दुनिया के नक्शे पर भारत इकलौता ऐसा अद्भुत देश बन चुका है, जहां ‘विघ्नहर्ता’ को ही विघ्नों का सामना करना पड़ रहा है।
जिस भगवान गणेश की पूजा किसी भी शुभ काम से पहले की जाती है, जो पूरे ब्रह्मांड के प्रथम पूज्य हैं, उन्हें आज अपनी ही ज़मीन पर, अपनी ही सड़कों से गुज़रने के लिए पुलिस और प्रशासन से ‘वीज़ा’ और ‘परमिशन’ लेनी पड़ रही है!
सुनने में कितना अजीब लगता है ना? लेकिन कर्नाटक में आजकल बिल्कुल यही नौटंकी चल रही है।
हाल ही में कर्नाटक में जो कुछ भी हुआ, उसने इस देश के ‘सेक्युलरिज्म’ के ढोल की पोल खोल कर रख दी है। सड़कों पर किसका हक़ है और किसका नहीं, ये अब देश का कानून या ट्रैफिक पुलिस नहीं, बल्कि इस बात से तय हो रहा है की रास्ते में मस्जिद है या नहीं!
ये सिर्फ गणपति की शोभा यात्रा का रूट बदलने का मामूली विवाद नहीं है, बल्कि यह बहुसंख्यक हिंदू समाज को एक बहुत ही सलीके से यह बताने की साज़िश है की अब तुम्हारी आस्था को भी हमारे खींचे हुए बैरिकेड्स के अंदर ही सांस लेनी पड़ेगी।
Mysuru, Karnataka: A Ganeshotsav Shobha Yatra in T. Narasipura entered Link Road, where Masjid-e-Noor is located. The procession followed despite an earlier warning by Inspector Dhananjay. Over 100 KSRP personnel were deployed near the mosque, with police vehicles positioned… pic.twitter.com/f3WfHfRsXP
— IANS (@ians_india) September 18, 2026
मैसूर में गणपति का जुलूस निकाल रहे थे हिन्दू युवा, लेकिन प्रशासन ने डरा-धमका कर कहा की मस्जिद के सामने से तुम्हे नहीं गुजरने देंगे
अब ज़रा ग्राउंड रियलिटी पर आते हैं की आखिर ये बवाल शुरू कहाँ से हुआ। बात है मैसूर ज़िले के टी. नरसीपुरा (T. Narasipura) की।
कुछ दिन पहले यहाँ के हिंदू युवा और ‘हिंदू जागरण वेदिके’ के कार्यकर्ता शांति से, अपनी पूरी श्रद्धा के साथ गणपति विसर्जन की शोभा यात्रा निकाल रहे थे।
कोई दंगा नहीं, कोई फसाद नहीं। लेकिन अचानक वहाँ पुलिस की एंट्री होती है और जो ड्रामा शुरू होता है, वो किसी को भी सोचने पर मजबूर कर दे।
वहाँ के पुलिस इंस्पेक्टर धनंजय खाकी वर्दी के रौब में खुलेआम हिंदू आयोजकों को धमकाते हुए कहते हैं –
“मस्जिद के सामने से जुलूस बिल्कुल नहीं जाएगा, और वहां कोई पटाखे नहीं फोड़ेगा। अगर किसी ने ऐसा किया, तो मैं उसे ठीक कर दूंगा (I will deal with it).”
मतलब हद है! ये पुलिस का फरमान था या किसी इलाके के डॉन की धमकी? यहाँ एक बहुत ही तार्किक और सीधा सा सवाल खड़ा होता है- क्या पब्लिक रोड (सार्वजनिक सड़क) किसी एक समुदाय या किसी धर्म विशेष की प्राइवेट प्रॉपर्टी है?
क्या सड़कों की रजिस्ट्री अब मस्जिदों के नाम पर होने लगी है? अगर भारत का संविधान हर नागरिक को सड़क पर चलने का बराबर अधिकार देता है, तो एक मस्जिद का बोर्ड ये कैसे तय कर सकता है की उस सड़क से कौन गुज़रेगा और कौन नहीं?
