सच को चाहे सौ गज़ ज़मीन के नीचे दफना दो, वो एक न एक दिन अपनी पूरी ताकत के साथ सीना चीर कर बाहर आ ही जाता है। इस्लामिक इतिहासकारों और सेक्युलरिज्म का झुनझुना बजाने वालों ने तो अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
उन्होंने पूरी ताकत लगा दी की मध्य प्रदेश के धार में स्थित हमारी पवित्र भोजशाला का असली सच कभी दुनिया के सामने न आ पाए।
दशकों तक हमारे ही देश में, हमारी ही छाती पर मूंग दलते हुए हमें यह पट्टी पढ़ाई गई की ये तो ‘कमाल मौला दरगाह’ है। ज़रा इनकी मक्कारी देखिए! जिस ढांचे की एक-एक ईंट, एक-एक पत्थर और खंभे अपने हिंदू होने की गवाही दे रहे हों, उस पर कट्टरपंथी इस्लामी गुट अपना मालिकाना हक जताते रहे। लेकिन अब इन मुंगेरीलाल के हसीन सपनों पर हमेशा के लिए पानी फिर गया है।
हाल ही में, मई 2026 में मध्य प्रदेश सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इंदौर हाईकोर्ट के सामने जो बेबाक हलफनामा ठोका है, उसने इन जिहादी दावों की बखिया उधेड़ कर रख दी है।
सरकार ने अदालत के मुंह पर सच्चाई का वो दस्तावेज़ मारा है जिसमें साफ लिखा है की ये जगह ऐतिहासिक रूप से परमार वंश के प्रतापी राजा भोज का महान विद्यापीठ और साक्षात माँ सरस्वती का मंदिर था। मस्जिद तो ये कभी थी ही नहीं!
ये लोग जो आज कोर्ट में छाती पीट रहे हैं, ये उसी चरमपंथी इस्लामी मानसिकता का हिस्सा हैं जिनका एक ही एजेंडा रहा है- काफिरों के मंदिरों को तोड़ो और उनके मलबे पर अपना कब्ज़ा जमा लो। लेकिन आज का हिंदू जाग चुका है। अब हमारे देवस्थानों को हाईजैक करने का ये गंदा खेल और नहीं चलेगा।
राजा भोज के सरस्वती मंदिर का वो स्वर्णिम इतिहास जिसे इस्लामी दीमकों ने मिटाने की कोशिश की
अब थोड़ा इतिहास में चलते हैं। जब भी भारत के गौरव की बात आती है, तो राजा भोज (1010–1055 ईस्वी) का नाम सबसे ऊपर आता है। राजा भोज का वो राजकाज, जहां ज्ञान और शौर्य दोनों की पूजा होती थी।
धार नगरी की वो ‘भोजशाला’ कोई आम ईंट-गारे की इमारत नहीं थी। वो साक्षात माँ सरस्वती का भव्य और दिव्य धाम था। एक ऐसा विशाल संस्कृत विद्यापीठ था जहां पूरे विश्व से लोग वेद-पुराण, खगोल विज्ञान, योग और दर्शन पढ़ने आते थे।
जब दुनिया के बहुत से हिस्सों में लोग जंगलों में भटक रहे थे, तब हमारे पुरखों ने मजबूत बेसाल्ट पत्थरों से नागर और मारू-गुर्जर शैली में इतना भव्य आर्किटेक्चर खड़ा कर दिया था की देखने वालों की आंखें फटी रह जाएं। ये हमारी बौद्धिक राजधानी थी, हमारा गर्व था।
लेकिन हमारे इस्लामी इतिहासकारों की तो जैसे सनातन धर्म से कोई जन्म-जन्मांतर की दुश्मनी रही है। ये दीमक की तरह हमारे इतिहास को चाट गए। इन्होंने एक सोची-समझी साजिश के तहत हमारी किताबों से ये सब गायब कर दिया ताकि हिंदू समाज अपने ही स्वर्णिम अतीत को भूल जाए और हमेशा हीन भावना में जिए।
पर वो ये भूल गए की पत्थरों पर उकेरी गई संस्कृत की ऋचाएं, वो श्लोक और वहां की मिट्टी में बसी सनातन ऊर्जा को मिटाना किसी जिहादी आक्रांता या उसके आज के पैरोकारों के बस की बात नहीं है।
अलाउद्दीन खिलजी की बर्बरता और सरस्वती मंदिर को तोड़कर बनाई गई जिहादी दरगाह का काला सच
अब बात करते हैं उन क्रूर इस्लामी आक्रांताओं की, जिन्हें आज भी कुछ लोग अपना ‘हीरो’ मानते हैं और जिनके नाम पर आज भी मस्जिदें और सड़कें खड़ी हैं। 1305 ईस्वी का वो काला साल था जब अलाउद्दीन खिलजी नाम का वो दरिंदा मालवा में घुसा।
