सच कहूं तो दुनिया में अगर कोई सबसे बेवकूफ और भोली कौम है, तो वो हम हिंदू हैं। हम इतने सीधे हैं की अपने ही धर्म का जनाज़ा निकलते हुए देखते हैं और उस पर तालियां पीटते हैं।
ज़रा सोचिए, हम अपनी ही खून-पसीने की गाढ़ी कमाई से 500-500 रुपये की टिकट खरीदते हैं, थिएटर में जाकर महंगा पॉपकॉर्न चबाते हैं और बड़े मज़े से उन भांडों को पर्दे पर नाचते देखते हैं जो असल में हमारे ही देवी-देवताओं के मुंह पर थूक रहे होते हैं।
ये कोई इत्तेफाक नहीं है भाई! ये मनोरंजन के नाम पर हमारे घरों में, हमारे ड्राइंग रूम में परोसा जा रहा एक मीठा ज़हर है।
इस ज़हर का असली नाम है- ‘सांस्कृतिक जिहाद’। हथियारों और बम-धमाकों से तो आप एक बार बच भी जाएं, लेकिन ये जो दिमागी आतंकवाद है ना, ये किसी भी तोप या बंदूक से हज़ार गुना ज्यादा खतरनाक है।
इसका सिर्फ एक ही सीधा सा मकसद है- हमारे युवाओं और हमारे बच्चों के दिमाग में ये बात ठोक-ठोक कर भर देना की तुम्हारा हिंदू धर्म बहुत ही पिछड़ा, सड़ा हुआ, पाखंडी और अंधविश्वासी है। और इसके ठीक उलट, इस्लाम एकदम शांति का धर्म है, भाईचारे की मिसाल है।
जब एक हिंदू बच्चा बचपन से टीवी पर देखता है की माथे पर तिलक लगाया हुआ पंडित कितना बड़ा गुंडा-मावली होता है, और मस्जिद का सफेद टोपी पहनने वाला मौलवी हमेशा लोगों की मदद करता है, तो वो बड़ा होकर अनजाने में ही अपनी संस्कृति से नफरत करने लगता है।
वो माथे पर तिलक लगाने में शर्म महसूस करता है, लेकिन इफ्तार पार्टियों में जाकर जालीदार टोपी पहनने को ‘सेक्युलरिज्म’ का मेडल समझ लेता है। यही तो इन गद्दारों की साज़िश थी!
इन्होंने बिना एक भी गोली चलाए करोड़ों हिंदू युवाओं का ब्रेनवॉश कर दिया और हम अपनी ही बर्बादी का ये तमाशा पैसा देकर खरीदते रहे।
दाऊद इब्राहिम और अंडरवर्ल्ड के काले पैसों का जिहादी खेल जिसने हिंदी सिनेमा को बना दिया हिंदू विरोधी ‘उर्दूवुड’
ये सब कोई रातों-रात नहीं हुआ। इसके पीछे एक बहुत ही खौफनाक और ज़हरीला इकोसिस्टम काम कर रहा था। अगर आप 80 और 90 के दशक का इतिहास खंगालेंगे, तो आपको बॉलीवुड का वो नंगा सच दिखेगा जिसे आज भी छुपाने की कोशिश की जाती है।
उस दौर में मुंबई का सिनेमा पूरी तरह से दुबई में बैठे दाऊद इब्राहिम, अबू सलेम और हाजी मस्तान जैसे अंडरवर्ल्ड के जेहादी गैंगस्टर्स की मुट्ठी में आ चुका था। फिल्म-विल्म बनाने का सारा पैसा इसी डी-कंपनी (D-Company) की तरफ से हवाला के ज़रिए आता था।
अब ज़ाहिर सी बात है, जिसका पैसा लगेगा, एजेंडा भी उसी का चलेगा। दाऊद इब्राहिम और उसके गुर्गों को ये बात बिल्कुल बर्दाश्त नहीं थी की हिंदी सिनेमा में हिंदू धर्म का गौरव दिखाया जाए। इसी अंडरवर्ल्ड ने सबसे खौफनाक काम किया था टी-सीरीज़ के मालिक गुलशन कुमार की हत्या करके।
गुलशन कुमार वो इंसान थे जो उस दौर में घर-घर में शिव भक्ति, माता की भेंटे और हिंदू भजन पहुंचा रहे थे। वो अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा वैष्णो देवी और भंडारों में दान करते थे।
