सनातन धर्म के लिए मंदिर केवल ईंट और पत्थर से बनी कोई इमारत नहीं होते हैं। एक हिंदू के लिए मंदिर साक्षात उस परमात्मा का निवास है जहाँ सदियों से हमारे पूर्वजों ने अपने मंत्रों और अपनी भक्ति से देवता के प्राणों की प्रतिष्ठा की होती है।
लेकिन क्या हो जब ‘आधुनिकता’ और ‘विकास’ के नाम पर सत्ता के नशे में चूर कोई सरकार उसी पवित्र मंदिर पर बुलडोजर चला दे?
हम बात कर रहे हैं कुछ दिन पहले हुई उस मनहूस घटना की, जब तेलंगाना सरकार ने अपने ‘यंग इंडिया इंटीग्रेटेड रेजिडेंशियल स्कूल’ प्रोजेक्ट के नाम पर वारंगल के अशोक नगर में एक 13वीं शताब्दी के प्राचीन शिव मंदिर को ज़मींदोज़ कर दिया।
जो काम सदियों पहले क्रूर जिहादी मुगल और खिलजी अपनी खून से सनी तलवारों से किया करते थे, वही काम आज का ये ‘सेक्युलर’ सिस्टम अपने सरकारी बुलडोजरों से कर रहा है।
फर्क सिर्फ इतना है की तब आक्रांता विदेशी थे, उनकी भाषा अलग थी, उनका पहनावा अलग था। वो सीना ठोक कर कहते थे की हम काफिरों के मंदिर तोड़ने आए हैं।
लेकिन आज? आज जो लोग हमारे मंदिरों को मलबे में तब्दील कर रहे हैं, वो हमारे ही बीच के हैं। वो ‘विकास’ और ‘एजुकेशन’ का मुखौटा पहनकर आते हैं। वो फाइलें लेकर आते हैं। और फिर एक ही रात में 800 साल पुराने उस प्राचीन शिव मंदिर को मिट्टी में मिला देते हैं जिसे मुगलों और निज़ामों की पुस्तें भी नहीं हिला पाई थीं।
काकतीय साम्राज्य का वो शौर्य और वारंगल का वो शिव मंदिर जिसे मलबे में मिला दिया गया
आगे बढ़ने से पहले ज़रा फ्लैशबैक में चलते हैं। वारंगल कोई ऐरी-गैरी जगह नहीं है। ये काकतीय शूरवीरों की वो धड़कती हुई ज़मीन है, जिसने दक्षिण भारत को इस्लामी आक्रांताओं की गिद्ध दृष्टि से बचाकर रखा था।
12वीं और 13वीं सदी के उस दौर को याद करो जब उत्तर भारत में जिहादी इस्लामी लुटेरे कत्लेआम मचा रहे थे। उस अंधकार भरे वक्त में काकतीय राजाओं ने न सिर्फ सनातन धर्म की रक्षा के लिए अपनी तलवारें उठाईं, बल्कि वास्तुकला के वो अद्भुत नमूने खड़े किए जो आज भी दुनिया को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर देते हैं।
रामप्पा मंदिर से लेकर हज़ार खंभों वाले मंदिर तक, काकतीय शासकों ने शिवभक्ति को पत्थरों में अमर कर दिया था।
वारंगल के अशोक नगर का ये शिव मंदिर भी उसी स्वर्णिम इतिहास का एक जीता-जागता हिस्सा था। इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो पता चलेगा की ये भव्य मंदिर 13वीं शताब्दी में काकतीय वंश के महानतम शासकों में से एक, महाराजा गणपतिदेव (1199–1262 ई.) के राज-काज के दौरान बना था।
महाराजा गणपतिदेव सनातन के एक ऐसे रक्षक थे जिनके नाम से ही दुश्मनों की रूह कांपती थी। उनके राज में वारंगल ने वो आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ऊंचाई देखी थी जिसका आज हम सिर्फ अंदाज़ा ही लगा सकते हैं।
1965 में बकायदा हेरिटेज विभाग ने इस मंदिर को अपनी फाइलों में एक ऐतिहासिक स्थल के रूप में दर्ज किया था। लेकिन आज के इन सत्ता के नशे में अंधे हो चुके नेताओं को 800 साल पुरानी उस अहमियत से क्या लेना-देना? उनके लिए तो वो बस एक रोड़ा था, जिसे रास्ते से हटाना था। और उन्होंने हटा दिया… पूरी बेशर्मी से!
