रानी चेन्नम्मा- औरंगजेब का अहंकार मिट्टी में मिलाने वाली कर्नाटक की शेरनी, जब मुगलों की विशाल सेना ने एक ‘हिंदू रानी’ के सामने टेक दिए घुटने

सनातन धर्म की महानता ही कुछ ऐसी है की इसे इस्लामिक आक्रांताओं ने जितनी बार मिटाने की कोशिश की गई, ये उतनी ही ताकत से वापस उठ खड़ा हुआ। 

ये इस पवित्र भूमि का प्रताप ही है की जब-जब इन जिहादी राक्षसों ने जुल्म की सारी हदें पार कीं, तब-तब इस मिट्टी ने एक से बढ़कर एक ऐसे वीर हिन्दू योद्धाओं को जन्म दिया, जिन्होंने इन मुग़लों की छाती को चीर कर धर्म की रक्षा की। 

ये कहानी 17वीं सदी की है। उस वक्त दिल्ली के तख्त पर एक ऐसा धर्मांध और क्रूर जिहादी मुगल बादशाह बैठा था, जिसकी हैवानियत की कोई सीमा नहीं थी- औरंगज़ेब। उसे लगता था की उसकी लाखों की फौज के सामने पूरा हिंदुस्तान घुटने टेक देगा।

और सच भी यही था की मुगलों की खूंखार सेना का नाम सुनते ही अच्छे-अच्छे राजाओं की हवा टाइट हो जाती थी। वो अपने महलों में दुबक कर बैठ जाते थे।

लेकिन इस क्रूर औरंगज़ेब को शायद ये नहीं पता था की मुगलों के अजेय होने का उसका सारा गुरूर दक्षिण भारत के घने जंगलों में बहुत बुरी तरह मिट्टी में मिलने वाला है। 

सनातन धर्म की रक्षा के लिए एक ऐसी हिन्दू शेरनी जन्म ले चुकी थी, जिसने दिल्ली के तख्त पर बैठे उस क्रूर मुगल बादशाह औरंगजेब के ऐसे छक्के छुड़ाए की मुगलों को जान की भीख मांगनी पड़ गई। 

हम बात कर रहे हैं दक्षिण भारत के मल्नाड (कर्नाटक) की वीरांगना महारानी चेन्नम्मा की।

रानी चेन्नम्मा ने जो किया, उसकी अहमियत समझने के लिए आपको पहले उस दौर की तस्वीर अपने दिमाग में बनानी होगी। 17वीं सदी का भारत कोई शांति का दौर नहीं था। 

दिल्ली के सिंहासन पर औरंगजेब बैठा था। अब ये इंसान कोई मामूली बादशाह नहीं था; ये एक ऐसा कट्टर, धर्मांध और जिहादी मानसिकता का शख्स था जिसका बस एक ही खूनी सपना था- पूरे हिंदुस्तान को ‘दारुल-इस्लाम’ (इस्लामिक राष्ट्र) में बदल देना।

काशी विश्वनाथ से लेकर मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि तक- जहाँ-जहाँ इस जिहादी की नज़र पड़ी, तबाही ही तबाही मची। हज़ारों पुराने और पवित्र मंदिर तोड़े गए, और जो भी हिंदू अपने धर्म पर अड़ा रहा, उसका बिना किसी रहम के कत्लेआम कर दिया गया।

जब उत्तर भारत में ये अपनी क्रूरता का नंगा नाच कर चुका, तो इसकी गिद्ध जैसी नज़रें दक्षिण की तरफ घूमीं। इसका सबसे बड़ा कांटा था मराठा साम्राज्य, जिसे साक्षात् छत्रपति शिवाजी महाराज ने खड़ा किया था। 

शिवाजी महाराज के जाने के बाद मराठों की कमान उनके बड़े बेटे छत्रपति संभाजी महाराज के हाथों में थी। संभाजी महाराज ने तो मुगलों को सालों तक नाकों चने चबवा दिए। लेकिन 1689 में संभाजी महाराज मुगलों के हाथ लग गए।

औरंगजेब ने उनके सामने शर्त रखी- “या तो इस्लाम कुबूल कर लो और मराठा साम्राज्य मुगलों को दे दो, या फिर मौत के लिए तैयार रहो।”

