‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ का नारा लगाने वाले को ‘महान इतिहासकार’ बनाने का ये कैसा गंदा खेल, जेल में बंद दंगाई ‘उमर खालिद’ की नयी किताब पूरे देश में लॉन्च करके समाज को क्यों दूषित कर रहा लिबरल इकोसिस्टम

आखिर हमारे देश का ये सिस्टम और समाज किस दिशा में जा रहा है! ज़रा सोचिए, जो आदमी 2020 के दिल्ली हिन्दू-विरोधी दंगों का मास्टरमाइंड होने के आरोप में पिछले 6 साल से तिहाड़ जेल की चक्की पीस रहा है..

जिस पर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ गैंग का हिस्सा होने और UAPA जैसे बेहद गंभीर देश-विरोधी कानून के तहत मुकदमे चल रहे हैं…

अचानक से रातों-रात उस आदमी को ‘महान इतिहासकार’ और ‘स्कॉलर’ (Scholar) बनाकर हमारे समाज में पेश किया जा रहा है।

क्या ये कोई मज़ाक है? मतलब जो आदमी सड़कों पर खून-खराबा करवाने के आरोप में अंदर है, उसकी ‘जेल’ से लिखी हुई ‘किताब’ को पूरे देश में बेचकर उसे अब ये वामपंथी इकोसिस्टम एक ‘मसीहा’ और ‘विद्वान’ साबित करने पर तुला हुआ है।

क्या अब दंगे करवाने वाले और देश की बर्बादी के नारे लगाने वाले लोग हमारे बच्चों के लिए ‘आइडियल’ बनेंगे? ये लिबरल गैंग आखिर समाज की रगों में कौन सा ज़हर इंजेक्ट करना चाहता है?

गद्दारी के आरोप में जेल में सड़ रहे उमर खालिद को मसीहा बनाने की इनकी नई स्क्रिप्ट

जब कोर्ट से आपको बेल नहीं मिलती, जब सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट तक के जज सुबूत देखकर आपको ज़मानत देने से मना कर देते हैं, तब ये लुटियंस गैंग अपने सबसे गंदे टूलकिट को बाहर निकालता है।

इस टूलकिट का नाम है- ‘विक्टिम कार्ड और वाइटवॉशिंग’ (Whitewashing)!

वाइटवॉशिंग का सीधा सा मतलब ये है की एक क्रिमिनल और दंगाई के ऊपर ‘विद्वान’ का ऐसा सफेद पेंट पोत दो की पब्लिक भूल ही जाए की इसके हाथ दिल्ली दंगों के खून से रंगे हैं।

इन वामपंथियों को लगता है की अगर ये 10-15 पत्रकारों और नेताओं को एक हॉल में खड़ा करके किसी के लिए तालियां बजवा देंगे, तो क्या देश की जनता उस खौफनाक मंज़र को भूल जाएगी?

ये वो आदमी है जिसके भड़काऊ भाषणों के ठीक बाद दिल्ली में हिन्दुओं के घर जलाए गए, आईबी (IB) अफसर अंकित शर्मा को चाकुओं से बेदर्दी से गोदा गया।

क्या देश वो सब भूल गया है? बिल्कुल नहीं! लेकिन इस अर्बन-नक्सल ईकोसिस्टम को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता।

इन्हें तो बस अपना वो विदेशी फंडिंग वाला एजेंडा चलाना है जिसके तहत भारत सरकार और हिन्दू समाज को हमेशा विलेन बनाकर पेश किया जा सके।

और इसी एजेंडे के तहत अब उमर खालिद को एक ‘महान लेखक’ बनाने की नई स्क्रिप्ट लिखी गई है।

तिहाड़ से किताब छपवाकर दंगाई को महान लेखक साबित करने का टूलकिट और लुटियंस गैंग की बेशर्मी

चलिए अब आपको इस नई नौटंकी की पूरी इनसाइड स्टोरी बताते हैं। अभी ताज़ा-ताज़ा बात है, 11 अगस्त 2026 को उमर खालिद का 39वां जन्मदिन था।

तिहाड़ जेल की सलाखों के पीछे ये उसका छठा जन्मदिन था! और इसी दिन को इन वामपंथियों ने अपने ‘पीआर स्टंट’ के लिए चुना।