वो खौफनाक रात जब तेलंगाना सरकार के बुलडोजरों ने रौंद डाला हिन्दुओं का शिव मंदिर
अब आते हैं उस काली रात और दिन के घटनाक्रम पर जब विकास के नाम पर विनाश का यह नंगा नाच खेला गया। राज्य सरकार ने तय किया की वारंगल की खानापुर मंडल में 30 एकड़ ज़मीन पर एक शानदार ‘इंटीग्रेटेड स्कूल’ बनाया जाएगा।
काम का ठेका मिल गया TGEWIDC (तेलंगाना स्टेट एजुकेशन वेलफेयर एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन) को। अच्छी बात है, स्कूल बनने चाहिए। पढ़ाई-लिखाई से किसे एतराज़ हो सकता है?
लेकिन क्या उस विशाल ज़मीन पर स्कूल बनाने के लिए ठीक बीचो-बीच खड़े उस 800 साल पुराने शिव मंदिर को कुचलना ही इकलौता रास्ता बचा था? जब सरकारी ठेकेदारों ने साइट पर भारी मशीनरी और बुलडोजर उतारे तो कुछ ही पलों में उस मंदिर को ध्वस्त कर दिया। वे पत्थर जिन पर काकतीय वास्तुकला की छाप थी, ताश के पत्तों की तरह ढह गए।
इस देश का दुर्भाग्य देखिए। जब भी विकास की बात आती है, जब भी कोई सड़क चौड़ी करनी होती है, जब भी कोई स्कूल या अस्पताल बनाना होता है, तो सिस्टम की नज़र सबसे पहले किसी हिंदू मंदिर पर ही क्यों पड़ती है?
अरे, इस देश में तो मुगलों की बनाई हुई उन इमारतों को भी ‘हेरिटेज’ का तमगा देकर छाती से लगा लिया जाता है, जिनकी नींव में हमारे पूर्वजों का खून और टूटे हुए मंदिरों का मलबा दबा है।
एक तरफ वो जिहादी आक्रांताओं के मकबरे हैं जिनकी हिफाज़त के लिए सरकारें करोड़ों लुटा देती हैं, और दूसरी तरफ हमारा वो प्राचीन शिव मंदिर है जिसे रातों-रात TGEWIDC के ठेकेदारों ने अपनी भारी-भरकम मशीनों से ऐसे कुचल डाला जैसे कोई सड़क छाप अतिक्रमण हो!
ये घटना बताती है की सिस्टम के भीतर औरंगजेब की आत्मा आज भी ज़िंदा है। पहले वो घोड़ों पर आते थे, आज वो बुलडोजर लेकर आते हैं। लक्ष्य तब भी वही था- हिंदू प्रतीकों को मिटाना, और लक्ष्य आज भी वही है। बस तरीके बदल गए हैं।
वारंगल की वो पावन मिट्टी, जिसने काकतीय वीरों का वो पराक्रम देखा है जिसके आगे बड़े-बड़े सुल्तानों के पसीने छूट जाते थे, आज वो ही मिट्टी अपने आराध्य महादेव के इस घोर अपमान पर खून के आंसू रो रही है।
जब ये भयंकर विध्वंस हुआ और सुबह गांव वालों को इसकी भनक लगी, तो वहां चीख-पुकार मच गई। तस्वीरें वायरल होने लगीं। लोगों का गुस्सा उबलने लगा। और तब शुरू हुआ हमारी इस ढीठ और बेशर्म व्यवस्था का वो पुराना रटा-रटाया ड्रामा।
सेक्युलर सरकार का वो बेहूदा तर्क- “हमें मंदिर दिखा ही नहीं”
जब बवाल बढ़ा तो वहां के स्थानीय विधायक दोंथी माधव रेड्डी और वारंगल की कलेक्टर डॉ. सत्य शारदा पहुंच गए। और पता है मीडिया के सामने उन्होंने क्या बकवास की? उन्होंने कहा- “अरे, वो मंदिर तो बहुत घनी झाड़ियों और पेड़ों के बीच छिपा हुआ था। सर्वे करने वाले अधिकारियों को तो वो दिखा ही नहीं!”
मतलब हद होती है यार! ये बयान नहीं है, ये हम हिंदुओं की अक्ल का सरेआम किया गया अपमान है। अरे कलेक्टर साहिबा, आप किसे बेवकूफ बना रही हैं?
आज के इस दौर में जब आपके पास ड्रोन मैपिंग है, सैटेलाइट इमेजरी है, जीपीएस और टोटल स्टेशन सर्वे जैसी हाई-टेक तकनीकें हैं… एक-एक इंच ज़मीन का डिजिटल नक्शा बनता है, और आप हमसे ये उम्मीद कर रही हैं की हम मान लें की 30 एकड़ के खुले प्लॉट में एक पूरा का पूरा 800 साल पुराना काकतीय मंदिर किसी को दिखा ही नहीं?
