शीला दीक्षित: वो महिला जिसने वो दिल्ली बनाई जिसमें हम रोज़ चलते हैं

दिल्ली की याददाश्त अक्सर नारों में बंट जाती है। रोज की दिल्ली उन नारों से छोटी है। वह ट्रेन है जो समय पर आती है। वह सोकेट है जिसमें उजाला टिकता है। वह नल है जो केवल अफवाह नहीं रहा।

शीला दीक्षित की कहानी इन्हीं छोटी चीजों से शुरू होती है।

जब दिल्ली न सांस ले पाती थी, न चल पाती थी

नब्बे के दशक के आखिरी सालों में दिल्ली थकी हुई लगती थी। शहर के एक छोर से दूसरे छोर तक जाना आधी सुबह खा सकता था। डीजल का धुआं गले में बैठ जाता था। बिजली चली जाती तो शाम खत्म हो जाती थी। पानी अक्सर ऊपरी मंजिल तक पहुंचता ही नहीं था। लोग अपना दिन काम या स्कूल या टहलने के हिसाब से नहीं, कमी के हिसाब से बांटते थे।

शाहदरा से आठ बजे निकला बाबू कनॉट प्लेस के दफ्तर तब पहुंचता जब पहली बैठक शुरू हो चुकी होती। पूर्वी दिल्ली की तीसरी मंजिल पर मां बाल्टियां पंक्ति में लगाए रखती, क्योंकि नौ बजे के बाद नल पर भरोसा नहीं रहता था। मई-जून में इन्वर्टर की बैटरी घर का सदस्य बन जाती थी। बच्चे पहली रोशनी वाले घंटे में ही पाठ खत्म करना सीख जाते थे। ड्राइवर जानते थे कि कौन सा चौराहा डरने लायक है।

फिर शहर ऐसे तरीकों से बदलने लगा जिन्हें हाथ से छुआ जा सकता था। मेट्रो का डिब्बा ऐसे स्टेशन में घुसा जो कुछ साल पहले था ही नहीं। फ्लाईओवर ने उस जंक्शन के ऊपर से गाड़ियां उठा लीं जो पहले एक घंटा निगल लेता था। बस सीएनजी पर चली और काला धुआं नहीं उगला। अस्पताल का नया विंग खुला जहां पहले मरीज लौटा दिए जाते थे। सोकेट में रात भर उजाला रहा।

एक औरत ने, सीमित अधिकार वाले केंद्र शासित प्रदेश के अंदर काम करते हुए, इस शहर का रोजमर्रा का नक्शा कैसे बदल दिया?

यह चमत्कार की कहानी नहीं है। यह ठहर कर काम करने की कहानी है। यह उस सहयोग की कहानी है जो केंद्र से तब भी बना रहा जब सत्ता में दूसरी पार्टी थी। यह उन योजनाओं की कहानी है जिन्हें लोग हर सुबह महसूस कर सकें। काम ने दिल्ली को पूर्ण नहीं बनाया। काम ने दिल्ली को नए ढंग से चलने लायक बनाया। वही फर्क आज भी परिवारों के दिन में बैठा है।

नब्बे के दशक के आखिरी सालों में दिल्ली राजधानी तो थी, शहर कम लगती थी। नाम बड़ा था। सुबह छोटी थी। लोग घड़ी नहीं देखते थे। जाम देखते थे, नल देखते थे, इन्वर्टर की लाल बत्ती देखते थे।

रिंग रोड उसी घंटे अटकती थी। एम्स के बाहर एंबुलेंस रेंगती थी। धौला कुआं एक चौराहा नहीं, एक परीक्षा था। आईएसबीटी की तरफ बसें धुएं का काफिला बन कर चलती थीं। ड्राइवर जानते थे कि कौन सा सिग्नल झूठा है, कौन सी लेन फांसी है, कौन सा उड़ान भरने वाला फ्लाईओवर अभी कागज पर है।

हवा मुंह में बैठती थी। सर्दी में धुआं नीचे लटकता था। खिड़की बंद करो, फिर भी कॉलर पर परत आ जाती। बच्चे स्कूल से लौटते तो आंखें लाल। बस स्टॉप पर खड़ा आदमी रूमाल निकालता, जैसे शहर से माफी मांग रहा हो। ऑटो का साइलेंसर बीमार था। डीजल बस का पिछला हिस्सा काला बादल छोड़ता था। लोग कहते थे दिल्ली चल रही है। सच यह था कि दिल्ली खांस रही थी।

बिजली एक वादा थी, आदत नहीं। गर्मी की दोपहर में पंखा रुकता तो कमरा तवा बन जाता। रात को इन्वर्टर गुनगुनाता। बच्चे पहली रोशनी में पाठ खत्म करना सीख गए थे। मां मोमबत्ती और माचिस एक ही दराज में रखती। बाप बालकनी पर डीजल की कैन रखता, “अगर हुआ तो।” ट्रांसफार्मर जब फटता, पूरी गली वह आवाज पहचान लेती। बिल आता। रोशनी नहीं आती। चोरी और नुकसान ने बोर्ड को ऐसा उलझा दिया था कि तारों पर भरोसा टूट चुका था।

पानी ऊपरी मंजिल तक अक्सर नहीं चढ़ता था। तीसरी मंजिल की औरत बाल्टियां पंक्ति में लगाती। दबाव आए तो भर लो। न आए तो टैंकर वाले का इंतजार। मई की शादी का मतलब बैंड भी था, टैंकर भी था। मकान मालिक और किरायेदार मोटर के समय पर झगड़ते। पूर्वी दिल्ली में यह लड़ाई और लंबी थी। यमुना पार का परिवार सिविल लाइंस जितनी राजधानी में रहता था, लेकिन उसका दिन दो घंटे की सप्लाई के इर्द-गिर्द बंधा रहता था।

पूर्व इंतजार का इलाका था। सड़क देर से आती। अस्पताल दूर था। पाइप पतला था। ट्रांसफार्मर कमजोर था। शाहदरा का बाबू आठ बजे निकलता और कनॉट प्लेस तब पहुंचता जब पहली बैठक शुरू हो चुकी होती। मयूर विहार की शिक्षिका नदी पार कर स्कूल पहुंचती तो घड़ी उसे डांटती। लोगों को लगता था राजधानी दो शहर है। एक वो जहां फाइलें चलती हैं। एक वो जहां बाल्टी चलती है।

सार्वजनिक परिवहन भरोसा नहीं देता था। बसें झुंड में आतीं, या आती ही नहीं थीं। पीक आवर का फर्श कोहनियों की मंडी था। सीट नहीं मिलती थी। हवा नहीं मिलती थी। समय नहीं मिलता था। दोपहिया इसलिए घर का सदस्य बन गया था कि बस पर यकीन नहीं था। कोलकाता के पास मेट्रो थी। दिल्ली के पास योजना की बात थी, पटरी की नहीं। कोई साधारण आदमी यह नहीं सोचता था कि ट्रेन उसे चुपचाप, समय पर, धुआं बिना नदी पार उतार देगी।

घरों के अंदर एक निजी इंजीनियरिंग चलती थी। कौन सा ट्रांसफार्मर पहले मरता है, यह पता था। मंगलवार को कौन सा टैंकर आता है, यह पता था। रात आठ के बाद कौन सा रूट गायब हो जाता है, यह पता था। लोग शहर से नहीं लड़ रहे थे। लोग शहर का जुगाड़ बना रहे थे। विकास अगर आता, तो उसे इन्हीं जुगाड़ों को तोड़ना होता। प्रेस नोट से नहीं। गेट पर, नल पर, सोकेट पर, बस स्टॉप पर।

दिल्ली तब थकी हुई राजधानी थी। काम पर निकलना एक अभियान था। शाम को घर लौटना एक जीत थी। बच्चे पढ़ते थे कटौती की दरार में। औरतें पानी के इर्द-गिर्द दिन बांटती थीं। बीमार आदमी एम्स पहुंचने में वह समय गंवाता जो इलाज का होना चाहिए था।

3 दिसंबर 1998 को शीला दीक्षित को यही शहर मिला। अधिकार पूरे राज्य जैसे नहीं थे। जमीन, पुलिस, कई मंजूरी केंद्र और दूसरी एजेंसियों के पास थीं। एक सड़क पर कई मालिक बैठे थे। बहाना आसान था। उन्होंने बहाना नहीं चुना। उन्होंने वह हिस्सा चुना जिसे छुआ जा सकता था: सड़क, बस, बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल, और वह तरीका जिससे नागरिक सरकार से बात करें।

