जब सनातन धर्म की रक्षा के लिए सम्राट ‘आनंदपाल’ ने एकजुट किये उत्तर भारत के सारे हिन्दू राजा, ‘महमूद गज़नवी’ को दिन में तारे दिखाने वाले इस हिँदू शेर को वामपंथी इतिहासकारों ने इतिहास में नहीं दिया सम्मान

जब भी मैं हमारे देश की इतिहास की किताबें खोलता हूँ ना, तो सच में मेरे खून में उबाल आ जाता है।

बचपन से लेकर आज तक स्कूल और कॉलेजों में हमें यही रटाया गया की मुगलों ने हम पर कैसे राज किया, विदेशी लुटेरे कितने ‘महान’ थे और हम हिन्दू तो बस हमेशा पिटते और हारते ही रहे।

इन वामपंथी और सेक्युलर इतिहासकारों ने हमारे असली नायकों का नाम इतिहास के पन्नों से पूरी तरह गायब कर दिया।

इन्होंने हमें कभी नहीं बताया की जब मध्य एशिया से खून के प्यासे जिहादी हमारे देश पर हमला करने आते थे, तो हमारे हिन्दू शेरों ने उन्हें कैसे जानवरों की तरह काटा था।

आज मैं आपको 1008 ईस्वी के एक ऐसे महायुद्ध की कहानी सुनाने जा रहा हूँ जिसे पढ़कर आपका सीना गर्व से 56 इंच का हो जाएगा।

ये कहानी है हिन्दू शाही राजवंश के उस शूरवीर सम्राट आनंदपाल की, जिसने क्रूर लुटेरे महमूद गज़नवी की रूह कंपा दी थी।

और जिसके 30 हज़ार आदिवासी योद्धाओं ने गज़नवी के कैंप में घुसकर जिहादियों का वो भयंकर संहार किया था की गज़नवी मैदान छोड़कर भागने की भीख मांगने लगा था।

वामपंथी इतिहासकारों की सबसे गंदी साज़िश और भारत का वो असली ‘लौह दरवाज़ा’ जिसे तोड़ना जिहादियों के बाप के बस की बात भी नहीं थी

सबसे पहले तो आप इस ‘हिन्दू शाही राजवंश’ (Hindu Shahi Dynasty) के बारे में जान लीजिए, जिसका नाम इन अर्बन-नक्सल इतिहासकारों ने बहुत ही चालाकी से किताबों से मिटा दिया।

सम्राट आनंदपाल इसी राजवंश के राजा जयपाल के बेटे थे। ये कोई छोटी-मोटी रियासत नहीं थी भाईसाहब! इनका साम्राज्य पंजाब से लेकर आज के काबुल (अफगानिस्तान) तक फैला हुआ था।

जब मध्य एशिया और अरब के रेगिस्तानों से जिहादी लुटेरों ने भारत की तरफ अपनी गिद्ध वाली आँखें गड़ानी शुरू कीं, तो यही हिन्दू शाही राजवंश भारत का वो ‘लौह दरवाज़ा’ (Iron Gate) था, जिससे टकराकर ये लुटेरे खून थूकते थे।

सम्राट आनंदपाल कोई ऐसे राजा नहीं थे जो महलों में बैठकर शराब और कबाब का मज़ा लेते हों।

वो एक ऐसे शूरवीर थे जो चौबीसों घंटे अपनी तलवार म्यान से बाहर रखते थे, क्योंकि उन्हें पता था की अफ़ग़ानिस्तान के उस पार से जो आंधी आ रही है, वो सिर्फ उनके राज्य को नहीं बल्कि पूरे सनातन धर्म को निगलने आ रही है।

लेकिन हमारे देश के इन वामपंथी इतिहासकारों का गंदा पाप देखिए।

इन्होंने अकबर और औरंगज़ेब जैसे हत्यारों को तो ‘महान’ और ‘ज़िंदा पीर’ बना दिया, लेकिन जिस हिन्दू शेर ने भारत की आज़ादी और धर्म की रक्षा के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी युद्ध के मैदान में खपा दी, उस सम्राट आनंदपाल का नाम तक हमारी किताबों में नहीं आने दिया।

