नॉर्थ-ईस्ट को भारत से अलग करने की खुल्ली धमकी और दिल्ली को शमशान बनाने का सपना, देश तोड़ने वाले उमर खालिद और शरजील इमाम को ताउम्र सलाखों के पीछे सड़ाना बेहद जरुरी

एक बात बताओ… क्या हमारे देश में ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ (Freedom of Speech) का मतलब ये हो गया है की आप सरेआम मंच पर खड़े होकर देश के टुकड़े करने की धमकी दे दो?

क्या ‘शांतिपूर्ण विरोध’ का चोला ओढ़कर किसी को इस बात की छूट दी जा सकती है की वो देश की राजधानी को दंगों की आग में झोंक दे? या खुलेआम भारत के नक्शे से एक पूरे राज्य को काटकर अलग करने का ब्लूप्रिंट तैयार करे?

शिक्षा के नाम पर, हमारे ही टैक्स के पैसों से JNU और जामिया में पढ़ने वाले कुछ गद्दार वहां बैठ कर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ की स्क्रिप्ट लिखते हैं!

और सबसे बड़ा मज़ाक तो ये है की वामपंथी इकोसिस्टम इन गद्दारों को ‘थिंकर’ (विचारक), ‘स्कॉलर’ और ‘स्टूडेंट एक्टिविस्ट’ बताकर पूरी दुनिया में बचाते हैं।

जब दिल्ली की सड़कों पर दंगो में खून बह रहा था, तब यही इकोसिस्टम चीख-चीख कर कह रहा था की ये तो सिर्फ नागरिकता कानून (CAA) का ‘शांतिपूर्ण विरोध’ कर रहे हैं।

CAA तो बस एक बहाना था। असली मक़सद तो भारत को तोड़ना, दिल्ली को बंधक बनाना और देश के अंदर इस्लामिक कट्टरवाद की आग भड़काना था।

और इस पूरी आग को लगाने वाले कोई अनपढ़ जाहिल लोग नहीं थे। इसके पीछे वो शातिर दिमाग थे, जो जेएनयू से पास आउट थे।

जी हां, हम बात कर रहे हैं इस ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के पोस्टर बॉय- शरजील इमाम और उमर खालिद की।

ये कोई भटके हुए युवा नहीं हैं। ये वो मास्टरमाइंड हैं जिन्होंने विदेशी फंडिंग के दम पर, दिल्ली में दंगे भड़का कर 53 मासूमों की लाशें बिछा दीं।

वामपंथी मीडिया इन्हें जितना भी ‘मासूम’ बताने का ढोंग कर ले, लेकिन दिल्ली पुलिस की चार्जशीट और इनके खुद के वीडियो चीख-चीख कर गवाही देते हैं की अगर ये लोग एक दिन के लिए भी जेल से बाहर आ गए, तो देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाएंगे।

चलिए, आज इन ‘तथाकथित छात्रों’ के देशद्रोह की जन्मकुंडली खोलते हैं।

हाथों में किताबें नहीं बल्कि देश तोड़ने का नक्शा था और शरजील इमाम ने बनाया था असम को भारत से काटने का प्लान

लुटियंस गैंग हमेशा कहता है की शरजील इमाम तो एक ब्रिलियंट स्टूडेंट है, उसे जेल में सड़ाकर सरकार उसका करियर बर्बाद कर रही है।

तो भाई, ज़रा इस ‘ब्रिलियंट स्टूडेंट’ के इरादे सुन लीजिए। तारीख थी 16 जनवरी 2020… जगह थी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) का कैंपस। सीएए (CAA) के विरोध के नाम पर वहां हज़ारों मुसलमानों की भीड़ जमा थी।

मंच पर माइक पकड़ कर खड़ा था शरजील इमाम।

इस बंदे के हाथ में कोई किताब या संविधान नहीं था, बल्कि इसके दिमाग में सीधे तौर पर भारत को तोड़ने का नक्शा चल रहा था।

भाषण देते हुए अचानक इसने एक शब्द का इस्तेमाल किया- ‘चिकन नेक’ (Chicken’s Neck)।

जिन लोगों को भूगोल नहीं पता, उन्हें बता दूँ की चिकन नेक दरअसल सिलीगुड़ी कॉरिडोर का वो मात्र 22 किलोमीटर चौड़ा हिस्सा है, जो पूरे नॉर्थ-ईस्ट (असम, मिज़ोरम, त्रिपुरा आदि) को भारत की मुख्य भूमि से जोड़ता है।

अगर उस हिस्से को ब्लॉक कर दिया जाए, तो पूरा नॉर्थ-ईस्ट भारत से कट जाएगा।

शरजील इमाम ने मंच से दहाड़ते हुए कहा था- “अगर 5 लाख मुसलमान ऑर्गेनाइज़ हो जाएं, तो हम हिंदुस्तान और नॉर्थ-ईस्ट को हमेशा के लिए काट सकते हैं! परमानेंट नहीं, तो कम से कम एक-दो महीने के लिए तो काट ही सकते हैं!”

