क्या आपने कभी सोचा है की जिस ‘टाटा’ (Tata) के नाम पर आप आँख मूंदकर भरोसा करते हैं, जिसे आप ‘देश का नमक’ समझकर हर घर की ज़रूरत मानते हैं, वही टाटा आपकी ही पीठ में खंजर घोंप रहा है? ज़रा सोचिए, एक तरफ तो ये कंपनियां हिंदुओं के पैसों से अपना खज़ाना भरती हैं, और दूसरी तरफ उसी पैसे का इस्तेमाल एक ऐसा ‘इस्लामिक इकोसिस्टम’ खड़ा करने में करती हैं जो आपकी ही जड़ों को काटने के लिए बनाया गया है।
सच तो ये है की भारत में एक बहुत ही खामोश और जहरीली साजिश चल रही है- ‘हलाल ट्रांसफॉर्मेशन’ की साजिश। आज खाने की प्लेट से लेकर आपके निवेश के पोर्टफोलियो तक, हर चीज़ को धीरे-धीरे इस्लामिक सांचे में ढाला जा रहा है। और इस खेल का सबसे बड़ा खिलाड़ी बनकर उभरा है- टाटा एथिकल फंड (Tata Ethical Fund).
ये एक ऐसा फंड है जो सिर्फ और सिर्फ इस्लामिक कानूनों के हिसाब से चलता है, जहाँ एक शरिया बोर्ड बैठकर ये तय करता है की पैसा कहाँ लगेगा और कहाँ नहीं।
अजीब बात देखिए, जिस देश में 80% आबादी हिंदुओं की है, वहाँ हमारी आस्था, हमारे ‘सात्विक’ मूल्यों और हमारे धर्म के हिसाब से कोई बड़ा फंड नहीं है। लेकिन 20% आबादी को खुश करने के लिए टाटा जैसी कंपनियां रेड कार्पेट बिछाए बैठी हैं। ये सिर्फ व्यापार नहीं है, ये सीधे तौर पर हिंदुओं का अपमान है। जब टाटा जैसी कंपनी बाज़ार में ‘शरिया’ को प्रमोट करती है, तो ये संदेश जाता है की उनके लिए हिंदू ग्राहकों की भावनाओं की कोई कीमत नहीं है।
गोश्त की दुकान से शेयर बाज़ार तक – कैसे फैल रहा है ‘हलाल’ का मायाजाल?
हम हिंदुओं की सबसे बड़ी दिक्कत ये है की हम हर चीज़ को बहुत हल्के में लेते हैं। आम हिंदू आज भी यही सोचता है की ‘हलाल’ का मतलब सिर्फ एक खास तरीके से कटा हुआ मीट है। उसे लगता है की “अरे छोड़ो यार, जो नॉन-वेज खाता है, उसे खाने दो हलाल, हमें क्या।” इसी ‘हमें क्या’ वाले एटीट्यूड ने आज हमें इस कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है की हमारे घरों के अंदर तक हलाल घुस चुका है।
ज़रा आंखें खोलकर देखिए, मार्केट में चल क्या रहा है। आज सिर्फ गोश्त हलाल नहीं है। कॉस्मेटिक्स (लिपस्टिक, क्रीम, शैम्पू), अस्पताल, हाउसिंग सोसाइटी, दवाइयां, टूरिज़्म पैकेजेस, और यहाँ तक की शाकाहारी स्नैक्स और आटा-चावल तक हलाल सर्टिफाई हो रहे हैं। हल्दीराम की नमकीन से लेकर पतंजलि के कुछ प्रोडक्ट्स तक पर इस ठप्पे का विवाद उठ चुका है। अब सवाल ये है की जब भारत में 80% आबादी हिंदुओं की है, तो कंपनियों को ये ‘हलाल’ का ठप्पा लगवाने की खुजली क्यों हो रही है?