जो शहर चल नहीं सकता, वह सोच भी नहीं सकता। जो शहर रोशनी नहीं रख सकता, वह पढ़ाई नहीं कर सकता। जो शहर साफ बस नहीं दे सकता, वह लोगों से सब्र नहीं मांग सकता। अगले पंद्रह साल का काम इन्हीं सादी बातों से शुरू हुआ। पहले दिल्ली को सांस और रास्ता चाहिए था। बाकी सब बाद में आ सकता था।

कपूरथला से कन्नौज तक, फिर राजधानी तक

शीला कपूर का जन्म 31 मार्च 1938 को पंजाब के कपूरथला में हुआ। तब कपूरथला रियासत का शहर था, आज का पंजाब। वे पंजाबी खत्री परिवार में पली-बढ़ीं। पिता का नाम संजय कपूर था। घर राजनीतिक मंच नहीं था। घर अनुशासन और पढ़ाई का था।

पढ़ाई के लिए वे जल्दी दिल्ली आईं। कॉन्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी ने उन्हें सलीका दिया। समय पर पहुंचना, साफ बोलना, शोर से काम निकालने की आदत न पालना। लोग बाद में उनकी धीमी आवाज को नरमी समझ बैठे। वह नरमी कम, कॉन्वेंट की छड़ी ज्यादा थी। अनुशासन था।

मिरांडा हाउस में इतिहास का स्नातकोत्तर हुआ। किताबें सिर्फ परीक्षा के लिए नहीं थीं। इतिहास ने उन्हें यह सिखाया कि शहर और सत्ता अचानक नहीं बनते। वे परत दर परत बनते हैं। वही समझ बाद में दिल्ली की फाइलों में काम आई। वे गरजने वाले नेता नहीं बनीं। वे पढ़ी हुई नेता बनीं।

विनोद कुमार दीक्षित आईएएस अधिकारी थे। उमा शंकर दीक्षित के बेटे थे। उमा शंकर स्वतंत्रता आंदोलन के आदमी थे, बाद में केंद्रीय मंत्री और राज्यपाल भी बने। शीला और विनोद कॉलेज के दिनों में मिले। यादों में एक बात बार-बार आती है। प्रस्ताव डीटीसी बस में हुआ, करीब 1958 के आसपास। शादी 11 जुलाई 1962 को हुई। तब तक विनोद सेवा में चुन लिए गए थे।

राजनीति घर के दरवाजे से आई, मंच से नहीं। फाइलें घर आतीं। लोग निवेदन लेकर आते। ससुर की दिनचर्या संभालते हुए उन्होंने क्षेत्र सीखा, कतार का सब्र सीखा, और यह सीखा कि मदद अक्सर शोर में नहीं, दफ्तर की मेज पर होती है। उमा शंकर का घर बिना श्यामपट्ट का स्कूल था। वहां पार्टी क्या बोलती है, इससे ज्यादा यह सिखाया जाता था कि आदमी क्या लेकर आया है।

1969 के आसपास वे ससुर की सहायता में सार्वजनिक जीवन से जुड़ीं। 1970 के आसपास यंग वुमेन एसोसिएशन की अध्यक्ष रहीं। चुनाव अभी दूर था। तैयारी घर के अंदर चल रही थी।

1984 आया। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश लहर में था। राजीव गांधी को उत्तर प्रदेश में चेहरा चाहिए था। कन्नौज चुना गया। शीला उस शहर में पली नहीं थीं। वे वहां की बेटी नहीं, बहू वाली राजनीति की उम्मीद थीं: परिवार की जड़, पार्टी की लहर, और एक नई उम्मीदवार जो फाइल पढ़ सके। वे जीतीं। लोकसभा पहुंचीं।

जीत के डेढ़ साल के भीतर वे राज्य मंत्री बन गईं। पहले संसदीय कार्य। फिर प्रधानमंत्री कार्यालय। लोकसभा की प्राक्कलन समिति में बैठीं। स्वतंत्रता के चालीस वर्ष और नेहरू शताब्दी के आयोजन से जुड़ी समिति की अध्यक्षता की। पांच वर्ष तक संयुक्त राष्ट्र की महिला स्थिति आयोग में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

कन्नौज और केंद्र ने दो पाठ पढ़ाए।

  • पहला: फाइल किस मेज से हिलती है, कौन सा मंत्री मंजूरी खोलता है, कौन सी चुप्पी इनकार है।
  • दूसरा: दिल्ली जैसा शहर तब तक नहीं चलता जब तक केंद्र और स्थानीय सरकार एक दिशा में न खिंचें।

अभिमान पटरी नहीं बिछाता। तालमेल बिछाता है। यह पाठ 1998 के बाद काम आया, जब मेट्रो और गैस के लिए उन्हें दूसरी पार्टी के केंद्र से बात करनी पड़ी।

लोकसभा की और यात्राएं आसान नहीं रहीं। 1989 में कन्नौज दोबारा नहीं बचा। बाद में दिल्ली की लोकसभा सीट भी हाथ से गई। 1991 में पिता का निधन हुआ। राजीव गांधी भी जा चुके थे। कई नेता यहां हार मान लेते। उन्होंने राजनीतिक घर दिल्ली बना लिया।

1998 में उन्हें दिल्ली कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। उसी वर्ष 3 दिसंबर को वे मुख्यमंत्री बनीं। गोल मार्केट से विधानसभा में आईं। तीन लगातार कार्यकाल दिए, 28 दिसंबर 2013 तक। दिल्ली की सबसे लंबे समय तक रहने वाली मुख्यमंत्री। भारत की सबसे लंबे समय तक रहने वाली महिला मुख्यमंत्री। वे 20 जुलाई 2019 को 81 वर्ष की आयु में गईं।

तिथियां स्मृति हैं। काम शहर है। कपूरथला की लड़की ने कॉन्वेंट की अनुशासन सीखी। मिरांडा हाउस ने इतिहास दिया। दीक्षित घर ने सेवा सिखाई। कन्नौज ने चुनाव दिया। प्रधानमंत्री कार्यालय ने केंद्र की भाषा दी। दिल्ली ने पंद्रह साल का मैदान दिया।

वे मंच की शेर नहीं थीं। छोटे कमरे की श्रोता थीं। गली क्या मांगती है, यह पूछती थीं। नाम याद रखती थीं। जब तक नाराज न हों, “बेटा” कहती थीं। नाराजगी में नाम औपचारिक हो जाता। अधिकारी वह फर्क सुनना सीख गए।

दिल्ली को एक और भाषण की जरूरत नहीं थी। दिल्ली को ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो फाइल के साथ तब तक बैठे जब तक सड़क न खुल जाए। कपूरथला से कन्नौज तक का रास्ता उन्हें वही आदत दे गया। राजधानी ने उसी आदत को मेट्रो, फ्लाईओवर, सीएनजी, तार और नल बना दिया।

1998: एक बाहरी औरत एक कठिन शहर में

3 दिसंबर 1998 को शीला दीक्षित ने शपथ ली तो शहर के कई लोग उन्हें बाहरी मान रहे थे। वे पुरानी दिल्ली की गली-गली संगठिका नहीं थीं। न पुराने वार्ड की हुंकार थी, न चौराहे की सभा वाली तूफानी छवि। गोल मार्केट से आई थीं। आवाज धीमी थी। कैमरों के लिए मेज नहीं पीटती थीं। लोगों को लगा, यह नेता शहर चलाएगी या शहर इसे निगल जाएगा।

दिल्ली तब आसान शहर नहीं था। आसान कुर्सी तो बिल्कुल नहीं थी। जमीन किसी के पास, पुलिस किसी के पास, मंजूरी किसी और के पास। उपराज्यपाल, नगर निकाय, दिल्ली विकास प्राधिकरण, केंद्र और राज्य सरकार एक ही सड़क के टुकड़े थामे बैठे थे। मुख्यमंत्री के पास पूरा राज्य जैसा अधिकार नहीं था। बहाना तैयार था: यह मेरे हाथ में नहीं। कई नेता यहीं रुक जाते। उन्होंने यहीं से शुरू किया।

बाहरी होना उनकी कमजोरी भी था, ताकत भी। पुरानी गुटबाजी का बोझ कम था। फाइल देखने की आदत ज्यादा थी। कन्नौज और प्रधानमंत्री कार्यालय ने सिखाया था कि काम शोर से नहीं, मेज से चलता है। दिल्ली को उसी आदत की जरूरत थी। शहर थका था। लोगों को भाषण नहीं, बस चाहिए थी, रोशनी चाहिए थी, नल चाहिए था।

अधिकारी जल्दी समझ गए कि धीमी आवाज का मतलब ढीला शासन नहीं। वे फॉलो-अप मांगती थीं। बस सड़क पर खड़ी दिखे तो फोन जाता। फ्लाईओवर की तारीख टली तो बैठक होती। जब तक नाराज न हों, “बेटा” कहतीं। नाराजगी में नाम औपचारिक हो जाता। “नेगी जी” सुनकर आदमी समझ जाता कि आज फाइल बच कर नहीं निकलेगी। सत्ता का यह स्वभाव पुरानी दिल्ली की हुंकार से अलग था। यह घर और दफ्तर दोनों की भाषा थी।

