दिल्ली की राजनीति का दस्तूर बड़ा ही अजीब है यार। यहाँ जो जितना ज़्यादा शोर मचाता है, जिसके जितने बड़े पोस्टर चौराहों पर लगते हैं, उसे उतना ही बड़ा नेता मान लिया जाता है।
इस शोर-शराबे वाली सियासत में उस इंसान को अक्सर भुला दिया जाता है जो चुपचाप, बिना किसी ड्रामे के, देश की तकदीर बदल कर चला जाता है।
भारत के इतिहास में भी एक ऐसा ही प्रधानमंत्री हुआ, जिसने अपनी खामोशी से वो काम कर दिखाए जो बड़े-बड़े नारे लगाने वाले नेता कभी सोच भी नहीं सकते थे।
ये कहानी है पामुलापर्थी वेंकट नरसिम्हा राव (P.V. Narasimha Rao) की। एक ऐसा संन्यासी राजनेता, जिसने कंगाली के दलदल में धंसे भारत को बाहर निकाला।
जिसने बिना कोई खून-खराबा किए, खामोशी से राम मंदिर की ऐसी पक्की कानूनी नींव रखी की दशकों बाद उसी नींव पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला खड़ा हुआ।
लेकिन बदले में उन्हें क्या मिला? अपनों का ही दिया हुआ वो खौफनाक और रुला देने वाला तिरस्कार, जिसे पढ़कर आज भी किसी पत्थर दिल इंसान की आँखों में भी आंसू आ जाएं।
चलिए, इतिहास की उस धूल को थोड़ा साफ करते हैं और आपको बताते हैं आधुनिक भारत के उस असल चाणक्य की कहानी, जिनके बारे में आज के बहुत कम युवा जानते हैं।

निज़ाम से बगावत से लेकर दिल्ली के सत्ता-शिखर तक, तेलंगाना के एक छोटे से गाँव से निकले विद्वान का वो खामोश सफर
दिल्ली की सियासत में अक्सर उसी का सिक्का चलता है जो शोर मचाना जानता है। लेकिन P.V. Narasimha Rao की कहानी इस शोर-शराबे से बिल्कुल अलग थी।
28 जून 1921 को वर्तमान तेलंगाना (उस दौर की हैदराबाद रियासत) के एक छोटे से गाँव लक्नेपल्ली में जन्मे राव साहब को 3 साल की उम्र में ही एक दूसरे परिवार ने गोद ले लिया था।
वे बचपन से ही कोई मामूली लड़के नहीं थे। जिस उम्र में बच्चे खेलते-कूदते हैं, उस उम्र में इस लड़के के भीतर निज़ाम की क्रूर सत्ता और रज़ाकारों के खिलाफ बगावत की आग सुलग रही थी।
उन्होंने छात्र जीवन में ही हैदराबाद रियासत में ‘वन्दे मातरम’ आंदोलन में हिस्सा लिया और आज़ादी की लड़ाई में कूद पड़े।
राव साहब की शख्सियत किसी पहेली से कम नहीं थी। ज़रा सोचिए, एक ऐसा इंसान जिसने विज्ञान (B.Sc) और कानून (LLB) की बेहतरीन पढ़ाई की हो, जिसे 17 अलग-अलग भाषाएं बोलनी आती हों, और जो स्पेनिश में भी कविताएं लिख लेता हो! उनका दिमाग एक चलते-फिरते इनसाइक्लोपीडिया जैसा था।
आज़ादी के बाद जब वे कांग्रेस में शामिल हुए, तो अपनी खामोशी और गहरी समझ के दम पर धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ते गए। 1971 में जब वे आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने ऐसे साहसिक भूमि सुधार (Land Reforms) लागू किए, जिसने बड़े-बड़े ज़मींदारों की नींद उड़ा दी और उन्हें गरीबों का मसीहा बना दिया।
उनकी इसी बेजोड़ काबिलियत को देखकर इंदिरा गांधी और बाद में राजीव गांधी ने उन्हें हमेशा अपने सबसे करीब रखा। 70 और 80 के दशक में राव साहब ने गृह, रक्षा और विदेश जैसे देश के सबसे भारी-भरकम मंत्रालय संभाले और अपनी कूटनीति का लोहा पूरी दुनिया को मनवाया।
फिर आता है 1991 का साल, और इसी दौरान राजीव गांधी की चुनाव प्रचार के बीच में दुखद हत्या हो जाती है। पूरी कांग्रेस पार्टी नेतृत्वविहीन होकर बिखरने की कगार पर पहुँच जाती है।
