ज़रा सोचिए भाई, दिल्ली के तख्त पर बैठा वो खूंखार जेहादी औरंगजेब जिसकी तलवार से पूरा हिंदुस्तान कांपता था, उसकी रातों की नींद मथुरा के एक अकेले हिन्दू शेर ने हराम कर दी थी!
वामपंथी गद्दारों ने हमसे वो इतिहास छुपा लिया जिसमें वीर गोकुला जाट के शौर्य और बलिदान की कहानी है। मैं विश्वास से कह सकता हूँ की आपने भी मेरी तरह गोकुला जाट के बारे में कभी इतिहास की किताबों में नहीं पढ़ा होगा।
ये वो वीर था जिसने अपने शरीर के हर एक अंग को बारी-बारी औरंगज़ेब से कटवा लिया लेकिन इस्लाम नहीं कुबूला। गोकुला जाट ने भरे दरबार में उस जेहादी के मुंह पर थूक दिया और इस्लाम को लात मार दी। उसका अंग-अंग कुल्हाड़ी से अलग कर दिया, पर वो शूरवीर हँसता रहा और आखिरी सांस तक अपना सनातन धर्म नहीं छोड़ा।
आज मैं आपको वीर गोकुला जाट के उसी अमर बलिदान और इस्लाम के जिहाद को कुचलने वाले उस महासंग्राम की रोंगटे खड़े कर देने वाली पूरी कहानी बताने जा रहा हूँ।
इस्लामी कीचड़ को कुचलने के लिए मथुरा में हुआ वीर गोकुला जाट का उदय
बात उन दिनों की है जब दिल्ली की गद्दी पर वो खूंखार और जेहादी जल्लाद औरंगजेब बैठा हुआ था। औरंगजेब कोई बादशाह नहीं, बल्कि एक नंबर का दरिंदा था, उसने हिंदुओं का जीना हराम कर दिया गया था।
उस कमीने ने ‘जजिया’ नाम का वो खौफनाक टैक्स हम पर थोप दिया, जिसका सीधा मतलब था की अगर तुम्हें इस देश में जिंदा रहना है और हिंदू बनकर रहना है, तो मुगलों को अपनी गाढ़ी कमाई का हिस्सा दो।
हिंदुओं पर पांच प्रतिशत टैक्स लगा दिया गया। ये सीधा-सीधा इकोनॉमिक जिहाद था। जो गरीब हिंदू टैक्स नहीं दे पाता था, उसे मार-मार कर जबरन कलमा पढ़वाया जाता था।
हद तो तब हो गई जब 1669 के अप्रैल महीने में औरंगजेब ने एक सीधा फरमान जारी कर दिया की काफिरों (हिंदुओं) के सारे मंदिरों को मिट्टी में मिला दो। उसने सबसे पहला निशाना बनाया हमारे ब्रजमंडल को, हमारी मथुरा और वृंदावन की पवित्र भूमि को।
मुगलों की जेहादी फौजें मथुरा के उस भव्य केशवदेव मंदिर को तोड़ने निकल पड़ीं, जहाँ हमारे भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। हमारे दीवाली, होली और मेलों पर पूरी तरह से बैन लगा दिया गया।
सोचिए उस वक्त वहां के आम किसानों, जाटों, गुर्जरों और अहीरों के दिलों पर क्या बीत रही होगी? उनकी आंखों के सामने उनके आराध्य के मंदिरों को तोड़ा जा रहा था, उनकी बहन-बेटियों को सरेआम बेइज्जत किया जा रहा था।
पूरे मथुरा और ब्रज क्षेत्र के हिंदुओं का खून खौल रहा था। अंदर ही अंदर गुस्से का एक ऐसा भयानक ज्वालामुखी पक रहा था, जिसे फटने के लिए बस एक चिंगारी की जरूरत थी। और वो चिंगारी, नहीं बल्कि पूरा का पूरा धधकता हुआ सूरज बनकर उभरे वीर गोकुला जाट!