लॉजिक बहुत सीधा है। इस्लामिक नियम कहता है की एक सच्चा मुसलमान सिर्फ वही चीज़ इस्तेमाल करेगा जो ‘हलाल’ (यानी शरिया कानून के तहत जायज़) हो। अब मुसलमान अपनी इस बात पर एकदम अड़ा रहता है। वो 20% होकर भी 100% कंज्यूमर तानाशाही चलाता है।
दूसरी तरफ, 80% हिंदू इतना ‘सेक्युलर’ और सोया हुआ है की उसे इस बात से कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि वो क्या खरीद रहा है। उसे बस सामान चाहिए। तो कंपनियों ने अपना फायदा देखा। उन्होंने सोचा की अगर हम अपना हर प्रोडक्ट हलाल बना दें, तो वो 20% कट्टर मुसलमान भी हमसे सामान खरीदेगा, और जो 80% बेवकूफ हिंदू है, वो तो खरीद ही रहा है, उसे तो कुछ पता ही नहीं।
नतीजा? एक ऐसी इकॉनमी खड़ी हो गई जहाँ हर हिंदू अनजाने में हलाल सर्टिफिकेशन के लिए पैसे दे रहा है। और ये सर्टिफिकेशन मुफ्त में नहीं मिलता। भारत में जमीयत उलेमा-ए-हिंद (Jamiat Ulema-e-Hind) जैसी प्राइवेट इस्लामिक संस्थाएं कंपनियों से लाखों-करोड़ों रुपये की मोटी फीस वसूलती हैं, तब जाकर उन्हें ये सर्टिफिकेट देती हैं।
और मजे की बात ये है की इस फीस से जो करोड़ों का फंड जमा होता है, उसका इस्तेमाल कहाँ होता है? उसी पैसे से बड़े-बड़े वकीलों की फौज खड़ी की जाती है, जो आतंकवाद के मामलों में पकड़े गए आरोपियों को छुड़ाने के लिए कोर्ट में केस लड़ते हैं।
मतलब, हिंदू अपनी मेहनत की कमाई से बिस्कुट या कॉस्मेटिक खरीदता है, उसमें से कुछ पैसा हलाल सर्टिफिकेट के नाम पर कटता है, और वही पैसा कल को किसी आतंकवादी या कट्टरपंथी को बचाने के काम आता है। ये है आपकी सेक्युलरिज्म की असली कीमत!
‘टाटा एथिकल फंड’- नैतिकता के पर्दे में हिंदुओं के पैसे से ‘शरिया’ का एजेंडा चला रहा है टाटा
अगर आपको लग रहा है की ये हलाल का खेल सिर्फ साबुन और बिस्कुट तक सीमित है, तो आप बहुत बड़े मुगालते में हैं। इन लोगों ने हमारे शेयर बाज़ार (Stock Market) और म्यूच्यूअल फंड (Mutual Funds) इंडस्ट्री को भी नहीं छोड़ा है। और यहाँ फिर से नाम आता है उसी टाटा ग्रुप का, जिसके नासिक ऑफिस में कॉर्पोरेट जिहाद चल रहा था।
टाटा का एक म्यूच्यूअल फंड है, जिसका नाम है- ‘टाटा एथिकल फंड’। जब आम आदमी ‘एथिकल’ शब्द सुनता है, तो उसे लगता है की शायद ये फंड पर्यावरण बचाने वाली कंपनियों में पैसा लगाता होगा, या उन कंपनियों में जो चाइल्ड लेबर का इस्तेमाल नहीं करतीं। लेकिन दाल में कुछ काला नहीं, यहाँ पूरी दाल ही काली है!
ये ‘एथिकल’ नाम सिर्फ हिंदुओं को बेवकूफ बनाने के लिए रखा गया है। असल में, यह एक 100% शरिया-कंप्लायंट म्यूच्यूअल फंड है। जी हाँ, आपने सही पढ़ा। भारत के शेयर बाज़ार में एक ऐसा फंड चल रहा है जो पूरी तरह से इस्लामिक शरिया कानून के हिसाब से काम करता है।
कैसे काम करता है ये फंड? जरा इसके नियम सुनिए। टाटा एथिकल फंड सिर्फ और सिर्फ ‘हलाल’ कंपनियों में इन्वेस्ट करता है। इसके लिए बाकायदा एक इस्लामिक शरिया बोर्ड बैठता है, जो तय करता है की किस कंपनी का स्टॉक ‘पाक’ (पवित्र) है और किसका ‘हराम’। शरिया के हिसाब से ‘रिबा’ (यानी ब्याज) हराम है। इसलिए ये फंड भारत की किसी भी बैंक या फाइनेंस कंपनी (जैसे HDFC, SBI, Bajaj Finance) में एक रुपया नहीं लगाता।
इसके अलावा, ये फंड उन कंपनियों को ब्लैकलिस्ट कर देता है जो:
- सूअर का मांस बेचती हैं।
- शराब बनाती हैं।
- तंबाकू या सिगरेट बेचती हैं।
- जुआ, कैसीनो या लॉटरी का काम करती हैं।
- एडल्ट एंटरटेनमेंट या सिनेमा/म्यूजिक से जुड़ी हैं।
यहाँ तक तो कोई भी आम आदमी कहेगा, “अरे वाह, ये तो बहुत अच्छी बात है, इसमें बुराई क्या है?”
