झारखंड-छत्तीसगढ़ के जंगलों में विदेशी चंगाई सभाओं का खौफनाक जाल, भोले-भाले वनवासी हिंदुओं के बीच कैंसर की तरह फैलता विदेश फंडेड ईसाई धर्मांतरण

हमारे टीवी चैनलों पर दिन-रात कश्मीर, पाकिस्तान और राजनीति की बातें चलती रहती है। लेकिन देश के अंदर, झारखंड और छत्तीसगढ़ के उन घने जंगलों में जो सनातन के खिलाफ एक भयानक और खौफनाक साइलेंट वॉर चल रहा है, उस पर सबने अपनी आंखें मूंद रखी हैं। 

वहां कोई गोलियां नहीं चल रहीं, कोई बम नहीं फूट रहे, लेकिन फिर भी हमारे सनातन धर्म की जड़ें रोज़ काटी जा रही हैं।

ये युद्ध बंदूकों से नहीं लड़ा जा रहा भाई! ये लड़ा जा रहा है समंदर पार से आ रहे विदेशी डॉलरों, फर्जी चमत्कारों और उन सफेद चोगे वाले पादरियों के पाखंड से, जिन्हें इस देश का सेक्युलर सिस्टम बड़े सम्मान से ‘मिशनरी’ कहता है। 

असल में ये कोई समाज सेवा करने वाले संत नहीं हैं, ये वो खूंखार सामाजिक गिद्ध हैं जिनका इकलौता मकसद हमारे उन भोले-भाले वनवासी हिन्दू भाइयों को ईसाई (Christian) बनाना है, जो आज भी जंगलों में अपनी सादगी के साथ जीते हैं।

इन मिशनरियों का असली खेल क्या है? ये गरीबों की मदद करने या स्कूल-अस्पताल खोलने नहीं जाते। ये ‘सोल हार्वेस्टिंग’ (Soul Harvesting) यानी आत्माओं का व्यापार करने जाते हैं। 

सदियों से हमारे वनवासी भाई अपनी सरना माता की पूजा करते आए हैं, अपने बोंगा देवता और महादेव के सामने सिर झुकाते आए हैं। राम जी की शबरी माता भी तो उसी वनवासी समाज की थीं ना! 

लेकिन ये सफेद चोगे वाले पाखंडी पादरी हमारे ही भाइयों के बीच जाकर क्या ज़हर घोलते हैं? ये उन्हें बताते हैं की तुम्हारे देवी-देवता तो ‘शैतान’ हैं, तुम्हारी प्रकृति पूजा तो अंधविश्वास है।

ज़रा सोचिए इस नीचता को! ये सिर्फ किसी का धर्म नहीं बदल रहे, ये एक पूरी की पूरी नस्ल का सांस्कृतिक कत्लेआम कर रहे हैं। ये हमारे ही वनवासी भाइयों का ब्रेनवॉश करके उन्हें अपनी ही जड़ों, अपने ही पुरखों और अपने ही सनातन धर्म से नफरत करना सिखा रहे हैं। 

और हम शहर में बैठे हिंदू बस ये सोचकर खुश हो रहे हैं की हमारे घर तक तो ये आग नहीं पहुंची। लेकिन यकीन मानिए, ये धर्मांतरण का कैंसर जिस तेज़ी से फैल रहा है, वो दिन दूर नहीं जब ये सफेद चोगे वाले गिद्ध हमारे शहरों के मोहल्लों तक पहुंच जाएंगे।

ईसाईयों का ‘चंगाई सभा’ का पाखंड और नकली चमत्कारों की आड़ में हिन्दू वनवासियों का धर्मांतरण

अब ज़रा इनके ‘धंधे’ के सबसे खौफनाक हथकंडे पर आते हैं- चंगाई सभा (Healing Crusade)। आपने भी कभी ना कभी सोशल मीडिया या यूट्यूब पर इनके वीडियो देखे होंगे।