क्या वो बुलडोजर चलाने वाला मोतियाबिंद का मरीज़ था? जब उसकी मशीन के लोहे के दांत उन विशाल पत्थरों, खंभों और शिवलिंग से टकरा रहे थे, तब भी उसे पता नहीं चला की वो क्या तोड़ रहा है? झाड़ियां कितनी भी घनी क्यों न हों, पत्थर की विशाल इमारत कोई माचिस की डिब्बी थोड़ी है जो छिप जाएगी!
सच्चाई तो ये है भाई, की उन्हें सब कुछ दिख रहा था। उनकी आंखों पर झाड़ियां नहीं, बल्कि हिंदू-विरोध और सेक्युलर तुष्टिकरण की पट्टी बंधी हुई थी।
उन्हें बहुत अच्छे से पता था की वो क्या तोड़ रहे हैं। लेकिन उन्हें ये भी पता था कि ये हिंदुओं का मंदिर है। और हिंदू तो बेचारा सहिष्णु है ना! वो कहाँ सड़कों पर आकर टायर जलाएगा? वो कहाँ सरकारी बसों में आग लगाएगा? इसी “हिंदू कायरता” का फायदा उठाकर प्रशासन ने जानबूझकर, पूरी प्लानिंग के साथ इस मंदिर को समतल कर दिया ताकि वहां कंक्रीट का एक नया स्कूल खड़ा किया जा सके।
अगर वहां मंदिर की जगह मज़ार होती तो क्या ये सरकार उसे छूने की हिम्मत करती?
यहीं आकर सबसे ज़्यादा खून खौलता है। अब ज़रा इस कहानी को पलट कर देखते हैं। मान लीजिए, उस 30 एकड़ ज़मीन के ठीक बीचो-बीच 800 साल पुराना शिव मंदिर न होकर कोई 50 साल पुरानी मज़ार होती। या फिर किसी सूफी संत की कोई कब्र होती। या अंग्रेजों के ज़माने का कोई खंडहर नुमा चर्च होता। तो क्या सिस्टम का कोई भी माई का लाल अधिकारी उस पर एक खरोंच भी मार सकता था?
क्या तब कलेक्टर साहिबा और विधायक महोदय कैमरे पर आकर ये बोलने की हिम्मत कर पाते कि “अरे, वो मज़ार तो झाड़ियों में छिपी थी”?
लिख कर ले लो भाई, उस मज़ार के दो किलोमीटर दूर से ही स्कूल का नक्शा बदल दिया जाता! वो पूरी की पूरी 30 एकड़ की ज़मीन ही वक्फ बोर्ड अपनी बताकर उस पर बोर्ड ठोक देता और सरकार उनके सामने घुटने टेक कर खड़ी रहती।
रातों-रात फतवे जारी हो जाते। पूरे देश में बवाल मच जाता। वामपंथी मीडिया के वो सारे गिद्ध पत्रकार अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर वारंगल में डेरा डाल लेते। आधी रात को सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े खुल जाते और चीफ जस्टिस खुद सुनवाई करने बैठ जाते।
लेकिन क्योंकि वो एक हिंदू मंदिर था… क्योंकि वो हमारे आराध्य भगवान शिव का स्थान था… इसलिए उसे बिना किसी झिझक के, बिना किसी डर के ढहा दिया गया। तेलंगाना में इस वक़्त कांग्रेस की सरकार है, और उनके राज में हिंदू प्रतीकों को जिस तरह से लावारिस छोड़ दिया गया है, वो कोई नई बात नहीं है।
कानूनों का चीरहरण और हेरिटेज एक्ट को नज़र अंदाज़ करके चलाया गया बुलडोज़र
इस देश में एक आम आदमी अगर अपने घर की एक दीवार भी बिना म्युनिसिपैलिटी की परमिशन के बना ले, तो अगले दिन चालान लेकर बाबू दरवाज़े पर खड़ा हो जाता है। अवैध निर्माण बताकर हथौड़े चला दिए जाते हैं। लेकिन जब यही सरकारें खुद हमारे मंदिरों पर हमला करती हैं, तो सारे कानून कचरे के डिब्बे में क्यों डाल दिए जाते हैं?