बुराई इसके पीछे छिपे उस इस्लामिक कट्टरपंथ और डबल स्टैंडर्ड्स में है जिसे कोई देखना नहीं चाहता। आज की तारीख में इस टाटा एथिकल फंड का वर्तमान बाजार मूल्य लगभग 3,400 करोड़ से 4,000 करोड़ रुपये के बीच झूल रहा है। यह भारत के सबसे बड़े थीमैटिक फंड्स में से एक बन चुका है।
भारत में ऐसे कई मुसलमान हैं जिन्हें शेयर बाज़ार से पैसा तो कमाना है, लेकिन वो चाहते हैं की उनका पैसा एकदम ‘हलाल’ तरीके से बढ़े। तो टाटा ने उनके लिए बाकायदा रेड कार्पेट बिछा दिया।
और सिर्फ टाटा ही क्यों? बाज़ार में पूरा का पूरा शरिया इकोसिस्टम खड़ा हो चुका है। ‘निप्पॉन इंडिया निफ्टी 50 शरिया बीस’, ‘क्वांटम एथिकल फंड’ जैसे कई फंड्स धड़ल्ले से चल रहे हैं। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ने तो बाकायदा ‘Nifty 50 Shariah Index’ तक बना रखा है, ताकि मुस्लिम इन्वेस्टर्स को कोई टेंशन ही ना हो।
यानी, एक 20% माइनॉरिटी के लिए हमारे शेयर बाज़ार ने, हमारे नेशनल एक्सचेंज ने, और हमारे दिग्गज कॉर्पोरेट्स ने मिलकर एक पूरा का पूरा इस्लामिक फाइनेंस ढांचा तैयार कर दिया। उनके धर्म, उनके मज़हब और उनकी किताब का पूरा सम्मान किया जा रहा है।
100 करोड़ हिंदुओं के लिए ‘सात्विक’ या ‘धार्मिक’ फंड क्यों नहीं?
अब आते हैं सबसे चुभने वाले सवाल पर। वो सवाल जो हर उस हिंदू के मन में उठना चाहिए जो अपना खून-पसीना एक करके पैसा कमाता है और मार्केट में इन्वेस्ट करता है।
अगर इस सेक्युलर देश में 20% मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं का इतना ख्याल रखा जा सकता है की उनके लिए अलग से ‘शरिया इंडेक्स’ और ‘हलाल म्यूच्यूअल फंड’ बना दिए गए… तो फिर 100 करोड़ हिंदुओं (80% आबादी) के लिए आज तक कोई ‘सात्विक म्यूच्यूअल फंड’ या ‘धार्मिक हिंदू फंड’ क्यों नहीं बना?
क्या हिंदुओं का पैसा लावारिस है? क्या हिंदू इन्वेस्टर सिर्फ गधा है जिसे जब चाहो इस्तेमाल करो और फिर लात मार दो?