ऐसे में पार्टी के क्षत्रपों को एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जो होनहार हो लेकिन जिसे ‘कठपुतली’ बनाकर पीछे से सत्ता चलाई जा सके। इसी सोच के साथ उन्होंने नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया।
दिवालिया होने की कगार पर खड़े देश को अपने साहसिक फैसलों से मंदी के भंवर से निकालने वाले आधुनिक भारत के असली चाणक्य

अब ज़रा उस दौर की तस्वीर को अपने दिमाग में लाइए। 1991 में जब नरसिम्हा राव ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, तो उन्हें कोई सजा-सजाया ताज नहीं मिला था, बल्कि कांटों का एक ऐसा बिस्तर मिला था जिस पर लेटना किसी भी आम नेता के बस की बात नहीं थी।
देश दिवालिया होने की कगार पर खड़ा था।
हालात इतने भयंकर थे की भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) में सिर्फ इतना पैसा बचा था की हम बमुश्किल 15 दिन का आयात (Import) कर सकते थे।
मतलब 15 दिन बाद हमारे पास पेट्रोल, डीज़ल और ज़रूरी दवाइयां खरीदने तक के पैसे नहीं होते। देश की तिजोरी में चूहे दौड़ रहे थे।
अपनी अंतरराष्ट्रीय इज्ज़त बचाने के लिए भारत सरकार को आज़ादी के बाद पहली बार अपना सोना (Gold) हवाई जहाज़ों में भरकर लंदन भेजना पड़ा था, ताकि बैंक ऑफ इंग्लैंड (Bank of England) में उसे गिरवी रखकर कुछ डॉलर उधार लिए जा सकें।
पूरा देश एक गहरे सदमे में था। ऐसे खौफनाक वक्त में राव साहब ने वो किया जो कोई और कांग्रेसी नेता सपने में भी नहीं सोच सकता था।
उन्होंने राजनीति और अर्थशास्त्र (Economics) को अलग-अलग कर दिया। उन्होंने अपनी ही पार्टी के पुराने और सड़े-गले समाजवादी (Socialist) नेताओं की एक न सुनी।
राव साहब जानते थे की देश को बचाने के लिए अब किसी नेता की नहीं, बल्कि एक अर्थशास्त्री की ज़रूरत है। उन्होंने रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर डॉ. मनमोहन सिंह को बुलाया और सीधे उन्हें अपना वित्त मंत्री (Finance Minister) बना दिया।
मनमोहन सिंह उस वक्त राजनीति के खिलाड़ी नहीं थे, उन्हें बस इकॉनमी की समझ थी।
राव साहब ने मनमोहन सिंह से कहा, “तुम वो करो जो देश की इकॉनमी के लिए सही है, राजनीतिक गोलियां खाने के लिए मैं खड़ा हूँ।” और वाकई उन्होंने वो गोलियां सीने पर खाईं! अपनी ही पार्टी के नेताओं के ताने सुने, लेकिन पीछे नहीं हटे।
इसी जोड़ी ने देश में ‘लाइसेंस राज’ (License Raj) का अंत किया। जो भारतीय व्यापारी पहले एक छोटा सा कारखाना लगाने के लिए दिल्ली के बाबुओं के चक्कर काटते-काटते चप्पलें घिस देते थे, उन्हें आज़ादी दे दी गई।
भारत के दरवाज़े विदेशी कंपनियों के लिए खोल दिए गए। देश में उदारीकरण (Liberalisation), निजीकरण (Privatisation) और वैश्वीकरण (Globalisation) यानी LPG रिफॉर्म्स की आंधी आ गई।
आज हम टीवी पर बैठकर जिस 5 ट्रिलियन डॉलर वाली इकॉनमी का सीना ठोक कर बखान करते हैं ना, आज हमारे पास जो 600 अरब डॉलर से ज़्यादा का विदेशी मुद्रा भंडार भरा पड़ा है… उसकी पहली ईंट उसी दिन पीवी नरसिम्हा राव ने रखी थी।
अगर उस दिन वो इंसान अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए कोई कमज़ोर फैसला लेता, तो आज हम भी शायद पाकिस्तान या श्रीलंका की तरह कटोरा लेकर दुनिया के सामने खड़े होते। उन्होंने चुपचाप भारत की डूबती नैया को पार लगा दिया, बिना किसी ढिंढोरे के, बिना किसी PR के।