अब्दुन नबी को बीच सड़क पर काटकर गोकुला जाट ने कट्टर इस्लाम को दी खुली चुनौती
औरंगजेब ने मथुरा के हिंदुओं को कुचलने के लिए अपने सबसे भरोसेमंद और खूंखार अफसर अब्दुन नबी को वहां का फौजदार बनाकर भेजा था। ये अब्दुन नबी कोई इंसान नहीं, चलता-फिरता शैतान था।
इसकी गुंडागर्दी और दरिंदगी की कोई हद नहीं थी। इसने हिंदुओं की जमीनों पर जबरन कब्जा करना शुरू कर दिया, हमारी बहन-बेटियों पर बुरी नज़र डालनी शुरू कर दी और तो और, केशवदेव मंदिर की बाउंड्री को तोड़कर बीचों-बीच एक जामा मस्जिद तान दी ताकि हिंदुओं को हर रोज़ खून के घूंट पीने पड़ें।
मथुरा के हिंदू घुट-घुट कर जी रहे थे, लेकिन तिलपत (जो आज के हरियाणा और मथुरा के बॉर्डर का इलाका है) के एक ज़मींदार वीर गोकुला जाट (गोकुल देव) से ये बेइज्जती बर्दाश्त नहीं हुई।
गोकुला कोई आम किसान नहीं थे, उनकी रगों में वो असली सनातनी खून दौड़ रहा था जो मुगलों के आगे रेंगने के बजाय कट जाना पसंद करता है। गोकुला ने चुपचाप हाथ पर हाथ रखकर रोने के बजाय बगावत का बिगुल फूंक दिया।
गोकुला ने गांव-गांव जाकर रात के अंधेरे में पंचायतें करनी शुरू कर दीं। उन्होंने जाटों, अहीरों, गुर्जरों, राजपूतों और आम किसानों को एक झंडे के नीचे खड़ा किया।
गोकुला की दहाड़ में वो जादू था की हल चलाने वाले किसानों ने अपनी दरातियां और फावड़े भालों और तलवारों में बदल दिए। उन्होंने साफ कह दिया की “अब अगर मुगलों को टैक्स दिया, तो वो हमारी आने वाली नस्लों को भी गुलाम बना लेंगे। टैक्स नहीं, अब मुगलों को मौत दी जाएगी!”
और फिर आया मई 1669 का वो खौफनाक दिन। गोकुला ने अपनी उस देसी फौज के साथ सीधा मुगलों के गढ़ सादाबाद (मथुरा के पास) पर भयानक धावा बोल दिया। मुगलों को भनक तक नहीं थी की कोई हिंदू उन पर इस तरह पलटवार भी कर सकता है। गोकुला और उनके शेरों ने मुगलों को गाजर-मूली की तरह काटना शुरू कर दिया।
अब्दुन नबी जो खुद को औरंगजेब का सबसे बड़ा मोहरा समझता था, उसे उसके घर से घसीट कर बाहर निकाला गया। गोकुला के शूरवीरों ने उस जेहादी अब्दुन नबी को बीच सड़क पर कुत्तों की तरह काट डाला।
मुगलों के पूरे इतिहास में ये पहली बार हुआ था की दिल्ली की नाक के नीचे, किसी हिंदू ने उनके इतने बड़े फौजदार की छाती इस तरह बीच बाज़ार फाड़ दी हो। सादाबाद की छावनी को लूट लिया गया और उसे आग के हवाले कर दिया गया।
अब्दुन नबी की लाश जब दिल्ली पहुंची, तो औरंगजेब के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वो खूंखार बादशाह जो खुद को खुदा समझता था, गोकुला जाट के खौफ से कांप उठा था।
तिलपत के महासंग्राम में गोकुला जाट की हिन्दू फौज ने मुगलों को काटा, और वीरांगनाओं का जौहर
अब्दुन नबी की मौत से औरंगजेब इतना घबरा गया की उसने कोई रिस्क नहीं लिया। उसे समझ आ गया था की ये कोई छोटी-मोटी बगावत नहीं है, बल्कि पूरा का पूरा हिंदू समाज मुगलों की कब्र खोदने के लिए उठ खड़ा हुआ है।
औरंगजेब ने तुरंत अपने सबसे खतरनाक सेनापतियों- शफवी खान, हसन अली खान और रजाब अली को एक विशाल फौज, तोपखाने और बंदूकों के साथ गोकुला को कुचलने के लिए भेज दिया।
हद तो तब हो गई जब औरंगजेब खुद अपनी छावनी छोड़कर इस लड़ाई को देखने के लिए मथुरा के पास आ डटा। सोचिए, एक अकेले गोकुला जाट ने दिल्ली के बादशाह की कैसी नींद हराम कर दी थी!
