टीपू सुल्तान कोई हीरो नहीं, बल्कि औरंगजेब की नस्ल का जेहादी जल्लाद, दिवाली के दिन किया था हजारों हिंदुओं का खूनी नरसंहार

सालों तक हमारे बच्चों का कैसा भयानक ब्रेनवाश किया गया है भाई! हमारे दिमाग में बचपन से ही ये ज़हर घोल दिया गया की टीपू सुल्तान तो ‘मैसूर का शेर’ था, वो तो आज़ादी का बहुत बड़ा सिपाही था, उसने अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। मतलब कुछ भी! झूठ बोलने की भी कोई हद होती है!

अरे भाई, जो आदमी औरंगजेब का भी सगा बाप निकला, जिसने लाखों हिंदुओं का कत्लेआम किया, हिन्दू औरतों की इज़्ज़त लूटी और हमारे मंदिरों को खंडहर बना दिया, उसे हमारे ये JNU वाले सेक्युलर इतिहासकार रातों-रात ‘हीरो’ बनाकर पेश कर गए। 

ये कोई अनजाने में हुई गलती नहीं थी; ये एक बहुत सोची-समझी साज़िश थी ताकि हम हिंदुओं को अपने असली हत्यारों से ही प्यार करना सिखा दिया जाए।

हकीकत तो ये है की टीपू सुल्तान का अंग्रेज़ों से लड़ने का कोई देशभक्ति वाला मकसद था ही नहीं। वो भारत को आज़ाद थोड़ी कराना चाहता था! उसका तो एक ही एजेंडा था- पूरे दक्षिण भारत को एक कट्टर इस्लामिक मुल्क यानी ‘दारुल-इस्लाम’ बनाना। 

अंग्रेज़ तो उसके इस जेहादी सपने के बीच में रोड़ा बन रहे थे, इसलिए वो उनसे लड़ा। 

और अगर आपको लगता है की वो कोई देशभक्त था, तो ज़रा इतिहास के पन्ने पलटकर देख लीजिए। इसी ‘मैसूर के शेर’ ने अफगानिस्तान के मुस्लिम शासक ज़मान शाह और फ्रांस के नेपोलियन को बकायदा चिट्ठियां लिखी थीं की “तुम लोग भारत पर हमला करो और यहाँ के काफिरों (मराठों और हिंदुओं) को कुचलने में मेरी मदद करो।”

मतलब जो आदमी खुद विदेशियों को भारत पर हमला करने का न्योता दे रहा हो, वो स्वतंत्रता सेनानी कैसे हो गया? पर क्या करें, इन वामपंथी और लिबरल कीड़ों ने हमेशा से हिंदुओं की आंखों में धूल झोंकने का ही काम किया है। आज हम इसी जेहादी जल्लाद के शौर्य का वो नंगा और खौफनाक सच आपके सामने रखेंगे, जिसे पढ़कर आपकी रातों की नींद उड़ जाएगी।

वामपंथी इतिहासकारों का सबसे बड़ा झूठ! टीपू कोई स्वतंत्रता सेनानी नहीं बल्कि एक खूंखार जेहादी था

अगर आप आज भी किसी लिबरल इंसान से बात करेंगे ना, तो वो तुरंत ज्ञान झाड़ना शुरू कर देगा की “अरे टीपू सुल्तान ने तो अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे, वो तो मिसाइल मैन था।” भाई, इन झूठे और दरबारी इतिहासकारों ने एक बहुत बड़ा ‘इकोसिस्टम’ बनाकर हमें सदियों तक बेवकूफ बनाया है। 

ये रोमिला थापर और इरफान हबीब जैसे वामपंथी इतिहासकार ही तो थे जिन्होंने टीपू की सारी दरिंदगी को कालीन के नीचे छुपा दिया और उसे एक सेक्युलर और महान राजा बना दिया।