बड़े-बड़े टेंट लगे होते हैं, लाउडस्पीकर पर कान फोड़ने वाली आवाज़ में ‘हालेलुया-हालेलुया’ का ड्रामा चल रहा होता है और स्टेज पर एक सूट-बूट पहना हुआ पादरी ऐसे एक्टिंग कर रहा होता है जैसे वो कोई साक्षात भगवान का दूत हो।

ये चंगाई सभाएं कोई प्रार्थना सभाएं नहीं हैं, ये एक बहुत बड़ा और सुनियोजित फ्रॉड है! स्टेज पर पहले से ही पैसे देकर उन ‘पेड एक्टर्स’ (Paid Actors) को बिठाया जाता है जो बीमारी का नाटक करते हैं।

फिर वो पादरी आता है, उनके सिर पर हाथ रखता है, कुछ अजीब सी भाषा में चिल्लाता है और अचानक से वो व्हीलचेयर पर बैठा आदमी उठकर नाचने लगता है! कोई कहता है की मेरी आंखों की अंधी रोशनी वापस आ गई, तो कोई चिल्लाता है की मेरा सालों पुराना कैंसर एक सेकंड में ठीक हो गया!

अरे भाई, ये कैसा चमत्कार है? अगर तुम्हारे छूने भर से कैंसर और लकवा ठीक हो जाता है, तो फिर ईसाई देशों में इतने बड़े-बड़े अस्पताल क्यों खुले हैं? वहां के लोग बीमार पड़ने पर डॉक्टर के पास क्यों जाते हैं, सीधे चर्च क्यों नहीं चले जाते? लेकिन ये पाखंडी जानते हैं की दिल्ली-मुंबई के पढ़े-लिखे लोगों पर उनका ये थर्ड-क्लास बॉलीवुड ड्रामा नहीं चलेगा।

इसीलिए ये लोग झारखंड और छत्तीसगढ़ के उन अंदरूनी और दुर्गम जंगलों को अपना शिकार बनाते हैं, जहाँ आज आज़ादी के इतने सालों बाद भी ढंग के अस्पताल और डॉक्टर नहीं पहुंच पाए हैं।

जब कोई बेचारा वनवासी अपने बीमार बच्चे को लेकर तड़प रहा होता है, और उसके पास इलाज के पैसे नहीं होते, तब ये गिद्ध वहां पहुंचते हैं। ये उसकी मजबूरी और लाचारी का सीधा फायदा उठाते हैं।

ये कहते हैं की तुम्हारे पुराने देवताओं ने तुम्हें बीमार किया है, अब यीशु की शरण में आओ तो सब ठीक हो जाएगा। और फिर उस बेचारे की बीमारी का डर दिखाकर, उसे थोड़ा बहुत राशन-वाशन थमाकर उसके गले में वो क्रॉस (Cross) पहना दिया जाता है। ये सेवा नहीं है, ये बीमारी और लाचारी की मंडी में इंसानियत का सबसे घिनौना सौदा है।

FCRA की आड़ में विदेशी फंडिंग का वो ईसाई नेक्सस जो हिन्दू धर्म को दीमक की तरह खोखला कर रहा है

अब एक बहुत सीधा सा सवाल उठता है की जंगलों के अंदर इतने बड़े-बड़े टेंट लगाने, साउंड सिस्टम बिछाने, पादरियों की फौज खड़ी करने और लोगों को राशन बांटने का ये अरबों रुपया आखिर आता कहां से है? कोई तो होगा जो इस धर्मांतरण के काले धंधे में पानी की तरह पैसा बहा रहा है?

