दुनिया का एक बहुत ही सीधा सा और कड़वा नियम है भाई। जब दिल्ली के तख्त पर बैठी सरकार कमज़ोर होती है, जब हुक्मरानों की रीढ़ की हड्डी में दम नहीं होता, तो दुश्मन की हिम्मत इतनी बढ़ जाती है की वो आपके घर में घुसकर आपके सीने पर वार करता है।
ज़रा दुनिया के दूसरे देशों की तरफ देखिए। अमेरिका हो या इज़रायल, अगर उनका एक आम नागरिक भी किसी दूसरे देश में खरोंच खा जाए, तो वो उस दुश्मन देश का नक्शा तक बदल कर रख देते हैं।
वो तब तक चैन से नहीं बैठते जब तक अपने एक-एक नागरिक के खून का बदला दस-दस दुश्मनों को मारकर नहीं ले लेते।
लेकिन हमारे इस महान भारत देश का क्या? यहाँ तो दशकों तक एक ऐसी बुज़दिल और कायर व्यवस्था का राज रहा है, जिसने देश के दुश्मनों को पालने-पोसने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
आप सोच भी नहीं सकते की इस कांग्रेसी सिस्टम ने भारत के स्वाभिमान को किस हद तक जूतों तले कुचला है। भारत के इतिहास की एक ऐसी इकलौती, खौफनाक और शर्मनाक घटना है जिसके बारे में आज के युवाओं को कभी पढ़ाया ही नहीं गया।
ज़रा सोचिए! क्या दुनिया के किसी भी संप्रभु देश के इतिहास में ऐसा कभी हुआ है की किसी दुश्मन देश का फाइटर जेट हवा में आए और आपके एक राज्य के मुख्यमंत्री को सरेआम बम से उड़ा दे?
और उससे भी ज़्यादा खौफनाक बात ये की केंद्र में बैठी सरकार उस शहादत का बदला लेने के बजाय चुपचाप अपने कमरे में बैठकर दांतो तले उँगलियाँ दबाये?
जी हां! 1965 में बिल्कुल ऐसा ही हुआ था। एक दुश्मन देश, उस नमकहराम पाकिस्तान ने हमारे एक राज्य (गुजरात) के मुख्यमंत्री को आसमान में ही उनके विमान समेत चिथड़ों में उड़ा दिया था।
लेकिन दिल्ली में बैठे कांग्रेसी सिस्टम ने क्या किया? कुछ नहीं! ये लेख उसी कांग्रेस की नामर्दी, उस खौफनाक कायरता और पाकिस्तान की उस बुज़दिली के मुंह पर एक ऐसा तमाचा होगा जो दशकों से दफन इस सच को ज़मीन फाड़कर बाहर निकालेगा।
19 सितंबर 1965 की वो मनहूस उड़ान जब गुजरात के मुख्यमंत्री ‘बलवंतराय मेहता’ कच्छ जाने के लिए विमान में हुए सवार
बात साल 1965 की है। भारत और पाकिस्तान के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था। पाकिस्तान हमेशा की तरह पीठ पीछे वार करने की अपनी गंदी फितरत दिखा रहा था।
उस वक्त गुजरात की गद्दी पर एक बहुत ही ज़मीनी, सच्चे देशभक्त और पंचायती राज के जनक कहे जाने वाले नेता बैठे थे- बलवंतराय मेहता। वो गुजरात के दूसरे मुख्यमंत्री थे।
बलवंतराय मेहता कोई आराम फरमाकर बैठकर राजनीति करने वाले नेता नहीं थे। जब बॉर्डर पर गोलियां चल रही थीं, तो उन्हें लगा की राज्य के मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें कच्छ (Kutch) के बॉर्डर इलाकों में जाकर वहां के नागरिकों और जवानों का हौसला बढ़ाना चाहिए।
वो चाहते तो आराम से गांधीनगर में बैठकर आदेश दे सकते थे, लेकिन उनके सीने में भारत माता के लिए कुछ कर गुज़रने की आग थी।