पर उस महान हिंदू हृदय सम्राट ने सनातन धर्म छोड़ने से साफ मना कर दिया। उसके बाद जो हुआ, उसे सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। औरंगजेब ने हैवानियत की सारी हदें पार कर दीं। 

संभाजी महाराज की जीभ काट ली गई, उनकी आँखें बड़ी बेरहमी से निकाल ली गईं। हफ्तों तक उन्हें तड़पाया गया, उनके नाखून तक उखाड़ लिए गए। और आख़िर में, उनकी खाल उधेड़कर शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए।

औरंगजेब को लगा था की ये दरिंदगी देखकर बाकी के हिंदू राजा डर के मारे कांप उठेंगे। उसे लगा की मराठों की तो पूरी तरह से कमर ही टूट गई है और अब सब उसके पैरों में गिरकर रहम की भीख मांगेंगे।

औरंगजेब के खौफ से कांपते बाकी हिन्दू राजा और तभी हिन्दू रानी चेन्नम्मा की एंट्री 

लेकिन हुआ एकदम उल्टा। संभाजी महाराज के इस बलिदान ने मराठों के अंदर बदले की वो आग भड़काई जो किसी के बुझाए बुझने वाली नहीं थी। मराठों ने तुरंत संभाजी के छोटे भाई राजाराम को नया छत्रपति घोषित कर दिया। मुगलों की नज़र राजाराम पर भी थी। रायगढ़ के किले पर मुगलों की खूंखार सेना ने घेरा डाल दिया। 

मराठा साम्राज्य को ज़िंदा रखने के लिए ये बहुत ज़रूरी था की राजाराम हर हाल में ज़िंदा रहें। इसलिए, राजाराम ने संन्यासी (जंगम) का भेष बनाया और मुगलों की आँखों में धूल झोंककर अपने कुछ भरोसेमंद लोगों के साथ रायगढ़ से निकल भागे। उनका मकसद था तमिलनाडु के जिंजी किले तक पहुँचना, जो एकदम अभेद्य माना जाता था।

लेकिन रायगढ़ से जिंजी का रास्ता कोई दो-चार किलोमीटर का तो था नहीं। बीच में घने जंगल, पहाड़ और कई रियासतें पड़ती थीं। और सबसे बड़ी मुसीबत ये थी की मुगलों की एक भारी-भरकम फौज खून की प्यासी होकर उनके पीछे पड़ी थी।

राजाराम ने रास्ते में पड़ने वाले दक्षिण के कई छोटे-बड़े हिंदू राजाओं से मदद मांगी। उनसे कहा की बस कुछ दिन की पनाह दे दो, ताकि हम आगे की रणनीति बना सकें। पर सच बताऊं? औरंगजेब का ख़ौफ़ उस वक्त लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा था। इन राजाओं की हवा इतनी टाइट थी की किसी ने भी राजाराम को अपने यहाँ घुसने तक नहीं दिया।

सबको अपनी गद्दी प्यारी थी। उन्हें पता था की राजाराम को शरण देने का मतलब है सीधे तौर पर औरंगजेब की मौत वाली फौज को अपने घर बुलाना। धर्म-वर्म सब ताक पर रखकर ये राजा कायरों की तरह अपने महलों में दुबक गए।

दर-दर भटकते हुए, थके-हारे राजाराम आख़िरकार कर्नाटक के मल्नाड इलाके में पहुँचे। ये इलाका केलड़ी रियासत का हिस्सा था, जहाँ राज कर रही थीं महारानी चेन्नम्मा। राजाराम ने अपना एक गुप्त संदेशा रानी तक भिजवाया और उनसे मदद की गुहार लगाई।

जब ये ख़बर केलड़ी के दरबार में पहुँची, तो पूरे महल में जैसे सन्नाटा छा गया। मंत्रियों और सेनापतियों की सांसें अटक गईं। रानी ने तुरंत एक गुप्त मीटिंग बुलाई।

दरबार के सारे पुराने और तज़ुर्बेकार मंत्रियों ने एक सुर में कहा, “महारानी, ऐसा अनर्थ मत कीजिएगा! मुगलों की फौज लाखों में है। उनके पास तोपें हैं, बारूद है। हम एक छोटा सा राज्य हैं। अगर हमने राजाराम को यहाँ पनाह दी, तो औरंगजेब हमारे राज्य की ईंट से ईंट बजा देगा। केलड़ी श्मशान बन जाएगा।”