एक परिवहन अधिकारी ने बाद में एक वाक्य में सब कह दिया। मुख्यमंत्री फोन करतीं और पूछतीं, “बेटा, यह बस खराब क्यों है?” सवाल नाटक नहीं था। अगली कॉल मैकेनिक की होती। पुर्जा चाहिए तो पुर्जा। खड़ी बस चलनी चाहिए। दिल्ली जैसी राजधानी बड़े सपनों से नहीं सुधरती। वह खड़ी बस से सुधरती है।

ट्रैफिक के साथ भी यही था। उनकी अपनी गाड़ी किसी अड़चन पर फंस जाए, तो अगली सुबह की बैठक उसी अड़चन की हो जाती। एम्स हो या धौला कुआं, जाम उनके लिए आंकड़ा नहीं था। जाम उनके लिए खोया हुआ घंटा था। नीति यहां से बनी: जो चौराहा शहर को रोज लज्जित करे, उसे मशहूर रहने की इजाजत मत दो। चौड़ा करो। उठा दो। सिग्नल हटाओ। मास्टर प्लान की प्रतीक्षा में लोग मत सड़ाओ।

केंद्र से रिश्ता उनकी सबसे व्यावहारिक परीक्षा था। पहले कार्यकाल में दिल्ली में कांग्रेस थी, केंद्र में वाजपेयी सरकार। मेट्रो, गैस, सड़क सबको केंद्र की मंजूरी चाहिए थी। कुछ लोग चाहते थे कि विरोध दर्ज हो, बयान निकले, श्रेय का झगड़ा हो। मेट्रो पर जब केंद्र ने थोड़े समय राजनीतिक अध्यक्ष बिठाया, टीम के कुछ लोग लड़ाई चाहते थे। उन्होंने बधाई दी और इंजीनियरों को चलाते रखा। दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है। उन्होंने इस तथ्य को अपमान नहीं माना। शर्त माना। शर्त यह थी कि पटरी बिछे, प्रेस नोट नहीं।

सीएनजी पर भी यही स्वभाव दिखा। अदालत का आदेश आया। समय कम था। पाइपलाइन चाहिए थी, किट चाहिए थे, नई बसें चाहिए थीं। वे केंद्र गईं। पेट्रोलियम मंत्री से गैस मांगी। कहा गया, आदेश आ गया है, तो दिल्ली साफ करो। नीति का सार बाहरीपन में नहीं था। सार काम में था। शहर काटने नहीं आई थीं। शहर चलाने आई थीं।

वे सरकार का पता भी बदलना चाहती थीं। सचिवालय पुरानी सिविल लाइंस की दूरी से उतर कर आईटीओ के पास प्लेयर्स बिल्डिंग में आया। नक्शे पर छोटी बात लगती है। सत्ता के बैठक की जगह बदलना बड़ी बात होती है। सरकार शहर के कामकाजी केंद्र के करीब आई। संदेश साफ था। राजधानी के काम को कोने में मत छिपाओ।

बाहरी औरत पर एक और शक था। क्या वे पूर्व को देखेंगी? क्या यमुना पार केवल वोट रहेगा? बाद के वर्षों ने उत्तर दिया। सोनिया विहार, पूर्वी पाइप, ट्रांस-यमुना सड़कें, मेट्रो का नदी पार जाना। कठिन शहर केवल कनॉट प्लेस नहीं था। कठिन शहर वह भी था जहां बाल्टी पंक्ति में लगती थी। उन्होंने दोनों को एक नक्शे में पढ़ना शुरू किया।

1998 की दिल्ली ने उन्हें आजमाया। धीमी आवाज को कमजोरी समझा। बंटे अधिकार को पक्षाघात समझा। अलग पार्टी के केंद्र को दीवार समझा। उन्होंने तीनों समझ को काम से काटा। खड़ी बस चलाई। अटकी फाइल हिलाई। बाहरीपन को मुलाकात में बदला।

कठिन शहर आसान नहीं हुआ। अधिकार अचानक पूरे नहीं हुए। मगर उस साल एक बात तय हो गई। दिल्ली को गरजने वाला मालिक नहीं चाहिए था। दिल्ली को ऐसा शासक चाहिए था जो सुबह पूछे कि बस क्यों खड़ी है, और शाम तक उसे चलवा दे। बाहरी औरत ने वही काम चुना। अगले पंद्रह साल उसी चुनाव की कहानी हैं।

वो मेट्रो जिसने दिल्ली को सार्वजनिक परिवहन पर भरोसा सिखाया

दिल्ली मेट्रो 1998 से पहले योजना में थी। निगम नब्बे के दशक के मध्य में बन चुका था। निर्माण उनकी कुर्सी संभालने के बाद रफ्तार पकड़ा। पहली सार्वजनिक पट्टी शाहदरा से तीस हजारी दिसंबर 2002 में खुली। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 24 दिसंबर को झंडी दिखाई। आम यात्री अगले दिन चढ़े, जो उनकी जन्म तिथि भी थी। उन्होंने स्मार्ट कार्ड खरीदा और सफर किया। इशारा मायने रखता था। यह कहता था कि यह वीआईपी खिलौना नहीं है।

सीलमपुर के एक दफ्तरी, जिन्होंने पहले हफ्ते की ट्रेन पकड़ी, बाद में कहते थे कि अचरज खामोशी का था। न हॉर्न। न हर गड्ढे पर झटका। जो सफर भरी बस में पौन घंटा लेता था, वह मिनटों में पूरा हो गया। तीस हजारी चाय पीने जितना समय बच कर पहुंचे। रात को भाई से कहा कि शहर ने नई तरह की सड़क उगा ली है, बस यह सड़क जाम के ऊपर चलती है और कंधे से सीट नहीं छीनती।

समय का वही छोटा उपहार लोगों को यकीन दिला गया।

परियोजना जब अभी नाजुक थी, शीला दीक्षित ने ई. श्रीधरन का साथ दिया। शुरुआती निर्माण दुर्घटनाओं के बाद, जिनमें मजदूर मारे गए, उन्होंने इस्तीफा देना चाहा। उन्होंने पत्र स्वीकार नहीं किया। उन्हें काम पूरा करने वाला आदमी चाहिए था, बलि का बकरा नहीं। श्रीधरन समय की पाबंदी के लिए जाने जाते थे, ठेकों से राजनीति दूर रखने के लिए जाने जाते थे, और समय-सीमा को नैतिक तथ्य मानते थे। उन्होंने उन्हें आवरण दिया।

जमीन, पाइप-केबल हटाने और केंद्र से राजनीतिक ढाल का तालमेल उन्होंने संभाला। अधिकारियों से कहा गया कि डीएमआरसी की मांग को जरूरी नागरिक काम मानें, एक और फाइल नहीं। जब केंद्र ने थोड़े समय के लिए राजनीतिक अध्यक्ष नियुक्त किया, टीम के कुछ लोग विरोध चाहते थे। उन्होंने नए अध्यक्ष को बधाई दी और इंजीनियरों को चलाते रखा। दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है। उन्होंने इस तथ्य को काम की शर्त माना, बहाना नहीं।

पहला भूमिगत खंड, विश्वविद्यालय से कश्मीरी गेट, दिसंबर 2004 में खुला। दिल्ली के पास अचानक ऐसी सुरंग थी जो दूसरे देश जैसी लगे: साफ, समय पर, एक से अधिक भाषाओं में घोषणा के साथ। लाइनें द्वारका, रोहिणी, केंद्रीय सचिवालय और फिर पूरे शहर तक गईं। स्टेशनों ने दिल्ली को नई सार्वजनिक शिष्टता सिखाई। कतार में खड़े रहो। उतरने दो। डिब्बा साफ रखो। फर्श को कूड़ादान मत समझो। शहर शिष्टता तब सीखता है जब जगह खुद उसकी उम्मीद करे।

बाद में इस प्रणाली को संयुक्त राष्ट्र के कार्बन क्रेडिट मिले। इस तरह का सम्मान पाने वाली यह विश्व की पहली रेल परियोजना कही गई। दूसरे भारतीय शहरों ने इसे मॉडल माना। आने वाले इंजीनियर उन प्रणालियों से नापते थे जिन पर प्रति किलोमीटर कहीं अधिक खर्च हुआ था। प्रतिष्ठा बाद में आई। पहला उपहार सरल था। बाबू, विद्यार्थी, नर्स और दुकानदार यमुना पार आधी सुबह गंवाए बिना जा सकते थे।