तारीख थी 19 सितंबर 1965। मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता अपनी पत्नी सरोजबेन, तीन वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों और एक पत्रकार के साथ सफर पर निकलने वाले थे।
उनका गंतव्य था मीठापुर (Mithapur)। इसके लिए उन्होंने गुजरात सरकार का एक बहुत ही छोटा और साधारण ‘नागरिक विमान’ (Civilian Aircraft) इस्तेमाल किया। ये विमान था 8 सीटर ‘बीचक्राफ्ट मॉडल 18’ (Beechcraft Model 18)।
ये कोई सेना का फाइटर जेट नहीं था! इसमें कोई मशीनगन नहीं लगी थी, कोई मिसाइल नहीं थी। ये पूरी तरह से एक निहत्था पैसेंजर प्लेन था, जिसमें एक राज्य का मुखिया अपनी पत्नी और निहत्थे अफसरों के साथ सफर कर रहा था।
इस विमान को उड़ाने की ज़िम्मेदारी जिसे दी गई थी, वो भी कोई साधारण पायलट नहीं थे। वो थे दूसरे विश्व युद्ध (WWII) के हीरो और भारतीय वायुसेना के पूर्व दिग्गज पायलट जहांगीर ‘जंगू’ इंजीनियर।
विमान ने उड़ान भरी। मौसम साफ था। किसी को इस बात का रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था की कुछ ही पलों में आसमान से मौत बरसने वाली है।
बलवंतराय मेहता और उनकी पत्नी सरोजबेन आराम से बैठे हुए थे, प्लेन सुथरी (Suthri) गांव के ऊपर से गुज़र रहा था।
सब कुछ एकदम सामान्य था, लेकिन सरहद के उस पार पाकिस्तान के एयरबेस में एक बहुत ही खौफनाक और शैतानी साज़िश रची जा रही थी।
‘नापाक’ पाकिस्तान का शर्मनाक युद्ध ‘अपराध’, F-86 ‘फाइटर जेट’ से भारत की सीमा के अंदर ‘निहत्थे विमान’ के उड़ाए चिथड़े
जैसे ही ये छोटा सा निहत्था बीचक्राफ्ट विमान भारतीय सीमा के अंदर सुथरी गांव के आसमान में था, पाकिस्तान के एयरबेस से एक जिहादी पायलट अपनी शैतानी मौत की मशीन लेकर उड़ता है।
उस 25 साल के पाकिस्तानी पायलट का नाम था- कैस हुसैन (Qais Hussain)। वो अमेरिका से मिला हुआ एक बेहद खतरनाक फाइटर जेट ‘एफ 86 सेबर’ (F-86 Sabre) उड़ा रहा था।
कैस हुसैन को उसके राडार पर हमारा वो छोटा सा विमान दिखा। वो तुरंत अपने फाइटर जेट को तूफानी स्पीड से हमारे विमान की तरफ मोड़ लेता है।
भाई साहब, आसमान का एक उसूल होता है। अगर कोई नागरिक या सिविलियन विमान गलती से भी कहीं आ जाए, तो कोई फाइटर जेट उस पर अंधाधुंध गोलियां नहीं चलाता।
इंटरनेशनल युद्ध के नियमों (Geneva Conventions) के हिसाब से एक निहत्थे पैसेंजर प्लेन को मार गिराना सबसे बड़ा ‘वॉर क्राइम’ (War Crime) या युद्ध अपराध माना जाता है।
पाकिस्तानी पायलट कैस हुसैन उस निहत्थे विमान के इतना करीब आ गया था की वो अपनी आंखों से साफ-साफ देख सकता था की ये कोई सेना का विमान नहीं है।
ये एक 8 सीटर छोटा सा नागरिक विमान है। हमारे पायलट जहांगीर इंजीनियर भी बहुत अनुभवी थे। जब उन्होंने देखा की पाकिस्तान का एक फाइटर जेट उनके पीछे लग गया है, तो उन्होंने तुरंत विमान के पंख हिलाए (Waggling wings)।
आसमान की भाषा में पंख हिलाने का मतलब होता है- “हम सरेंडर कर रहे हैं, हम निहत्थे हैं, हम नागरिक हैं, हमारे पास कोई हथियार नहीं है।”