कोई भी आम शासक होता तो शायद डर कर मना कर देता। पर रानी चेन्नम्मा तो किसी और ही मिट्टी की बनी थीं। उन्होंने भरे दरबार में जो जवाब दिया, वो हर हिंदू को आज अपने दिल में उतार लेना चाहिए।

रानी ने गरजते हुए कहा, “शरणागत की रक्षा करना सनातन धर्म में हमारा सबसे बड़ा राजधर्म है। राजाराम कोई आम मुसाफ़िर नहीं हैं, वो उस मराठा साम्राज्य की इकलौती उम्मीद हैं जो पूरे देश में हिंदू धर्म को बचाने के लिए मुगलों से लड़ रहा है।”

“अगर आज डर के मारे हमने एक शरणागत को बाहर निकाल दिया, तो आने वाला इतिहास हमारे मुँह पर थूकेगा। जान जाती है तो जाए, राज्य मिटता है तो मिट जाए, लेकिन केलड़ी का स्वाभिमान और हमारा क्षात्र धर्म किसी भी कीमत पर झुकेगा नहीं।”

और बस, फैसला हो गया। रानी ने अपनी और अपने राज्य की परवाह किए बिना, पूरे राजसी सम्मान के साथ छत्रपति राजाराम को अपने यहाँ पनाह दे दी। ये सिर्फ एक कूटनीतिक फैसला नहीं था; ये दिल्ली के तख्त पर बैठे उस अजेय माने जाने वाले जिहादी औरंगजेब को एक खुली और सीधी चुनौती थी।

रानी चेन्नम्मा- एक साधारण हिन्दू कन्या जो मुगलों के लिए साक्षात काल बन गई 

अब बात करते हैं की आख़िर रानी चेन्नम्मा थीं कौन। वैसे, आपको लग रहा होगा की वो बचपन से ही महलों में पली-बढ़ी किसी बड़े शाही खानदान की बेटी रही होंगी। जी नहीं, बिल्कुल नहीं। यही तो सनातन धर्म की ख़ूबसूरती है की यहाँ जन्म से ज़्यादा कर्म और योग्यता की कद्र होती है।

चेन्नम्मा कुंडापुर के एक बहुत ही साधारण व्यापारी सिद्धप्पा शेट्टी की बेटी थीं। बचपन से ही वो गज़ब की तेज़-तर्रार, सुंदर और निडर थीं। एक दिन केलड़ी के राजा सोमशेखर नायक कुंडापुर के किसी मंदिर के उत्सव या मेले में गए हुए थे।

वहीं उनकी नज़र चेन्नम्मा पर पड़ी और वो उनकी बुद्धिमानी देखकर इतने प्रभावित हुए की अपना दिल हार बैठे। समाज के सारे बंधनों और ऊंच-नीच को किनारे रखकर 1667 में राजा ने उनसे शादी कर ली और चेन्नम्मा बन गईं केलड़ी की महारानी।

लेकिन रानी की ज़िंदगी में सुकून नाम की कोई चीज़ ज़्यादा दिन तक टिक नहीं पाई। शादी के कुछ ही सालों बाद, राजा सोमशेखर के बर्ताव में अजीब से बदलाव आने लगे। वो हिंसक हो गए, जैसे पागलपन के दौरे पड़ने लगे हों। दाल में कुछ काला था।

दरअसल, राज्य के ही एक गद्दार मंत्री भरमा माहुता ने सत्ता हथियाने के लालच में राजा को कोई ज़हरीली जड़ी-बूटी खिला दी थी। इसी साज़िश के चलते 1677 में राजा की बेरहमी से हत्या कर दी गई।

सोचिए उस वक्त रानी पर क्या गुज़री होगी? अपना कोई बच्चा था नहीं, पति को मार डाला गया, और राज्य के अंदर बैठे गद्दार गिद्धों की तरह सिंहासन पर कब्ज़ा करने के लिए मंडरा रहे थे। वहीं दूसरी तरफ बीजापुर के इस्लामी सुल्तान भी मौके का फायदा उठाकर केलड़ी पर हमला करने की फिराक में थे। सबको लगा की एक अकेली औरत क्या ही उखाड़ लेगी, हार मान कर बैठ जाएगी।