जब इस गुंडागर्दी का वीडियो वायरल हुआ, तो विपक्ष और हिंदू संगठनों का खून खौलना ही था। मैसूर के सांसद यदुवीर वाडियार, पूर्व सांसद प्रताप सिम्हा और आर. अशोक जैसे नेता सीधे मैदान में उतर आए।
जब हिंदू कार्यकर्ताओं ने पुलिस के इस एकतरफा फरमान को मानने से साफ़ इंकार कर दिया और अपनी जिद्द पर अड़ गए की यात्रा तो उसी पारंपरिक रास्ते से जाएगी, तब जाकर पुलिस बैकफुट पर आई।
लेकिन कमाल की बात तो ये देखिए, जुलूस निकलने के बाद पुलिस ने अपनी भड़ास निकालने के लिए प्रताप सिम्हा और कई हिंदू कार्यकर्ताओं पर ही एफआईआर (FIR) ठोक दी!
मतलब अगर आप अपने भगवान को सार्वजनिक रास्ते से लेकर जाएंगे, तो कर्नाटक में आप क्रिमिनल बन जाएंगे।
भटकल और नागमंगला में गणेश यात्रा पर जमकर हुआ पथराव, लेकिन दंगाइयों पर एक्शन लेने के बजाय कर्नाटक सरकार बदल रही बप्पा का रूट
ये कोई मैसूर की इकलौती घटना नहीं थी। कर्नाटक में अब ये एक सेट पैटर्न बन चुका है। पुलिस का तर्क होता है की “मस्जिद के पास से जाओगे तो दंगा हो जाएगा, इसलिए तुम ही अपना रास्ता बदल लो।” वाह रे सिस्टम!
अभी 16 सितंबर 2026 की ही बात ले लीजिए। उत्तर कन्नड़ ज़िले के भटकल में जब ‘तलनदा सार्वजनिक गणेशोत्सव समिति’ की यात्रा शांतिपूर्वक इस्माइल सुन्नी जामा मस्जिद और एक मदरसे के पास से गुज़र रही थी, तो अचानक क्या हुआ?
छतों से जुलूस के ऊपर भयंकर पथराव शुरू हो गया! इसी तरह पिछले साल मांड्या के नागमंगला में भी बिल्कुल यही स्क्रिप्ट दोहराई गई थी। जब वहां मस्जिद के पास से गणेश जुलूस गुज़रा, तो अचानक उस पर पेट्रोल बम फेंके गए और आस-पास की दुकानें जला दी गईं।
अब ज़रा यहाँ प्रशासन का न्याय देखिए। दंगा कौन कर रहा है? छतों पर पत्थर कौन जमा कर रहा है? पेट्रोल बम कौन फेंक रहा है? ये सब शीशे की तरह साफ है!
लेकिन कर्नाटक का महान और सेक्युलर सिस्टम सज़ा किसको देता है? सज़ा मिलती है उस बेचारे हिंदू श्रद्धालु को!
सरकार उपद्रवियों और पत्थरबाज़ों के घरों पर बुलडोज़र चलाने या उन पर सख्त एक्शन लेने के बजाय, एक बहुत ही ‘आसान’ शॉर्टकट निकाल लेती है- “अरे भाई, हिंदू तो सीधे-सादे होते हैं, इन्हीं का रूट बदल दो। ना ये मस्जिद के पास जाएंगे, ना पत्थरबाज़ों को तकलीफ होगी!”
इसे मनोविज्ञान की भाषा में ‘विक्टिम ब्लेमिंग’ (Victim Blaming) कहते हैं। गलती तुम्हारी है की तुम उस रास्ते से गए जहाँ उन्हें तुम्हारी शक्ल पसंद नहीं आई!
ये तुष्टिकरण नहीं तो और क्या है दोस्त? पत्थरबाज़ों को खुली छूट और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आस्था मनाने वालों पर पाबंदी!