दाऊद के जेहादी इकोसिस्टम को ये हिंदू जागरण खटकने लगा। नतीजा? गुलशन कुमार को दिन-दहाड़े मुंबई की सड़कों पर गोलियों से भून दिया गया। और इसके बाद जो बॉलीवुड में सन्नाटा पसरा, उसने बॉलीवुड को पूरी तरह से ‘उर्दूवुड’ बना दिया।
स्क्रिप्ट-वस्क्रिप्ट सब दुबई के इशारों पर लिखी जाने लगीं। फिल्मों की भाषा हिंदी से उर्दू में बदल गई। आदाब और नमाज़ के सीन जबरदस्ती ठूंसे जाने लगे।
इतिहास के पन्नों से वो मुगल, जिन्होंने हमारे मंदिरों को तोड़ा था और हमारी बहन-बेटियों का रेप किया था, उन्हें ‘मुग़ल-ए-आज़म’ और ‘जोधा अकबर’ जैसी फिल्मों के ज़रिए महान और रोमांटिक हीरो बनाकर पेश किया जाने लगा।
ये भांड एक्टर दाऊद की पार्टियों में जाकर मुज़रा करते थे और वहां से ऑर्डर लेकर आते थे की अगली फिल्म में हिंदुओं को कैसे नीचा दिखाना है।
माथे पर तिलक और रुद्राक्ष वाला हमेशा रेपिस्ट या भ्रष्ट, और 786 का बिल्ला पहनने वाला रहीम चाचा हमेशा नेक इंसान
इस दाऊद वाले इकोसिस्टम ने फिल्मों में एक फिक्स ‘टेम्पलेट’ सेट कर दिया था। आप 80, 90 या 2000 के दशक की कोई भी फिल्म उठाकर देख लीजिए। आपको हमेशा एक ही पैटर्न मिलेगा।
अगर फिल्म में कोई गुंडा है, कोई खूंखार रेपिस्ट है, या कोई बेईमान और भ्रष्ट नेता है, तो उसका हुलिया कैसा होगा? उसके माथे पर एक बड़ा सा लाल तिलक लगा होगा, गले में रुद्राक्ष की मोटी सी माला होगी, और वो अपने अड्डे पर पीछे एक बड़ी सी माता की या भगवान शिव की मूर्ति रखकर बैठा होगा।
वो पूजा-पाठ करेगा और फिर बाहर आकर लोगों का खून पिएगा या लड़कियों का रेप करेगा। ‘सिंघम रिटर्न्स’ का वो ढोंगी हिंदू बाबा याद है ना? ये सब जानबूझकर किया गया ताकि लोगों के दिमाग में ये सेट हो जाए कि जो भी आदमी तिलक लगाता है या रुद्राक्ष पहनता है, वो पक्का फ्रॉड और गुंडा है।
और वहीं दूसरी तरफ, इस उर्दूवुड का वो ‘शांति दूत’ वाला प्रोपेगेंडा देखिए। पुरानी क्लासिक फिल्म ‘दीवार’ याद है? उसमें अमिताभ बच्चन को नास्तिक दिखाया गया जो भगवान शिव के मंदिर में कदम नहीं रखता।
लेकिन जब उस नास्तिक अमिताभ बच्चन की जान बचने की बारी आती है, तो उसे कोई भगवान नहीं बचाता, बल्कि उसके बिल्ले पर लिखा ‘786’ का वो इस्लामिक नंबर उसकी जान बचाता है! क्या गज़ब का जेहादी दिमाग लगाया था इन लेखकों ने।
और वो ‘शोले’ फिल्म का रहीम चाचा (एके हंगल का रोल) तो आपको याद ही होगा। गांव का सबसे नेक, सबसे ईमानदार और शांति पसंद इंसान कौन? वो रहीम चाचा! जो नमाज़ पढ़ता है और अपने बेटे की लाश उठने के बाद भी कहता है की “इतना सन्नाटा क्यों है भाई?” मतलब, हिंदू समाज को ये पट्टी पढ़ाई गई की टोपी और दाढ़ी वाला इंसान हमेशा फरिश्ता होता है।
अरे भाई, ज़रा इन भांड डायरेक्टर्स से कोई पूछे की आज तक बॉलीवुड के पूरे इतिहास में इन्होंने किसी मदरसे के मौलवी को आतंकवादी क्यों नहीं दिखाया?