इसका जवाब है- विदेशी फंडिंग का वो खौफनाक नेक्सस, जो एफसीआरए (FCRA – Foreign Contribution Regulation Act) की आड़ में हमारे देश को दीमक की तरह अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है।

अमेरिका, कनाडा और यूरोप के बड़े-बड़े चर्च और वहां की ईसाई संस्थाएं भारत में बैठे एनजीओ (NGOs) को ‘गरीबों की मदद’, ‘बच्चों की शिक्षा’ और ‘अनाथालयों’ के नाम पर समंदर पार से डॉलरों की बारिश करते हैं। कागज़ों पर ये सब बहुत पवित्र और समाज सेवा का काम लगता है।

लेकिन ज़मीन पर इस पैसे का क्या होता है? ये पैसा किसी वनवासी बच्चे के लिए स्कूल बनाने में खर्च नहीं होता। इस पैसे से रातों-रात लाखों की तादाद में क्षेत्रीय भाषाओं में बाइबल छापी जाती हैं।

इस पैसे से उन लोकल ‘एजेंटों’ को भारी-भरकम सैलरी और कमीशन दिया जाता है जिन्हें ‘टारगेट’ दिया जाता है की इस महीने तुम्हें 50 हिंदू परिवारों का धर्म बदलवाना है। मतलब, ये पूरा का पूरा एक कॉर्पोरेट धंधा बन चुका है! प्रति व्यक्ति धर्मांतरण के हिसाब से रेट तय होते हैं।

जब मई 2026 तक आते-आते हमारी राष्ट्रवादी सरकार ने इस विदेशी फंडिंग की नकेल कसी और ‘वर्ल्ड विजन’ (World Vision) व ‘कम्पैशन इंटरनेशनल’ (Compassion International) जैसे बड़े-बड़े धर्मांतरण माफियाओं के एफसीआरए (FCRA) लाइसेंस रद्द किए, तो आपने देखा होगा की कैसे पूरा का पूरा वामपंथी और लिबरल इकोसिस्टम छाती पीट-पीट कर रोने लगा था।

वो अमेरिका के अखबारों में लिखवाने लगे की भारत में ईसाइयों पर जुल्म हो रहा है!

अरे भाई, जुल्म कैसा? तुम्हारी चोरी पकड़ी गई है! तुम ‘चैरिटी’ का चोला ओढ़कर हमारे देश की डेमोग्राफी को बदलने का जिहाद चला रहे थे। सरकार ने बस तुम्हारी उस विदेशी पाइपलाइन को काटा है जिससे तुम हमारे वनवासी समाज की नसें काट रहे थे।

ये विदेशी फंडिंग कोई दान नहीं है, ये वो ज़हर है जिससे भारत को सांस्कृतिक रूप से गुलाम बनाने की एक नई साज़िश रची जा रही है।

डी-लिस्टिंग की हुंकार और ईसाई बने लोगों का आरक्षण छीनने की मांग

अब ज़रा इस पूरे धर्मांतरण वाले खेल के सबसे बड़े आर्थिक और कानूनी फ्रॉड को समझिए। ये कोई ऐसा-वैसा घोटाला नहीं है, ये हमारे असली और सनातनी वनवासी भाइयों के मुंह से निवाला छीनने की एक बहुत बड़ी साज़िश है।

ये जो लोग चंगाई सभाओं में जाकर, पादरियों के बहकावे में आकर ईसाई बन जाते हैं, ये अपना धर्म तो छोड़ देते हैं, अपने देवी-देवताओं को तो गालियां देने लगते हैं, लेकिन जब सरकारी नौकरी और आरक्षण की बात आती है, तो ये बेशर्मी से अपना पुराना ‘आदिवासी’ (ST – Scheduled Tribe) का सर्टिफिकेट आगे कर देते हैं।

ज़रा इस मक्कारी को देखिए! जब तुम्हें हिंदू धर्म और आदिवासी संस्कृति में इतनी ही खोट नज़र आ रही थी की तुमने यीशु की शरण ले ली, तो फिर उस हिंदू आदिवासी समाज के नाम पर मिलने वाले आरक्षण की मलाई क्यों खा रहे हो?

