निकाह, हलाला और तीन तलाक जैसी कुप्रथाओं का ‘सनातन’ भारत में क्या काम, जिहादियों के ‘शरिया मंसूबों’ को तोड़ने के लिए देश मांगे UCC की हुंकार

हमने आज़ादी के 75 साल बाद भी खुद को एक ऐसे सिस्टम का गुलाम बना रखा है, जहाँ कहने को तो एक देश और एक संविधान है, लेकिन जब बात कानून की आती है, तो अचानक से इस देश में दो लाइनें खिंच जाती हैं।

एक तरफ वो बहुसंख्यक हिंदू समाज है, जो शांति से देश के हर कानून को मानता है, हिंदू मैरिज एक्ट के तहत बंधा हुआ है और अगर एक भी नियम तोड़े तो उसे सीधा जेल में डाल दिया जाता है।

और दूसरी तरफ? दूसरी तरफ एक विशेष समुदाय है जिसे ‘अल्पसंख्यक’ होने का विक्टिम कार्ड थमाकर शरिया के नाम पर हर कुप्रथा और हर जिहादी मंसूबे को अंजाम देने की खुली छूट मिली हुई है।

अरे भाई, ये कौन सा लोकतंत्र है जहाँ तुम देश की सड़क, देश का राशन और देश की सुविधाएं तो संविधान के नाम पर लेते हो, लेकिन जब शादी, तलाक और संपत्ति की बात आती है, तो तुम अचानक से संविधान को लात मारकर ‘शरिया कानून’ की किताब खोलकर बैठ जाते हो?

ये जो ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का ढोंग हमें दशकों से पिलाया जा रहा है ना, ये असल में इस शरिया वाले कैंसर को पालने-पोसने का एक खौफनाक षड्यंत्र है।

ज़रा इन कुप्रथाओं का घिनौना सच देखिए। चार-चार शादियां करना, बच्चियों की उम्र देखे बिना उनका निकाह कर देना, निकाह मुताह (अस्थायी शादी के नाम पर जिस्मफरोशी), और इन सबसे ऊपर वो खौफनाक ‘हलाला’! हलाला कोई धार्मिक प्रथा नहीं है, ये औरतों के साथ सरेआम दुष्कर्म को लीगल करने का एक मजहबी लाइसेंस है। 

जहाँ एक पति अपनी पत्नी को तीन बार ‘तलाक’ बोलकर घर से निकाल देता है, और अगर उसे फिर से उसी पत्नी से निकाह करना हो, तो उस बेचारी औरत को किसी दूसरे मौलवी या अजनबी मर्द के साथ ‘हलाला’ के नाम पे संबंध बनाने होते हैं।

और ये वामपंथी फेमिनिस्ट जो दिन-रात महिला सशक्तिकरण का रोना रोते हैं, वो इस हलाला की घटिया प्रथा पर अपनी आंखें मूंद कर बैठ जाते हैं।

भारत कोई ‘दारुल इस्लाम’ नहीं है जहाँ ये सब बर्दाश्त किया जाएगा। ये सनातनियों का देश है, ये राम और कृष्ण का देश है। अगर तुम्हें इस देश के संसाधनों पर हक़ चाहिए, तो तुम्हें इस देश का एक समान कानून (UCC) भी मानना पड़ेगा। मुल्लों के फतवे और शरिया की किताबें अब इस नए भारत में नहीं चलेंगी!

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की सनातन भारत पर ‘शरिया’ नियम थोपने की खौफनाक जिहादी साज़िश

अब ज़रा इस पूरे खेल के पीछे बैठे उन मास्टरमाइंड्स को देखिए, जो इस देश को दीमक की तरह अंदर ही अंदर खोखला कर रहे हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) जैसे संगठन असल में क्या हैं? ये कोई साधारण संस्थाएं नहीं हैं।

ये इस देश के भीतर एक ‘स्टेट विदिन अ स्टेट’ यानी देश के अंदर एक अलग इस्लामी देश चलाने वाले कट्टरपंथी अड्डे हैं। ये खुद को सुप्रीम कोर्ट और संसद से भी ऊपर मानते हैं।