किसी चर्च के पादरी को इन्होंने कभी रेपिस्ट क्यों नहीं दिखाया, जबकि वहां से रोज़ खबरें आती हैं? क्योंकि इनका टारगेट सिर्फ और सिर्फ सॉफ्ट और सहिष्णु हिंदू धर्म था।
PK से लेकर OMG तक सनातन का सरेआम भद्दा मज़ाक, किसी दूसरे मज़हब पर फिल्म बनाने में कांपती है इन भांडों की रूह
ये नंगा नाच सिर्फ 90 के दशक तक नहीं रुका, बल्कि नए ज़माने में ये और भी ज्यादा बेशर्म और खतरनाक हो गया। आमिर खान की वो फिल्म ‘पीके’ (PK) तो याद होगी आपको? उस फिल्म में इस दाऊद के इकोसिस्टम ने अपनी औकात दिखा दी थी।
इस फिल्म में साक्षात हमारे महादेव (भगवान शिव) के रूप धरे एक इंसान को टॉयलेट में छुपते हुए और डरकर भागते हुए दिखाया गया। शिवलिंग पर दूध चढ़ाने को अंधविश्वास और पैसों की बर्बादी बताकर ज्ञान पेला गया।
पर ज़रा सोचिए, क्या उसी आमिर खान में इतनी हिम्मत थी की वो मस्जिदों की मज़ार पर चढ़ने वाली चादरों को अंधविश्वास बता देता? क्या उसमें ये पूछने की हिम्मत थी की हज यात्राओं पर जो अरबों रुपये फूंके जाते हैं, वो पैसा किसी गरीब को क्यों नहीं दे दिया जाता?
मोहर्रम में जो खुद को कोड़े मारे जाते हैं, क्या पीके में उसका मज़ाक उड़ाया गया? बिल्कुल नहीं! वहां तो पीके की बोलती बंद हो जाती है।
यही हाल ‘ओएमजी’ (OMG – Oh My God) जैसी फिल्मों का रहा। परेश रावल जैसे एक्टर जो खुद को राष्ट्रवादी कहते हैं, उन्होंने भी इस फिल्म में हिंदू मंदिरों की दान-व्यवस्था का जमकर चीरहरण किया।
मंदिरों के पुजारियों को चोर, लुटेरा और बिजनेस करने वाला ढोंगी बता दिया गया। पूरी फिल्म का एक ही लब्बोलुआब था की मंदिरों में जाना और भगवान को प्रसाद चढ़ाना बेवकूफी है।
ये सेक्युलरिज्म का वन-वे ट्रैफिक चल रहा है भाई! इनको पता है की हिंदू सहिष्णु है, वो ज़्यादा से ज़्यादा एक-दो दिन ट्विटर पर बॉयकॉट-बॉयकॉट चिल्लाएगा और फिर भूलकर फिल्म देखने चला जाएगा।
लेकिन अगर इन्होंने इस्लाम की किसी एक कुप्रथा पर- चाहे वो तीन तलाक हो, हलाला हो, या मदरसों में बच्चों के साथ होने वाला शोषण हो- उस पर एक भी फिल्म बना दी, तो अगले ही दिन इनका ‘सर तन से जुदा’ हो जाएगा।