लेकिन उस जिहादी पाकिस्तान और उसके खूंखार कमांडरों के दिमाग में इंसानियत नाम की कोई चीज़ बची ही कहां थी! कैस हुसैन ने अपने पाकिस्तानी कंट्रोल रूम से संपर्क किया।
वहां बैठे उसके आकाओं ने बिना एक पल सोचे उस निहत्थे विमान को आसमान में ही भून डालने का खौफनाक आदेश दे दिया।
और फिर आसमान में वो कत्लेआम हुआ जिसकी गूंज आज भी सुथरी गांव की हवाओं में सुनी जा सकती है। कैस हुसैन ने अपने एफ 86 सेबर से अंधाधुंध गोलियों और मिसाइल की बारिश कर दी।
हमारा वो छोटा सा बीचक्राफ्ट विमान एक ही झटके में आग के गोले में तब्दील हो गया। विमान के परखच्चे उड़ गए। गुजरात के मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता, उनकी धर्मपत्नी सरोजबेन, हमारे जांबाज पायलट जहांगीर और बाकी सभी 5 लोगों के चिथड़े आसमान में उड़ गए।
उनका शरीर जलकर खाक हो गया और विमान का मलबा ज़मीन पर आ गिरा। एक झटके में एक दुश्मन देश ने हमारे एक राज्य के मुख्यमंत्री को सरेआम मौत के घाट उतार दिया!
8 लाशों के बाद भी कांग्रेस की बेशर्मी भरी खामोशी, एक मुख्यमंत्री की सरेआम हत्या पर क्यों नहीं हुआ कोई पलटवार
जब ऑल इंडिया रेडियो (AIR) से ये खबर पूरे देश में फैली की पाकिस्तान ने हवा में हमारे मुख्यमंत्री के विमान को मार गिराया है, तो पूरे देश में हाहाकार मच गया।
लोगों का खून खौलने लगा। ये सिर्फ बलवंतराय मेहता की हत्या नहीं थी भाई! ये भारत की संप्रभुता (Sovereignty) पर पाकिस्तान का जड़ा हुआ एक ऐसा तमाचा था जिसकी गूंज पूरी दुनिया ने सुनी।
लेकिन दिल्ली में बैठे उस कांग्रेसी सिस्टम ने क्या किया? जब तुम्हारे ही देश का एक मुख्यमंत्री, उसकी पत्नी और 6 बेगुनाह लोग दुश्मन की मिसाइलों से भून दिए गए, तो क्या उस दिन आसमान से आग बरसी?
क्या भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने लाहौर और कराची के अड्डों को मलबे में तब्दील कर दिया? क्या पाकिस्तान के राष्ट्रपति या उनके किसी बड़े नेता के परखच्चे उड़ाए गए?
बिल्कुल नहीं! दिल्ली का वो सिस्टम बस हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा। उन्होंने इस सरेआम हत्या को एक सामान्य ‘वॉर कैजुअल्टी’ (War Casualty) मानकर फाइल में बंद कर दिया।
कांग्रेस की सरकार हमेशा से ही पाकिस्तान को लेकर इतनी डिफेंसिव और डरपोक रही है की उसने अपने ही मुख्यमंत्री की शहादत का खून पी लिया, लेकिन दुश्मन को उसकी औकात नहीं दिखाई।
ज़रा सोचिए, अगर किसी दुश्मन ने अमेरिका के किसी गवर्नर या ब्रिटेन के किसी बड़े नेता का प्लेन ऐसे गिराया होता, तो क्या वो देश खामोश बैठता? वो उस देश का नामोनिशान दुनिया के नक्शे से मिटा देते।
लेकिन कांग्रेस की वो जो ‘तुष्टिकरण और डर’ वाली राजनीति थी, उसने हमेशा दुश्मनों के हौसले बुलंद किए। उन्हें लगा की अगर हम इंटरनेशनल लेवल पर शोर मचाएंगे या कोई खौफनाक पलटवार करेंगे, तो शायद विश्व बिरादरी नाराज़ हो जाएगी।
अरे लानत है ऐसी विश्व बिरादरी पर जो एक निहत्थे मुख्यमंत्री की हत्या को चुपचाप देखती रही!