मेट्रो ने सड़कें खाली नहीं कर दीं। उसने आधार रेखा बदल दी। जब लोगों को सार्वजनिक ट्रेन पर भरोसा हुआ, वे सार्वजनिक शहर की कल्पना कर सके। कुछ सफर के लिए दोपहिया घर छोड़ सके। बेटी को शहर के दूसरे छोर के कॉलेज भेज सके। वह नौकरी ले सके जो पहले बहुत दूर लगती थी। भरोसा भी ढांचा है।

कार्यकाल के बाद के वर्षों में मेट्रो अचरज नहीं, आदत बन गई। दफ्तर का बैग, स्कूल का बैग और बाजार का बैग एक ही डिब्बे में बैठने लगे। एक पीढ़ी स्मार्ट कार्ड को सामान्य मान कर बड़ी हुई। परियोजना शहर इसी तरह बनती है। पहले वह घटना होती है। फिर वह मंगलवार होती है।

फ्लाईओवर, सिग्नल-फ्री सड़कें और अंतहीन जाम का अंत

अगर मेट्रो शहर की नई रीढ़ थी, तो फ्लाईओवर उसके नए जोड़ थे।

नब्बे के दशक के आखिर का ट्रैफिक केवल ईंधन नहीं खाता था। सब्र खाता था। एम्स, धौला कुआं और रिंग रोड के लंबे हिस्से गलत वजह से मशहूर थे। एंबुलेंस रेंगती थी। स्कूल बसें खड़ी रहती थीं। शादी जाने वाला परिवार दो घंटे पहले निकलता और फिर भी देर से पहुंचता। सेल्समैन अपना रास्ता उन घंटों के हिसाब से बनाते जब चौराहा असंभव हो जाता। एम्स के डॉक्टर वे मिनट गंवाते जो मरीज के पास नहीं होते थे।

उनकी सरकार ने 65 से अधिक नए फ्लाईओवर बनवाए, साथ में फुट-ओवर-ब्रिज और सबवे भी। साथियों के कुछ हिसाब ऊंचे थे जब एलिवेटेड कॉरिडोर और अंडरपास जोड़ लिए जाते। सुरक्षित बात यह है: आवाजाही का आकाश बदल गया। एम्स फ्लाईओवर रोज की राहत का चिह्न बन गया। धौला कुआं का काम शहर के सबसे खराब इंटरचेंज में से एक को नया रूप दे गया। रिंग रोड के हिस्से आसान हुए। आउटर रिंग रोड को सांस मिली। बारापुल्ला एलिवेटेड कॉरिडोर कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले निकलवाया गया, दक्षिण दिल्ली को आयोजन स्थलों से और आगे पूर्वी दिल्ली से जोड़ता हुआ।

सिग्नेचर ब्रिज यमुना पर प्रतीक की तरह सोचा गया, एक संरचना जो कहे कि शहर आधुनिक दिख सकता है और फिर भी अपनी नदी का रह सकता है। उठने में वर्ष लगे। विचार उन महत्वाकांक्षा वाले वर्षों का था, जब दिल्ली से कहा गया कि उसे सुंदरता भी मिल सकती है, केवल काम नहीं।

लोक निर्माण मंत्री ए.के. वालिया बाद में कहते थे कि तरीका व्यावहारिक था। अड़चन ढूंढो। जो चौड़ा हो सके उसे चौड़ा करो। जो न हो सके उसे उठा दो। कुछ हिस्सों को सिग्नल-फ्री बनाओ। अगर लोग पहले से लाल बत्ती पर फंसे हैं तो संपूर्ण मास्टर प्लान की प्रतीक्षा मत करो। यमुना पार की सड़कों को वह ध्यान मिला जिसे पुरानी योजनाएं टालती रही थीं। जो शहर पूरब की तरफ बढ़े, उसके सब नए पुल पश्चिम में नहीं रह सकते।

रास्ते में आपत्तियां आईं। एक ऊंची सड़क को स्मारक के दृश्य को लेकर विरोध मिला। रेलवे की मंजूरी में समय लगा। वे बहस सुनती रहीं और रास्ता निकालती रहीं। उद्देश्य बहस जीतना नहीं था। उद्देश्य गलियारा खोलना था।

कोई शहर ट्रैफिक हमेशा के लिए खत्म नहीं करता। दिल्ली ने भी नहीं किया। नई गाड़ियां नए कंक्रीट से तेज आईं। बदला नक्शा। जो सवार कभी दो कुख्यात चौराहों के इर्द-गिर्द जीवन बांटता था, उसके सिर के ऊपर फ्लाईओवर आ गया। शाम को एक घंटा लौट आया। अभिभावक स्कूल गेट समय पर पहुंचे। मजदूर रात की पाली जंक्शन की लड़ाई बिना पहुंच गया।

वह घंटा विकास है जिसे भाषण के बिना गिना जा सकता है।

संध्या में फुट-ओवर-ब्रिज पर खड़े होकर उन वर्षों की समझ आज भी दिखती है। नीचे पुरानी सड़क अपना काम कर रही है। ऊपर एक पाट बाकी बोझ उठा रहा है। डिजाइन कविता नहीं है। यह दूसरों के समय के प्रति शिष्टता है।

सीएनजी की बाजी: गंदी सड़कों पर साफ बसें

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की बसों को कंप्रेस्ड नेचुरल गैस पर जाने का आदेश दिया। समय-सीमा कसकर बंधी थी। शहर को पाइपलाइन चाहिए थी, किट चाहिए थे, नई बसें चाहिए थीं, और ऐसा ईंधन चाहिए था जो सुबह छह बजे नाकाम न हो। पुरानी डीजल बसें सड़क से उतरनी थीं। ऑटो और टैक्सी की बनावट बदलनी थी। पंप स्टेशन वहां खड़े होने थे जहां पहले कुछ नहीं था।

शीला दीक्षित आदेश को राज्य सरकार पर फेंके गए बोझ की तरह ले सकती थीं। उन्होंने इसे उस हवा को साफ करने का मौका माना जिसे लोग बस स्टॉप पर सच में सांस लेते हैं।

उन वर्षों में परिवहन संभाल रहे अजय माकन उनकी एक पंक्ति याद करते हैं। अदालत का आदेश आया है, तो चलो दिल्ली साफ करें। गैस के लिए वे केंद्र गईं। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री राम नाईक ने गुजरात से लंबी पाइपलाइन और अदालत की तारीख का आश्वासन दिया। स्टेशन उठे। निर्माताओं को आदेश गए। किट लगे। पुरानी डीजल बसें उतर गईं। ऑटो और टैक्सी पीछे आए।

पहले महीने अस्त-व्यस्त रहे। सीएनजी पंप पर कतारें लंबी थीं। चालक शिकायत करते थे। सवार प्रतीक्षा करते थे। कुछ नया ईंधन से डरते थे। उन्होंने नीति नहीं पलटी। 2002 के अंत तक शहर कह सकता था कि उसके सार्वजनिक बेड़े ने अपनी तरह का सबसे बड़ा स्वच्छ ईंधन बदलाव शुरू कर दिया है। अदालत ने खुद नोट किया कि दिल्ली चली, जबकि और लोग हिचकिचाए।

बाद में लो-फ्लोर बसें और वातानुकूलित डिब्बे आए, खासकर 2010 के आसपास, जब गेम्स की समय-सीमा ने नया बेड़ा सड़क पर उतारा। वह डीटीसी बस जो बुजुर्ग यात्री के लिए किनारे झुकती थी, छोटी गरिमा थी। जून की दोपहर वातानुकूलित बस बड़ी गरिमा थी। ऑटोमैटिक गियर और वह फर्श जिसके लिए चढ़ना न पड़े, बस का उपयोग करने वालों का दायरा बदल गया: खराब घुटने वाला व्यक्ति, बच्चों वाली मां, भारी थैला उठाए मजदूर।

एक सुबह उन्होंने अधिकारी को उस घंटे फोन किया जब ज्यादातर दफ्तर अभी बंद होते हैं। उन्होंने धुआं उगलता ऑटो देखा था। उन्हें विकल्प चाहिए थे, सफाई का पैराग्राफ नहीं। कुछ दिन बाद अदालत से जो बदलाव वे पहले ही मान चुकी थीं, उसे सरकार की चोटी से नई गति मिली।

दिल्ली की हवा आज भी संघर्ष है। कोई ईमानदार बयान इसके विपरीत दावा न करे। सर्दी आज भी शहर की परीक्षा लेती है। सीएनजी वाले वर्षों ने सार्वजनिक परिवहन की आधार रेखा बदली। बस स्टॉप वह जगह नहीं रह गया जहां शहर हार मान चुका हो। स्कूल बैग लिए इंतजार करता बच्चा 1997 के बच्चे से कुछ आसान सांस ले सका।