तुम रविवार को चर्च जाते हो, गले में क्रॉस पहनते हो, शादी तुम्हारी पादरी करवाता है, तुम अपने आप को इंटरनेशनल क्रिश्चियन कम्युनिटी का हिस्सा बताते हो, और जब यूपीएससी (UPSC) या राज्य सरकार की नौकरी का फॉर्म भरना होता है, तो अचानक से तुम्हें याद आ जाता है की “अरे, मैं तो पिछड़ा हुआ आदिवासी हूं!”

इसी दोहरी मक्कारी और मलाई खाने वाले सिंडिकेट की कमर तोड़ने के लिए आज पूरे देश में, खासकर छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा में ‘जनजातीय सुरक्षा मंच’ (JSM) ने एक ऐसा भयानक आंदोलन छेड़ रखा है जिसकी गूंज दिल्ली तक पहुंच चुकी है।

इस आंदोलन का नाम है- ‘डी-लिस्टिंग’ (De-listing)। मतलब साफ है, जो व्यक्ति अपनी मूल आदिवासी और सनातन संस्कृति को छोड़कर ईसाई या मुसलमान बन चुका है, उसे एसटी (ST) की लिस्ट से धक्के मारकर बाहर निकालो। उसका आरक्षण तुरंत छीना जाए।

आज हालात ये हो गए हैं की जो असली वनवासी है, जो आज भी जंगलों में रहकर अपने सरना धर्म और ठाकुर देव की पूजा करता है, वो तो आज भी गरीबी में जी रहा है। और ये जो कन्वर्टेड (Converted) ईसाई हैं, जिन्हें कॉन्वेंट स्कूलों में अंग्रेज़ी पढ़ाई जाती है और विदेशी फंडिंग मिलती है, ये सारा का सारा एसटी (ST) का कोटा डकार जाते हैं। 

आईएएस से लेकर सरकारी डॉक्टरों की पोस्ट पर ये धर्मांतरित लोग कुंडली मारकर बैठ गए हैं। जनजातीय सुरक्षा मंच की रैलियों में आज लाखों वनवासी हिंदू सड़कों पर उतर रहे हैं और उनकी ये दहाड़ सुनकर इन मिशनरियों की पैंट गीली हो गई है।

अगर ये डी-लिस्टिंग का कानून पास हो गया ना भाई, तो इन पादरियों की धर्मांतरण वाली दुकान रातों-रात बंद हो जाएगी, क्योंकि बिना आरक्षण के लालच के कोई भी आदिवासी अपना सनातन धर्म नहीं छोड़ेगा।

कार्तिक उरांव का वो अधूरा सपना और कांग्रेस की गद्दारी जिसने हिन्दू आदिवासियों की पीठ में खंजर घोंपा

ये डी-लिस्टिंग की मांग कोई आज की नहीं है। अगर आपको इस देश के सेक्युलर सिस्टम की सबसे बड़ी गद्दारी देखनी है, तो इतिहास के उस पन्ने को पलटिए जिसे कांग्रेस ने जानबूझकर फाड़ दिया था।

बात 1967 की है। उस वक्त झारखंड (तब बिहार) के एक बहुत ही कद्दावर और पढ़े-लिखे आदिवासी नेता हुआ करते थे- स्वर्गीय कार्तिक उरांव जी। वो एक सच्चे सनातनी और वनवासी समाज के असली रक्षक थे।

कार्तिक उरांव जी ने उसी वक्त इस खतरे को भांप लिया था की ईसाई मिशनरियां आरक्षण का लालच देकर आदिवासियों को निगल रही हैं। उन्होंने संसद में एक बिल पेश किया था। उन्होंने डंके की चोट पर कहा था की जो आदिवासी अपना धर्म छोड़कर क्रिश्चियन बन गया है, उसे अनुसूचित जनजाति (ST) का कोई फायदा नहीं मिलना चाहिए।

आपको जानकर हैरानी होगी की उस वक्त संसद के 300 से ज्यादा सांसदों ने (जिनमें हर पार्टी के लोग शामिल थे) एक सुर में कार्तिक उरांव जी का समर्थन किया था। एक ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कमिटी (JPC) भी बनी थी, जिसने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा था की धर्म बदलने वालों का आरक्षण खत्म होना चाहिए।