ज़रा दिमाग लगाइए, 18वीं सदी में जब ‘भारत’ नाम का कोई एक अखंड देश (राजनीतिक रूप से) था ही नहीं, जब हर राजा अपनी-अपनी रियासत बचाने में लगा था, तब टीपू सुल्तान पूरे देश की आज़ादी की लड़ाई कैसे लड़ सकता है? उसका असली टारगेट तो अपनी रियासत को एक पूरी तरह से इस्लामिक स्टेट में बदलना था। 

वो मराठों से क्यों नफरत करता था? क्योंकि मराठे हिंदू पद पादशाही की रक्षा कर रहे थे। वो नायर और कोडावा हिंदुओं से क्यों चिढ़ता था? क्योंकि वो अपनी सनातन परंपराओं को छोड़ने को तैयार नहीं थे।

टीपू सुल्तान ने अपने शासनकाल में बाकायदा फारसी और अरबी को थोपने की कोशिश की। जो इलाके सदियों से हिंदू नामों से जाने जाते थे, उनका नाम बदलकर इस्लामी कर दिया। जैसे मंगलुरु का नाम बदलकर ‘जलालाबाद’ कर दिया गया, मैसूर का ‘नज़राबाद’ और कन्नूर का ‘कुशनाबाद’। क्या कोई सेक्युलर राजा ऐसा करता है?

इतना ही नहीं, इसने अपनी तलवार पर अरबी में बाकायदा लिखवा रखा था की “मेरे अल्लाह, मेरी मदद कर कि मैं काफिरों (गैर-मुस्लिमों) का खात्मा कर सकूं।” और ऐसे आदमी को हमारे देश की कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां आज भी अपना अब्बा जान मानकर उसकी जयंतियां मनाती हैं। 

ये सिर्फ हमारे पुरखों का अपमान नहीं है, बल्कि हमारी आने वाली नस्लों की छाती पर मूंग दलने वाला काम है। टीपू सुल्तान सिर्फ एक खूंखार जेहादी था, जिसका एक ही मिशन था- या तो इस्लाम कुबूल करो, या फिर कटने के लिए तैयार रहो।

मेलुकोटे की वो खूनी दीवाली जब नीच जिहादी टीपू सुल्तान ने 800 ब्राह्मणों को सरेआम काट डाला

अब ज़रा दिल थाम लीजिए, क्योंकि इतिहास का जो पन्ना मैं अब खोलने जा रहा हूं, वो कोई फिल्म की कहानी नहीं है, बल्कि हमारे अपने सगे हिंदू भाइयों का वो वीभत्स नरसंहार है जिसे सुनकर पत्थर भी रो पड़े।

बात 1790 के आसपास की है। कर्नाटक में एक बहुत ही पवित्र जगह है- मेलुकोटे। यहाँ योग नरसिंहस्वामी का एक प्राचीन और भव्य मंदिर है। इस इलाके में मांड्यम अय्यंगार ब्राह्मण रहा करते थे।

ये बेचारे बहुत ही सीधे, शांत और पूरी तरह से भगवान की भक्ति में डूबे रहने वाले लोग थे। इनका कोई राजनीतिक लालच नहीं था, ना ही ये किसी जंग-वंग के हिस्सेदार थे।

इनका बस एक ही ‘अपराध’ था- ये कट्टर हिंदू थे और अपनी शिखा (चोटी), जनेऊ और माथे के तिलक से कोई समझौता नहीं करते थे। और यही बात टीपू सुल्तान की जेहादी आंखों में खटकती थी।

दीवाली का टाइम था। पूरे देश की तरह मेलुकोटे में भी ‘चतुर्दशी’ (छोटी दीवाली) की तैयारियां चल रही थीं। मंदिर में खास पूजा-पाठ रखा गया था।

सभी अय्यंगार ब्राह्मण, उनकी औरतें, छोटे-छोटे बच्चे और बूढ़े मंदिर के पास इकट्ठे हुए थे। उन्हें क्या पता था की जिस नरकासुर के वध की खुशी में वो दीये जलाने वाले हैं, एक असली नरकासुर टीपू सुल्तान के रूप में उनकी तरफ बढ़ रहा है।