जरा सोचिए, एक आम कट्टर और धर्म-कर्म मानने वाला हिंदू अपना पैसा बाज़ार में लगाता है। उसे निफ्टी 50 या किसी आम इंडेक्स फंड में इन्वेस्ट करना पड़ता है। वो नहीं जानता की उसका पैसा किन कंपनियों में जा रहा है।
हो सकता है उसका पैसा उन कंपनियों में लग रहा हो जो बड़े पैमाने पर गोमांस का एक्सपोर्ट करती हैं। भारत आज दुनिया के सबसे बड़े बीफ एक्सपोर्टर्स में से एक है, और शेयर बाज़ार में ऐसी कई कंपनियां लिस्टेड हैं जिनका सीधा या इनडायरेक्ट कनेक्शन स्लॉटर हाउस और मीट प्रोसेसिंग से है।
क्या एक सच्चा हिंदू कभी चाहेगा की उसकी गाढ़ी कमाई का एक भी रुपया किसी ऐसी कंपनी में लगे जो गौमाता की हत्या करके पैसा कमाती हो? बिल्कुल नहीं! लेकिन उसके पास कोई चॉइस ही नहीं है।
एक ‘सात्विक म्यूच्यूअल फंड’ कैसा होना चाहिए? अगर शरिया फंड सूअर के मांस वाली कंपनियों को बैन कर सकता है, तो एक हिंदू फंड में उन तमाम कंपनियों पर बैन होना चाहिए जो:
- बीफ (गोमांस) या किसी भी तरह के स्लाटर हाउस/मीट इंडस्ट्री से जुड़ी हों।
- जो चमड़े का बड़े पैमाने पर व्यापार करती हों, जिसमें गोवंश का इस्तेमाल होता हो।
- जो मीडिया हाउस या एंटरटेनमेंट चैनल दिन-रात एंटी-हिंदू प्रोपेगेंडा चलाते हों, हिंदू देवी-देवताओं का मज़ाक उड़ाते हों (जैसे कुछ OTT प्लेटफॉर्म्स)। एक सात्विक फंड का पैसा ऐसी कंपनियों के स्टॉक्स में कभी नहीं जाना चाहिए।
- जो ब्रांड्स अपने विज्ञापनों के जरिए हिंदू त्योहारों (दीवाली पर पटाखा बैन, होली पर पानी बचाओ, करवा चौथ को पितृसत्तात्मक बताना) पर ज्ञान बांटते हैं और हमारी संस्कृति को नीचा दिखाते हैं।
- जो पर्यावरण को भयंकर नुकसान पहुंचाती हों, क्योंकि प्रकृति की पूजा सनातन धर्म का मूल है।
आज मार्केट में एक भी ऐसा ढंग का फंड मौजूद नहीं है। जो एक-आध छोटे-मोटे सात्विक फंड हैं भी, वो इतने छोटे और गुमनाम हैं की किसी को उनके बारे में पता तक नहीं है। ना उन्हें कोई बड़ा एसेट मैनेजमेंट कंपनी प्रमोट करता है, और ना ही उनका स्केल इतना बड़ा है की वो मार्केट में कोई इम्पैक्ट डाल सकें।
अडानी-अंबानी जैसे ‘हिंदू’ उद्योगपति मुसलमानों के आगे नतमस्तक क्यों हैं?
इस देश में मुकेश अंबानी और गौतम अडानी जैसे दिग्गज उद्योगपति हैं। ये दोनों अक्सर अपनी जड़ों, अपनी सनातन संस्कृति और अपने हिंदू होने का बहुत गर्व से प्रदर्शन करते हैं। अंबानी परिवार को हर बड़े मंदिर में दान देते और पूजा करते देखा जा सकता है। अडानी ग्रुप भी राष्ट्रवाद और सनातन प्रतीकों के साथ खड़ा दिखता है।
लेकिन फिर सवाल ये है की जब बात ‘इंस्टीट्यूशनल फाइनेंस’ की आती है, तो ये दिग्गज पीछे क्यों हट जाते हैं? क्यों अडानी या अंबानी की तरफ से एक भव्य, विशाल और आक्रामक ‘सनातन म्यूच्यूअल फंड’ लॉन्च नहीं किया जाता? एक ऐसा फंड जो डंके की चोट पर कहे की ये उन हिंदुओं के लिए है जो सात्विक तरीके से अपना पैसा बढ़ाना चाहते हैं!
सच कहूं तो, इसके पीछे दो कारण हैं। पहला- हमारे हिंदू लीडर्स में वो ‘कट्टरपन’ या वो जिद्द नहीं है जो मुसलमानों में होती है। मुसलमान अपने मज़हब के लिए मार्केट को झुकाना जानता है। दूसरा कारण- ‘सेक्युलरिज्म का नशा’। इन बड़े उद्योगपतियों को लगता है की अगर वो ‘हिंदू फंड’ निकालेंगे, तो वामपंथी मीडिया, लिबरल गैंग और इंटरनेशनल प्रेस उनके पीछे पड़ जाएगी। उन पर सांप्रदायिक होने का ठप्पा लगा दिया जाएगा।
मतलब, टाटा अगर शरिया फंड चलाए, तो वो ‘एथिकल’ और ‘प्रोग्रेसिव’ है। लेकिन कोई हिंदू कंपनी सात्विक फंड चलाए, तो वो ‘सांप्रदायिक’ हो जाएगी! वाह रे मेरे देश के दोगले सेक्युलरिज्म!