पर गद्दारों ने बहुत बड़ी गलतफहमी पाल रखी थी। रानी ने जो रौद्र रूप दिखाया, गद्दारों की रूह कांप गई। अपने एक बेहद वफादार सेनापति तिमन्ना नायक की मदद से रानी ने अपनी सेना खड़ी की। 

उन्होंने चुन-चुन कर हर एक गद्दार और साज़िशकर्ता को मौत के घाट उतार दिया। एकदम निर्ममता से। राज्य में विद्रोह को कुचल कर उन्होंने एक रिश्तेदार के बेटे बसवप्पा नायक को गोद लिया और खुद पूरी सत्ता अपने हाथों में ले ली।

राजाराम के आने से पहले ही वो बीजापुर के सुल्तानों और मैसूर के वोडेयार शासकों के हमलों को धूल चटा चुकी थीं। मतलब, वो कोई नौसिखिया नहीं थीं, बल्कि युद्ध और कूटनीति की पक्की खिलाड़ी बन चुकी थीं।

एक हिन्दू रानी से खुली चुनौती पाकर तिलमिला उठा था धर्मांध जिहादी औरंगज़ेब 

ख़ैर, वापस लौटते हैं राजाराम वाले मुद्दे पर। जब औरंगजेब के जासूसों ने उसे जाकर ये ख़बर दी की दक्षिण की एक छोटी सी रियासत की ‘हिंदू औरत’ ने राजाराम को पनाह दे दी है, तो उसका खून खौल उठा।

औरंगजेब खुद को ‘आलमगीर’ (दुनिया जीतने वाला) कहता था। उसका घमंड सांतवें आसमान पर था। एक कट्टर जिहादी मानसिकता वाले इंसान के लिए, जो औरतों को महज़ ‘हरम’ की चीज़ या दोयम दर्जे का मानता हो, ये हज़म करना नामुमकिन था की एक “काफिर औरत” उसके शाही फरमानों को जूते की नोक पर रख दे!

गुस्से में पागल होकर उसने तुरंत अपने सबसे खूंखार और पुराने सेनापतियों- जान निसार खान और अज़मत आरा- को बुलाया। एक विशाल, हथियारों और तोपों से लदी मुगल सेना को केलड़ी की तरफ रवाना कर दिया गया।

मुगल सेनापतियों का घमंड भी देखने लायक था। उन्हें लगा की ये तो बच्चों का खेल है। वो मानकर चल रहे थे की एक औरत की अगुवाई वाली छोटी सी सेना उनकी भारी-भरकम तोपों और खूंखार घुड़सवारों के सामने एक-दो दिन भी नहीं टिक पाएगी। 

उनका तो पूरा प्लान ही यही था की जाएंगे, केलड़ी को गाजर-मूली की तरह काटेंगे, किलों को मलबे में बदल देंगे और रानी चेन्नम्मा व राजाराम को ज़ंजीरों में बांधकर औरंगजेब के पैरों में डाल देंगे। इसी बेवकूफी भरे घमंड के साथ वो मौत की आंधी की तरह केलड़ी की सीमाओं में घुसने लगे।

जंगलों में खुदी मुगलों की कब्रें, हिन्दू योद्धाओं ने औरंगज़ेब की सेना को गाजर-मूली की तरह काटा 

लेकिन असली पिक्चर तो अभी बाकी थी! मुगलों का सामना खुले मैदान में किसी आम सेना से नहीं, बल्कि पश्चिमी घाट (मल्नाड) के उन भयानक, दुर्गम और घने जंगलों से होने वाला था, जहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता।

रानी चेन्नम्मा बहुत शातिर रणनीतिकार थीं। वो ये बात अच्छे से जानती थीं की आमने-सामने की लड़ाई में मुगलों के भारी तोपखानों का मुकाबला करना अक्लमंदी नहीं है।

इसलिए उन्होंने अपनी पूरी सेना को खुले मैदान से हटा लिया और जंगलों की गहराइयों में तैनात कर दिया। मुगलों को लगा की हिंदू डर कर भाग गए हैं। इसी गफलत में वो अपनी बड़ी-बड़ी तोपें और हज़ारों सैनिक लेकर जैसे ही उन जंगलों और पहाड़ियों में घुसे… बस, बुरी तरह फंस गए।