गोकुला जाट और उनके वीर चाचा उदय सिंह भी पीछे हटने वाले नहीं थे। उन्होंने अपने 20 हज़ार किसानों और देसी योद्धाओं के साथ तिलपत के किले को अपना गढ़ बना लिया।
मुगलों की लाखों की फौज और तोपों के सामने, इन 20 हज़ार हिंदुओं के पास ना तो कोई बहुत बड़े हथियार थे, ना कोई भारी तोपखाना। उनके पास अगर कुछ था तो वो था अपने सनातन धर्म को बचाने का वो जुनून, जिसके आगे मुगलों की तोपें भी बौनी पड़ रही थीं।
दिसंबर 1669 के आखिर में तिलपत का वो खौफनाक महासंग्राम शुरू हुआ। मुगलों ने सोचा था की सुबह हमला करेंगे और दोपहर तक इन किसानों को कुचल देंगे। लेकिन उन्हें नहीं पता था की वो किन सनातनी शेरों से भिड़ रहे हैं।
चार दिन और चार रात तक तिलपत की मिट्टी खून से लाल होती रही। गोकुला के वीरों ने मुगलों की फौज में वो कोहराम मचाया की मुगलों की लाशों के अंबार लग गए।
इतिहासकार खुद मानते हैं की उन देसी किसानों ने लगभग चार हज़ार से ज्यादा मुगल सैनिकों को जहन्नुम पहुंचा दिया था। हसन अली खान की फौज तो एक बार को मैदान छोड़कर भागने तक लगी थी।
लेकिन मुगलों की फौजों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही थी और सबसे बड़ा कहर बरपा रही थीं उनकी भारी तोपें। जब लगातार तोप के गोलों से तिलपत के किले की दीवारें टूटने लगीं और मुगलों की टिड्डी दल फौज अंदर घुसने लगी, तब वहां एक ऐसा मंज़र देखने को मिला जो इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों से लिखा जाना चाहिए था, लेकिन गद्दारों ने उसे छुपा लिया।
जब गांव की हिंदू और जाट महिलाओं को लगा की अब दुश्मन अंदर आ चुके हैं और गोकुला की फौज कम पड़ रही है, तो उन वीरांगनाओं ने मुगलों के गंदे हाथों में पड़ने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर समझा।
हमारी उन माताओं और बहनों ने हँसते-हँसते धधकती हुई आग में छलांग लगा दी। पूरे तिलपत में ‘जौहर’ की लपटें उठने लगीं। अपनी औरतों को आग में जलता देख गोकुला के बचे हुए योद्धाओं का खून और खौल उठा।
उन्होंने आखिरी सांस तक मुगलों की छाती में अपनी दरातियां और भाले घोंपे। मुगलों को तिलपत जीतने के लिए अपने ही सैनिकों की हजारों लाशों पर से गुजरना पड़ा।
ये कोई हार नहीं थी, यह उस जेहादी सल्तनत के सीने में गाड़ा गया वो खंजर था जिसका घाव मुगलों को सदियों तक रिसता रहा। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वो औरंगजेब की क्रूरता और गोकुला जाट के शौर्य की एक ऐसी खौफनाक दास्तान है, जिसे सुनकर आज भी आंखों से आंसू और सीने से आग निकलने लगती है।
आगरा की कोतवाली में औरंगजेब के मुंह पर थूक कर गोकुला जाट ने इस्लाम को मारी लात