जब भी समान नागरिक संहिता (UCC) की बात उठती है, तो ये दाढ़ी वाले मौलाना तुरंत टीवी चैनलों पर आकर छाती पीटने लगते हैं की “इस्लाम खतरे में है, हमारी मज़हबी आज़ादी छीनी जा रही है।”

असल में इनकी कोई मज़हबी आज़ादी नहीं छीनी जा रही, बल्कि इनका वो खौफनाक ‘डेमोग्राफिक जिहाद’ खतरे में आ गया है, जिसके दम पर ये पूरे भारत को निगलना चाहते हैं।

ज़रा लॉजिक लगाइए। चार शादियां करने और दर्जनों बच्चे पैदा करने की ज़िद का धर्म से क्या लेना-देना है? ये सीधे-सीधे जनसांख्यिकी को बदलने का एक हथियार है।

इनका प्लान एकदम साफ है- हिंदू एक शादी करेगा और एक या दो बच्चे पैदा करेगा, और हम चार शादियां करके 20 बच्चे पैदा करेंगे। धीरे-धीरे हम बहुसंख्यक हो जाएंगे और फिर इस देश पर पूरी तरह से शरिया कानून थोप देंगे। ये जो पर्सनल लॉ बोर्ड है, ये इसी ‘गज़वा-ए-हिंद’ के सपने को कानूनी ढाल देने का काम करता है।

और इस जिहादी नेक्सस का सबसे बड़ा पार्टनर कौन है? वो लुटियंस दिल्ली में बैठा वामपंथी और लिबरल इकोसिस्टम! ये अर्बन नक्सल और JNU छाप पत्रकार इतने बड़े दोगले हैं की अगर हिंदू धर्म में करवा चौथ का व्रत रखा जाए, तो ये उसे पितृसत्ता और महिलाओं पर अत्याचार बताकर आर्टिकल लिखने लगते हैं। 

लेकिन जब किसी मुस्लिम औरत को हलाला के नाम पर किसी अजनबी के बिस्तर पर धकेला जाता है, या उसे बुरके की जेल में कैद किया जाता है, तो इन वामपंथियों के मुंह में दही जम जाता है।

तब ये ‘आर्टिकल 25’ और ‘धार्मिक आज़ादी’ का झंडा लेकर खड़े हो जाते हैं। इस लिबरल इकोसिस्टम ने अपनी आत्मा इन जेहादियों को बेच दी है। लेकिन अब इनका ये खौफनाक नेक्सस टूटने वाला है, क्योंकि देश का हिंदू अब पूरी तरह से जाग चुका है।

1980 में भारत में शरिया की कुप्रथाओं को बचाने वाली कांग्रेस की देश के सविधान से ऐतिहासिक गद्दारी

अब ज़रा इतिहास के उस काले पन्ने को पलटते हैं जहाँ से इस पूरे ‘शरिया आतंकवाद’ को इस देश में सरकारी खाद-पानी मिलना शुरू हुआ था।

अगर आज कोई जेहादी सीना तानकर कहता है की हम संविधान नहीं बल्कि शरिया मानेंगे, तो उसकी इस औकात के पीछे सबसे बड़ा हाथ कांग्रेस पार्टी की उस ऐतिहासिक गद्दारी का है, जिसने चंद मुस्लिम वोटों के लालच में इस देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को मुल्लों के जूतों तले रौंद डाला था।

बात 1980 के दशक की है। शाहबानो नाम की एक 62 साल की बूढ़ी मुस्लिम महिला को उसके पति ने तीन बार तलाक बोलकर घर से धक्के मार कर निकाल दिया था।

बेचारी औरत अपने पांच बच्चों को पालने के लिए जब सुप्रीम कोर्ट पहुंची, तो कोर्ट ने भी उस बूढ़ी औरत का दर्द समझा और पति को गुज़ारा भत्ता (Alimony) देने का आदेश सुना दिया। 

लेकिन भाई साहब, जैसे ही सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला आया, पूरे देश के मौलवियों, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कट्टरपंथियों के पेट में मरोड़ उठने लगी। वो सड़कों पर उतर आए और छाती पीटने लगे की “सुप्रीम कोर्ट हमारे शरिया में दखल दे रहा है!”