टीपू सुल्तान को किसी ने भड़का दिया था की ये मांड्यम अय्यंगार अंदर ही अंदर मैसूर की पुरानी वाडियार रानी (जो हिंदू थीं) के वफादार हैं। बस फिर क्या था! बिना कोई जांच किए, बिना कोई सवाल-जवाब किए, टीपू ने अपनी जल्लाद फौज को मेलुकोटे पर टूट पड़ने का ऑर्डर दे दिया।

टीपू की जेहादी फौज ने निहत्थे और पूजा में मग्न 800 से ज्यादा अय्यंगार ब्राह्मणों को चारों तरफ से घेर लिया। बच्चों को उनके मां-बाप के सामने गाजर-मूली की तरह काट डाला गया।

औरतों की छातियों में तलवारें उतार दी गईं। जो पुजारी भगवान की आरती गा रहे थे, उनके सिर धड़ से अलग कर दिए गए। पूरे मंदिर का फर्श और वहां की मिट्टी इन हिंदुओं के खून से लाल हो गई थी।

और इस हैवानियत की कोई लिमिट यहीं खत्म नहीं हुई। हिंदुओं के मन में खौफ पैदा करने के लिए, टीपू के सैनिकों ने उन अय्यंगार ब्राह्मणों की लाशों को वहां मौजूद इमली के पेड़ों पर लटका दिया।

सोचिए ज़रा उस मंज़र के बारे में! जिन पेड़ों पर कभी दीवाली के दीये सजने थे, उन पर हमारे ही भाई-बहनों की खून से लथपथ लाशें झूल रही थीं। क्या कोई इंसान इतना गिरा हुआ और दरिंदा हो सकता है? और हमारे वामपंथी इतिहासकार आज भी बेशर्मी से हमसे कहते हैं कि “टीपू एक महान राजा था!” थू है ऐसे सेक्युलरिज्म पर!

आज भी अपने हिन्दू पुरखों के मातम में दीवाली पर अंधेरे में डूब जाता है मेलुकोटे गांव

आप और हम जब दीवाली पर अपने घरों को लाइटों से सजाते हैं, पटाखे फोड़ते हैं, नए-नए कपड़े पहनकर एक-दूसरे को मिठाइयां बांटते हैं, तब क्या आपको पता है की देश में एक जगह ऐसी भी है जो आज भी उस दिन एकदम घने अंधेरे में डूब जाती है?

हाँ भाई, आज 230 साल से भी ज्यादा का वक्त बीत चुका है, लेकिन मेलुकोटे के उन मांड्यम अय्यंगारों के वंशज आज भी छोटी दीवाली नहीं मनाते।

जब पूरा भारत दीवाली के जश्न में डूबा होता है, तब ये हिंदू परिवार अपने घरों के दरवाज़े बंद करके, बिना कोई दीया जलाए, अपने पुरखों के उस खौफनाक नरसंहार का मातम मना रहे होते हैं। इनके घरों में आज भी दीवाली के दिन मिठाइयां नहीं बनतीं।

ये कोई अंधविश्वास नहीं है, बल्कि ये उन बचे हुए अय्यंगार परिवारों की वो खूनी कसम है, जो उन्होंने अपने कटे हुए भाइयों की लाशों के सामने खाई थी।

उन्होंने कसम खाई थी की जब तक इस जेहादी टीपू सुल्तान का नामोनिशान इस धरती से नहीं मिट जाता, जब तक इतिहास में उसे एक हत्यारे की तरह दर्ज नहीं किया जाता, तब तक मेलुकोटे का कोई भी मांड्यम अय्यंगार अपने घर में दीवाली का दीया नहीं जलाएगा।

ज़रा सोचिए उस दर्द के बारे में, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आज भी उनके सीने में एक ज्वालामुखी की तरह धधक रहा है। और हमारे देश की पॉलिटिक्स देखिए!