वो बिजली जो बनी रही

नब्बे के दशक की दिल्ली में गुजरा परिवार गर्मी के बारे में पूछो, तो बहुत से जनरेटर याद करेंगे। बालकनियों पर डीजल रखा जाता था। इन्वर्टर गुनगुनाते थे। बच्चे आपात रोशनी में पाठ करते थे। ट्रांसफार्मर उस आवाज से फटते थे जिसे पूरी गली पहचानती थी। बिल, चोरी और नुकसान ने दिल्ली विद्युत बोर्ड को संकट में उलझा दिया था। कुछ इलाकों में व्यवस्था में घुसी आधी बिजली भुगतान वाले मीटर तक पहुंचती ही नहीं थी।

जुलाई 2002 में उनकी सरकार ने बोर्ड को तोड़ा और वितरण निजी कंपनियों को सौंपा। टाटा पावर ने एक क्षेत्र लिया। बीएसईएस ने बाकी लिए। राज्य ने हिस्सेदारी रखी और नियामक बनाया ताकि दरें निजी लूट न बन जाएं। उत्पादन और पारेषण सार्वजनिक हाथ में रहे। फैसला विवादित था। यूनियनें बदलाव से डरती थीं। विपक्ष इसे बिक्री कहता था। वे आगे बढ़ीं।

शिखर आपूर्ति 1997 के लगभग 2,050 मेगावाट से 2013 तक 5,600 मेगावाट से ऊपर पहुंची। लगभग 49 प्रतिशत घाटा मध्य किशोरी प्रतिशत की ओर आया। नई लाइनें, नए ट्रांसफार्मर और नए मीटर ने उस व्यवस्था को बदला जो बिजली और पैसा दोनों रिसाती थी। लोड शेडिंग जो रोज का तथ्य थी, ज्यादा कॉलोनियों में अपवाद बन गई।

पश्चिमी दिल्ली का एक परिवार जो जनरेटर के लिए डीजल की कैन रखता था, दो गर्मियों के बाद वह ईंधन खरीदना बंद कर दिया क्योंकि कटौती कम हो गई थी। मां कहती थी कि असली बदलाव बिल नहीं था। शाम थी। पंखा चलता रहा। फ्रिज दूध खट्टा नहीं करता था। बच्चे की स्कूल परियोजना अंधेरे कमरे में नहीं मरती थी। पिता “अगर हुआ तो” कह कर पंप से कैन लेकर घर आना बंद कर देते थे। वह कैन उस शहर का प्रतीक था जो अपने तारों पर भरोसा नहीं करता था।

पूर्व मुख्य सचिव पी.के. त्रिपाठी ने बाद में एक और असर बताया। जब पुराना बोर्ड बजट का बड़ा हिस्सा निगलना बंद हुआ, ज्यादा पैसा अस्पतालों की तरफ जा सका। एक क्षेत्र के सुधार ने दूसरे क्षेत्र की देखभाल चुकाई। रिसाव वाले ग्रिड की बचत बिस्तर और विंग बनी।

बढ़ती राजधानी में बिजली कभी पूरा हुआ काम नहीं होती। मांग बढ़ती रही। मॉल, नए फ्लैट, एयर-कंडीशनर और दफ्तर हर साल बोझ जोड़ते रहे। बदला भरोसा। सोकेट में उजाला फिर सामान्य हो गया। जो शहर अपनी रातें कटौती के इर्द-गिर्द बांटता था, उसके लिए यह नागरिक क्रांति थी।

पूर्व के लिए पानी: सोनिया विहार और लंबा पाइप

दिल्ली का पानी हमेशा दूसरे राज्यों और नदी से समझौता रहा है। पूर्वी दिल्ली ने कमी सबसे तीखी महसूस की। कई कॉलोनियों की ऊपरी मंजिलों पर धार थी, या अजीब घंटे थे, या टैंकर था। औरतें भरने के लिए भोर से पहले उठतीं। मकान मालिक और किरायेदार मोटर के समय पर झगड़ते। मई की शादी का मतलब बैंड की तरह टैंकर किराए पर लेना भी था।

उन वर्षों का बड़ा उत्तर सोनिया विहार का शोधन संयंत्र था। उसने गंगा नहर का पानी नए पैमाने पर शहर में लाया। संयंत्र की क्षमता लगभग 140 मिलियन गैलन प्रति दिन थी, पुनर्ग्रहण की गई जमीन पर बैठा, कंप्यूटर नियंत्रित। अंदर की हानि बहुत कम रखने का डिजाइन था। कच्चा पानी जब पहली बार टैंकों में घुसा, शीला दीक्षित ने गेट खोले। उन्होंने इसे ऐतिहासिक क्षण कहा: श्रद्धा से कही जाने वाली गंगा दिल्ली के शोधन कार्यों तक पहुंच गई है।

उस अवधि के आधिकारिक उत्पादन आंकड़े लगभग 577 मिलियन गैलन प्रति दिन से 655 की ओर बढ़े। जल लाइन का जाल नब्बे के दशक के अंत की तुलना में हजारों किलोमीटर बढ़ा। कनेक्शन लगभग 12 लाख से कार्यकाल के अंत तक लगभग 20 लाख के करीब पहुंचे। संयंत्र ने उत्तर-पूर्व, पूर्व और पाइपों के जरिए दक्षिण दिल्ली के कुछ हिस्सों तक पानी पहुंचाया। वे पाइप जीती-जागती सड़कों के नीचे बिछाने पड़े।

उन्होंने रेणुका बांध जैसी लंबी अवधि के स्रोतों का भी समर्थन किया, यह जानते हुए कि शहर केवल अगली गर्मी की नहर पर नहीं जी सकता। जो राजधानी कच्चे पानी के लिए पड़ोसियों पर निर्भर हो, उसे दशक में सोचना पड़ता है, समाचार चक्र में नहीं।

हर घर के लिए पानी प्रचुर नहीं हो गया। टैंकर गायब नहीं हुए। कुछ कॉलोनियां प्रतीक्षा करती रहीं। बदला पाइप। दिलशाद गार्डन या गीता कॉलोनी का परिवार जो दिन दो घंटे की सप्लाई के इर्द-गिर्द बांटता था, उसे ज्यादा नियमित धार मिलने लगी। बच्चे स्कूल से पहले बाल्टी की लड़ाई बिना नहा सके। चाय और सफाई के लिए पानी चाहिए वाली दुकान दोपहर शटर बंद करना छोड़ सकी।

नदियों पर बहसों वाले शहर में सुबह छह बजे काम करता नल ही वह तर्क है जो मायने रखता है।

कॉमनवेल्थ गेम्स की समय-सीमा जिसने काम तेज कर दिया

2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स ने दिल्ली को वह तारीख दी जिसे टाला नहीं जा सकता था। तारीखें सरकारों को डराती हैं। वे उन फैसलों को भी मजबूर करती हैं जो नहीं तो फाइलों में हमेशा के लिए रह जाते हैं।

मेट्रो लाइनें स्थलों और व्यापक जनता की सेवा के लिए फैलीं। सड़कें और फ्लाईओवर जो अटके रह सकते थे, पूरे हुए। इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर टर्मिनल 3 खुला, ऐसा द्वार जिसने राजधानी को राजधानी जैसा दिखाया जब मेहमान विमान से पहले कदम रखता। स्टेडियम बने या नए रूप में जिए। गेम्स विलेज नदी किनारे उठा। सड़कों की सजावट, संकेत, रोशनी और साफ किनारे उन हिस्सों को बदल गए जिन्हें मेहमान देखते और जिन्हें निवासी अंतिम पदक के बाद भी रखते।

भारत पदक तालिका में दूसरे स्थान पर रहा, 38 स्वर्ण और कुल 101 पदक के साथ। केवल ऑस्ट्रेलिया ऊपर रहा। खिलाड़ियों ने फर्श, पटरी और कोर्ट पर शहर को गर्व दिया। शहर ने उन्हें ऐसे स्थल दिए जो मेजबान को लज्जित न करें। लंबे समय से इतने बड़े आयोजन की प्रतीक्षा कर रहे देश के लिए दूसरा स्थान दरवाजा खुलने जैसा लगा।

गेम्स को उस सवार की नजर से देखो जो वर्षों बाद उन्हें याद करता है। पदक समारोह खत्म हुआ। फ्लाईओवर रह गया। मेट्रो स्टेशन रह गया। हवाई अड्डे का टर्मिनल रह गया। गेम्स विलेज आवास बना। मेहमानों के लिए जली स्ट्रीटलाइट उस सड़क के लोगों के लिए जलती रही। समय-सीमा संपत्तियों का समूह बन गई।