इस विध्वंस में सिर्फ हमारी आस्था की नहीं, बल्कि देश और राज्य के कानूनों की भी सरेआम धज्जियां उड़ाई गई हैं। ‘कोठा तेलंगाना चरित्र बृंदम’ (KTCB) के संयोजक और जाने-माने इतिहासकार एस. हरगोपाल जी ने इस पूरी घटना पर जो सवाल उठाए हैं, उसका जवाब किसी सेक्युलर नेता के पास नहीं है।
उनका साफ कहना है की अगर आपको वहां स्कूल बनाना ही था, तो उस मंदिर को स्कूल के लैंडस्केप का हिस्सा क्यों नहीं बनाया? आज के आर्किटेक्ट इतने तो समझदार हैं की पुरानी इमारत को डिस्टर्ब किए बिना नया नक्शा पास कर दें। इससे वहां पढ़ने वाले बच्चों को भी अपने काकतीय इतिहास पर गर्व करने का मौका मिलता।
धरोहर बचाने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ रहे वकील इम्मानेनी रामा राव जी ने इस जिहादी मानसिकता वाले कृत्य के खिलाफ ‘नेशनल मॉन्यूमेंट्स अथॉरिटी’ (NMA) और केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय में बाकायदा आधिकारिक शिकायत ठोकी है।
उन्होंने साफ-साफ बताया है की ये सब ‘तेलंगाना हेरिटेज (प्रोटेक्शन, प्रिजर्वेशन, कंजर्वेशन एंड मेंटेनेंस) एक्ट, 2017’ (Telangana Heritage Act 2017) की धारा 30 का सीधा और खुला उल्लंघन है। इस कानून के हिसाब से आप किसी भी ऐतिहासिक साइट को बिना पुरातत्व विभाग की लिखित परमिशन के छू तक नहीं सकते।
पर यहाँ तो नियम-कानून का मज़ाक बनाकर रख दिया गया! TGEWIDC के ठेकेदारों ने बिना किसी हेरिटेज सर्वे के, बिना किसी परमिशन के रातों-रात महादेव के मंदिर पर मशीनें चढ़ा दीं।
क्या प्रशासन में एक भी ऐसा बाबू नहीं था जिसने काम शुरू होने से पहले नक्शा और हेरिटेज क्लियरेंस चेक किया हो? सच तो ये है की जब बात हिंदू धरोहरों को मिटाने की आती है, तो ये सिस्टम खुद ही जज और खुद ही जल्लाद बन जाता है।
शिव मंदिर को बचाने के लिए फूटा शिवभक्तों का गुस्सा और गांव वालों की हुंकार
खैर… चाहे सिस्टम जितना भी ताकतवर और मगरूर क्यों न हो, जब हिन्दुओं की आस्था पर चोट लगती है तो ज्वालामुखी को फटने से कोई नहीं रोक सकता। जब अशोक नगर (वारंगल) और उसके आस-पास के गांव वालों को इस बर्बरता का पता चला, तो उनका धैर्य जवाब दे गया।
जब प्रशासन को लग रहा था की हिंदू तो सो रहा है, ये बात आई-गई हो जाएगी, तब वहां के शिवभक्तों, लोकल ग्रामीणों और इतिहास प्रेमियों ने मौके पर पहुंचकर उन मशीनों का रास्ता रोक लिया।
जब गांव वालों ने साफ अल्टीमेटम दिया की अगर दोषियों पर तुरंत FIR दर्ज करके उन्हें जेल में नहीं डाला गया तो पूरे इलाके में उग्र आंदोलन होगा, तब जाकर इस ठंडे पड़े सिस्टम में हड़कंप मचा।
इसी को कहते हैं हिंदू जागरण! जब तक तुम सड़कों पर उतरकर कॉलर नहीं पकड़ोगे, ये व्यवस्था तुम्हें इसी तरह पैरों तले रौंदती रहेगी। बढ़ते जन-आक्रोश को देखकर आखिरकार केंद्र के पुरातत्व विभाग को भी नींद से जागना पड़ा और मामले में दखल देना पड़ा।
नया शिव मंदिर बनाने का झूठा लॉलीपॉप और हिन्दुओं की पीठ में घोंपा गया सेक्युलर खंजर
अब जब मामला बिगड़ गया, सोशल मीडिया पर थू-थू होने लगी और राजनीतिक आग पूरे राज्य में फैलने लगी, तो शुरू हुआ असली पॉलिटिकल ड्रामा- डैमेज कंट्रोल की नौटंकी!