उसी कर्नाटक में, जहाँ इन हिंदुओं का खून बहाया गया, वहां कांग्रेस की सरकारें छाती ठोक-ठोक कर ‘टीपू जयंती’ मनाती रही हैं। मतलब ये तो वही बात हो गई की आप किसी यहूदी के सामने हिटलर की जयंती मना रहे हों!

ये सेक्युलर पार्टियां हमारे ही टैक्स के पैसों से उस हत्यारे का महिमामंडन करती हैं जिसने हमारी ही पीठ में छुरा घोंपा था। जब भी कोई वामपंथी नेता या मंत्री टीपू को माला पहनाता है, तो मेलुकोटे के उन अय्यंगारों के पुराने ज़ख्म एक बार फिर से हरे हो जाते हैं।

उन इमली के पेड़ों पर लटकी लाशें आज भी चीख-चीख कर हमसे इंसाफ मांग रही हैं, लेकिन हम अपने ‘सेक्युलर’ नशे में इतने चूर हैं की हमें अपने ही पुरखों की चीखें सुनाई नहीं देतीं।

देवती परम्बु का सबसे वीभत्स कत्लेआम, कैसे गलीच टीपू सुल्तान ने धोखे से निहत्थे 60 हजार हिंदुओं की बलि चढ़ाई

भाई, अब जो मैं आपको बताने जा रहा हूं ना, उसे सुनकर आपको जलियांवाला बाग भी छोटा लगने लगेगा। हमारे स्कूलों में हमें जनरल डायर की क्रूरता तो खूब पढ़ाई जाती है, लेकिन कूर्ग के देवती परम्बु में टीपू सुल्तान ने जो खूनी दरिंदगी की थी, उस पर इन सेक्युलर इतिहासकारों ने हमेशा के लिए मिट्टी डाल दी।

कूर्ग में रहने वाले ‘कोडावा’ हिंदू बहुत ही बहादुर और जन्मजात योद्धा होते हैं। आज भी इंडियन आर्मी में आपको कोडावा रेजीमेंट के अनगिनत वीर मिल जाएंगे। 18वीं सदी में जब टीपू सुल्तान पूरे साउथ को इस्लामी स्टेट बनाने पर तुला था, तब ये कोडावा हिंदू ही थे जो उसके गले की हड्डी बन गए थे।

आपको जानकर हैरानी होगी की इन कोडावा योद्धाओं ने मैदान-ए-जंग में टीपू सुल्तान और उसकी जेहादी फौज को एक-दो बार नहीं, बल्कि पूरे 31 बार कुत्तों की तरह खदेड़ा था। टीपू की फौज जब भी कूर्ग में घुसने की कोशिश करती, ये हिंदू शेर उन्हें गाजर-मूली की तरह काट डालते थे।

जब टीपू सुल्तान को समझ आ गया की वो इन कोडावा हिंदुओं को सीधे युद्ध में कभी नहीं हरा सकता, तो उसने औरंगजेब और अलाउद्दीन खिलजी वाली कायरता और धोखेबाज़ी का सहारा लिया।

उसने 1785 में शांति और सुलह का एक बहुत बड़ा नाटक रचा। उसने कोडावा नेताओं को पैगाम भेजा की “मैं अब और खून-खराबा नहीं चाहता, चलो हम दोस्त बन जाते हैं।” सीधे-सादे हिंदुओं ने उस गद्दार की बातों पर भरोसा कर लिया।

13 दिसंबर 1785 का वो मनहूस दिन था। टीपू ने सभी कोडावा परिवारों को ‘देवती परम्बु’ नाम के एक बड़े खुले मैदान में दावत के बहाने बुलाया। वहां हज़ारों की तादाद में कोडावा हिंदू अपने औरतों, बच्चों और बूढ़ों के साथ निहत्थे पहुंचे थे। उन्हें लगा की कोई बड़ा समझौता होने वाला है। लेकिन वहां क्या इंतज़ार कर रहा था? मौत!