कांग्रेस के डीएनए (DNA) में ही वो खौफनाक कायरता रची-बसी थी जिसके कारण पाकिस्तान को ये एहसास हो गया की ये देश तो मार खाने के लिए ही बना है।
बलवंतराय मेहता कोई मामूली इंसान नहीं, वो आज़ादी की लड़ाई के हीरो थे, शेर-ए-हिंद थे।
लेकिन जब उनके शरीर के चिथड़े ज़मीन पर गिरे, तो दिल्ली की सरकार ने उस शहादत का बदला लेने के बजाय अपनी कुर्सी को महफूज़ रखने में ज़्यादा भलाई समझी।
46 साल बाद पाकिस्तानी कातिल की वो बेशर्म चिट्ठी और यूपीए सरकार की नामर्दी जो उस हत्यारे को नहीं दिला सकी सजा
अगर आपको लग रहा है की कांग्रेस की ये कायरता सिर्फ 1965 तक ही सीमित थी, तो ज़रा अपने रोंगटे खड़े कर लेने वाले इस दूसरे और सबसे शर्मनाक अध्याय को सुन लीजिए।
ये वो अध्याय है जो साबित करता है की कांग्रेस के खून में ही पाकिस्तान के आगे घुटने टेकना लिखा था। बात अगस्त 2011 की है।
इस घटना के पूरे 46 साल बीत चुके थे। उस वक्त केंद्र में यूपीए (UPA) की यानी सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के रिमोट कंट्रोल वाली कांग्रेसी सरकार बैठी थी।
तभी अचानक 46 साल बाद वो पाकिस्तानी कातिल, वो जिहादी पायलट ‘कैस हुसैन’ एक ईमेल लिखता है। उसने वो ईमेल हमारे उस शहीद पायलट जहांगीर इंजीनियर की बेटी फरीदा सिंह को लिखा था।
उस ईमेल में उस कातिल ने जो लिखा, वो एक बेशर्म ढोंग और एक बहुत बड़ा तमाचा था। कैस हुसैन ने लिखा की-
“मुझे उस घटना का बहुत अफसोस है। मैंने वो विमान मार गिराया था, लेकिन मैं तो सिर्फ अपने आकाओं के ऑर्डर मान रहा था। मुझे जो आदेश मिला, मैंने वो कर दिया। मुझे माफ कर दो।”
लानत है ऐसी माफी पर! तुम एक निहत्थे पैसेंजर प्लेन के करीब आए, तुमने देखा की अंदर कोई सेना नहीं है, तुमने अपनी आंखों से एक नागरिक विमान को पहचाना, फिर भी तुमने अंधाधुंध मिसाइलें और गोलियां दाग कर 8 बेगुनाह लोगों के चिथड़े उड़ा दिए।
और 46 साल बाद तुम एक ईमेल लिखकर कहते हो की मुझे माफ कर दो? ये कोई गलती नहीं थी, ये ‘जेनेवा कन्वेंशन’ (Geneva Conventions) और अंतरराष्ट्रीय युद्ध के नियमों का सरेआम उल्लंघन था। ये एक खौफनाक ‘वॉर क्राइम’ (War Crime) था!