दिल्ली के ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ (Press Club of India)- जो आजकल ऐसे ही लोगों का अड्डा बन चुका है- वहां बाकायदा एक बड़ा सा इवेंट रखा गया।

मक़सद क्या था? मक़सद था इस आरोपी की एक नई किताब को प्रमोट करना।

‘जगरनॉट बुक्स’ (Juggernaut Books) नाम के एक पब्लिकेशन ने उमर खालिद की जेएनयू (JNU) वाली पीएचडी थीसिस और जेल से लिखे पत्रों को एक करके रातों-रात एक ‘किताब’ का रूप दे दिया और उसे बाज़ार में उतार दिया।

इस किताब का नाम रखा गया है- “Fractured Communities” (फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज)।

अब ज़रा इस इवेंट की बेशर्मी का लेवल देखिए। एक मुजरिम, जो देशद्रोह के आरोप में जेल में बंद है, उसकी किताब को प्रमोट करने के लिए कौन-कौन पहुंचा?

इस इवेंट में पूरा का पूरा लुटियंस और वामपंथी ईकोसिस्टम सज-धज कर पहुंचा था।

RJD सांसद मनोज झा, ‘द वायर’ (The Wire) के एडिटर सिद्धार्थ वरदराजन, कट्टरपंथी पत्रकार आरफ़ा खानम शेरवानी, और जेएनयू के प्रोफेसर अपूर्वानंद जैसे लोग वहां मंच पर बैठकर इस दंगाई के कसीदे पढ़ रहे थे।

ये लोग माइक पकड़कर ऐसे रोना रो रहे थे जैसे कोई बहुत बड़ा ‘स्वतंत्रता सेनानी’ जेल में बंद हो गया हो! इन्होंने पूरी बेशर्मी से इस किताब के बहाने देश की न्यायपालिका पर ही सवाल खड़े कर दिए।

इनका कहना था की “देखो, उमर खालिद कितना बड़ा विद्वान है, उसने कितनी अच्छी रिसर्च की है, फिर भी सरकार उसे जेल में सड़ा रही है।”

मतलब ये तो वही बात हो गई ना की कल को कोई दाऊद इब्राहिम या अजमल कसाब भी जेल में बैठकर कोई ‘किताब-विताब’ लिख दे, तो ये आरफ़ा खानम और सिद्धार्थ वरदराजन जैसे लोग उसे भी महान दार्शनिक और समाज सुधारक घोषित कर देंगे!

क्या एक आदमी अगर पढ़ा-लिखा है, तो उसे दंगे भड़काने का लाइसेंस मिल जाता है? क्या पीएचडी (PhD) करने वाले लोग देशविरोधी साज़िशें नहीं कर सकते?

लादेन भी तो बहुत पढ़ा-लिखा इंजीनियर ही था ना!

लेकिन ये ईकोसिस्टम पूरी ताकत लगाकर इसी नैरेटिव को सेट करने में जुटा है की उमर खालिद एक ‘मज़लूम और बेचारा’ छात्र है, जिसे सिर्फ उसकी आवाज़ दबाने के लिए फंसाया गया है।

JNU में फिर घुसा टुकड़े-टुकड़े गैंग का ज़हर प्रशासन की रोक के बावजूद वामपंथी गुंडों ने सरेआम किया महिमामंडन

अब ज़रा इनकी गुंडागर्दी और बेशर्मी का एक और नमूना देखिए। प्रेस क्लब वाले ड्रामे से ठीक एक दिन पहले, 10 अगस्त 2026 को इस गैंग ने जेएनयू (JNU) में भी बवाल काटने की पूरी तैयारी कर ली थी।

जेएनयू… हाँ, वही यूनिवर्सिटी जहाँ से ये पूरा ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ वाला ज़हर शुरू हुआ था। ये लोग चाहते थे की जेएनयू के ऑडिटोरियम में इस देश-विरोधी किताब का एकदम भव्य और ग्रैंड लॉन्च हो।

लेकिन इस बार जेएनयू प्रशासन ने थोड़ी रीढ़ की हड्डी दिखाई। प्रशासन ने साफ कह दिया की भाई, कैंपस के अंदर किसी दंगाई और देशविरोधी मुजरिम का ऐसा कोई महिमामंडन नहीं होगा, और उन्होंने कड़ा रुख अपनाते हुए इवेंट की परमिशन कैंसिल कर दी।