आयोजन के इर्द-गिर्द विवाद रहे। यह लेख उनकी दोबारा सुनवाई का स्थान नहीं है। जो भौतिक शहर लाखों लोग हर सप्ताह इस्तेमाल करते हैं, झंडे उतरने पर वही हिस्सा नहीं मिटा। 2010 की भागदौड़ में बने स्टेशन पर बदलती छात्रा समापन समारोह नहीं सोचती। वह कक्षा पहुंचने सोचती है।

समय-सीमा एक तरह की ईमानदारी है। वह सरकार से कहती है कि जनता काम एक तय दिन देखेगी। शीला दीक्षित ने उस ईमानदारी का उपयोग किया। शहर ने कंक्रीट रखा।

जिन निवासियों ने गेम्स का टिकट कभी नहीं खरीदा, उनके लिए पुरस्कार साधारण था। घर लौटते रास्ते का उजला हिस्सा। वह स्टेशन जिसने सफर छोटा कर दिया। वह हवाई अड्डा जिसने आने वाले मेहमानों को दिल्ली की तुलना कहीं और से करना कम कर दिया। राजधानी का पहला कर्तव्य अपने लोगों की देखभाल है। उसका दूसरा कर्तव्य राजधानी जैसी दिखना भी है। 2010 में वे दोनों कर्तव्य लंबे समय बाद पहले से ज्यादा करीब आए।

अस्पताल, कक्षाएं और बेटी

ढांचे की तस्वीर आसान है। अस्पताल का गलियारा कठिन है। शीला दीक्षित के वर्षों ने वहां क्षमता जोड़ी जहां दिल्ली पतली थी।

बड़े अस्पताल फैले। जो संस्थान अपने डिजाइन से आगे चल रहे थे, उनमें बिस्तर जुड़े। इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज ने शहर को वह विशेषज्ञ सार्वजनिक संस्थान दिया जिसकी कमी थी, ऐसी जगह जहां कठिन मामले पहली प्रवृत्ति में राजधानी छोड़ने को मजबूर न हों। दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट ने उस देखभाल की पहुंच बढ़ाई जिसे परिवार पहले दूर या भारी निजी खर्च पर खोजते थे। ज्यादा डिस्पेंसरी मोहल्लों के करीब खुलीं, ताकि बुखार या पट्टी का मतलब हमेशा विशाल अस्पताल के फाटक पर दिन गंवाना न रह जाए।

स्त्री शक्ति शिविरों ने जांच और मूल सेवाएं उन महिलाओं तक पहुंचाईं जो सामान्य दिन बड़े अस्पताल नहीं जातीं। सामुदायिक हाल में पंक्ति में बैठी महिलाएं और उनके पास आए डॉक्टर, देखभाल का भूगोल बदल गए। हर घर के लिए स्वास्थ्य समान नहीं हो गया। प्रतीक्षा सूची गायब नहीं हुई। पहुंच की आधार रेखा हिली। पुनर्वास कॉलोनी का मरीज ऐसा सरकारी केंद्र पा सका जो एक दशक पहले उस रूप में था ही नहीं।

शिक्षा दो पटरियों पर चली। ज्यादा कक्षाओं और संस्थानों ने सरकारी स्कूलों की भीड़ कुछ हल्की की। नई इमारतें उठीं। पाली व्यवस्था को सांस की थोड़ी जगह मिली। निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की सीटों के समर्थन ने वे दरवाजे खोले जिन्हें फीस बंद रखती थी। साधारण घर का बच्चा उस कक्षा में बैठ सका जिसके पैसे माता-पिता अकेले नहीं दे सकते थे।

1 जनवरी 2008 को शुरू लाडली योजना ने बेटी के नाम जन्म से स्कूल के पड़ावों तक पैसे रखे। जन्म या संस्थागत प्रसव पर राशि। कक्षा एक, छह, नौ में प्रवेश पर और आगे दसवीं उत्तीर्ण करने तथा बारहवीं में प्रवेश पर और राशि। पैसा उसके नाम रहा जब तक वह युवा वयस्क होकर, स्कूल में टिक कर, उसे ले न सके। गरीब घर के पास अचानक रुपये में लिखा कारण था कि बेटी कक्षा में रहे। योजना ने हर बेटी को नहीं उठाया। उसने हजारों परिवारों से कहा कि राज्य ने बही के बेटी वाले पन्ने पर छोटी पूंजी रख दी है।

महिलाओं के लिए मदद का ढांचा बढ़ा। दिल्ली महिला आयोग की उपस्थिति गहरी हुई। 181 हेल्पलाइन ने वह नंबर दिया जिसे फाइल के बिना घुमाया जा सके। सहायता केंद्र और स्त्री शक्ति नेटवर्क ने खुली खिड़कियां बनाईं। जो शहर अक्सर महिलाओं की सुरक्षा और सेहत को बाद की बात मानता था, उसने उनके नाम के कमरे और फोन लाइनें खड़ी करनी शुरू कीं।

जो मां स्त्री शक्ति शिविर में जांच करवाती, और बाद में बेटी की स्कूल फाइल में लाडली का कागज लगाती, वह नीति की भाषा नहीं बोलती थी। वह उस सरकार की बात करती थी जिसने बेटियों को देखा।

भागदारी, पार्क और एक शहर जो संभला हुआ लगा

दिल्ली इतनी बड़ी है कि मुख्यमंत्री हर गड्ढा नहीं देख सकते। शीला दीक्षित का उत्तर भागदारी था, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों के साथ साझेदारी।

शब्द का अर्थ साझेदारी है। व्यवहार का अर्थ मासिक बैठकें थीं, पार्क और नाले और स्ट्रीटलाइट की साझी योजनाएं थीं, और अधिकारी तथा निवासी को एक ही कमरे में बैठाने की आदत थी। मुट्ठी भर समूहों से शुरू होकर यह हजारों नागरिक संस्थाओं तक फैला, जो लाखों निवासियों का प्रतिनिधित्व करती थीं। वे वीडियो बैठकों में बैठतीं। एक ही शिकायत एक से अधिक बार सुनतीं: अंधेरी पट्टी, अटा नाला, कूड़े का पार्क, मरम्मत मांगती स्कूल दीवार। फर्क यह था कि शिकायत के साथ अब नाम था, तारीख थी, और वह अधिकारी था जिसे मोहल्ले के सामने जवाब देना था।

2005 में कार्यक्रम को संयुक्त राष्ट्र का पब्लिक सर्विस अवार्ड मिला। दूसरी सरकारें देखने आईं। राष्ट्रमंडल समुदाय ने इसे उपयोगी व्यवहारों में गिना। पुरस्कार पार्क नहीं सींचते। बैठकें सींचती थीं। जो कॉलोनी नगर निकाय पर फाटक से चिल्लाती थी, वह इंजीनियर के साथ बैठ कर काम बांटना सीख गई।

उस अवधि में हरित आवरण बढ़ा। आधिकारिक वन आकलन ने लाभ दर्ज किए, जबकि मेट्रो लाइनें और सड़कें बन रही थीं। अवधि के दस्तावेज और उनके अपने सार्वजनिक वक्तव्य उस शहर की बात करते थे जो नब्बे के दशक के अंत में पतली हरित पट्टी से चला और अगले दशक बड़े घेरे के साथ पहुंचा। ग्रीन दिल्ली अभियानों ने कॉलोनियों से पौधे लगाने और बचाने को कहा। कचरे और लैंडफिल पर शुरुआती सोच शुरू हुई, हालांकि कचरे का पहाड़ एक कार्यकाल में गायब नहीं होने वाला था। ईमानदार दावा छोटा है और फिर भी कहने लायक है: शहर ने पेड़ और कचरे को नागरिक विषय मानना शुरू किया, बाद की बात नहीं।

दिल्ली हाट ने शिल्प और भोजन को वह सार्वजनिक चौक दिया जो रविवार को आज भी परिवार खींचता है। लंबी छुट्टी न कर पाने वाला व्यक्ति दुकानों के बीच चल सकता है, खा सकता है, और महसूस कर सकता है कि राजधानी दफ्तरों से आगे भी जीती है।

उन वर्षों की अर्थव्यवस्था शहर के अनुकूल रही। वृद्धि मजबूत थी। प्रति व्यक्ति आय तेज बढ़ी। पंद्रह वर्षों में कर संग्रह दूसरे पैमाने पर चढ़ा। दफ्तर, दुकानें और नए आवास उस राजधानी को भर गए जो केवल ब्रोशर में नहीं, शाम की गाड़ी में भी आधुनिक दिखने लगी। दिल्ली कामकाजी अंतरराष्ट्रीय शहर जैसा चलने लगी, जबकि गलियों और पुराने बाजारों का शहर भी बनी रही।