मैदान के चारों तरफ घने जंगल थे। टीपू सुल्तान ने पहले से ही अपनी फौज और फ्रांसीसी तोपों को उन जंगलों में छुपा रखा था। जैसे ही सारे हिंदू मैदान के बीच में जमा हुए, इस जेहादी जल्लाद ने हमला करने का ऑर्डर दे दिया। चारों तरफ से अचानक तोप के गोले बरसने लगे। निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध गोलियां चलाई गईं और तलवारों से उन्हें काटा जाने लगा।

वो कोई युद्ध नहीं था, वो एक कायरों वाला कत्लेआम था। कुछ ही घंटों के अंदर देवती परम्बु की ज़मीन 60 हज़ार से ज्यादा कोडावा हिंदुओं की लाशों से पट गई थी। कावेरी नदी का पानी हफ्तों तक इन हिंदुओं के खून से लाल बहता रहा।

और जो कुछ हज़ार कोडावा ज़िंदा बच गए थे ना, उनके साथ टीपू ने मौत से भी बदतर सुलूक किया। उन्हें बंदी बनाकर श्रीरंगपट्टनम ले जाया गया, जहाँ जबरन उन सभी का खतना किया गया, उन्हें गोमांस खाने पर मजबूर किया गया और उन्हें मुसलमान बना दिया गया।

ज़रा सोचिए, इतने बड़े पैमाने पर हमारे पूर्वजों का नरसंहार हुआ और हमारे हिस्ट्री की किताबों में इसका एक पन्ना तक नहीं है! क्यों? क्योंकि ये सेक्युलर इकोसिस्टम टीपू सुल्तान के दामन पर लगे इस हिंदू खून को हमसे छुपाना चाहता था।

औरंगजेब का बाप निकला टीपू सुल्तान! खुद अपने हाथों से लिखी चिट्ठियों में उगला है जिहाद का सच

अगर आपको लगता है की टीपू सुल्तान की नफरत सिर्फ मैसूर या कूर्ग तक सीमित थी, तो ज़रा केरल के मालाबार का इतिहास उठाकर देख लीजिए। 1788 से 1790 के बीच इस दरिंदे ने मालाबार में जो नंगा नाच किया है, उसने औरंगजेब के ज़ुल्मों को भी पीछे छोड़ दिया।

वहां के हिंदू राजा (ज़ामोरिन) को धोखा देकर टीपू ने जब मालाबार पर कब्ज़ा किया, तो उसने एक फरमान जारी कर दिया- “या तो कुरान पढ़ो, या फिर मरने के लिए तैयार रहो।”

लाखों की तादाद में नायर और नंबूदरी ब्राह्मणों को अपने पुश्तैनी घर-बार छोड़कर त्रावणकोर के जंगलों में भागना पड़ा। जो लोग पकड़े गए, उनके साथ जो दरिंदगी हुई वो रोंगटे खड़े कर देने वाली है।

और भाई, मैं कोई हवा में बातें नहीं कर रहा हूं। ये कोई व्हाट्सएप फॉरवर्ड नहीं बोल रही है। ये बातें खुद टीपू सुल्तान ने अपनी सगी कलम से फारसी में लिखी चिट्ठियों में कबूली हैं। आज भी लंदन की लाइब्रेरी और मैसूर के आर्काइव में टीपू के हाथ के लिखे वो असली लेटर मौजूद हैं।

ज़रा सुनिए इस जेहादी ने अपने सेनापति सैयद अब्दुल दुलई को 1790 में क्या चिट्ठी लिखी थी-

“अल्लाह के करम से, कालीकट के सारे हिंदुओं को मैंने इस्लाम में शामिल कर लिया है। सिर्फ कोचीन के कुछ इलाके बचे हैं, जल्द ही मैं वहां भी इस्लाम का परचम लहरा दूंगा।”