6 दिसंबर का वो दिन जब सत्ता दांव पर लगाकर नरसिम्हा राव ने रामभक्तों पर गोली चलाने से कर दिया था साफ इनकार

इकॉनमी को तो उन्होंने बचा लिया, लेकिन नरसिम्हा राव की असली परीक्षा तो अभी बाकी थी। ये वो दौर था जब पूरे देश में राम जन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर था।
अयोध्या की सड़कों पर भगवा लहर उफान मार रही थी। और इसी आंदोलन के बीच आया 6 दिसंबर 1992 का वो ऐतिहासिक दिन, जिसने भारत की राजनीति को हमेशा-हमेशा के लिए बदलकर रख दिया।
अब ज़रा 6 दिसंबर की उस सुबह को याद कीजिए। केंद्र में कांग्रेस की पूर्ण बहुमत वाली सरकार नहीं थी, लेकिन सत्ता की कमान नरसिम्हा राव के हाथ में थी।
उधर उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे और लाखों की संख्या में कारसेवक अयोध्या पहुंच चुके थे। कांग्रेस के अंदर बैठे वो तमाम नेता, जो खुद को बहुत बड़ा ‘सेक्युलर’ मानते थे (जैसे अर्जुन सिंह और उनके साथी), वो राव साहब पर भयंकर दबाव बना रहे थे।
इन कांग्रेसी क्षत्रपों की मांग थी की यूपी की कल्याण सिंह सरकार को तुरंत बर्खास्त किया जाए, वहां अनुच्छेद 356 (Article 356) के तहत राष्ट्रपति शासन लगाया जाए, और अयोध्या में घुसी पैरामिलिट्री फोर्स को आदेश दिया जाए की वो कारसेवकों पर सीधी गोली चलाएं।
वो चाहते थे की किसी भी कीमत पर उस विवादित ढांचे को खरोंच तक ना आए, चाहे इसके लिए कितने ही रामभक्तों की लाशें क्यों ना बिछानी पड़ें।
लेकिन इसी मोड़ पर राव साहब का वो ‘खामोश अवतार’ सामने आया, जिसे आज भी राजनीतिक गलियारों में एक रहस्य माना जाता है।
उस दौर के बड़े पत्रकार कुलदीप नैयर से लेकर पूर्व गृह सचिव माधव गोडबोले तक, कई लोगों ने अपनी किताबों और लेखों में उस दिन का जो आंखों-देखा हाल बताया है, वो हैरान करने वाला है।
जब अयोध्या में गुंबद पर कारसेवक चढ़ने लगे और कांग्रेस के नेता राव साहब को फोन मिलाने लगे की “गोली चलाने का ऑर्डर दीजिए,” तब जानते हैं राव साहब ने क्या किया?
उन्होंने खुद को अपने कमरे में बंद कर लिया और ‘पूजा’ में बैठ गए! उन्होंने साफ निर्देश दे दिया था की उन्हें कोई डिस्टर्ब न करे।
फोन की घंटियां बजती रहीं, फाइलें बाहर पड़ी रहीं, लेकिन उस कमरे का दरवाज़ा तब तक नहीं खुला, जब तक की वो कलंकित ढांचा पूरी तरह से ज़मींदोज़ नहीं हो गया।
उन्होंने मुलायम सिंह यादव की तरह अपने हाथ रामभक्तों के खून से नहीं रंगे। उनके पास पूरी ताकत थी की वो एक झटके में सेना या पुलिस को गोली चलाने का आदेश दे सकते थे, लेकिन उन्होंने अपनी ही सत्ता और पार्टी को दांव पर लगा दिया।
उन्होंने जानबूझकर वो ‘मौन’ धारण किया, जिसने सदियों पुरानी उस गुलामी की निशानी को मिट्टी में मिलने का मौका दे दिया।
वो जानते थे की इसका नतीजा क्या होगा, उन्हें पता था की उनकी पार्टी उनका राजनीतिक करियर खत्म कर देगी, लेकिन फिर भी उन्होंने गोली नहीं चलवाई।
1994 का वो ऐतिहासिक हलफनामा जिसे आज कोई याद नहीं करता लेकिन उसी ने लिखी थी राम मंदिर की भव्य जीत की पक्की स्क्रिप्ट

ढांचा तो गिर गया, लेकिन राव साहब जानते थे की असली लड़ाई अभी कोर्ट में लड़ी जानी है। यहीं पर उनके अंदर का वो दूरदर्शी ‘चाणक्य’ जाग उठा, जिसने राम मंदिर की ऐसी पक्की कानूनी नींव रखी की जिसे आने वाली कोई भी सरकार हिला नहीं पाई।