कॉर्पोरेट दफ्तरों में क्यों आसान है हिंदुओं को ‘हलाल’ करना और मुस्लिमों का तुष्टिकरण?
अब वापस उसी TCS नासिक वाले मुद्दे पर आते हैं, क्योंकि यहाँ बात टाटा की कंपनी की ही हो रही है और ये दोनों चीजें आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं। जो कंपनियां शरिया फंड बनाकर मुस्लिम समुदाय के सामने लेट जाती हैं, उन्हीं कंपनियों के अंदर धीरे-धीरे ‘हिंदू-विरोधी’ कैंसर पनपने लगता है।
आजकल भारत की हर बड़ी IT कंपनी, FMCG कंपनी और बैंक के HR डिपार्टमेंट्स पर एक खास तरह की ‘वोक’ और वामपंथी सोच वाले लोगों का कब्ज़ा हो चुका है। इन्होंने कंपनियों के अंदर “डाइवर्सिटी” के नाम पर एक ऐसा इकोसिस्टम बना लिया है जहाँ हर माइनॉरिटी तो विक्टिम है, और हर बहुसंख्यक (हिंदू) अत्याचारी है।
आप खुद सोचिए, TCS नासिक में 2022 से लेकर 2026 तक हिंदू लड़कियों के साथ यौन शोषण होता रहा। मुस्लिम लड़कों से कहा गया की ‘जाओ हिंदू लड़कियों को गर्लफ्रेंड बनाओ और उनसे शादी करो।’
एक गवाह ने NDTV और अन्य मीडिया चैनल्स को सरेआम बताया की कैसे आरोपियों को बकायदा फंडिंग दिया जाता था ताकि वो हिंदू लड़कियों को फंसा सकें और उनका ब्रेनवॉश करके उन्हें इस्लाम काबुल करवा सकें। लड़कियों ने HR डिपार्टमेंट को बाकायदा ईमेल्स लिखे। एक-दो नहीं, दर्जनों ईमेल्स। लेकिन HR हेड अश्विनी चिनानी और बाकी मैनेजमेंट क्या कर रहा था? वो कान में रुई डालकर बैठे थे। क्यों?
क्योंकि अगर कोई हिंदू लड़की शिकायत करे की एक मुस्लिम सीनियर उस पर नमाज़ पढ़ने का दबाव डाल रहा है, तो इन लिबरल HR वालों को उसमें ‘इस्लामोफोबिया’ नज़र आने लगता है। ये उस मामले को दबाने की पूरी कोशिश करते हैं ताकि कंपनी की ‘सेक्युलर इमेज’ खराब ना हो। लेकिन वही HR डिपार्टमेंट तब सबसे आगे खड़ा होता है जब किसी मुसलमान कर्मचारी को ऑफिस में दाढ़ी रखने या जुम्मे की नमाज़ के लिए अलग से कमरा चाहिए होता है। तब अचानक से इनकी ‘धार्मिक सहिष्णुता’ जाग उठती है।
ये सिर्फ TCS की कहानी नहीं है। इंफोसिस, विप्रो, कॉग्निजेंट, से लेकर हर बड़े कॉर्पोरेट हाउस में आज यही हो रहा है। बहुसंख्यक हिंदू कर्मचारी सिर्फ काम करने वाले गधे बन कर रह गए हैं। वो चुपचाप काम करते हैं, टैक्स भरते हैं, और अगर कोई उनके धर्म का मज़ाक उड़ाए, तो नौकरी जाने के डर से चुप रह जाते हैं।
दूसरी तरफ, वो लोग जो संख्या में कम हैं, उन्होंने अपना एक सॉलिड नेटवर्क बना लिया है। वो एक-दूसरे को रेफरल देते हैं, एक-दूसरे को प्रमोट करते हैं, और धीरे-धीरे पूरे के पूरे प्रोजेक्ट्स या फ्लोर्स पर अपना वर्चस्व कायम कर लेते हैं।
नासिक में क्या हुआ? निदा खान जैसी आरोपी ने हिंदू लड़कियों को तौसीफ और शफी जैसे दरिंदों से मिलवाया। उन बेचारी लड़कियों को लगा की ये ऑफिस के दोस्त हैं, मदद करेंगे। लेकिन उन्हें क्या पता था की ये ‘हेल्प’ नहीं, बल्कि ‘हलाल’ करने की तैयारी थी। उनसे कहा जाता था की रातों-रात सैलरी हाइक चाहिए तो हमारे साथ चलो, हमारे धर्म को मानो। ये पूरी तरह से एक संगठित ‘इकोनॉमिक टेररिज्म’ और ‘लव जिहाद’ का कॉर्पोरेट वर्शन था।