उस वक्त केंद्र में राजीव गांधी की सरकार थी। 1984 में इंदिरा गांधी की मौत के बाद राजीव गांधी को 400 से ज्यादा सांसदों का प्रचंड बहुमत मिला था।

वो चाहते तो एक झटके में इन मौलानाओं को उनकी औकात याद दिला सकते थे। वो डंके की चोट पर कह सकते थे की इस देश में सुप्रीम कोर्ट का फैसला चलेगा, तुम्हारे मदरसों का फतवा नहीं।

लेकिन राजीव गांधी और कांग्रेस ने क्या किया? उन्होंने अपने उस ‘मुस्लिम वोटबैंक’ के आगे घुटने टेक दिए। उन्हें डर लग गया की अगर ये मुल्ले नाराज़ हो गए तो हमारा वोटबैंक खिसक जाएगा।

मौलवियों को खुश करने के लिए राजीव गांधी सरकार ने रातों-रात संसद में अपने बहुमत का घमंड दिखाते हुए एक नया बिल पेश कर दिया- The Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act, 1986. इस गद्दार कानून ने सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले को सीधे-सीधे कूड़ेदान में फेंक दिया।

इस काले कानून ने शरिया की उस सड़ी हुई कुप्रथा को भारत के संविधान का हिस्सा बना दिया। इसमें नियम बना दिया गया की तलाक देने वाला पति सिर्फ 90 दिन तक ही पत्नी को गुज़ारा भत्ता देगा। 90 दिन के बाद अगर वो औरत सड़क पर भूखी मर रही है, तो उसकी ज़िम्मेदारी पति की नहीं होगी।

ज़रा सोचिए इस भयानक गद्दारी को! जो औरत 40 साल तक एक आदमी के साथ रही, उसके बच्चे पैदा किए, उसे उस आदमी ने तीन बार तलाक बोलकर घर से निकाल दिया और कांग्रेस के इस कानून ने उस आदमी को सिर्फ 90 दिन के पैसे देकर ज़िम्मेदारी से ‘फ्री’ कर दिया!

इस 1986 के कानून ने देश के हिंदुओं को ये बता दिया था की तुम तो हिंदू मैरिज एक्ट के डंडे से हांके जाओगे, लेकिन इस देश का मुसलमान अपने शरिया के हिसाब से चलेगा। 

शाहबानो तो बस एक मोहरा थी, असली निशाना तो भारत का संविधान था जिसे राजीव गांधी ने इन मुस्लिम कट्टरपंथियों के पैरों में गिरवी रख दिया था।

यही वो ऐतिहासिक पाप है जिसे धोने के लिए और इन शरिया मंसूबों की कब्र खोदने के लिए आज पूरा देश एक सुर में ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) की हुंकार भर रहा है!

उत्तराखंड और गुजरात में शरिया की चिता जलनी शुरू, भारत का पहला और सबसे कड़क UCC मॉडल

जब केंद्र में और राज्यों में सनातनियों की अपनी मजबूत सरकारें बैठी हों, तो फिर शरिया के इन पैरोकारों की उल्टी गिनती शुरू होना तय है। उत्तराखंड ने तो डंके की चोट पर वो कर दिखाया है, जिसे करने से पुरानी सेक्युलर सरकारें खौफ खाती थीं।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देवभूमि की पवित्रता को बचाने के लिए जो इतिहास रचा है, वो पूरे देश के लिए एक ऐसा रोल मॉडल बन गया है जिसने जिहादियों की रातों की नींद उड़ा दी है।

उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (UCC) को बाकायदा लागू कर दिया गया है। और अभी हाल ही 2026 की शुरुआत में धामी सरकार ने इसमें जो कड़े संशोधन करके इसे ज़मीन पर उतारा है, उसने तो इन कट्टरपंथियों की कमर ही तोड़ दी है।