ज़रा सोचिए! ये बंदा खुलेआम देश के एक हिस्से को अलग करने की धमकी दे रहा था! और बात सिर्फ यहीं नहीं रुकी। इसके इरादे इतने खतरनाक थे की इसने सीधे-सीधे भारतीय सेना को चुनौती दे डाली।

इसने भीड़ को भड़काते हुए कहा की “असम को काटना हमारी ज़िम्मेदारी है… रेल की पटरियों पर इतना मलबा डाल दो, चक्का जाम कर दो की इंडियन आर्मी वहां सप्लाई लेकर पहुंच ही ना सके!”

अब आप ही बताइए यार, जो इंसान अपनी ही देश की सेना का रास्ता रोकने की बात करे, जो सेना तक रसद और हथियार पहुंचने से रोकने का प्लान बनाए, क्या वो कोई ‘मासूम छात्र’ हो सकता है? बिल्कुल नहीं!

वो विशुद्ध रूप से एक देशद्रोही और आतंकी मानसिकता वाला इंसान है। ये कोई भाषण नहीं था, ये भारत के खिलाफ खुली जंग का ऐलान था।

शरजील इमाम जैसे लोग इस बात को बहुत अच्छे से जानते थे की अगर सेना वहां नहीं पहुँच पाएगी, तो नॉर्थ-ईस्ट में घुसपैठ और दंगे करवाना कितना आसान हो जाएगा।

इसने अपने पर्चों में साफ़ लिखा था की वो इस ‘सेक्युलर’ भारत को नहीं मानता, वो तो मोहम्मद अली जिन्नाह की विचारधारा पर चलने वाला आदमी है।

सोचिए, जेएनयू में बैठकर, सरकार की सब्सिडी वाली थाली में खाना खाकर, ये बंदा भारत में दूसरा ‘बंटवारा’ करने की स्क्रिप्ट लिख रहा था।

जिस आदमी के दिमाग में अपने ही देश को काटने और सेना पर हमला करने का इतना खौफनाक ब्लूप्रिंट छपा हो, उसे अगर तिहाड़ जेल की कालकोठरी में ना सड़ाया जाए, तो फिर कहाँ रखा जाए?

पहले 2016 में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ का नारा, और फिर ट्रंप के दौरे पर खून बहाने की साज़िश वाला गद्दार उमर खालिद

शरजील इमाम तो इस पूरे खेल का सिर्फ एक मोहरा था, लेकिन इस ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का असली पोस्टर बॉय और इस पूरी साज़िश का मास्टरमाइंड कोई और था।

जी हां, हम बात कर रहे हैं जेएनयू के उसी कुख्यात ‘छात्र’ उमर खालिद की। वामपंथी इकोसिस्टम इसे बहुत ही सॉफ्ट-स्पोकन, सेक्युलर और संविधान का रक्षक बताने की कोशिश करता है।

लेकिन जो लोग भूलने की बीमारी के शिकार हैं, उन्हें ज़रा 2016 के उस काले दिन के फ्लैशबैक में ले जाना बहुत ज़रूरी है।

याद है आपको 9 फरवरी 2016? जेएनयू कैंपस का वो दिन जब संसद हमले के मास्टरमाइंड आतंकी अफ़ज़ल गुरु की ‘शहादत’ की बरसी मनाई गई थी!