आर्थिक जिहाद – हिंदुओं के लिए खतरे की घंटी
ये समझना बहुत ज़रूरी है की ‘शरिया म्यूच्यूअल फंड’, ‘हलाल प्रोडक्ट्स’ और ‘TCS नासिक का कॉर्पोरेट जिहाद’- ये तीनों अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं। ये एक ही पेड़ की अलग-अलग शाखाएं हैं। और इस पेड़ का नाम है- आर्थिक जिहाद।
जब आप किसी समुदाय को आर्थिक रूप से इतना मजबूत कर देते हैं की वो अपनी शर्तों पर मार्केट को नचाने लगे, तो उसके नतीजे यही होते हैं। आज हलाल सर्टिफिकेशन के जरिए जो अरबों रुपये का पैरेलल इकोसिस्टम बना है, वो सिर्फ व्यापार नहीं है। वो ताकत है। पैसों की ताकत।
और जब वो पैसा उन कट्टरपंथियों के हाथ में जाता है, तो उसी पैसे से वो सिस्टम को खरीदते हैं। वो कंपनियों के HR डिपार्टमेंट्स में अपने लोग बिठाते हैं। वो वकीलों की फौज खड़ी करते हैं। वो ऐसा नैरेटिव बनाते हैं कि अगर कोई उनके खिलाफ बोले, तो उसे तुरंत ‘नफरत फैलाने वाला’ करार दे दिया जाए।
और हम हिंदू क्या कर रहे हैं? हम आज भी इसी भ्रम में जी रहे हैं की “अरे भाई, सब धर्म एक समान हैं,” “ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम,” और “सेक्युलरिज्म ही सबसे बड़ा धर्म है।”
ज़रा आंखें खोलिए! जब TCS नासिक में उस हिंदू बच्ची पर एक विशेष समुदाय के लोग गिद्धों की तरह टूट पड़े थे, तब उसे बचाने कौन आया था? क्या कोई सेक्युलरिज्म उसे बचाने आया? क्या कंपनी की वो ‘पॉश कमेटी’ उसे बचाने आई जिसके नाम पर ये कॉर्पोरेट्स लंबे-लंबे सेमिनार करते हैं? नहीं! उसे खुद जाकर पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज करानी पड़ी, तब जाकर ये मामला मीडिया में फटा। और अगर वहां कुछ हिंदूवादी संगठनों ने दबाव ना बनाया होता, तो आज भी ये मामला ठंडे बस्ते में पड़ा सड़ रहा होता।
ये हमारे लिए एक अलार्म है। बहुत बड़ा अलार्म। अगर हिंदू समाज आज नहीं जागा, तो कल बहुत देर हो जाएगी। ये धीरे-धीरे जो हर चीज़ ‘हलाल’ हो रही है, ये सिर्फ खाने-पीने तक नहीं रुकेगी। ये आपके ऑफिस के डेस्क तक पहुंच चुकी है, ये आपके शेयर बाज़ार के पोर्टफोलियो तक पहुंच चुकी है, और बहुत जल्द ये आपके घरों के दरवाज़े तोड़कर अंदर घुसेगी।
अब हिंदू को अपनी जेब की ताकत से देना होगा इन दोगली कंपनियों को मुंहतोड़ जवाब
तो रास्ता क्या है? रोने-धोने से कुछ नहीं होने वाला। और ना ही ट्विटर पर दो-चार दिन हैशटैग चलाकर आप इस बीमारी को जड़ से उखाड़ सकते हैं। इसका इलाज एक ही है, और वो है- काउंटर इकॉनमी और बॉयकॉट की असली ताकत।
पहली बात: हिंदू समाज को अपनी जेब की ताकत समझनी होगी। हम 100 करोड़ हैं। इस देश का सबसे बड़ा कंज्यूमर बेस हम हैं। अगर हम तय कर लें की हम किसी भी हलाल-सर्टिफाइड प्रोडक्ट को नहीं खरीदेंगे, तो कंपनियों की रातों की नींद उड़ जाएगी। जिस दिन भारत के हिंदुओं ने हलाल लिखे हुए प्रोडक्ट्स को सुपरमार्केट के शेल्फ पर वैसे ही छोड़ना शुरू कर दिया, उस दिन ये बड़ी-बड़ी कंपनियां घुटनों के बल बैठकर माफी मांगेंगी और ये सर्टिफिकेशन हटाएंगी।