एक दूसरी चिट्ठी जो उसने अपने कमांडर बदरुज़ ज़मां खान को लिखी थी, उसमें ये जल्लाद बड़े घमंड से लिखता है-

“मुझे तुम्हें ये बताते हुए बड़ी खुशी हो रही है की मेरे हुक्म से मालाबार के चार लाख काफिरों (हिंदुओं) को इस्लाम कुबूल करवा दिया गया है। मैंने एक भी नायर और ब्राह्मण को बिना खतने के ज़िंदा नहीं छोड़ा है।”

अरे लिबरल कीड़ों, जो इंसान खुद अपनी चिट्ठियों में डंके की चोट पर ये मान रहा हो की उसने चार लाख हिंदुओं का जबरन धर्मांतरण कराया है, वो तुम्हारे लिए सेक्युलर और देशभक्त कैसे हो गया?

मालाबार के अंदर टीपू ने 2000 से ज्यादा प्राचीन हिंदू मंदिरों को तोड़ा, मूर्तियों को खंडित किया और मंदिरों की पवित्र जगहों पर गायें काटकर फेंक दीं। और हमारे देश के कुछ गद्दार नेता आज भी इसी टीपू की मज़ार पर जाकर चादरें चढ़ाते हैं और माथा टेकते हैं! इससे बड़ी बेशर्मी और क्या हो सकती है?

जला के फेंक डालो इस जिहादी को ‘मैसूर का टाइगर’ बताने वाली किताबों को

आज का हिंदू कोई वो पुराना वाला सोया हुआ और सेक्युलरिज्म के नशे में धुत्त हिंदू नहीं है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के इस ज़माने में हमारे पास अपना असली इतिहास पहुंच रहा है। हमें अब समझ में आ रहा है की हमारे साथ कितना भयानक धोखा किया गया है।

हमें आज उन किताबों को जलाकर राख कर देना चाहिए जिन्होंने टीपू सुल्तान जैसे जल्लाद को ‘मैसूर का टाइगर’ बताया। अरे, टाइगर तो हमारे वो कोडावा हिंदू थे जिन्होंने इसे 31 बार धूल चटाई थी! असली टाइगर तो हमारे छत्रपति शिवाजी महाराज और लाचित बोरफुकन थे जिन्होंने जेहादियों की छाती पर चढ़कर भगवा लहराया था।

आज पूरे हिंदू समाज को एक होकर ये डंके की चोट पर बोलना होगा की हम अपने पुरखों के हत्यारे का महिमामंडन अपने ही देश में नहीं सहेंगे।

कर्नाटक हो या दिल्ली, जहाँ भी इस गद्दार के नाम पर कोई सड़क, कोई मोहल्ला या कोई इमारत है, उसका नाम तुरंत बदला जाना चाहिए। हमें टीपू सुल्तान मार्ग नहीं चाहिए, हमें ‘कोडावा वीर मार्ग’ चाहिए।

और वो जो वोटबैंक के भूखे राजनीतिक दल हर साल ‘टीपू जयंती’ का जश्न मनाकर हमारे जले पर नमक छिड़कने का काम करते हैं ना, उनका ऐसा राजनीतिक बहिष्कार होना चाहिए की उनकी ज़मानतें ज़ब्त हो जाएं। जो पार्टी हमारे हत्यारों का जश्न मनाएगी, उसे इस देश का हिंदू अपने जूतों की नोक पर रखेगा।

जब तक हमारे इतिहास की किताबों से टीपू सुल्तान जैसे जेहादी जल्लादों की तारीफें मिटाकर उन्हें उनके असली खूंखार रूप में नहीं पढ़ाया जाएगा, तब तक हमारा ये धर्मयुद्ध जारी रहेगा।

वंदे मातरम! जय श्री राम! भारत माता की जय!

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