इसी उमर खालिद की लीडरशिप में वहां खुलेआम “भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाल्लाह-इंशाल्लाह” और “कितने अफ़ज़ल मारोगे, हर घर से अफ़ज़ल निकलेगा” जैसे देश-विरोधी नारे गूंजे थे।

ये बंदा कोई आज का एक्टिविस्ट नहीं है, इसके तो रग-रग में देशद्रोह भरा हुआ है। 2016 में सिस्टम की कुछ कमियों का फायदा उठाकर ये भले ही बच निकला था, लेकिन इसके मंसूबे कभी नहीं बदले।

जब 2019-2020 में सीएए (CAA) का मुद्दा आया, तो उमर खालिद को समझ आ गया की अपनी वो अधूरी ख़्वाहिश (भारत के टुकड़े करने की) पूरी करने का इससे बढ़िया मौका नहीं मिलेगा।

एक तरफ शरजील इमाम असम को काटने की तैयारी कर रहा था, तो दूसरी तरफ उमर खालिद दिल्ली को आग में झोंकने का ब्लूप्रिंट तैयार कर चुका था।

17 फरवरी 2020 का वो मनहूस दिन याद कीजिए। महाराष्ट्र के अमरावती में एक भयंकर भीड़ जमा थी और मंच पर माइक पकड़े ज़हर उगल रहा था उमर खालिद।

इसने खुलेआम भीड़ को भड़काते हुए एक अल्टीमेटम दे डाला। इसने कहा- “24 फरवरी को अमेरिका का राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हिंदुस्तान आ रहा है। तब हम दिखाएंगे की हिंदुस्तान की सरकार कैसे देश को बांट रही है… हम सब सड़कों पर उतरेंगे!”

ज़रा क्रोनोलॉजी समझिए यार! 17 तारीख को ये अमरावती में ऐलान करता है की ‘हम दिखाएंगे’, और ठीक एक हफ़्ते बाद, यानी 23-24-25 फरवरी को जब डोनाल्ड ट्रंप दिल्ली में बैठे होते हैं, तब पूरी नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली दंगों की आग में धधक उठती है।

क्या ये कोई इत्तेफाक था? बिल्कुल भी नहीं! ये एक सोची-समझी, पक्की टाइमिंग वाली साज़िश थी। इनका सीधा सा प्लान था की जब दुनिया के सबसे ताकतवर देश का राष्ट्रपति भारत में हो, तब दिल्ली की सड़कों पर इतना खून बहे की पूरे इंटरनेशनल मीडिया में भारत की थू-थू हो जाए।

देश की इज़्ज़त को दुनिया भर में नीलाम करने का इससे घटिया और खौफनाक प्लान कोई विदेशी दुश्मन भी नहीं बना सकता था।

औरतों और मासूम बच्चों को ढाल बनाकर खेला गया खूनी खेल और चार्जशीट में दर्ज है शाहीन बाग मॉडल का पूरा काला सच

जब पुलिस और जांच एजेंसियों ने दिल्ली दंगों की तह तक जाने के लिए खुदाई शुरू की, तो जो कचरा निकल कर बाहर आया, उसने अच्छे-अच्छों के होश उड़ा दिए।

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने जो ‘FIR 59/2020’ की ऐतिहासिक चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की है, वो कोई कहानी की किताब नहीं है, बल्कि पक्के सबूतों का पुलिंदा है।

उस चार्जशीट में साफ दर्ज है की ये दंगे अचानक भड़का हुआ कोई ‘गुस्सा’ नहीं थे, बल्कि उमर खालिद और उसके गिरोह द्वारा रची गई एक बेहद शातिर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ थी।

इस साज़िश को अंजाम कैसे दिया गया? इसका जवाब छिपा है उन सीक्रेट मीटिंग्स और वाट्सऐप ग्रुप्स में। उमर खालिद ने सीलमपुर, जाफराबाद और शाहीन बाग के अंधेरे कमरों में न जाने कितनी सीक्रेट मीटिंग्स की थीं।

पुलिस ने बाकायदा ‘DPSG’ (Delhi Protests Support Group) जैसे कई वाट्सऐप ग्रुप्स के चैट्स रिकवर किए।

इन चैट्स में साफ दिखा की ये लोग मिनट-दर-मिनट की प्लानिंग कर रहे थे की किस सड़क को ब्लॉक करना है, कहाँ से भीड़ बुलानी है और किस इलाके में कब आग लगानी है।

और इन दंगाइयों की सबसे बड़ी कायरता और नीचता देखिए! इन्होंने पुलिस से बचने के लिए उसी ‘शाहीन बाग मॉडल’ का इस्तेमाल किया, जिसने पूरे देश को बंधक बना कर रखा था।

उमर खालिद और उसके मास्टरमाइंड्स का सीधा आदेश था की विरोध प्रदर्शन में सबसे आगे बुर्के वाली औरतों और छोटे-छोटे मासूम बच्चों को बिठा दो।