अगर आनंदपाल और उनके 30 हज़ार योद्धाओं की कहानी इस देश का हिन्दू बच्चा-बच्चा पढ़ लेता, तो इन लिबरलों का “इस्लामी आक्रमणकारी अजेय थे” वाला झूठा नैरेटिव उसी दिन कूड़ेदान में चला जाता।

जब क्रूर जिहादी महमूद गज़नवी ने भारत को लूटने की रची खौफनाक साज़िश और सम्राट आनंदपाल ने फूंका हिन्दू एकता का शंखनाद

साल था 1008 ईस्वी। मध्य एशिया का सबसे खूंखार और वहशी लुटेरा महमूद गज़नवी भारत के दरवाज़े पर खड़ा था।

इस जिहादी का एक ही मकसद था- इस्लाम के नाम पर भारत के भव्य मंदिरों को तोड़ना, हमारी मूर्तियों को खंडित करना और हिन्दुओं का कत्लेआम करके यहाँ का खजाना लूटना।

वो एक बहुत बड़ी और खौफनाक सेना लेकर पेशावर की तरफ बढ़ रहा था।

उस वक्त उत्तर भारत के कई हिन्दू राजा आपस में छोटी-छोटी बातों पर लड़ रहे थे। लेकिन सम्राट आनंदपाल की दूरदृष्टि गज़ब की थी।

वो जानते थे की महमूद गज़नवी कोई मामूली दुश्मन नहीं है। अगर आज हिन्दू शाही राजवंश का दरवाज़ा टूट गया, तो इस जिहादी आंधी को कोई रोक नहीं पाएगा।

आनंदपाल ने पड़ोसी राज्यों से मदद की भीख नहीं मांगी, बल्कि उन्होंने एक चेतावनी दी। उन्होंने भारत के बाकी राजाओं को साफ-साफ संदेश भिजवाया की “ज़रा आँखें खोलो!

आज अगर मेरे राज्य का दरवाज़ा टूटा और मैं गिरा, तो याद रखना… कल ये जिहादी फौज तुम्हारे महलों और तुम्हारे मंदिरों तक भी पहुँचेगी। तुम्हारा कोई वजूद नहीं बचेगा।”

और भाईसाहब, आनंदपाल की इस दहाड़ का जो असर हुआ, वो उत्तर भारत के इतिहास का सबसे सुनहरा पन्ना है।

16वीं सदी के मशहूर फारसी इतिहासकार ‘फरिश्ता’ (Firishta) ने अपने दस्तावेजों में साफ लिखा है की आनंदपाल की इस पुकार पर उज्जैन, ग्वालियर, कालिंजर, कन्नौज, दिल्ली और अजमेर के हिन्दू राजाओं ने अपने आपसी मतभेद एक झटके में भुला दिए।

सबने अपनी-अपनी सेनाएं तैयार कीं और महमूद गज़नवी को सबक सिखाने के लिए पेशावर की तरफ कूच कर दिया। ये कोई मामूली बात नहीं थी। ये उत्तर भारत के इतिहास का सबसे भयंकर और विशाल मिलिट्री गठबंधन (Military Coalition) था!

सनातन धर्म को बचाने के लिए जब हिन्दू औरतों ने पिघला दिए अपने सोने के गहने और पूरा देश खड़ा हो गया जिहादियों के खिलाफ

ये लड़ाई अब सिर्फ राजाओं की नहीं रह गई थी। महमूद गज़नवी का खौफ और उसकी क्रूरता पूरे देश को पता थी, इसलिए यह लड़ाई भारतवर्ष की आज़ादी और सनातन धर्म को बचाने का एक जन-आंदोलन बन गई।

जब आनंदपाल की इतनी विशाल सेना को खड़ा करने और उनके राशन-हथियारों के लिए खजाने में पैसों की कमी पड़ने लगी, तो पता है क्या हुआ? पूरे उत्तर भारत की हिन्दू औरतों ने अपने घरों के बक्से खोल दिए!