केलड़ी के वीरों ने ऐसा भयानक छापामार (Guerrilla) युद्ध शुरू किया की मुगलों के पसीने छूट गए। पेड़ की हर डाल से, हर झाड़ी के पीछे से अचानक तीर बरसने लगते- वो भी ज़हरीले।

रात के अंधेरे में रानी के सैनिक मुगलों के तंबुओं पर टूट पड़ते, उनकी रसद (खाने-पीने का सामान) लूट लेते, हथियारों में आग लगा देते और इससे पहले की मुगल संभल पाते, वो वापस जंगलों में ग़ायब हो जाते। 

मुगल इस अदृश्य दुश्मन से लड़ते-लड़ते पागल होने लगे। उनके भारी तोपखाने उन उबड़-खाबड़ रास्तों पर किसी काम के नहीं रहे।

और इसी बीच, मुगलों के ताबूत में आख़िरी कील ठोकने आ गया- कर्नाटक का भयंकर मानसून।

मूसलाधार बारिश ने मुगलों के शिविरों को साक्षात् नर्क बना दिया। लगातार बारिश से मुगलों की बंदूकें गीली हो गईं, उनका बारूद बेकार हो गया और हथियारों में जंग लगने लगा। जो घोड़े और हाथी वो बड़ी शान से लेकर आए थे, वो कीचड़ में धंस-धंस कर मरने लगे।

ऊपर से जंगल के मच्छर-वच्छर, ज़हरीले कीड़े और जोंक मुगलों का खून पीने लगे। मुगलों के कैंप में हैजा और मलेरिया जैसी भयंकर महामारियां फैल गईं।

हालत ये हो गई की मुगल सैनिक तलवार से कम और बीमारी व भुखमरी से तड़प-तड़प कर ज़्यादा मरने लगे। जान निसार खान बेबस होकर अपनी पूरी सेना को कीड़े-मकौड़ों की तरह मरते देख रहा था।

और सबसे मज़ेदार बात क्या थी? जिस वक्त मुगल उस जंगल में अपनी जान बचाने के लिए रो-गिड़गिड़ा रहे थे, ठीक उसी वक्त रानी चेन्नम्मा की अचूक प्लानिंग के तहत, केलड़ी के सैनिकों ने छत्रपति राजाराम को एक गुप्त और सुरक्षित रास्ते से निकाल कर जिंजी के किले तक पहुँचा दिया था। मुगलों ने जिसके लिए ये पूरी नौटंकी रची थी, वो तो कब का उनके हाथ से निकल चुका था!

अपनी जान की भीख मांगते हुए हिन्दू रानी चेन्नम्मा के पैरों में गिरे औरंगज़ेब के खूंखार मुगल 

एक-एक दिन मुगलों पर भारी पड़ रहा था। जान निसार खान की आधी फौज तो वैसे ही खप चुकी थी, और जो बचे थे वो भूख और बीमारी से ऐसे बेहाल थे की उन्होंने हथियार उठाने से ही मना कर दिया।

मुगलों की हवा पूरी तरह निकल चुकी थी। सेनापति को समझ आ गया था की अगर एक-दो दिन और यहाँ रुके, तो एक भी मुगल ज़िंदा दिल्ली वापस नहीं जाएगा।

और फिर इतिहास में वो हुआ, जिसकी औरंगजेब ने कभी सपने में भी कल्पना नहीं की होगी। जो मुगल पूरे हिंदुस्तान को अपनी जागीर समझते थे, जिन्हें लगता था की उन्हें कोई हरा नहीं सकता, उन खूंखार मुगल सेनापतियों ने गिड़गिड़ाते हुए रानी चेन्नम्मा के सामने आत्मसमर्पण का झंडा उठा लिया।

ज़रा सोचिए इस मंज़र को! वो मुगल सेनापति अपनी जान की भीख मांगते हुए एक ‘हिंदू रानी’ के दरबार में संधि का प्रस्ताव भेज रहे थे। रानी चेन्नम्मा, जो धर्म और न्याय की साक्षात् मूर्ति थीं, उन्होंने बेवजह खून-खराबा न करते हुए मुगलों को अपनी शर्तों पर जीवनदान दिया। मुगलों को राजाराम का पीछा छोड़ना पड़ा और केलड़ी की आज़ादी को मानना पड़ा।