दूसरी बात: हमें अपने ‘हिंदू उद्योगपतियों’ को जगाना होगा। चाहे वो अंबानी हों, अडानी हों, या फिर महिंद्रा और बिड़ला। हमें सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक ये मांग उठानी होगी की हमें शरिया फंड्स के जवाब में एक विशाल और पारदर्शी ‘सात्विक म्यूच्यूअल फंड’ चाहिए। हमें एक ऐसा फाइनेंशियल इकोसिस्टम चाहिए जो हिंदू धर्म के मूल्यों पर आधारित हो। जो हमारे मंदिरों के पैसे को, हमारे निवेशकों के पैसे को वापस हमारे ही धर्म के उत्थान में लगाए, ना कि उसे किसी ‘सेक्युलर’ नाले में बहा दे जहाँ से वो अंततः हमारे ही खिलाफ इस्तेमाल हो।
तीसरी बात: कॉर्पोरेट वर्ल्ड में काम करने वाले हर हिंदू को अपनी आवाज़ उठानी होगी। अगर आपके ऑफिस में, आपके HR डिपार्टमेंट में कोई एंटी-हिंदू नैरेटिव चलाया जा रहा है, या फिर TCS नासिक जैसी किसी ‘निदा खान’ या ‘तौसीफ’ को प्रमोट करके आपके धर्म का मज़ाक उड़ाया जा रहा है, तो चुप मत बैठिए। सबूत इकट्ठा कीजिए। कंप्लेंट कीजिए। सोशल मीडिया का इस्तेमाल कीजिए। जो कंपनी आपका पैसा लेकर चलती है, उसे ये साफ मैसेज जाना चाहिए कि वो आपकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकती।
या तो हिंदुओं के लिए ‘सात्विक फंड’ लाओ, वरना अपने ‘हलाल’ कारोबार का अंजाम भुगतने को तैयार रहो
ये भारत है। ये किसी के बाप की जागीर नहीं है की 20% लोग आकर 80% आबादी पर अपनी जीवनशैली, अपना खान-पान और अपने आर्थिक नियम (शरिया) थोप देंगे। टाटा जैसी कंपनियों को ये तय करना होगा की उन्हें व्यापार करना है या ‘तुष्टिकरण का अड्डा’ चलाना है। अगर वो शरिया फंड चलाकर और अपने ऑफिसों में ‘कॉर्पोरेट कन्वर्शन’ का रैकेट पालकर सोचते हैं की भारत का बहुसंख्यक हिंदू समाज यूं ही चुपचाप तमाशा देखता रहेगा, तो वो एक बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं।
वक्त आ गया है जब इस ‘हलाल इकॉनमी’ की गर्दन मरोड़नी होगी। हमें अपनी सनातन जड़ों की ओर लौटना होगा और एक ऐसा सात्विक, सशक्त और बेखौफ आर्थिक मॉडल खड़ा करना होगा जो ‘तुष्टिकरण’ के सामने झुके नहीं, बल्कि उसका सीना चीर कर अपना हक छीन ले।
याद रखिए, पैसा भगवान नहीं होता, लेकिन इस कलियुग में वो बहुत बड़ी ताकत है। और अगर आपने अपनी ताकत को खुद ही अपने दुश्मनों के हाथों में सौंप दिया, तो कल जब वो उसी पैसे से हथियार खरीदकर आप पर वार करेंगे, तब शिकायत करने का भी मौका नहीं मिलेगा।
जागिए, सवाल पूछिए और अपनी आर्थिक ताकत को ‘सात्विक’ बनाइए, क्योंकि अब बात सिर्फ धर्म की नहीं, आपके वजूद और आपकी आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा की है! और यकीन मानिए, अगर हम आज नहीं लड़े, तो कल हमारा पूरा अस्तित्व ही ‘हलाल’ कर दिया जाएगा।