हमारी मातृशक्ति ने अपने सोने के गहने, मंगलसूत्र, कंगन और कान की बालियाँ तक निकाल कर सेना के फंड में दान कर दीं।

औरतों ने अपने सुहाग की निशानियाँ पिघलाने के लिए दे दीं ताकि उन पैसों से जिहादियों का गला काटने के लिए तलवारें बन सकें।

ज़रा सोचिए उस जज़्बे को! गरीब किसानों ने अपनी गाढ़ी कमाई का अनाज बैलगाड़ियों में भर-भर कर सेना के कैंपों तक पहुँचाया। लोहारों ने अपनी भट्ठियां रात-दिन जलती रखीं और बिना थके, बिना सोए सेना के लिए खंजर, तलवारें और भाले बनाए।

पूरा का पूरा देश महमूद गज़नवी नाम की उस जिहादी बीमारी को रोकने के लिए एक चट्टान की तरह खड़ा हो गया था।

आनंदपाल ने वो कर दिखाया था जो उस वक्त किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था- हिन्दू एकता का सबसे विकराल रूप! और इसी विकराल रूप का सामना करने के लिए महमूद गज़नवी अपनी फौज के साथ पेशावर के पास ‘वहिंद’ (Waihind) के मैदान में खड़ा था।

उसे अंदाज़ा ही नहीं था की अगले कुछ दिनों में उसके जिहादियों का वो हश्र होने वाला है, जिसे देखकर उसकी रूह कांप जाएगी।

वहिंद का महायुद्ध और 30 हज़ार गक्खड़ योद्धाओं का वो खौफनाक तांडव जिसने गज़नवी की सेना की बखिया उधेड़ कर रख दी

पेशावर के पास ‘वहिंद’ (Waihind) का वो विशाल मैदान अब एक भयंकर महायुद्ध के लिए पूरी तरह तैयार था।

एक तरफ महमूद गज़नवी की वो खूंखार जिहादी सेना खड़ी थी जो लूट और खून के नशे में अंधी थी, और दूसरी तरफ हिन्दू सम्राट आनंदपाल के नेतृत्व में पूरे उत्तर भारत की वो संयुक्त सेना डटी थी जो अपनी मातृभूमि और धर्म को बचाने के लिए कफ़न बांध कर आई थी।

पूरे 40 दिन तक दोनों सेनाएं एक-दूसरे के आमने-सामने डटी रहीं। किसी की भी हिम्मत नहीं हो रही थी की वो पहला वार करे।

गज़नवी की सेना में खौफ छाने लगा था क्योंकि उन्होंने इससे पहले हिन्दुओं की इतनी विशाल और एक-जुट फौज कभी नहीं देखी थी।

जब 40 दिन बाद गज़नवी का सब्र टूटने लगा, तो उसने चाल चलते हुए अपने 6,000 घुड़सवार तीरंदाज़ों को आगे भेजा ताकि वो हिन्दू सेना को उकसा सकें और उन पर तीरों की बारिश कर सकें।

लेकिन गज़नवी को ये नहीं पता था की सम्राट आनंदपाल ने उसके लिए मौत का कैसा खौफनाक जाल बिछा रखा था। जैसे ही गज़नवी के वो तीरंदाज़ आगे बढ़े, आनंदपाल ने अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया!

ये ब्रह्मास्त्र कोई तोप या बारूद नहीं था, बल्कि ये थे आनंदपाल की सेना के सबसे घातक और खूंखार लड़ाके- ‘गक्खड़’ (Gakhars) आदिवासी योद्धा!

आनंदपाल की फौज में 30,000 गक्खड़ आदिवासी शामिल थे। ये नंगे पैर लड़ने वाले वो खूंखार योद्धा थे जिनके शरीर पर लोहे का कोई भारी कवच नहीं होता था।

इनके हाथों में सिर्फ नंगी तलवारें, भाले और खंजर होते थे, और इनका निशाना अचूक होता था। जैसे ही आनंदपाल ने इशारा किया, ये 30 हज़ार गक्खड़ योद्धा गज़नवी के उन तीरंदाज़ों पर ऐसे टूटे जैसे भूखे शेर भेड़ों के झुंड पर टूटते हैं!