इनके पुतले जला दिए जाएंगे और इनके घर जला दिए जाएंगे। इन जिहादियों के डर से ये उर्दूवुड वाले कभी उनके खिलाफ मुंह नहीं खोलते। इनकी सारी मर्दानगी, इनका सारा सेक्युलर ज्ञान सिर्फ और सिर्फ हिंदुओं को नीचा दिखाने के लिए बाहर आता है।
OTT प्लेटफॉर्म्स का जिहादी एजेंडा- तांडव, आश्रम, और पाताल लोक जैसी वेब सीरीज़ में सनातन धर्म को घटिया बताने की घिनौनी साज़िश
अब जब थिएटरों में इन भांडों की फिल्में पिटनी शुरू हो गईं, तो इस दाऊद वाले इकोसिस्टम ने एक नया और सबसे खौफनाक रास्ता खोज निकाला- ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स!
अमेज़न प्राइम, नेटफ्लिक्स, हॉटस्टार जैसे प्लेटफॉर्म्स इन जिहादी एजेंडाधारियों के लिए किसी जन्नत से कम नहीं हैं। क्यों? क्योंकि यहाँ कोई सेंसर बोर्ड नहीं है। यहाँ कोई कैंची चलाने वाला नहीं है।
इन्हें वेब सीरीज़ के नाम पर हमारे घरों के बेडरूम तक घुसने और बिना किसी रोक-टोक के सनातनियों के खिलाफ सीधा और नंगा ‘प्रोपेगेंडा’ चलाने का खुला लाइसेंस मिल गया है।
अमेज़न प्राइम की वो ‘तांडव’ (Tandav) वेब सीरीज़ तो आपको याद ही होगी! उसमें क्या बेशर्मी दिखाई गई थी? ज़ीशान अय्यूब नाम का एक मुस्लिम एक्टर, जो असल ज़िंदगी में भी सीएए (CAA) विरोधियों के साथ खड़ा था, वो स्टेज पर साक्षात हमारे आराध्य भगवान शिव के रूप में आता है और गालियां बकता है! ज़रा सोचिए इस दुस्साहस को।
क्या इसी ज़ीशान अय्यूब या इस सीरीज़ के डायरेक्टर अली अब्बास ज़फर में इतनी औकात थी की ये किसी पैगंबर या अल्लाह का मज़ाक उड़ाकर दिखा दें? नहीं! क्योंकि इन्हें पता था की हिंदू सहिष्णु है, वो ज़्यादा से ज़्यादा एक-दो दिन ट्विटर पर गुस्सा करेगा और बात आई-गई हो जाएगी।
यही नंगा नाच ‘आश्रम’ (Aashram) जैसी सीरीज़ में चला। बॉबी देओल को एक रेपिस्ट, अय्याश और खूंखार भगवाधारी बाबा दिखा दिया गया।
मैं मानता हूं की समाज में ढोंगी लोग होते हैं, लेकिन ज़रा इन ओटीटी वालों से पूछिए की आज तक इन्होंने किसी मदरसे में होने वाले बच्चों के शोषण पर कोई सीरीज़ क्यों नहीं बनाई? किसी चर्च के पादरी की काली करतूतों पर कोई वेब सीरीज़ क्यों नहीं हिट होती?