बाबरी विध्वंस के ठीक एक महीने बाद, जनवरी 1993 में राव सरकार एक बहुत बड़ा मास्टरस्ट्रोक लेकर आई- ‘अयोध्या अधिग्रहण कानून’ (Ayodhya Act 1993)।
इसके तहत सरकार ने उस विवादित स्थल के आस-पास की पूरी 67 एकड़ ज़मीन अपने कब्ज़े (Acquire) में ले ली। उन्होंने ऐसा इसलिए किया ताकि कोई भी वक्फ बोर्ड या कट्टरपंथी संगठन वहां जाकर कोई नया कब्ज़ा ना कर ले और वो पूरी जगह सुरक्षित रहे।
लेकिन कहानी का सबसे बड़ा और अचूक तीर चला 14 सितंबर 1994 को। ये वो दिन है जिसे राम मंदिर के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा जाना चाहिए, लेकिन अफ़सोस की इसे आज कोई याद नहीं करता।
राव साहब की सरकार ने उस दिन सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार की तरफ से एक आधिकारिक हलफनामा (Affidavit) दाखिल किया।
जब आप उस हलफनामे की शब्दावली पढ़ेंगे, तो हैरान रह जाएंगे की एक कांग्रेसी प्रधानमंत्री ऐसा कैसे लिख सकता है! उस हलफनामे में भारत सरकार ने डंके की चोट पर लिखा था:
“अगर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की खुदाई में और जांच में यह साबित हो जाता है की इस मस्जिद को बनाने से पहले वहां कोई हिन्दू मंदिर या ढांचा मौजूद था, तो भारत सरकार वो पूरी ज़मीन हिन्दुओं की इच्छा के अनुसार राम मंदिर बनाने के लिए उन्हें सौंप देगी।”
यकीन मानिए, यही वो अकेला सरकारी दस्तावेज़ था जिसने पूरी बाज़ी पलट दी थी। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने लिखित में कमिटमेंट दे दी थी की फैसला आस्था पर नहीं, बल्कि ASI के सबूतों पर होगा और अगर सबूत हिन्दुओं के पक्ष में आए, तो ज़मीन हिन्दुओं को ही मिलेगी।
सालों बाद जब ASI ने वहां खुदाई की और ज़मीन के नीचे से एक विशाल हिन्दू मंदिर के 14 कसौटी वाले खंभे, कलश और मूर्तियां निकलीं, तो यही 1994 का हलफनामा सबसे बड़ा कानूनी हथियार बना।
2019 में जब आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने राम मंदिर के हक़ में अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया, तो उन्होंने उसी सरकारी हलफनामे को एक बहुत बड़ा आधार (Legal Ground) माना।
खुद सुब्रमण्यम स्वामी जैसे दिग्गज नेता और कानूनविद कई बार सार्वजनिक मंचों पर यह बात कह चुके हैं की नरसिम्हा राव ने ही राम मंदिर का रास्ता कानूनी रूप से साफ किया था।
अगर उस दिन राव सरकार वो हलफनामा सुप्रीम कोर्ट में ना देती और गोलमोल बातें कर जाती, तो शायद यह केस आज भी कोर्ट के चक्कर काट रहा होता। राव साहब ने बिना कोई शोर मचाए, खामोशी से रामलला की वापसी की पक्की स्क्रिप्ट लिख दी थी।
रामलला का रास्ता खोलने की नरसिम्हा राव को मिली वो खौफनाक सज़ा जब अपनी ही पार्टी ने उन्हें इतिहास से मिटाने का रच दिया षड्यंत्र

इतिहास गवाह है की जब भी किसी राजनेता ने अपने देश और धर्म के लिए अपनी पार्टी लाइन से हटकर कोई बड़ा फैसला लिया है, तो उसकी सज़ा उसे अपने ही लोगों से मिली है।
नरसिम्हा राव के साथ भी ठीक वैसा ही हुआ। बाबरी ढांचा क्या गिरा, कांग्रेस पार्टी के अंदर मानो भूचाल आ गया। रातों-रात कांग्रेस का वो पुराना ‘मुस्लिम वोट बैंक’ खिसक कर मुलायम सिंह और लालू यादव जैसे नेताओं के पास चला गया।