शहर तब संभला लगता है जब पार्क की बाड़ काम करे, स्ट्रीटलाइट जले, और आरडब्ल्यूए के फोन पर कोई उत्तर दे। भागदारी ने वह अहसास पहले से ज्यादा आम किया। जो लोग सरकार को केवल दोपहर बंद होने वाली खिड़की मानते थे, उन्होंने सरकार को सुनने को मजबूर साझेदार के रूप में देखा।

शीला दीक्षित का महत्व

शीला दीक्षित का महत्व यह है कि उन्होंने अधूरी कुर्सी पर बैठकर दिल्ली का रोज का शहर बदल दिया। मास्टर प्लान उनके नाम से नहीं छपा। मेट्रो, फ्लाईओवर, सीएनजी बस, जलती बत्ती, पूर्व तक पहुंचा नल, और गली से पूछने की आदत उनके बाद भी चलती है।

वे 3 दिसंबर 1998 से 28 दिसंबर 2013 तक मुख्यमंत्री रहीं। तीन पूरे कार्यकाल। पंद्रह साल।

जन्म 31 मार्च 1938 को कपूरथला में शीला कपूर के नाम से हुआ। कॉन्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी, मिरांडा हाउस से इतिहास। विनोद कुमार दीक्षित से विवाह, जो आईएएस थे और उमा शंकर दीक्षित के पुत्र थे। राजनीति घर की मेज से आई। 1984 में कन्नौज से लोकसभा। राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में राज्य मंत्री। 1998 में दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष, फिर मुख्यमंत्री।

कुर्सी छोटी थी, काम बड़ा था

दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश थी। जमीन, पुलिस, बड़ी योजना और कई मंजूरी केंद्र, उपराज्यपाल और डीडीए के पास थीं। बहाना तैयार था: यह मेरे हाथ में नहीं। उन्होंने बहाना नहीं चुना। जो हाथ में था, उसे पकड़ा। परिवहन, बिजली, पानी, सड़क, स्कूल, अस्पताल, नागरिक बैठक। बाकी के लिए केंद्र से झगड़ा कम, फाइल ज्यादा। पहले कार्यकाल में वाजपेयी सरकार से मेट्रो और गैस निकली। यह समझौता उनकी सबसे व्यावहारिक राजनीति थी।

जो आज भी छूने को मिलता है

  • मेट्रो उनकी सबसे चमकदार देन है। निगम 1995 में बना। रफ्तार उनके समय में आई। ई. श्रीधरन का साथ रहा। शुरुआती दुर्घटनाओं के बाद इस्तीफा नहीं लिया। 24-25 दिसंबर 2002 को शाहदरा-तीस हजारी खुली। दिल्ली को सार्वजनिक समय पर भरोसा मिला।
  • सड़कें दूसरी देन हैं। 65 से अधिक फ्लाईओवर, पुल, सबवे। एम्स, धौला कुआं, रिंग रोड, खेलों से पहले बारापुल्ला। जाम मरा नहीं। खोए घंटे का नक्शा बदला।
  • सीएनजी अदालत का आदेश था। उन्होंने उसे बोझ नहीं, काम माना। बस स्टॉप की हवा बदली। 2010 के आसपास लो-फ्लोर और एसी बसें आईं। फर्श झुकना भी नीति है।
  • बिजली सुधार जुलाई 2002 में हुआ। वितरण टाटा पावर और बीएसईएस को गया। शिखर आपूर्ति लगभग 2,050 मेगावाट से 2013 तक 5,600 से ऊपर। नुकसान करीब 49 प्रतिशत से मध्य किशोरी प्रतिशत की ओर। घर का जनरेटर योजना नहीं रह गया।
  • सोनिया विहार ने गंगा नहर का पानी पूर्व तक पहुंचाया। क्षमता करीब 140 एमजीडी। उत्पादन आंकड़े उस दौर में लगभग 577 से 655 एमजीडी की ओर बढ़े। टैंकर गायब नहीं हुए। नल की आधार रेखा बदली।
  • 2010 के खेल समय-सीमा बने। मेट्रो, सड़क, टर्मिनल 3, स्थल, गेम्स विलेज। भारत पदक तालिका में दूसरा रहा। विवाद रहे। ढांचा रह गया।
  • लाडली, ईडब्ल्यूएस सीटें, स्त्री शक्ति, 181 हेल्पलाइन, आईएलबीएस, कैंसर संस्थान, ज्यादा कक्षाएं। पहुंच बढ़ी। सूची खत्म नहीं हुई।
  • भागदारी ने आरडब्ल्यूए को मेज पर बैठाया। 2005 में संयुक्त राष्ट्र का सम्मान मिला। मध्यम वर्ग की आवाज तेज रही। फिर भी सिद्धांत नया था: गली अधिकारी को बुला सके।

महत्व का सही पैमाना

वे प्रदूषण हमेशा के लिए नहीं मिटा सकीं। पानी हर कॉलोनी में काफी नहीं हुआ। गाड़ियां पाट से तेज बढ़ीं। डीडीए की जमीन उनके पास नहीं थी। 2013 में लंबा दौर थमा।

इसका अर्थ यह नहीं कि काम हल्का था। अर्थ यह है कि उन्होंने अंत नहीं लिखा। आधार रेखा लिखी। थकी नब्बे के दशक की राजधानी एक ऐसे शहर में बदली जो मंगलवार की शाम चल सके, जल सके, नदी पार उतर सके।

बाद की सरकारों को वही मेट्रो, ग्रिड, फ्लाईओवर और गंगा से जुड़ा संयंत्र मिला। उन्हें अधूरी नदी और बढ़ती भीड़ भी मिली।

एक वाक्य में

शीला दीक्षित का महत्व कांग्रेस की नेता होने से बड़ा है, और केवल “महिला मुख्यमंत्री” होने से भी बड़ा है। वे यह साबित कर गईं कि बंटे अधिकार वाले शहर में भी काम हो सकता है, अगर नेता केंद्र से लड़ने से पहले पाइप बिछाने बैठे।

कपूरथला की लड़की ने दिल्ली को पूर्ण नहीं बनाया। उसने दिल्ली को चलने लायक बनाया। शाम को दरवाजे अब भी उसी पटरी पर खुलते हैं। यही महत्व है।

शीला दीक्षित: सड़क, मेट्रो, पानी, बिजली, स्वास्थ्य

उनके पंद्रह साल (3 दिसंबर 1998 से 28 दिसंबर 2013) पांच फाइलों में पढ़े जा सकते हैं, जिन्हें लोग आज भी छूते हैं। पूरा राज्य जैसा अधिकार नहीं था। जमीन और पुलिस औरों के पास थीं। ये पांच काम केंद्र शासित प्रदेश की मुख्यमंत्री कर सकती थीं। इन्हीं से दिल्ली की आधार रेखा बदली।

सड़क

नीति साफ थी। जो चौराहा एक घंटा चुराए, वह योजना की हार है। चौड़ा करो। उठा दो। सिग्नल हटाओ।

उनके वर्षों में 65 से अधिक फ्लाईओवर बने, फुट-ओवर-ब्रिज और सबवे भी। एम्स, धौला कुआं, रिंग रोड के हिस्से, खेलों से पहले बारापुल्ला। यमुना पर सिग्नेचर ब्रिज उसी सोच का था: पूर्व को याददाश्त मत बनाओ।

ट्रैफिक खत्म नहीं हुआ। गाड़ियां कंक्रीट से तेज बढ़ीं। बदला खोए समय का नक्शा। एम्स की एंबुलेंस और रिंग रोड का बाबू अब हर सुबह हार मानने को मजबूर नहीं थे। सड़क मेट्रो की जुड़वां थी। एक जाम के ऊपर-नीचे ले गई। दूसरी जाम में छेद करती रही।

डीएमआरसी

निगम मई 1995 में बना। निर्माण 1998 के बाद तेज हुआ। उनकी भूमिका इंजीनियरिंग नहीं, राजनीतिक आवरण और रोज का पीछा था।

उन्होंने ई. श्रीधरन का साथ दिया। शुरुआती निर्माण मौतों के बाद इस्तीफा नहीं लिया। पाइप-केबल हटाना नागरिक जरूरत माना, एक और फाइल नहीं। दिल्ली और केंद्र अक्सर अलग पार्टियों के थे। मेट्रो चली क्योंकि दोनों ने कैलेंडर को जीतने दिया।

पहली सार्वजनिक पट्टी: शाहदरा से तीस हजारी, 24-25 दिसंबर 2002। पहली भूमिगत: विश्वविद्यालय-कश्मीरी गेट, दिसंबर 2004। फेज वन 2006 तक सिमटा। फेज टू खेलों की समय-सीमा पर लगभग 188 किलोमीटर तक गया।