पूर्व उपमुख्यमंत्री का तीखा सवाल- 3000 साल पुरानी सनातन परंपरा, फिर क्यों 300 साल पहले मस्जिद के नाम पर गणपति उत्सव पर लगाए जा रहे पहरे

इस पूरे ड्रामे के बीच कर्नाटक के पूर्व उपमुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता आर. अशोक ने एक ऐसा चुभता हुआ सवाल दागा है, जिसका जवाब ना तो कांग्रेस सरकार के पास है और ना ही उनके पुलिस प्रशासन के पास।
उन्होंने सड़कों पर उतरकर डंके की चोट पर पूछा-
“क्या हम भारत में हैं या पाकिस्तान में? गणपति की पूजा इस देश में 3000 साल से हो रही है। और मस्जिदें 300 साल पहले बनी हैं। देश की सड़कें सबकी हैं, तो फिर ये कौन तय कर रहा है की गणेश जुलूस मस्जिद के सामने से नहीं जाएगा?”
आर. अशोक का ये सवाल सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि ये हर उस आम सनातनी के दिल की भड़ास है जो आज अपनी ही सड़कों पर खुद को बेगाना महसूस कर रहा है।
अगर सरकार ये नियम बनाती है की मस्जिद के सामने से गणेश जुलूस नहीं जाएगा, तो क्या कांग्रेस सरकार में इतनी हिम्मत है की वो ये भी क़ानून पास कर दे की किसी हिंदू मंदिर के सामने से मुहर्रम का जुलूस नहीं निकलेगा?
नहीं करेंगे! क्योंकि वहाँ इनका सेक्युलरिज्म वाला सॉफ्टवेयर क्रैश कर जाएगा।
चुनाव आते ही मंदिरों में पहुँच जाते नेता, लेकिन सत्ता मिलते ही मुस्लिम समुदाय को खुश करने के लिए क्यों रोक दी जाती शोभा यात्रा
कर्नाटक के इस ‘सेक्युलरिज्म’ का मॉडल ही एकदम गज़ब है! लगता है जैसे इनके सिस्टम में कोई ऐसा खास ‘सेक्युलर GPS’ फिट कर दिया गया है, जो किसी भी हिंदू यात्रा के दौरान मस्जिद आते ही ऑटोमैटिक लाल हो जाता है और सायरन बजाने लगता है।
ज़रा इन राजनेताओं के दोगलेपन की क्रोनोलॉजी समझिए। जब चुनाव सर पर होते हैं, तो यही नेता अपनी सफेद खादी के ऊपर बाकायदा जनेऊ पहनकर, माथे पर बड़ा सा चंदन का टीका लगाकर मंदिरों के चक्कर काटते नज़र आते हैं।
उस वक़्त इन्हें कैमरे के सामने ‘चुनावी हिंदू’ बनने में बड़ा मज़ा आता है। लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म, सत्ता हाथ में आई, वैसे ही इनके भीतर का वो ‘खास भाईचारा’ जाग उठता है।
अचानक से राज्य का लॉ एंड ऑर्डर इतना कमज़ोर और नाज़ुक हो जाता है की ढोल-नगाड़ों की आवाज़ से उसे खतरा महसूस होने लगता है।
बप्पा की शोभा यात्रा निकलेगी, लेकिन कहाँ से निकलेगी, कब निकलेगी, कितने डेसिबल पर बाजा बजेगा… ये सब वो लोग तय करेंगे जिन्हें इस देश की सनातन संस्कृति से ही चिढ़ है।
इसे सेक्युलरिज्म नहीं कहते मेरे भाई, इसे कहते हैं तुष्टिकरण, जो आज कर्नाटक की सड़कों पर खुलेआम खेला जा रहा है।
मुहर्रम और दूसरे जुलूसों को सड़कों पर मिलती है पूरी छूट, लेकिन गणेश विसर्जन आते ही मस्जिद के बाहर क्यों लगा दिए जाते बैरिकेड्स
सच-सच बताइएगा, क्या आपने भारत के इतिहास में कभी कोई ऐसी ख़बर पढ़ी है की किसी मुहर्रम के जुलूस का, या ताजिये का रास्ता इसलिए बदल दिया गया हो क्योंकि रास्ते में कोई बहुत बड़ा हिंदू मंदिर आ रहा था?