क्यों? क्योंकि इन्हें मालूम था कि दिल्ली पुलिस कितनी भी सख्त क्यों ना हो, वो औरतों और छोटे बच्चों पर कभी लाठीचार्ज नहीं करेगी, गोली नहीं चलाएगी।

और बस, इसी बात का फायदा उठाया गया। आगे औरतों और बच्चों को ढाल बनाकर बिठाया गया, और पीछे से इन जाहिल दंगाइयों ने पुलिस पर पेट्रोल बम और पत्थर बरसाने शुरू कर दिए।

ज़रा सोचिए यार, जो लोग अपने राजनीतिक एजेंडे और विदेशी फंडिंग को हलाल करने के लिए अपनी ही औरतों और दूधमुंहे बच्चों को दंगों की आग में झोंक दें, क्या उन्हें इंसान कहने का भी कोई हक़ है?

इन्होंने लोकतंत्र के नाम पर दी गई ‘धरना-प्रदर्शन’ की आज़ादी का ऐसा वीभत्स रेपिस्ट मॉडल तैयार किया था, जिसे देखकर शैतान भी शर्मा जाए।

और लुटियंस मीडिया वाले हमें ज्ञान देते हैं की “बेचारा उमर खालिद तो सिर्फ शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहा था!” शांतिपूर्ण प्रदर्शन? जिसमें औरतों को ह्यूमन शील्ड (Human Shield) बनाकर पुलिस वालों का गला रेता जा रहा था?

छतों पर तेज़ाब के पैकेट और गुलेलें कोई रातों-रात नहीं आई थीं, बल्कि PFI की फंडिंग से रची गई थी 53 लाशें बिछाने की साज़िश

जब वामपंथी इकोसिस्टम इन दंगों को ‘स्वतः स्फूर्त’ (अचानक भड़का हुआ) बताने का ज्ञान पेलता है ना, तो सच में मन करता है की इनसे पूछा जाए की क्या तुम्हारे घरों की छतों पर रातों-रात ईंटों के पहाड़ अपने आप उग आते हैं?

क्या तेज़ाब के पैकेट और पेट्रोल बम आसमान से बारिश की तरह बरसते हैं? भाईसाहब, 23 से 25 फरवरी के बीच दिल्ली में जो तांडव हुआ, वो महीनों की तैयारी और करोड़ों रुपये की विदेशी फंडिंग का नतीजा था।

दिल्ली दंगों की वो भयानक तस्वीर याद कीजिए! 53 से ज़्यादा मासूम लोगों की जान चली गई, सैकड़ों हंसते-खेलते घर और दुकानें जलाकर खाक कर दी गईं।

ताहिर हुसैन जैसे लोगों की छतों पर जो हथियारों का जखीरा, पेट्रोल बम, बड़ी-बड़ी गुलेलें और तेज़ाब के ड्रम मिले थे, वो किसी ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ का हिस्सा नहीं थे। वो बाकायदा युद्ध की तैयारी थी!

और ये सब बिना भारी फंडिंग के मुमकिन था क्या? बिल्कुल नहीं! पुलिस और ईडी (ED) की जांच में साफ़ हो चुका है की इस पूरे खूनी खेल के पीछे अब बैन हो चुके इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन PFI (Popular Front of India) और विदेशी अकाउंट्स से आए काले धन का सीधा हाथ था।

उमर खालिद और इसके गैंग ने इन्हीं देश-विरोधी ताकतों से फंडिंग का जुगाड़ किया था।

इन दंगाइयों का असली क्रूर चेहरा तो तब सामने आया जब इन्होंने इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के जांबाज़ अफसर अंकित शर्मा को अपना शिकार बनाया।

एक निहत्थे अफसर को दंगाइयों ने नाले के पास खींचा और उसके शरीर को चाकुओं से 400 से ज़्यादा बार गोदा! 400 बार! क्या ये किसी इंसान का काम हो सकता है? ये शुद्ध रूप से एक जिहादी और आतंकी मानसिकता थी।

और ड्यूटी पर तैनात दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल रतन लाल की सरेआम पीट-पीटकर हत्या कर दी गई!