अनुष्का शर्मा के प्रोडक्शन में बनी ‘पाताल लोक’ (Paatal Lok) में हिंदुओं को दलितों पर अत्याचार करने वाले क्रूर राक्षस और कुत्ते पालने वाले विलेन के रूप में दिखाया गया।
और हद तो तब पार हो गई जब नेटफ्लिक्स ने ‘लीला’ (Leila) नाम की एक सीरीज़ उतारी। इस सीरीज़ में भविष्य के भारत को ‘आर्यावर्त’ (मतलब हिंदू राष्ट्र) नाम का एक ऐसा फासीवादी और खौफनाक देश दिखाया गया जहाँ औरतों को गुलाम बनाकर रखा जाता है और अल्पसंख्यकों का रोज़ कत्लेआम होता है।
मतलब, इन्होंने एक काल्पनिक हिंदू राष्ट्र को सीरिया और इराक के आईएसआईएस (ISIS) से भी बदतर दिखा दिया! ये महज़ कुछ वेब सीरीज़ नहीं हैं भाई। ये हमारे बच्चों के दिमाग में सनातन धर्म के खिलाफ भरा जा रहा एक खौफनाक आतंकवादी विचार है, जो उन्हें अपनी ही जड़ों से नफरत करना सिखा रहा है।
IC 814 और अन्नपूर्णी का ताज़ा ज़हर, आतंकवादियों को हिंदू नाम देना और हमारे भगवान राम को मांसाहारी बताने का नीच प्रयास
अगर आपको लग रहा है की ये सब पुरानी बातें हो गई हैं और अब बॉलीवुड सुधर गया है, तो ये आपकी सबसे बड़ी गलतफहमी है। अभी हाल ही में जो ज़हर उगला गया है, उसने तो बेशर्मी के सारे रिकॉर्ड ही तोड़ दिए हैं।
नेटफ्लिक्स पर अनुभव सिन्हा (जो खुद एक घोर हिंदू-विरोधी वामपंथी विचार रखते हैं) की एक सीरीज़ आई ‘आईसी 814 द कंधार हाईजैक’ (IC 814 The Kandahar Hijack)। ये सीरीज़ 1999 में हुए उस खौफनाक प्लेन हाईजैक पर थी जो पाकिस्तानी आईएसआई (ISI) और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने किया था।
अब ज़रा इस सीरीज़ का वो जिहादी एजेंडा देखिए। जिन आतंकियों ने प्लेन हाईजैक किया था, उनके असली नाम इब्राहिम अतहर, शाहिद अख्तर, सनी अहमद काज़ी और जहूर मिस्त्री थे।
लेकिन अनुभव सिन्हा ने बहुत ही चालाकी से सीरीज़ के अंदर उन आतंकियों को ‘भोला’ और ‘शंकर’ नाम से पुकारते हुए दिखाया! अरे भाई, पूरी दुनिया जब इस सीरीज़ को देखेगी तो वो क्या सोचेगी?
वो यही सोचेगी ना की भारत के एक प्लेन को ‘भोला’ और ‘शंकर’ नाम के किसी हिंदू आतंकवादियों ने हाईजैक किया था! ये कोई सिनेमैटिक लिबर्टी नहीं है, ये सरेआम हमारे धर्म का ‘टेररिज्म’ है। ये लोग पूरी दुनिया में आतंकवाद का ठीकरा हिंदुओं के माथे फोड़ने की साज़िश रच रहे हैं।
और उधर साउथ से भी इसी उर्दूवुड वाले इकोसिस्टम की बदबू आने लगी है। नयनतारा की फिल्म ‘अन्नपूर्णी’ (Annapoorani) को देखिए। ये फिल्म एक श्रीरंगम के पवित्र और शुद्ध शाकाहारी मंदिर के पुजारी की बेटी पर थी।
इस फिल्म में उस हिंदू लड़की को जानबूझकर अपनी दोस्त के साथ नमाज़ पढ़ते हुए दिखाया गया, बुर्का पहनते हुए दिखाया गया और बेशर्मी की हद तो तब हो गई जब वो लड़की बीफ (मांस) पकाती है!