कांग्रेस 1996 का चुनाव हार गयी और इस पूरी हार का ठीकरा अकेले उस इंसान के सिर फोड़ दिया गया, जिसने कभी अपनी सफाई में एक शब्द तक नहीं कहा।
10 जनपथ (सोनिया गांधी) से उनकी दूरियां इतनी बढ़ गईं की दोनों के बीच बातचीत लगभग बंद सी हो गई। इसका सबसे बड़ा कारण सिर्फ बाबरी विध्वंस ही नहीं था, बल्कि ये भी था की राव साहब किसी की ‘कठपुतली’ बनकर सत्ता चलाने को तैयार नहीं थे।
वो एक स्वाभिमानी इंसान थे, जो फैसले 10 जनपथ से पूछकर नहीं, बल्कि देश के हित को देखकर ले रहे थे। और कांग्रेस जैसी पार्टी में, जो सिर्फ एक परिवार की परिक्रमा करती हो, वहां ये बात सबसे बड़ा ‘अपराध’ मानी जाती है।
राव साहब को इसकी ऐसी खौफनाक सज़ा दी गई जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। 1996 में जैसे ही वो सत्ता से बाहर हुए, उन्हें रातों-रात कांग्रेस अध्यक्ष पद से बेदखल कर दिया गया।
जिस इंसान ने 5 साल तक पार्टी और देश को टूटने से बचाया, उसे 1998 के आम चुनावों में कांग्रेस का टिकट तक नहीं दिया गया! ज़रा सोचिए, एक पूर्व प्रधानमंत्री को अपनी ही पार्टी से टिकट मांगने पर दुत्कार दिया गया।
इतना ही नहीं, उन्हें पूरी तरह से तोड़ने के लिए उन पर भ्रष्टाचार के झूठे और बेबुनियाद केस लादे गए। एक ऐसा प्रधानमंत्री जिसने देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी, उसे अपने बुढ़ापे में वकीलों की फीस भरने के लिए अपनी पुश्तैनी ज़मीनें तक बेचनी पड़ीं।
वो अकेले अदालतों के चक्कर काटते रहे, और पूरी कांग्रेस पार्टी तमाशा देखती रही। उन्हें इतिहास के पन्नों से ऐसे मिटाने की कोशिश की गई, जैसे वो कभी देश के प्रधानमंत्री थे ही नहीं।
हर मंच से 1991 के आर्थिक सुधारों का पूरा क्रेडिट सिर्फ मनमोहन सिंह को दिया जाने लगा, और राव साहब का नाम लेना भी कांग्रेस में ‘पाप’ मान लिया गया।
24 अकबर रोड का वो बंद दरवाज़ा, दिल्ली की सर्दी में आधे घंटे तक अपनी ही पार्टी के दफ्तर के बाहर लाश बनकर खड़ा रहा एक पूर्व प्रधानमंत्री
राव साहब ने जीते जी तो ये जलालत झेली ही, लेकिन जो उनके मरने के बाद हुआ, वो भारतीय राजनीति के माथे पर एक ऐसा कलंक है जिसे शायद गंगा का पानी भी न धो पाए।
विनय सीतापति ने अपनी किताब ‘हाफ लायन’ में इस वाकये का जो दर्दनाक ज़िक्र किया है, उसे पढ़कर पत्थर से पत्थर इंसान की भी आंखें नम हो जाएं।
23 दिसंबर 2004… दिल्ली की कड़कड़ाती हुई सर्द दोपहर। इसी दिन पीवी नरसिम्हा राव ने AIIMS अस्पताल में अपनी आख़िरी सांस ली।
कांग्रेस पार्टी की एक पुरानी और अटूट परंपरा रही है की जब भी किसी पूर्व प्रधानमंत्री या पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष का निधन होता है, तो उनके पार्थिव शरीर (शव) को अंतिम दर्शनों के लिए ’24 अकबर रोड’ यानी AICC (कांग्रेस मुख्यालय) के प्रांगण में रखा जाता है।
के. कामराज से लेकर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी तक, सबके लिए यह दरवाज़ा हमेशा खुला था।
राव साहब के पार्थिव शरीर को भी एक तोप-गाड़ी (Hearse) में पूरे राजकीय सम्मान के साथ 24 अकबर रोड लाया गया। उनके परिवार के लोग, कुछ करीबी दोस्त और सेना के जवान उस तोप-गाड़ी के साथ थे।
लेकिन जब वो काफिला कांग्रेस मुख्यालय के गेट पर पहुंचा, तो जो मंज़र था, वो दिल चीर देने वाला था।
गेट का भारी-भरकम लोहे का दरवाज़ा अंदर से बंद था। उस पर ताला लगा हुआ था!