और फिर ये अर्बन-नक्सल गैंग छाती पीटकर कहता है की “हमारे मासूम छात्रों को आज़ाद करो!” शर्म आनी चाहिए ऐसे लोगों को जो इन कातिलों में ‘छात्र’ ढूंढते हैं।

आजकल आप जब भी सोशल मीडिया खोलेंगे तो आपको कोई न कोई कॉकरोच मिल जायेगा। इनका एक ही रटा-रटाया नैरेटिव है- “उमर खालिद और शरजील इमाम पॉलिटिकल प्रिज़नर हैं, सरकार ने बिना ट्रायल के इन्हें इतने सालों से जेल में ठूंस रखा है।”

वाह! तुम्हारा विक्टिम कार्ड भी क्या कमाल का है! जब ये दोनों सड़कों पर खून बहाने की प्लानिंग कर रहे थे, असम को काटने की धमकियां दे रहे थे..

तब तुम्हें कानून और मानवाधिकार याद नहीं आया? अब जब तिहाड़ की कालकोठरी में चक्की पीसनी पड़ रही है, तो अचानक ये दोनों ‘मासूम’ बन गए?

बाहर से ‘स्टूडेंट एक्टिविस्ट्स’ दिखने वाले इन गद्दारों के दिमाग में असल में इस्लामिक कट्टरवाद और भारत विभाजन का ज़हर भरा हुआ है!

अदालतों ने भी माना की इनके खिलाफ सबूतों का पहाड़ है, और यही वजह है की इन टुकड़े-टुकड़े गैंग के सरगनाओं का ताउम्र तिहाड़ में सड़ना है बेहद ज़रूरी

वामपंथी गैंग को लगता है की वो ट्विटर (X) पर हैशटैग चलाकर अदालतों को झुका लेंगे, लेकिन कानून सबूतों पर चलता है।

2020 से लेकर आज 2026 तक, इन दोनों गद्दारों ने लोअर कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा लिया है।

वकीलों की पूरी एक फौज खड़ी कर दी जो लाखों की फीस लेती है (सोचिए वो पैसा कहाँ से आ रहा है?), लेकिन इन्हें कहीं से भी ज़मानत (Bail) नहीं मिली।

क्यों नहीं मिली? क्योंकि इन पर कोई मामूली चोरी-चकारी का केस नहीं है, बल्कि देश के सबसे सख्त आतंकवाद विरोधी कानून UAPA (Unlawful Activities Prevention Act) के तहत मुकदमा दर्ज़ है।

और अदालतें कोई बेवकूफ नहीं हैं। दिल्ली हाई कोर्ट के जजों ने खुद इनके भाषणों को सुना है और उन्हें ऑन-रिकॉर्ड ‘अत्यंत घिनौना’ (obnoxious) और ‘भड़काऊ’ माना है।

अदालतों ने साफ़ कर दिया है की पुलिस की चार्जशीट में लगाए गए आरोप ‘प्रथम दृष्टया सच’ (Prima facie true) लगते हैं और ऐसे संगीन मामलों में बेल देना समाज के लिए सीधा खतरा है।

अब बात एकदम साफ़ है। हमारे देश का जो तंत्र है, वो बहुत सहिष्णु है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं की कोई भी ऐरा-गैरा आकर हमारे ही टैक्स के पैसों से पढ़ेगा, हमारी ही सब्सिडी खाएगा, और फिर माइक पकड़ कर कहेगा की “भारत तेरे टुकड़े होंगे” या “असम को काट देंगे”।

वो ज़माना गया जब ये लोग JNU में बैठकर देश के खिलाफ ज़हर उगलते थे और शाम को लुटियंस की पार्टियों में जाम टकराते थे।

जब तक ये दोनों (और इन जैसे बाकी गद्दार) तिहाड़ जेल की मोटी दीवारों के पीछे सड़ रहे हैं, तभी तक हमारी दिल्ली की सड़कें, हमारा नॉर्थ-ईस्ट और पूरे भारत का नक्शा सुरक्षित है।

देशद्रोहियों के लिए कोई ‘मानवाधिकार’ नहीं होता, उनके लिए सिर्फ और सिर्फ तिहाड़ की कालकोठरी होती है।

और एक सच्चे हिंदुस्तानी के तौर पर हमारी यही ज़िम्मेदारी है की हम इस देश-विरोधी गैंग के हर नैरेटिव को इसी तरह ठोक-बजा कर तार-तार करते रहें, ताकि भविष्य में कोई दूसरा उमर या शरजील देश तोड़ने का सपना देखने से पहले हज़ार बार सोचे!

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