या पुलिस ने कभी किसी समुदाय विशेष के लोगों को धमकाया हो की “मंदिर के सामने से तुम्हारा जुलूस नहीं निकलेगा, वरना मैं तुम्हें ठीक कर दूंगा”?
नहीं ना! आपने ऐसा कभी नहीं सुना होगा। और वो इसलिए क्योंकि हिंदू समाज सहिष्णु है। जब मुहर्रम का जुलूस या कोई और धार्मिक यात्रा किसी मंदिर के सामने से निकलती है, तो मंदिर की छतों से कभी ईंट-पत्थर नहीं बरसते। कोई पेट्रोल बम नहीं फेंकता।
हिंदू समाज या तो शांति से अपने काम में लगा रहता है, या फिर प्यासे जुलूस वालों को पानी पिलाने का इंतज़ाम कर देता है।
लेकिन दिक्कत कहाँ आती है? दिक्कत तब आती है जब साल में सिर्फ एक बार, 10 मिनट के लिए गणपति बप्पा की शोभा यात्रा ढोल-नगाड़ों के साथ किसी मस्जिद के सामने से गुज़रती है।
अचानक से उस 10 मिनट के बाजे में कुछ कट्टरपंथियों और इन सो-कॉल्ड लिबरलों का ‘ईमान’ खतरे में आ जाता है। उन्हें उस आवाज़ से चिढ़ होने लगती है।
और उससे भी बड़ी त्रासदी ये है की राज्य की सरकार उन्हें समझाने या उन पर लगाम कसने के बजाय, उल्टे हिंदुओं को ही ज्ञान देने लगती है की “अरे भाई, तुम बाजा बंद कर लो, तुम रास्ता बदल लो।”
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार की सरकार पर आज जो सवाल उठ रहे हैं, वो बिल्कुल जायज़ हैं।
क्या यही आपका न्याय है? एक समुदाय की सड़कों पर मनमानी को आप ‘अधिकार’ कहते हैं और दूसरे समुदाय के त्योहार को आप ‘लॉ एंड ऑर्डर’ के लिए खतरा बता देते हैं!
ये कोई कानून-व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश नहीं है, ये सीधे-सीधे पुलिस की वर्दी का इस्तेमाल करके अपने खास ‘वोटबैंक’ की पहरेदारी की जा रही है।
आज रास्ता बदलने को कहा है, कल को घर के अंदर ही त्यौहार मनाने को कहेंगे
वैसे बात सिर्फ एक रूट बदलने या एक शोभा यात्रा की नहीं है। इसे बहुत ध्यान से समझिएगा। अंग्रेज़ी में एक कहावत है ‘The Slippery Slope’ (यानी एक बार आप फिसले, तो फिर रसातल में ही जाकर रुकेंगे)।
अगर आज हिंदू समाज ने घुटने टेक दिए और मस्जिद के डर से बप्पा का रास्ता बदल लिया, तो ये कोई आख़िरी समझौता नहीं होगा।
वो दिन दूर नहीं जब फरमान आएगा की “मस्जिद के 2 किलोमीटर के दायरे में शंख मत बजाओ, आरती की आवाज़ बाहर नहीं आनी चाहिए, और अपने त्योहार घरों के अंदर ही मनाओ।”
अगर आप एक बार पीछे हटेंगे, तो ये आपको दीवार तक धकेल देंगे।
भारत एक संवैधानिक और लोकतांत्रिक देश है, कोई इस्लामिक स्टेट नहीं जहाँ की सड़कें किसी शरिया कानून से तय होंगी।
जो संविधान हर नागरिक को अपनी आस्था का पालन करने की पूरी आज़ादी देता है, उस संविधान का मज़ाक उड़ाने की इजाज़त किसी भी सरकार या पुलिस अफसर को नहीं दी जा सकती।
गणेश उत्सव कोई सरकारी मोहताज कार्यक्रम नहीं है, ये इस देश की आत्मा है। और आत्मा पर पहरा लगाने की कोशिश जिसने भी की है, इतिहास गवाह है कि उसे हमेशा मुंह की खानी पड़ी है।