कायदे से तो बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी, है ना? लेकिन नहीं! जब परमिशन रद्द हुई तो इन वामपंथी छात्र संगठनों (JNUSU) के अंदर का असली ‘गुंडा’ बाहर आ गया।

इन्होंने प्रशासन के आदेश को सीधे ठेंगा दिखा दिया और ऑडिटोरियम के बाहर ही ज़बरदस्ती भीड़ जुटाकर इस इवेंट को कर डाला।

मतलब देख रहे हो इनकी हिम्मत! जिस जेएनयू को पढ़ाई-लिखाई और रिसर्च का मंदिर होना चाहिए था, उसे ये वामपंथी फिर से आतंकियों, अलगाववादियों और दंगाइयों का पीआर (PR) हब बनाने पर तुले हैं।

एडमिनिस्ट्रेशन लाख मना करे, लेकिन इन्हें तो अपनी ‘आज़ादी’ वाली नौटंकी करनी ही है।

और मज़ाक की बात तो ये है की यही लोग दिन-रात टीवी पर बैठकर ‘लोकतंत्र और संविधान खतरे में है’ का रोना रोते हैं, जबकि खुद सरेआम नियमों की धज्जियां उड़ाने में इन्हें कोई शर्म नहीं आती!

सुप्रीम कोर्ट को ठेंगा दिखाने की कोशिश और हिन्दुओं के खून से रंगे हाथों को कलम थमाकर सफेदपोश करने का गंदा खेल

खैर, अब सबसे बड़ा सवाल ये उठता है की आखिर ये पूरा वामपंथी ईकोसिस्टम एक फ्लॉप किताब को इतना सिर पर क्यों चढ़ा रहा है?

क्या इन्हें इससे करोड़ों की कमाई होने वाली है? जी नहीं! इस पूरी पीआर (PR) साज़िश का असली मकसद पैसा कमाना नहीं, बल्कि देश की न्यायपालिका (Judiciary) पर एक भयंकर मानसिक दबाव बनाना है।

सच्चाई तो ये है की पिछले 6 सालों में उमर खालिद के वकीलों ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा लिया है। सुप्रीम कोर्ट से लेकर दिल्ली हाई कोर्ट तक, हर दरवाज़ा खटखटा कर देख लिया।

लेकिन हर बार जजों ने इसे ज़मानत (Bail) देने से साफ मना कर दिया। क्यों? क्योंकि जजों ने पुलिस की वो चार्जशीट देखी है।

उन्होंने वो पुख्ता सुबूत देखे हैं जिनमें साफ़ नज़र आ रहा है की UAPA (गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) के तहत इस आदमी ने दिल्ली दंगों की कैसी खौफनाक साज़िश रची थी।

अब जब लीगल तरीके से इनकी दाल नहीं गल रही, तो इस लुटियंस मीडिया ने दूसरा रास्ता निकाल लिया। ये लोग पूरी दुनिया के सामने ‘विक्टिम कार्ड’ (Victim Card) खेल रहे हैं।

ये सीधा नैरेटिव सेट कर रहे हैं की ‘देखो, ये तो एक बहुत ही होनहार, पढ़ा-लिखा और उत्पीड़ित स्कॉलर है, सरकार इसे सिर्फ इसलिए जेल में रख रही है क्योंकि ये सरकार की आलोचना करता है।’

अरे भाई, आलोचना करने या सवाल पूछने पर कोई जेल नहीं जाता! जेल वो जाता है जो दिल्ली की सड़कों पर आग लगवाता है।

जिनके हाथों पर दिल्ली दंगों में मारे गए बेगुनाह हिन्दुओं का और आईबी अफसर अंकित शर्मा का खून लगा हो, उनके हाथों में कलम थमा देने से वो ‘महान लेखक’ नहीं बन जाते।

ये सफेदपोश करने (Whitewashing) का सबसे गंदा और नीच खेल है।

ये सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के जजों को ब्लैकमेल करने का वामपंथी तरीका है की “अगर तुमने इसे बेल नहीं दी, तो हम दुनिया भर में ढिंढोरा पीटेंगे की भारत में अल्पसंख्यकों पर जुल्म हो रहा है।”

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