तोप-गाड़ी गेट के बाहर रुक गई। अंदर कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी और देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित तमाम बड़े नेता मौजूद थे।
सब जानते थे की बाहर देश के पूर्व प्रधानमंत्री की लाश खड़ी है, लेकिन किसी ने वो ताला खुलवाने की जहमत नहीं उठाई। कहा जाता है की ऊपर से साफ आदेश था कि दरवाज़ा नहीं खुलेगा।
पूरी दिल्ली की उस जमा देने वाली सर्दी में, वो महान पूर्व प्रधानमंत्री अपनी ही पार्टी के दफ्तर के बाहर पूरे आधे घंटे तक एक लाश बनकर खड़ा रहा।
कोई सुगबुगाहट नहीं, कोई सम्मान नहीं। जब आधे घंटे बाद भी वो लोहे का दरवाज़ा नहीं खुला, तो परिवार भारी मन से उस तोप-गाड़ी को वापस लेकर लौट गया।
तिरस्कार का ये सिलसिला यहीं नहीं रुका। जब परिवार ने चाहा की राव साहब का अंतिम संस्कार दिल्ली में ही हो, क्योंकि उन्होंने अपनी ज़िंदगी के 30 से ज़्यादा साल इसी दिल्ली की राजनीति को दिए थे, तो उन्हें दिल्ली में ‘दो गज़ ज़मीन’ तक नहीं दी गई।
जहां नेहरू और गांधी परिवार के हर सदस्य की दिल्ली में भव्य समाधि (शांति वन, शक्ति स्थल, वीर भूमि) बनी हुई है, वहां राव साहब के लिए सरकार ने ज़मीन देने से साफ इनकार कर दिया।
उन पर दबाव डाला गया की आप शव को तुरंत यहाँ से हटाइए और हैदराबाद ले जाइए। आख़िरकार, भरे मन से परिवार को उनकी देह हैदराबाद ले जानी पड़ी, जहां उनका अंतिम संस्कार हुआ।
अपनों ने दिया सिर्फ तिरस्कार लेकिन समय ने किया न्याय और आज भारत रत्न बनकर अमर हो गए PV नरसिम्हा राव
लेकिन एक बात हमेशा याद रखिएगा यार, इंसान भले ही कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, इतिहास की अदालत अपना हिसाब खुद करती है।
आप किसी को किताबों से मिटा सकते हैं, भाषणों से हटा सकते हैं, लेकिन सच को ज़मीन में नहीं गाड़ सकते।
जिस इंसान को उसकी अपनी पार्टी ने भुला दिया था, जिसे एक समाधि तक नसीब नहीं हुई, आख़िरकार उसी देश ने उसे सिर-आंखों पर बिठाया।
सालों बाद देश की राजनीति बदली, और साल 2024 में नरेंद्र मोदी सरकार ने दलगत राजनीति से ऊपर उठते हुए पीवी नरसिम्हा राव को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया।
यह सिर्फ एक मेडल नहीं था, बल्कि यह उस खामोश चाणक्य के साथ हुए दशकों पुराने अन्याय पर देश का लगाया हुआ ‘क्षमा का मरहम’ था।
आज जब अयोध्या में रामलला अपने भव्य और दिव्य मंदिर में विराजमान हैं, तो करोड़ों रामभक्तों की आस्था के साथ-साथ उस मंदिर की नींव में नरसिम्हा राव के उस 1994 के हलफनामे की ताकत भी दबी हुई है।
राव साहब शायद आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी खामोशी आज भी बोलती है। वो बंद दरवाज़े उनका कद छोटा नहीं कर पाए, बल्कि उन दरवाज़ों को बंद करने वालों की सोच को छोटा साबित कर गए।
जब-जब आधुनिक भारत के निर्माण का इतिहास लिखा जाएगा, और जब-जब राम मंदिर के संघर्ष की कहानी सुनाई जाएगी, तब-तब पामुलापर्थी वेंकट नरसिम्हा राव का नाम सुनहरे अक्षरों में चमक उठेगा।
एक ऐसा हीरो, जिसे शायद उसके अपने दौर ने नहीं समझा, लेकिन आने वाली पीढ़ियां हमेशा उसे एक ‘भारत रत्न’ के रूप में पूजेंगी।