एक अकेली हिंदू शेरनी ने उस वक्त की सबसे बड़ी जिहादी सैन्य शक्ति की ऐसी दुर्गति की थी की औरंगजेब का सारा गुरूर मिट्टी में मिल गया। ये उन वामपंथी इतिहासकारों के मुँह पर एक बहुत बड़ा तमाचा है जो दिन-रात मुगलों की अजेयता के कसीदे पढ़ते नहीं थकते। मुगलों को उनकी असली औकात एक हिंदू औरत ने दिखा दी थी।

जहाँ मुगलों ने मंदिर तोड़े वहीं रानी चेन्नम्मा ने खड़ा किया शक्तिशाली और समृद्ध हिन्दू साम्राज्य 

अब ये तो हो गई लड़ाई-झगड़े की बात। पर महारानी चेन्नम्मा का रुतबा सिर्फ जंग के मैदान तक सीमित नहीं था। राज-काज चलाने में भी उनका कोई सानी नहीं था। उनका 25 साल (1672-1697) का शासनकाल केलड़ी का स्वर्ण युग माना जाता है।

वो एक पक्की शिवभक्त और निष्ठावान लिंगायत थीं। जहाँ उत्तर भारत में औरंगजेब अपनी सनक में मंदिर-वंदिर तुड़वा रहा था, वहीं दक्षिण में रानी चेन्नम्मा सनातन धर्म की जड़ों को और मज़बूत कर रही थीं।

उन्होंने आदिशंकराचार्य द्वारा स्थापित श्रृंगेरी अद्वैत मठ को दिल खोलकर ज़मीन और पैसा दान किया, ताकि वहां वैदिक पढ़ाई और पूजा-पाठ बिना किसी रुकावट के चलता रहे। कोल्लूर के मुकाम्बिका मंदिर जैसे कई प्राचीन मंदिरों का उन्होंने जीर्णोद्धार करवाया।

अर्थव्यवस्था के मामले में भी उनका दिमाग खूब चलता था। वो जानती थीं की एक मज़बूत हिंदू राष्ट्र के लिए खज़ाने का भरा होना बहुत ज़रूरी है। पुर्तगालियों के साथ उन्होंने ऐसे शानदार व्यापारिक समझौते किए की राज्य मालामाल हो गया।

यहाँ से काली मिर्च और चावल बड़े पैमाने पर बाहर भेजा जाता था। पुर्तगाली व्यापारी उनकी कूटनीति से इतने प्रभावित थे की वो बेहद इज़्ज़त के साथ रानी को ‘रैना दा पिमेंटा’ (मिर्च की रानी) कहकर बुलाते थे।

किसानों के लिए भी उन्होंने कमाल के काम किए। खेती बढ़ाने के लिए जंगलों को साफ करवाया और जो किसान नई ज़मीन पर खेती करते, उनके लिए टैक्स-वैक्स एकदम माफ़ कर दिए। उन्होंने अपनी एक मज़बूत नौसेना भी बनाई जो अरब सागर में हिंदू व्यापारियों के जहाजों की रक्षा करती थी। कुल मिलाकर कहें तो उनका शासन एक दम आदर्श रामराज्य था।

महारानी चेन्नम्मा का जीवन हमें सिखाता है की दुश्मन चाहे कितना भी ताकतवर क्यों न हो, फौज चाहे लाखों की हो, अगर शासक के दिल में सनातन धर्म की रक्षा का जज़्बा हो और क्षात्र धर्म पर टिके रहने की हिम्मत हो, तो पूरी की पूरी मुगलिया सल्तनत को भी धूल चटाई जा सकती है।

रानी चेन्नम्मा का वो संदेश- “प्राण जाएं पर धर्म न जाए”- आज हर एक हिंदू के रोम-रोम में गूंजना चाहिए।

यही वो इतिहास है जो हमारी पीढ़ियों को ये बताएगा की हम उन शूरवीरों के वंशज हैं जिन्होंने मुगलों के घमंड को अपने पैरों तले रौंदा था।

जय भवानी! जय शिवाजी! जय केलड़ी चेन्नम्मा!

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