उसका असली टारगेट सिर्फ राज-पाट लूटना थोड़ी था? उसका तो सीधा मकसद हमारी सनातन आस्था की रीढ़ तोड़ना और हमारे स्वाभिमान को कुचलना था।
इन इस्लामी आक्रांताओं की फितरत ही यही थी। खुद तो कोई कला या विज्ञान आता नहीं था, तो जो हमारे भव्य मंदिर पहले से शान से खड़े थे, उन्हें ही तोड़-फोड़ कर अपना बना लेते थे।
खिलजी और उसके बाद आए दिलावर खान गोरी और महमूद खिलजी जैसे लोगों ने ठीक यही खूनी खेल खेला। भोजशाला में जमकर तोड़फोड़ मचाई गई। माँ सरस्वती के उस भव्य मंदिर की मूर्तियों को बेरहमी से तोड़ कर खंडित किया गया। और फिर उसी मंदिर के खंभों को, उसी छत को और उसी गर्भगृह को जोड़-जाड़ कर बेशर्मी से उसे ‘कमाल मौला दरगाह’ का नाम थमा दिया।
आज ये मुस्लिम पक्ष (मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी) कोर्ट में जो बवाल काट रहा है, वो असल में अपने पुरखों के इसी खूनी और बर्बर इतिहास पर पर्दा डालने की एक छटपटाहट है।
वो जिस ढांचे को अपनी ‘इबादतगाह’ बता रहे हैं, वो असल में हमारे सीने पर किया गया एक गहरा घाव है। कोई भी स्वाभिमानी हिंदू अपने इस्लामी आक्रांताओं के इस अवैध और खूनी कब्जे को भला कैसे और क्यों बर्दाश्त करेगा?
2000 पन्नों की ASI रिपोर्ट ने खोद निकाली जिहादी दावों की कब्र
अगर किसी सेक्युलर की आंखों पर अब भी भाईचारे का चश्मा चढ़ा हो और उसे दाल में कुछ काला लग रहा हो, तो उसे अदालत के आदेश पर 2024 में एएसआई (ASI) द्वारा किए गए 98 दिनों के महा-सर्वे की रिपोर्ट पढ़ लेनी चाहिए।
इस 2000 पन्नों की रिपोर्ट ने वो वैज्ञानिक प्रमाण सामने रखे हैं, जिसके बाद इन कट्टरपंथियों के मुंह पर ताला लग जाना चाहिए। विज्ञान और ज़मीन के नीचे दबे पत्थर कभी झूठ नहीं बोलते।
इस एएसआई सर्वे के दौरान 94 से ज्यादा मूर्तियां और उनके अवशेष मिले हैं। ज़रा ध्यान से सुनिए- इनमें भगवान श्री गणेश, ब्रह्मा जी, भैरव बाबा और भगवान नरसिंह की साफ-साफ मूर्तियां और आकृतियां शामिल हैं।
अरे भाई, कोई इन मौलानाओं से पूछे की दुनिया की कौन सी ऐसी मस्जिद होती है जिसमें भगवान नरसिंह या गणेश जी की मूर्तियां दीवार में चुनी हुई होती हैं? कोई जवाब है इनके पास? बिल्कुल नहीं।
एएसआई ने अपनी रिपोर्ट में एकदम साफ लिखा है की मंदिर के खंभों पर जो हिंदू देवी-देवताओं की आकृतियां थीं और जहां-जहां ‘ओम नमः शिवाय’ के श्लोक लिखे थे, उन्हें बाकायदा छैनी-हथौड़े से कुरेद-कुरेद कर विकृत किया गया है ताकि उनकी असली पहचान हमेशा के लिए छिपाई जा सके।
मतलब साफ है की ये जिहादी आक्रांता और उनके वारिस इतने डरे हुए थे की उन्होंने सच को दबाने के लिए हर मुमकिन मक़्कारी की।
कार्बन डेटिंग, ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (GPR) और दीवारों के परीक्षण ने साबित कर दिया है की ये पूरा का पूरा ढांचा 14वीं सदी से बहुत पहले एक भव्य हिंदू मंदिर ही था, जिसे बाद में जबरन, तलवार के दम पर मस्जिद में तब्दील किया गया। चोर की दाढ़ी में तिनका नहीं, अब तो पूरा का पूरा शहतीर ही बाहर आ चुका है।
धार की भोजशाला सदियों पहले भी पूरी तरह से हिंदुओं की थी, आज भी हिंदुओं की है, और आगे भी हमेशा हिंदुओं की ही रहेगी।
माँ सरस्वती के इस पावन धाम को उन आक्रांताओं के कलंकित निशानों से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्त कराना ही अब हम सभी सनातनियों का अंतिम लक्ष्य है। अब कोई तुष्टिकरण नहीं चलेगा, कोई भाईचारा नहीं चलेगा।
जय माँ सरस्वती! जय श्री राम!