अब वहां कोई मुल्ला अपनी पंचायत लगाकर फतवे नहीं दे सकता। अब उत्तराखंड में चाहे आप हिंदू हों, या मुसलमान, शादी का रजिस्ट्रेशन सरकारी दफ्तर में ही होगा।

और सबसे बड़ी बात, बहुविवाह यानी एक से ज्यादा पत्नियां रखने पर पूरी तरह से परमानेंट बैन लगा दिया गया है। अगर किसी ने दूसरी शादी करने की सोची भी, तो वो सीधा जेल की हवा खाएगा।

देवभूमि की इसी खौफनाक हुंकार को अब गुजरात ने भी अपनी ज़मीन पर उतार दिया है। अप्रैल 2026 के ताज़ा विधानसभा सत्र में गुजरात सरकार ने भी अपना UCC बिल पेश करके पास करवा लिया। गुजरात का मॉडल तो और भी धाकड़ है।

वहां डंके की चोट पर ऐलान कर दिया गया है की ‘लव जिहाद’ की आड़ में पहचान छुपाकर निकाह करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। अगर कोई अपना असली मज़हब छुपाकर किसी हिंदू बेटी को फंसाता है, तो वो शादी उसी पल रद्द मानी जाएगी और उस जिहादी को ऐसी सज़ा मिलेगी की उसकी पुश्तें याद रखेंगी।

ज़मीन पर इन कानूनों का जो खौफ दिख रहा है, वो देखने लायक है। इन राज्यों में अब मुल्लों और काज़ियों की वो मनमानी वाली दुकान पर ताला लग चुका है।

कोई तीन बार तलाक-तलाक बोलकर औरतों को सड़क पर नहीं फेंक सकता। और अगर हलाला जैसी घिनौनी हरकत की, तो उसे सीधा गैर-ज़मानती अपराध माना जाएगा।

धामी और भूपेंद्र पटेल की सरकारों ने साबित कर दिया है की अगर सीने में राष्ट्रभक्ति की आग हो, तो संविधान के दायरे में रहकर भी इन जिहादी कुप्रथाओं की कब्र खोदी जा सकती है।

असम में हिमंत दा ने खोदी शरिया कानूनों की कब्र, बहुविवाह जैसी कुप्रथा को मिटाकर सनातन राज में गूंजी UCC की हुंकार

और अगर आप सोच रहे हैं की सिर्फ उत्तर भारत और पश्चिम भारत ही जाग रहा है, तो ज़रा असम की तरफ नज़र घुमाइए। वहां एक ऐसा हिंदू शेर बैठा है जो सिर्फ बातें नहीं करता, बल्कि जिहादियों के सिर पर सीधा हथौड़ा मारता है। हिमंत बिस्वा सरमा (हिमंत दा) ने असम में वो गदर मचाया है की बदरुद्दीन अजमल और ओवैसी जैसे लोगों की पैंट गीली हो चुकी है।

असम में दशकों से अंग्रेज़ों के ज़माने का एक गद्दार कानून चल रहा था- ‘असम मुस्लिम मैरिज एंड डिवोर्स रजिस्ट्रेशन एक्ट 1935’। इस 89 साल पुराने सड़े हुए कानून की आड़ में ये कट्टरपंथी क्या करते थे? ये लोग छोटी-छोटी मासूम बच्चियों की शादियां 50-50 साल के बूढ़े मौलवियों से करवा देते थे। 

हिमंत दा ने कोई कमेटी-वमेटी नहीं बनाई, उन्होंने सीधा कैबिनेट की मीटिंग बुलाई और इस 1935 के जिहादी कानून को फाड़कर सीधे कूड़ेदान में फेंक दिया।

उन्होंने साफ कह दिया की “जब तक मैं ज़िंदा हूं, असम में कोई बाल-विवाह नहीं होगा और शरिया के नाम पर बच्चियों की ज़िंदगी बर्बाद नहीं होने दूंगा।”