डीएमआरसी उनकी सबसे टिकाऊ देन बनी। बाद की समय की पाबंदी और लाखों रोज की सवारियां उसी नींव पर खड़ी हैं। उन्होंने मेट्रो का आविष्कार नहीं किया। उन्होंने फाइलों से मेट्रो को मरने नहीं दिया।

पानी

पूर्वी दिल्ली राजधानी का प्रतीक्षालय थी। नीति यह थी कि केवल यमुना पर मत टिको। गंगा नहर का पानी लाओ।

सोनिया विहार औजार बना: करीब 140 एमजीडी / 635 एमएलडी, सूएज के डिजाइन और संचालन में, 2006 के आसपास चालू। मुरादनगर से कच्चा पानी। प्री-सेटलर, क्लैरिफायर, फिल्टर, क्लोरीन। तहिरपुर, शास्त्री पार्क और दक्षिण के कुछ हिस्सों तक पाइप।

उस दौर के उत्पादन आंकड़े लगभग 577 एमजीडी से 655 की ओर बढ़े। कनेक्शन बढ़े। रेणुका जैसे लंबे स्रोत का समर्थन रहा। टैंकर गायब नहीं हुए। नहर बंद हो तो संयंत्र थम जाता। यमुना का अमोनिया अब भी काट देता है। ईमानदार दावा यही है: 1998 की तुलना में पूर्व का नल ज्यादा गंभीर तथ्य बना।

बिजली

सुधार से पहले गर्मी की रात निजी इंजीनियरिंग थी: इन्वर्टर, डीजल की कैन, पड़ोसी का जनरेटर।

जुलाई 2002 में दिल्ली विद्युत बोर्ड टूटा। उत्पादन और पारेषण राज्य के पास रहे। वितरण टाटा पावर और बीएसईएस को गया, हिस्सेदारी और नियामक के साथ।

शिखर उपलब्धता लगभग 2,050 मेगावाट (1997) से 2013 तक 5,600 से ऊपर गई। नुकसान करीब 49 प्रतिशत से मध्य किशोरी प्रतिशत की ओर आया। कटौती छोटी पड़ी। बची रकम अस्पतालों की तरफ भी जा सकी।

बिजली विश्वसनीयता की शहरी योजना थी। जो शहर पंखा नहीं चला सकता, वह आधुनिक राजधानी होने का नाटक नहीं कर सकता। बिजली मुफ्त या पूर्ण नहीं हुई। अंधेरा फिर असामान्य हुआ।

स्वास्थ्य

स्वास्थ्य पहुंच थी, चमत्कार नहीं।

बड़े अस्पताल फैले। आईएलबीएस और दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट विशेषज्ञ क्षमता लाए। ज्यादा डिस्पेंसरी ने पहली यात्रा घटाई। स्त्री शक्ति शिविर जांच मोहल्ले तक ले गए।

औरत की नागरिक सेहत क्लिनिक के साथ चली: दिल्ली महिला आयोग, 181 हेल्पलाइन, सहायता केंद्र।

बात भूगोल की थी। दूर की कॉलोनी का परिवार पूरे शहर को रेफरल न माने। प्रतीक्षा सूची रही। मरीज का गलियारा छोटा और सरकारी हुआ।

पांच फाइलें एक नक्शे पर

  • सड़क और डीएमआरसी आवाजाही थीं।
  • पानी और बिजली घर थे।
  • स्वास्थ्य यह था कि बीमार देह को शहर यहीं संभाले।
  • भागदारी और खेलों की तारीख पांचों को काटती हैं। आरडब्ल्यूए रोशनी और नाले पर बैठे। 2010 ने मेट्रो, फ्लाईओवर, टर्मिनल 3 और स्थलों को कैलेंडर पर बांधा।
  • प्रदूषण, जाम, पानी हमेशा के लिए हल नहीं हुए। बदला मंगलवार का मतलब: ट्रेन आए, पाट चौराहा उठाए, नल केवल अफवाह न हो, सोकेट उजाला थामे, अस्पताल नदी के इसी पार हो।
  • एक पंक्ति में यही फाइल है। शीला दीक्षित का महत्व नारा नहीं। वह शहर है जिसमें लोग अब भी चलते हैं।

भाषणों के बाद भी जो खड़ा है

28 दिसंबर 2013 को मुख्यमंत्री के रूप में उनका लंबा दौर समाप्त हुआ। 20 जुलाई 2019 को उनका निधन हुआ।

भाषण जैसे भाषण करते हैं, मिट गए। नक्शा नहीं मिटा।

मेट्रो भोर से पहले और रात के खाने के बाद भी चलती है। रात की पाली खत्म कर नर्स अब भी ट्रेन पाती है। पूर्वी दिल्ली की छात्रा नदी आधी सुबह गंवाए बिना पार करती है। करोल बाग की दुकान जाता दर्जी उस प्लेटफॉर्म पर खड़ा होता है जो उसके बचपन में था ही नहीं। डिब्बे अब ज्यादा भरे हैं। विचार वही है: शहर के पास चलने का सार्वजनिक रास्ता है।

फ्लाईओवर शाम की भीड़ अब भी उठाते हैं। एम्स, धौला कुआं, बारापुल्ला और दर्जनों छोटे पाट मिनट बचाने का सादा काम अब भी करते हैं। एंबुलेंस जंक्शन के ऊपर की ऊंचाई अब भी इस्तेमाल करती है। परिवार दोपहर निकल बिना शादी पहुंच जाता है।

सीएनजी बसें अब भी चलती हैं, अब बड़े और बदलते बेड़े का हिस्सा बन कर। विचार वही है कि सार्वजनिक परिवहन अपने सवारों को जहर न दे। पहली स्वच्छ ईंधन की बाजी ने अगले बदलाव सोचने लायक बनाए।

सोकेट अब भी उजाला थामे रहते हैं। बालकनी का जनरेटर हर गर्मी की रात की पारिवारिक योजना नहीं रहा। बच्चे पाठ की शिकायत करते हैं, अंधेरे की नहीं।

सोनिया विहार अब भी नहर का पानी शोधित करता है। उन वर्षों में बिछे पाइप उन टंकियों तक चढ़ते हैं जो कभी सूख जाती थीं। पूर्वी दिल्ली का नल 1998 की तुलना में अब भी ज्यादा गंभीर तथ्य है।

जिन अस्पतालों का विस्तार उन्होंने करवाया, वे मरीज लेते हैं। कक्षाएं भरती हैं। लाडली की फाइलें परिवारों के स्टील अलमारियों में रखी हैं, भले बाद की सरकारें योजना का रूप बदलें। हेल्पलाइन का नंबर इसलिए है कि किसी ने पहले तय किया कि मुसीबत में महिला को छोटे नंबर की जरूरत है, लंबे गलियारे की नहीं।

पार्कों में वे पेड़ हैं जिन्हें आरडब्ल्यूए ने भागदारी के तहत सींचा। दिल्ली हाट रविवार को आज भी भोजन की गंध देता है। सचिवालय आईटीओ के पास की इमारत से अब भी काम करता है।

उन्होंने प्रदूषण हमेशा के लिए हल नहीं किया। हर पानी की कमी या हर जाम खत्म नहीं किया। कोई ईमानदार लेखक यह न कहे कि किया। उन्होंने कठिन शहर की आधार रेखा बदली। उन्होंने दिखाया कि केंद्र शासित प्रदेश, अगर केंद्र और अपने नागरिकों के साथ काम करे, तो टिकने वाली चीजें बना सकता है।

आज की दिल्ली 1998 में संभाली गई दिल्ली से बड़ी, समृद्ध और ज्यादा भीड़ वाली है। नई समस्याएं पुरानी समस्याओं के ऊपर बैठी हैं। जीते शहर यही करते हैं। नई समस्याओं के नीचे रोज का शहर उन पंद्रह वर्षों के काम पर अब भी चलता है।

एक प्लेटफॉर्म। चौराहे के ऊपर कंक्रीट का पाट। वह बस जो काला धुआं नहीं उगलती। वह तार जो थामे रहता है। वह नल जो देता है। अस्पताल का गलियारा। बेटी की छात्रवृत्ति का कागज।

शाम की भीड़ में चलो तो उस काम का आकार आज भी महसूस होता है। मेट्रो के दरवाजे खुलते हैं। फ्लाईओवर गाड़ी उठाता है। सोकेट दीये को जिलाए रखता है। यही विरासत है। इसे जोरदार अंत की जरूरत नहीं। इसे केवल इतना चाहिए कि शहर चलता रहे, और उजाला बना रहे।

मेट्रो अभी चलती है। फ्लाईओवर शाम की भीड़ उठाते हैं। सोकेट में उजाला टिकता है। नल कभी-कभी थम जाता है, पर 1998 वाला इंतजार नहीं रहा।

यही विरासत है। शोर नहीं। आदत।

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