लेकिन मेरे भाई, सबसे ज़्यादा खून तो तब खौलता है जब हम अपनी ही उस तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार की तरफ देखते हैं।
जब दुनिया के सामने उस पाकिस्तानी हत्यारे ने खुद अपना जुर्म कबूल कर लिया, जब उसने खुद लिखित में दे दिया की हां, मैंने एक निहत्थे विमान को मारा था, तो हमारी सरकार ने क्या किया?
क्या 2011 में बैठी उस कांग्रेसी सरकार ने तुरंत हरकत में आकर पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय अदालत (International Court of Justice) में घसीटा?
क्या भारत ने पाकिस्तान सरकार और उस पायलट के खिलाफ वॉर क्राइम का इंटरनेशनल वारंट जारी करवाया? क्या इंटरपोल (Interpol) से उसे गिरफ्तार करने की कोई मांग की गई?
बिल्कुल नहीं! शून्य! सन्नाटा! कांग्रेस की उस यूपीए सरकार ने फिर से वही अपनी पुरानी और बुज़दिल नीति अपनाई। उन्होंने उस ईमेल और उस कबूलनामे को ऐसे इग्नोर कर दिया जैसे कुछ हुआ ही ना हो।
वो कातिल आराम से पाकिस्तान में अपनी ज़िंदगी जीता रहा और हमारे नेता यहाँ पाकिस्तान के साथ ‘क्रिकेट डिप्लोमेसी’ खेलते रहे, उन्हें बिरयानी खिलाते रहे।
एक मुख्यमंत्री और सात बेगुनाह लोगों का खून इस देश की सत्ता के लिए इतना सस्ता हो गया था की मुजरिम के कबूल करने के बाद भी दिल्ली के कांग्रेसी हुक्मरानों की रगों में उबाल नहीं आया।
ये नामर्दी नहीं तो और क्या है? ये सीधे-सीधे अपने ही देश के शहीदों का अपमान और पाकिस्तान के जिहादी गुरूर के सामने नतमस्तक होना था।
आज जब कोई कांग्रेसी नेता टीवी पर बैठकर राष्ट्रीय सुरक्षा पर भाषण देता है, तो मन करता है की 1965 और 2011 की ये फाइलें उसके मुंह पर मारकर पूछा जाए की “तुम्हारी कायरता ने इस देश को क्या दिया है?”
ये कांग्रेस वाला लाचार नहीं, बल्कि आज का नया और खूंखार भारत है
अब ज़रा एक पल के लिए सोचिए की अगर आज के इस नए भारत में पाकिस्तान ने 1965 जैसी कोई जुर्रत की होती। अगर आज किसी दुश्मन देश के फाइटर जेट ने भारत के किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री के विमान को खरोंच भी लगाई होती, तो क्या होता?
मैं डंके की चोट पर कह सकता हूँ की अगर आज ऐसा कुछ हुआ होता, तो अगले 24 घंटे के अंदर पाकिस्तान का नामोनिशान दुनिया के नक्शे से मिट चुका होता!
हमारी ब्रह्मोस मिसाइलें और हमारे राफेल जेट पाकिस्तान के एयरबेस, उनके संसद और उनके कमांडरों के अड्डों को तबाह करके रख देते। आज का भारत ईंट का जवाब पत्थर से नहीं, बल्कि ईंट का जवाब बम से देना जानता है।
यही फर्क है उस पुरानी, डरपोक और लाचार कांग्रेसी राजनीति में और आज के इस इस मोदी जी के प्रखर, आक्रामक और देशभक्त भारत में।
कांग्रेस ने हमेशा इस देश को ये सिखाया की अगर कोई तुम्हें एक थप्पड़ मारे, तो दूसरा गाल आगे कर दो। लेकिन आज के भारत का सिद्धांत एकदम साफ है- “हम किसी को छेड़ेंगे नहीं, लेकिन अगर किसी ने हमें छेड़ा, तो हम उसे छोड़ेंगे नहीं!”
भारत माता की जय!