कलेक्टर डॉ. सत्य शारदा और विधायक दोंथी माधव रेड्डी ने आनन-फानन में मीडिया के सामने जो कहा, वो जले पर नमक छिड़कने से कम नहीं था।
विधायक महोदय ने बड़ी बेशर्मी से जनता को शांत करने के लिए एक लॉलीपॉप पकड़ाते हुए कहा- “अरे आप लोग प्लीज़ चिंता मत कीजिए। हम स्कूल के पास ही उसी जगह पर एक बिलकुल नया शिव मंदिर बनवा देंगे। और तो और, वहां माँ सरस्वती की एक सुंदर सी मूर्ति भी स्थापित करवा देंगे।”
वहीं कलेक्टर साहिबा ने भी पुरानी स्मारकों को “दुर्लभ विरासत” बताते हुए हवा-हवाई बातें कीं कि वो पुरातत्व विभाग से बात करेंगी, पारंपरिक वास्तुकारों को बुलाएंगी और मंदिर का ओरिजिनल डिज़ाइन देखकर वैसा ही नया मंदिर खड़ा करवा देंगी।
वाह रे सिस्टम! क्या गज़ब का ‘सेक्युलर’ लॉजिक है तुम्हारा! मंदिर कोई सीमेंट, गारे और ईंट का मकान है क्या की आज मन किया तो गिरा दिया और कल टेंडर पास करके नया खड़ा कर दिया? क्या कोई नया ठेकेदार या आर्किटेक्ट उस 13वीं सदी की उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा को वापस ला सकता है जो उन पत्थरों में रची-बसी थी?
वो प्राचीन पत्थर जिन पर काकतीय वास्तुकला की छाप थी, जिन पर राजा गणपतिदेव के दौर के शिल्पकारों ने अपने हाथों से छेनी-हथौड़े चलाए थे, क्या वो वापस आ जाएंगे? 1231 ईस्वी का वो दुर्लभ तेलुगु शिलालेख, जो अब तुम्हारे बुलडोजर के नीचे दबकर चकनाचूर हो चुका है, क्या उसे कोई 3D प्रिंटर से प्रिंट करके ले आएगा?
नहीं ला सकते तुम! ये कोई भरपाई नहीं है। एक प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर को तोड़कर वहां नया मंदिर बना देना उसका ‘संरक्षण’ नहीं होता, वो तुम्हारे पाप का प्रायश्चित नहीं हो सकता।
ये तो बस अपनी गर्दन बचाने और एफआईआर से बचने की एक भद्दी चाल है। ये हमें शांत करने का वो लॉलीपॉप है जिसे चूसकर हम चुपचाप अपने घरों में बैठ जाएं।
हिन्दुओं को चेतावनी, अब जाग जाओ वरना कल तुम्हारा वजूद मिट जाएगा
वारंगल की उस पावन धरती पर जो विध्वंस हुआ है, वो सिर्फ एक जिले या एक राज्य की घटना नहीं है। ये पूरे भारतवर्ष के 100 करोड़ से ज़्यादा सनातनियों के लिए एक बहुत बड़ा अलार्म है।
अगर आज भी हम अपने इतिहास, अपनी संस्कृति और अपने मंदिरों के प्रति यूं ही उदासीन और बंटे हुए रहे, तो लिख कर रख लो… एक दिन ऐसा आएगा जब हर दिन कोई न कोई सरकारी बुलडोजर हमारे किसी न किसी मंदिर पर चढ़ता हुआ दिखाई देगा।
हम अक्सर अपने बच्चों को महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज और काकतीय राजाओं की बहादुरी की कहानियां सुनाते हैं। हम सीना चौड़ा करके बताते हैं की कैसे हमारे पूर्वजों ने मुगलों और आक्रांताओं की तलवारों के सामने अपनी गर्दन कटा ली लेकिन अपने मंदिरों पर आंच नहीं आने दी।
लेकिन ज़रा सोचो, कल जब हमारी आने वाली पीढ़ियां हमसे पूछेंगी की “जब आज़ाद भारत में एक 800 साल पुराने शिव मंदिर को विकास के नाम पर रौंदा जा रहा था, तब आप क्या कर रहे थे?”
तब हम उन्हें क्या जवाब देंगे? क्या हम कहेंगे की हम सोशल मीडिया पर रील्स स्क्रॉल कर रहे थे या भाईचारे और सेक्युलरिज्म का पाठ पढ़ रहे थे?
अगर आज हम इस अन्याय को भूलकर अपने रोज़मर्रा के कामों में लग गए, तो याद रखना… कल हमारी आने वाली पीढ़ियां हमारे इतिहास को सिर्फ किताबों में ही ढूंढा करेंगी! उठो, जागो और अपनी हिन्दू सभ्यता की रक्षा के लिए खड़े हो जाओ। क्योंकि जो समाज अपना इतिहास नहीं बचा सकता, उसका भविष्य कभी सुरक्षित नहीं रह सकता।
हर हर महादेव!
