन पर पैर रखकर उनसे ज़बर्दस्ती हलाल सर्टिफिकेशन करवाता है, तब इन मानवाधिकार वालों के मुंह में दही जम जाता है।

तब इन्हें सेक्युलरिज्म खतरे में नज़र नहीं आता? दरअसल, ये वामपंथी और कुछ गद्दार राजनीतिक पार्टियां इन जेहादियों के बिकाऊ गुलाम बन चुके हैं।

ये सिर्फ मुस्लिम वोटबैंक के लालच में इस इकोनॉमिक जिहाद को पूरी सरकारी सुरक्षा देते आए हैं। कांग्रेस और टीएमसी जैसी सरकारों ने तो बकायदा इन हलाल सर्टिफिकेशन वालों को सरकारी टेंडर तक दिलवाए थे। मतलब चोर भी ये, थानेदार भी ये, और लुटने वाले हम गरीब हिंदू!

अब जागने का वक्त आ गया है हर हिंदू को करना होगा इस हलाल का पूर्ण बहिष्कार

अगर हम आज भी सिर्फ सोशल मीडिया पर रील खिसकाते रहे और ‘क्या फर्क पड़ता है’ वाली बीमारी में फंसे रहे, तो वो दिन दूर नहीं जब ये जिहादी हमें हमारे ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रख देंगे।

ये हलाल सिंडिकेट बिल्कुल उसी इस्लामिक कब्जे की शुरुआत है। ये आपके पैसों से अपनी फौज तैयार कर रहे हैं। तो अब हमें क्या करना है? अब हमें सड़कों पर उतरकर इन कंपनियों की नाक में नकेल डालनी होगी। ये एक आर-पार की लड़ाई है।

आज से और अभी से हर सच्चे हिंदू को ये कसम खानी होगी की वो अपनी मेहनत की कमाई का एक रुपया भी इस ‘हलाल जिहाद’ में नहीं जाने देगा।

जब भी बाज़ार जाएं, बिस्किट, चायपत्ती, नमकीन, या मेकअप का सामान खरीदें- तो पैकेट को घुमाकर चेक करें। अगर उस पर हलाल का निशान है, तो उसे वहीं दुकानदार के मुंह पर मारें और साफ कहें की “हम हिंदुओं का खून पसीना जेहादियों की फंडिंग के लिए नहीं है।”

जब आप किसी रेस्टोरेंट में जाएं, तो वहां के मैनेजर को बुलाकर डंके की चोट पर पूछें कि “तुम झटके का मीट खिलाते हो या हलाल का?” अगर वो हलाल बोले, तो वहीं से अपनी प्लेट छोड़कर उठ जाएं।

उसे बता दें कि अगर हिंदुओं का पैसा चाहिए, तो हमारे हिसाब से चलना होगा। जब 100 करोड़ हिंदू एक साथ मिलकर इस हलाल का आर्थिक बहिष्कार करेंगे ना, तो इन बड़ी-बड़ी कंपनियों और इन मौलवियों की सारी हेकड़ी एक दिन में निकल जाएगी। ये घुटनों के बल रेंगते हुए आकर आपके सामने गिड़गिड़ाएंगे।

ये लड़ाई सिर्फ मांस या बिस्किट की नहीं है; ये हमारे सनातन धर्म, हमारी संप्रभुता और हमारे वजूद की लड़ाई है। हम भारत को सीरिया, या दूसरा पाकिस्तान नहीं बनने देंगे। अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई से हम किसी जेहादी को गोली खरीदने का पैसा नहीं देंगे।

ये हमारी ज़मीन है, हमारा देश है, और यहाँ हमारा नियम चलेगा। जब तक इस हलाल के आतंकवादी नेक्सस को हम ज़मीन में नहीं गाड़ देते, तब तक किसी भी हिंदू को चैन से नहीं बैठना चाहिए।

जय श्री राम!

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