और हिमंत दा यहीं नहीं रुके! अभी इसी ताज़ा मई 2026 के ऐतिहासिक विधानसभा अधिवेशन में असम सरकार ने ‘एंटी-पॉलीगैमी बिल’ (बहुविवाह विरोधी कानून) और UCC का ऐसा खौफनाक ड्राफ्ट पेश किया है, जिसने पूरे मदरसा इकोसिस्टम को हिला कर रख दिया है।

अब असम में शादियां और तलाक किसी मदरसे का मौलवी या काज़ी रजिस्टर नहीं करेगा। मुल्लों की वो पूरी की पूरी समानांतर सत्ता खत्म कर दी गई है।

अब मुसलमानों को भी शादी रजिस्टर कराने के लिए डिस्ट्रिक्ट कमिश्नर (DC) यानी सरकारी दफ्तर के धक्के खाने पड़ेंगे। काज़ी सिस्टम को जड़ से उखाड़ फेंका गया है।

शरिया कानून बचाने के लिए देश जलाने की धमकियां, UCC से ही होगा जिहादियों का परमानेंट इलाज

जैसे-जैसे पूरे देश में UCC का माहौल गरमा रहा है, इन जेहादियों और उनके पैरोकारों की बौखलाहट अब गुंडागर्दी में बदलती जा रही है। असदुद्दीन ओवैसी से लेकर पर्सनल लॉ बोर्ड के मौलाना दिन-रात अपने भाषणों में देश को खुलेआम धमकियां देते हैं।

इनकी भाषा सुनिए- “अगर UCC थोपा गया, तो मुसलमान बर्दाश्त नहीं करेगा। हम सड़कों पर उतरेंगे, देश जल जाएगा।”

लेकिन इन मुल्लों और अर्बन नक्सलियों को शायद अभी तक ये समझ नहीं आया है की ये 1980 का वो कांग्रेस वाला भारत नहीं है जो तुम्हारी गुंडागर्दी और फतवों के आगे घुटने टेक देगा।

ये नया भारत है, ये सनातनियों का वो भारत है जिसने राम मंदिर बनते देखा है और धारा 370 को मलबे में तब्दील होते देखा है। अब देश का हिंदू तुम्हारी इन खोखली धमकियों से डरने वाला नहीं है।

अब बात बिल्कुल आर-पार की हो चुकी है। उत्तराखंड, गुजरात और असम ने तो अपनी हुंकार से ये साबित कर दिया है की अगर सीने में राष्ट्रभक्ति की आग धधक रही हो, तो शरिया के इन पैरोकारों को जूतों तले कुचला जा सकता है। लेकिन बात सिर्फ तीन-चार राज्यों की नहीं है।

अब हम सनातनियों की सिर्फ और सिर्फ एक ही मांग है- पूरे देश में एक समान नागरिक संहिता! आने वाले मॉनसून सत्र में केंद्र सरकार को बिना किसी दबाव के संसद में एक कड़क और बिना किसी माइनॉरिटी छूट वाला ‘नेशनल UCC बिल’ लाना ही होगा।

हमें वो सेक्युलर फ्रॉड वाला UCC नहीं चाहिए जिसमें ईसाइयों या मुसलमानों को कोई ‘विशेष छूट’ दे दी जाए। कानून का मतलब है कानून! जो नियम एक हिंदू पर लागू होगा, वही नियम एक मुसलमान, ईसाई और पारसी पर भी लागू होगा।

एक पत्नी, एक कानून, और शादी-तलाक के लिए सिर्फ और सिर्फ सरकारी दफ्तर। मुल्लों के वो सारे शरिया कोर्ट, दारुल कज़ा और फतवा जारी करने वाले मदरसों पर परमानेंट ताला जड़ा जाना चाहिए।

अपनी आवाज़ को बुलंद करो, अपने सांसदों की गर्दन पकड़ो और डंके की चोट पर कहो की हमें हमारा ‘एक देश, एक कानून’ चाहिए!

जय श्री राम! वंदे मातरम! 

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