तो फिर ये कानून बना क्यों नहीं? क्योंकि बीच में आ गया वो खौफनाक ईसाई और विदेशी इकोसिस्टम, जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और कांग्रेस सरकार की गर्दन दबोच ली।

जैसे ही ये बिल पास होने वाला था, वेटिकन (Vatican) और इंटरनेशनल क्रिश्चियन लॉबी का ऐसा भयंकर दबाव पड़ा की इंदिरा गांधी सरकार ने रातों-रात अपने कदम पीछे खींच लिए। कार्तिक उरांव जी के उस ऐतिहासिक बिल को ठंडे बस्ते में डालकर कूड़ेदान में फेंक दिया गया।

ये कांग्रेस की वो ऐतिहासिक गद्दारी है जिसने हमारे लाखों वनवासी भाइयों की पीठ में खंजर घोंपा। चंद वोटों और विदेशी आकाओं को खुश करने के लिए कांग्रेस ने हमारे आदिवासियों को इन मिशनरी भेड़ियों के आगे परोस दिया।

आज अगर हमारे वनवासी भाई गरीबी, नक्सलवाद और धर्मांतरण की मार झेल रहे हैं, तो उसके पीछे सीधे तौर पर यही सेक्युलर राजनीति ज़िम्मेदार है।

अब वो वक्त आ गया है की कार्तिक उरांव जी का वो अधूरा सपना, आज की ये कट्टर राष्ट्रवादी सरकार पूरा करे। जो ईसाई बन गया, उसका हमारे कोटे पर कोई हक नहीं!

ईसाई मिशनरियों की कब्र खोदता वनवासी कल्याण आश्रम, और दिलीप सिंह जूदेव के पदचिन्हों पर सनातन की घरवापसी का महा-अभियान

आदिवासी हिन्दुओं की इस अंधेरी और डरावनी रात में एक बहुत बड़ी उम्मीद की किरण भी है। वो किरण हैं हमारे हिंदू संगठनों के वो गुमनाम सिपाही, जो अपनी जान हथेली पर रखकर इन घने जंगलों में काम कर रहे हैं।

जब हम और आप अपने घरों में चैन की नींद सो रहे होते हैं, तब ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ के कार्यकर्ता नक्सल प्रभावित जंगलों में पैदल घूमकर इन पादरियों के नेक्सस को तोड़ रहे होते हैं।

ये काम कोई आसान काम नहीं है भाई। कदम-कदम पर विदेशी फंडिंग से पले हुए गुंडों और नक्सलियों का खतरा होता है। लेकिन हमारे इन सनातन के शेरों ने हार नहीं मानी है।

आज अगर झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के जंगलों में सनातन धर्म का भगवा झंडा शान से लहरा रहा है, तो वो सिर्फ और सिर्फ इन ज़मीनी कार्यकर्ताओं की बदौलत है। इन्होंने गांव-गांव में एकल विद्यालय खोले हैं, ताकि हमारे वनवासी बच्चों को कोई मिशनरी स्कूल वाला बहका ना सके।

और सबसे बड़ी बात, हमें उस महान शूरवीर को कभी नहीं भूलना चाहिए जिसने धर्मांतरण के इस ज़हर के खिलाफ सबसे बड़ा धर्मयुद्ध छेड़ा था- स्वर्गीय दिलीप सिंह जूदेव!