तिलपत के उस महासंग्राम में मुगलों की लाशों के पहाड़ लग गए। वीर गोकुला और उनके चाचा उदय सिंह पूरी तरह से लहूलुहान हो चुके थे और उनके हथियार टूट चुके थे। तब मुगलों की भारी फौज ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया। हमारे इन शूरवीरों को धोखे से बंदी बना लिया गया।
उन्हें भारी जंजीरों में जकड़ कर आगरा की कोतवाली लाया गया। तारीख थी 1 जनवरी 1670। पूरे आगरा शहर में सन्नाटा पसरा हुआ था। औरंगजेब अपने तख्त पर बड़ी हेकड़ी से बैठा था।
उसे लग रहा था की खून से लथपथ और बेड़ियों में जकड़ा हुआ ये जाट किसान उसके पैरों में गिरकर रहम की भीख मांगेगा। उसने गोकुला के सामने अपना वो पुराना और गंदा जेहादी ऑफर रखा।
औरंगजेब ने कहा- “ए गोकुला, अगर तू और तेरे साथी इस्लाम कुबूल कर लें, कलमा पढ़ लें, तो मैं तुम्हारी जान बख्श दूंगा। तुम्हारी जागीरें वापस कर दूंगा और तुम्हें अपने दरबार में ऊंचा ओहदा दूंगा।”
भाई, सोचिए उस वक्त का मंज़र! मौत सामने खड़ी थी, शरीर से खून बह रहा था, लेकिन उस हिंदू शेर की आंखों में रत्ती भर भी खौफ नहीं था। गोकुला ने अपना सिर उठाने के बजाय सीना चौड़ा किया और औरंगजेब की आंखों में आंखें डालकर मौत का ऐसा मज़ाक उड़ाया की पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया।
वीर गोकुला ने औरंगज़ेब के मुँह पे थूकते हुए कहा-
“अपना ये गंदा इस्लाम और अपना ये जहन्नुम वाला मजहब अपने पास रख। मुझे मेरा सनातन धर्म मेरी जान से भी ज्यादा प्यारा है। अगर सौ बार भी जन्म लूं, तो सौ बार हिंदू बनकर ही पैदा होना चाहूंगा। तू क्या मुझे मौत से डराएगा, हम तो वो हैं जो मौत को भी मुट्ठी में लेकर चलते हैं!”
वीर गोकुला का ये जवाब कोई मामूली बात नहीं थी। ये सीधे-सीधे उस जेहादी औरंगजेब के घमंड पर एक ऐसा करारा तमाचा था, जिसकी गूंज से उसकी रूह कांप गई। गोकुला ने इस्लाम को भरे दरबार में ठोकर मार दी थी।
औरंगजेब गुस्से से पागल हो उठा। उसने तुरंत हुक्म दिया की इस काफिर को ऐसी खौफनाक मौत दो की आने वाले हजार सालों तक कोई हिंदू मुगलों के खिलाफ आंख उठाने की जुर्रत ना करे।
अंग-अंग कटवा लिए पर सनातन नहीं छोड़ा, वीर गोकुला का खौफनाक बलिदान
औरंगजेब के जल्लाद अपनी कुल्हाड़ियां और तलवारें लेकर आ गए। आगरा की कोतवाली के बाहर हजारों हिंदुओं की भीड़ ये सब देखने के लिए मजबूर की गई थी ताकि उनके दिलों में दहशत बैठ जाए। लेकिन वहां दहशत नहीं, बल्कि सनातन का वो शौर्य लिखा जाने वाला था जिसे इतिहास कभी मिटा नहीं पाया।
जल्लाद ने सबसे पहले वीर गोकुला की एक बांह पर कुल्हाड़ी मारी। खून का फव्वारा फूट पड़ा। हाथ कटकर ज़मीन पर गिर गया। मुगलों ने सोचा की अब ये चीखेगा, गिड़गिड़ाएगा। लेकिन गोकुला के चेहरे पर दर्द की एक शिकन तक नहीं आई। वो शेर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगा। उसने मुगलों को ललकारते हुए कहा- “बस? यही ताकत है तेरे इस्लाम में? और ज़ोर से मार!”