सिर्फ चंद मिनटों में जानवरों की तरह काटे गए 5000 जिहादी, मौत का वो नंगा नाच देखकर महमूद गज़नवी भी भागने लगा मैदान छोड़कर

मैदान-ए-जंग में इन गक्खड़ों ने जो तांडव मचाया ना, उसने गज़नवी की उस सिक्योरिटी लाइन और तीरंदाज़ों की ऐसी धज्जियां उड़ाईं की जिहादियों को संभलने का मौका तक नहीं मिला।

फारसी इतिहासकार ‘फरिश्ता’ (Firishta) ने खुद अपने हाथों से लिखा है की ये गक्खड़ योद्धा तीरंदाज़ों को चीरते हुए सीधे महमूद गज़नवी के मेन कैंप (तंबू) तक घुस गए थे।

और वहां पहुँच कर उन्होंने जो मौत का नंगा नाच किया, वो देखकर आसमान भी कांप गया होगा। कुछ ही मिनटों के भीतर, जी हाँ, सिर्फ कुछ मिनटों के भीतर इन गक्खड़ों ने गज़नवी के 5000 खूंखार जिहादी सैनिकों को काट कर फेंक दिया!

पेशावर की उस मिट्टी पर सिर्फ और सिर्फ पठानों और तुर्कों की लाशें बिछी हुई थीं। गक्खड़ों की तलवारें जिहादियों का खून पीकर लाल हो चुकी थीं और वो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। गज़नवी के कैंप में भयंकर भगदड़ मच गई थी।

जिस महमूद गज़नवी के नाम से लोग खौफ खाते थे, उस दिन उसकी खुद की रूह कांप गई थी। वो इतना डर गया था की उसने अपने कमांडरों से कह दिया था की “फौज को पीछे हटाओ, हमें वापस अफ़ग़ानिस्तान लौटना होगा।”

लुटेरों के तलवे चाटने वाले इन झूठे इतिहासकारों ने आनंदपाल और हमारे हिन्दू योद्धाओं का नाम इतिहास से क्यों मिटाया

अब सवाल ये उठता है की अगर हमारे इतिहास में इतनी बड़ी लड़ाई लड़ी गई, हिन्दू औरतों ने अपने सुहाग के गहने तक दे दिए, 30 हज़ार आदिवासियों ने गज़नवी के 5000 जिहादियों को काट डाला… तो हमें ये सब स्कूलों में क्यों नहीं पढ़ाया गया?

जवाब बहुत सीधा है। आज़ादी के बाद इस देश की शिक्षा व्यवस्था उन अर्बन-नक्सल और वामपंथी इतिहासकारों के हाथ में सौंप दी गई, जो मानसिक रूप से मुगलों और आक्रांताओं के गुलाम थे।

इन गद्दारों का एक ही एजेंडा था- हिन्दुओं के दिमाग में यह कूट-कूट कर भर दो की “तुम कमज़ोर हो और विदेशी आक्रांता अजेय थे।”

ज़रा सोचिए, अगर ये इतिहासकार हमारी किताबों में आनंदपाल और गक्खड़ों के संहार वाली कहानी लिख देते, तो क्या होता?

महमूद गज़नवी जैसे जिहादियों की जो झूठी शान इन्होंने गढ़ी थी, उसकी सरेआम धज्जियां उड़ जातीं!

हिन्दू युवाओं को पता चल जाता की हमारे पुरखे मैदान छोड़कर भागने वाले नहीं, बल्कि जिहादियों के कैंप में घुसकर उनका गला काटने वाले शेर थे।

इसी ‘हिन्दू गर्व’ को मारने के लिए इन्होंने आनंदपाल का गौरवशाली इतिहास हमेशा के लिए दफन कर दिया।

लेकिन अब वो दौर बीत चुका है। अब इंटरनेट और सोशल मीडिया का ज़माना है। अब हिन्दू समाज जाग रहा है और अपने असली नायकों को पहचान रहा है।

सम्राट आनंदपाल ने पूरे भारतवर्ष को जो हिन्दू एकता का पाठ पढ़ाया और गज़नवी को जो दिन में तारे दिखाए, वो आज भी हर सनातनी के दिल में ज़िंदा है।

हर हर महादेव!

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