जूदेव जी कोई आम नेता नहीं थे, वो छत्तीसगढ़ की माटी के वो शेर थे जिन्होंने विदेशी पादरियों की रातों की नींद हराम कर दी थी। उन्होंने ‘घरवापसी’ का वो महा-अभियान शुरू किया था जिसे देखकर वेटिकन तक में हड़कंप मच गया था।

जूदेव जी क्या करते थे? वो गांव-गांव जाते थे, उन वनवासियों के पैर गंगाजल से धोते थे जिन्हें धोखे से ईसाई बना दिया गया था, और पूरे सम्मान के साथ उन्हें वापस उनके मूल सनातन धर्म में लेकर आते थे।

उन्होंने डंके की चोट पर लाखों वनवासियों की घरवापसी कराई थी। जब जूदेव जी अपनी मूंछों पर ताव देकर कहते थे की “हिंदू धर्म में वापसी कोई जुर्म नहीं, बल्कि अपने पुरखों के घर लौटना है”, तो मिशनरियों के पसीने छूट जाते थे।

आज दिलीप सिंह जूदेव जी शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी लगाई हुई वो आग आज झारखंड और छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में धधक रही है। आज हमारे वनवासी भाई खुद खड़े हो रहे हैं।

उन्हें समझ में आ गया है की उनकी जड़ें रोम या वेटिकन सिटी से नहीं जुड़ी हैं। उनकी जड़ें भगवान बिरसा मुंडा, टंट्या भील और प्रभु श्री राम की परम भक्त शबरी माता से जुड़ी हैं। ये जागता हुआ वनवासी समाज अब इन पादरियों को जंगलों से खदेड़-खदेड़ कर भगा रहा है।

ईसाई धर्मांतरण माफिया को कुचलने के लिए राष्ट्रीय धर्मांतरण विरोधी कानून ही बचाएगा सनातन का वजूद

अब बात आती है की हम और आप क्या कर सकते हैं? सबसे पहले तो शहरों में बैठे उन मिडिल क्लास हिंदुओं को अपनी ये गलतफहमी दूर करनी होगी की “अरे, धर्मांतरण तो सिर्फ गरीब आदिवासियों का हो रहा है, हम पर क्या फर्क पड़ता है!”

अरे भाई, फर्क पड़ता है! अगर तुमने आज अपने वनवासी भाइयों को इस विदेशी अजगर के मुंह से नहीं बचाया, तो कल पूरा का पूरा झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा एक नया मिनी-वेटिकन या दूसरा नागालैंड-मिज़ोरम बन जाएगा।

अगर पूर्वोत्तर (North East) के राज्यों का हाल देखना है, तो देख लीजिए। जहाँ-जहाँ इन मिशनरियों ने अपनी पकड़ बनाई, वहां हिंदू अल्पसंख्यक हो गया और फिर वहां से अलगाववाद (Separatism) और देश तोड़ने की मांगें उठने लगीं।

सिर्फ कुछ राज्यों के ‘एंटी-कन्वर्जन लॉ’ से काम नहीं चलने वाला। अब वक्त आ गया है की केंद्र सरकार संसद में एक ऐसा ‘राष्ट्रीय धर्मांतरण विरोधी कानून’ लेकर आए जो इतना सख्त हो की जो भी संस्था विदेशी फंड का इस्तेमाल धर्मांतरण के लिए करती पाई जाए, उसकी सारी संपत्ति रातों-रात ज़ब्त कर ली जाए और उसके दलालों को उम्रकैद की सज़ा दी जाए।

इसके साथ ही, वो जो ‘डी-लिस्टिंग’ (Delisting) का आंदोलन चल रहा है, उसे तुरंत संसद से पास करवाना ही होगा। सरकार को डंके की चोट पर ये ऐलान करना होगा की जो व्यक्ति अपना मूल हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई या मुसलमान बन गया है, उसका एसटी (ST) और एससी (SC) आरक्षण उसी सेकंड हमेशा-हमेशा के लिए रद्द कर दिया जाएगा। 

इन विदेशी पैसों पर पलने वाले सफेद चोगे वाले ईसाई गिद्धों को ये बताना ही होगा की ये हमारी माटी है, ये हमारे लोग हैं और हम किसी भी कीमत पर अपनी भारत माता के सांस्कृतिक टुकड़े नहीं होने देंगे!

जय भगवान बिरसा मुंडा! भारत माता की जय!

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