उसके बाद जल्लाद ने दूसरा हाथ काट दिया। फिर कुल्हाड़ी से एक पैर काटा गया। गोकुला जाट तिल-तिल कर कट रहे थे। शरीर से खून की नदियां बह रही थीं, लेकिन उनके होंठों पर सिर्फ महादेव और श्री कृष्ण का नाम था।
वो दर्द से तड़पे नहीं, वो चीखे नहीं। जब उनका दूसरा पैर भी काट दिया गया, तो वो सिर्फ धड़ के बल ज़मीन पर गिरे हुए थे, लेकिन उनकी आंखें मुगलों के उस खौफनाक गुरूर को चीर रही थीं।
आखिरकार जल्लादों ने उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। उसी तरह उनके वीर चाचा उदय सिंह की भी खाल उधेड़ कर बेरहमी से हत्या कर दी गई। मुगलों को लगा था की उन्होंने गोकुला को मार कर बगावत कुचल दी।
पर सच कहूं तो, मुगलों की सबसे बड़ी हार उसी दिन हो गई थी। औरंगजेब जीत कर भी हार गया था क्योंकि वो एक अकेले जाट किसान को डरा नहीं पाया, उसका धर्म नहीं बदलवा पाया।
गोकुला का वो बलिदान हिंदू धर्म को हमेशा के लिए अजेय कर गया। आगरा की उस मिट्टी में जो खून गिरा, उसने मुगलों की कब्र खोदने के लिए ऐसे-ऐसे शूरवीरों को जन्म दिया जिसकी औरंगजेब ने सपने में भी कल्पना नहीं की थी।
गोकुला जाट की मौत का खौफनाक बदला और अकबर की कब्र खोदकर उसकी हड्डियां जलाना
गोकुला का खून बेकार नहीं गया भाई। उनकी शहादत की खबर जैसे-जैसे जाटों, गुर्जरों और ब्रज के किसानों तक पहुंची, उनके अंदर इंतकाम की ऐसी भयंकर आग भड़क उठी जिसने मुगलों का जीना हराम कर दिया।
औरंगजेब को लगा था की गोकुला के बाद सब शांत हो जाएगा, लेकिन उसे नहीं पता था की गोकुला के खून की एक-एक बूंद से हजारों नए गोकुला पैदा हो चुके थे।
बगावत की इस मशाल को फिर उठाया वीर राजाराम जाट ने। राजाराम ने कसम खा ली थी की वो गोकुला की बेरहम मौत का ऐसा बदला लेगा की मुगलों की आने वाली नस्लें भी कांपेंगी। राजाराम ने गुरिल्ला युद्ध शुरू कर दिया।
उन्होंने आगरा और मथुरा के आसपास मुगलों की नाक में इतना दम कर दिया की मुगलों के बड़े-बड़े सूबेदार अपनी छावनियां छोड़कर भागने लगे।
और फिर 1688 में राजाराम जाट ने वो किया, जिसने मुगलिया सल्तनत के मुंह पर हमेशा के लिए सबसे बड़ी और काली कालिख पोत दी। राजाराम अपनी जाट फौज लेकर सीधे आगरा के पास सिकंदरा में घुस गए।
ये वही सिकंदरा था जहाँ मुगलों का वो तथाकथित ‘महान’ अकबर दफनाया गया था। राजाराम ने अकबर के उस भव्य मकबरे पर हमला बोला, मुगल पहरेदारों को बोटी-बोटी करके काटा और सीधे अकबर की कब्र पर फावड़ा चला दिया।
जी हां! राजाराम जाट ने अकबर की कब्र खोद डाली। अंदर से अकबर की सड़ी हुई हड्डियां और ढांचा बाहर निकाला गया। राजाराम ने साफ कहा- “जिस मुगलों ने हमारे मंदिरों को जलाया, आज हम उनके सबसे बड़े बादशाह को जलाएंगे।”
अकबर की हड्डियों को चिता पर रखा गया और पूरी तरह से हिंदू रीति-रिवाज़ के साथ उन्हें आग लगा दी गई। अकबर की वो हड्डियां जलकर राख हो गईं। सोचिए, जिस अकबर को मुगल अपना खुदा मानते थे, उसे मरने के बाद भी चैन नहीं मिला। मुगलों के पूरे इतिहास में इससे बड़ी बेइज्जती और इससे खौफनाक इंतकाम कोई दूसरा नहीं है!