और इस बीफ पकाने को सही ठहराने के लिए उस फिल्म में क्या ज्ञान दिया गया? फिल्म का जिहादी हीरो कहता है की वाल्मीकि रामायण में लिखा है की भगवान राम, लक्ष्मण और सीता माता भी वनवास के दौरान जानवरों का मांस खाते थे!
क्या बकवास है ये? हमारे आराध्य, हमारी मर्यादा पुरुषोत्तम राम के बारे में ये सफेद झूठ पूरी दुनिया के सामने परोसा गया ताकि ये साबित किया जा सके की हिंदुओं का शाकाहार एक ढोंग है।
जब इस पर हंगामा हुआ तो नेटफ्लिक्स ने डर के मारे फिल्म हटा ली। लेकिन ये इस बात का जीता-जागता सबूत है की ये गद्दार आज भी अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आ रहे हैं।
हिंदू समाज को अपनी जेबें बंद कर इस उर्दूवुड की कब्र खोदनी ही होगी
ये भांड एक्टर, जो करोड़ों के बंगलों में बैठकर हमें ज्ञान देते हैं और करवा चौथ को दकियानूसी बताकर ईद पर बिरयानी खाते हैं, इनकी असली औकात हमारी जेबों से है।
हमारी ही टिकटों के पैसों से अमीर होकर, हमारे ही देवताओं पर थूकने वाले इस जिहादी ‘उर्दूवुड’ को अब हमेशा के लिए दफनाने का वक्त आ गया है।
सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद जो ‘बॉयकॉट बॉलीवुड’ की आंधी उठी थी, वो कोई मज़ाक नहीं थी। हमने देखा है की कैसे जब हिंदू समाज एक हुआ, तो आमिर खान की ‘लाल सिंह चड्ढा’ जैसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर मुंह के बल गिर पड़ीं।
जो एक्टर घमंड में चूर रहते थे, वो थिएटरों के बाहर दर्शकों के लिए भीख मांगते हुए नज़र आए। यही वो ताकत है जिसे हमें अब हर दिन, हर फिल्म और हर वेब सीरीज़ के लिए इस्तेमाल करना होगा।
अब हमें ये समझना ही होगा की ये सिर्फ कंटेंट नहीं है, ये एक सीधा एजेंडा है। अगर कोई भी वेब सीरीज़ या फिल्म हिंदू धर्म का ज़रा सा भी अपमान करती है, हमारे साधु-संतों को ढोंगी दिखाती है या मुगलों और जिहादियों का महिमामंडन करती है, तो हमें उसके सब्सक्रिप्शन को तुरंत लात मार देनी चाहिए।
तुरंत अपना नेटफ्लिक्स या अमेज़न प्राइम अनइंस्टॉल कर दो। जब इनके करोड़ों रुपये का नुकसान होगा, जब इनके शेयर्स धड़ाम से गिरेंगे, तब जाकर इन अर्बन नक्सलियों को समझ में आएगा की हिंदुओं से पंगा लेने का अंजाम क्या होता है।
अगर हमने आज अपनी जेबें बंद नहीं कीं, अगर हमने आज अपने बच्चों को इस सांस्कृतिक आतंकवाद से नहीं बचाया, तो यकीन मानिए, ये उर्दूवुड हमारे घरों में बैठकर हमारे ही सनातन धर्म की चिता जला देगा।
अब कोई समझौता नहीं। ये धर्मयुद्ध है और इस युद्ध में जीत तभी होगी जब इस उर्दूवुड की आर्थिक रीढ़ की हड्डी को जूतों से कुचल दिया जाएगा।
अपनी ताकत पहचानो हिंदू! ये फिल्म टिकट और ये OTT सब्सक्रिप्शन तुम्हारी सबसे बड़ी मिसाइल है। इसे इन गद्दारों पर दागने का वक्त आ गया है।
वंदे मातरम! जय श्री राम!