गद्दार इतिहासकारों ने गोकुला जाट का हिन्दू शौर्य छुपाया
अब एक सीधा सवाल पूछता हूं। क्या आपने या मैंने वीर गोकुला जाट या राजाराम जाट की ये कहानियां कभी अपने स्कूलों की किताबों में पढ़ीं? नहीं ना! क्यों? क्योंकि हमारे देश का एजुकेशन सिस्टम और इतिहास लिखने का पूरा ठेका उन वामपंथी, सेक्युलर और जेहादी मानसिकता वाले इतिहासकारों को दे दिया गया था।
आज हमें इस गद्दार इकोसिस्टम को जड़ से उखाड़ फेंकना है। गोकुला जाट की ये कहानी आज के समय में और भी ज्यादा ज़रूरी हो गई है। आज हमारे देश में फिर से वो जेहादी ताकतें सिर उठा रही हैं।
आज फिर से वो ‘डेमोग्राफिक जिहाद’ हमारी बहन-बेटियों, हमारी ज़मीनों और हमारे मोहल्लों को निगल रहा है। वक्फ बोर्ड के नाम पर आज फिर से हमारी ज़मीनें छीनी जा रही हैं।
वीर गोकुला जाट ने हमें एक बहुत बड़ा सबक दिया है। जब गोकुला ने मुगलों के खिलाफ तलवार उठाई थी, तो उन्होंने ये नहीं देखा था की मैं सिर्फ जाट हूं। उनके साथ गुर्जर, अहीर, राजपूत, ब्राह्मण और हर वो इंसान खड़ा था जिसके अंदर सनातन का खून था।
आज सबसे बड़ी दिक्कत ये है की हम हिंदू जातियों में बंट गए हैं। जेहादी जब पत्थर मारता है या हमारी ज़मीन हड़पता है, तो वो हमारी जाति नहीं देखता; वो सिर्फ ये देखता है कि हम काफिर हैं, हम हिंदू हैं।
अगर हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों को इस नए जेहादी खतरे से बचाना है, अगर हमें अपनी सनातन अस्मिता को सुरक्षित रखना है, तो हमें अपनी जातियों का चोला उतारकर फेंकना होगा। हमें फिर से एक मुट्ठी बनना होगा।
आज के हर हिंदू युवा को अपने अंदर एक ‘गोकुला जाट’ पैदा करना होगा। जब तक हमारे अंदर वो आग, वो जज़्बा और धर्म के लिए मर-मिटने का वो गुरूर वापस नहीं आएगा, तब तक ये जेहादी हमें ऐसे ही नोंचते रहेंगे।
जागो हिंदू, जागो! वीर गोकुला का बलिदान हमें चीख-चीख कर कह रहा है की कायरों की तरह घुटने टेकने से अच्छा है, शेर की तरह लड़ते हुए कट जाना। अब ना कोई सेक्युलरिज्म चलेगा और ना कोई झूठा भाईचारा।
अब सिर्फ सनातन का परचम लहराएगा और जो भी इस परचम की तरफ आंख उठाएगा, उसका वही हश्र होगा जो वीर गोकुला और राजाराम जाट ने मुगलों का किया था!
वंदे मातरम! जय श्री राम! हर हर महादेव! भारत माता की जय!
