जब मुगलों ने देखा साक्षात ‘चार हाथों’ वाले ‘काल’ का तांडव, ‘कंधे’ पर बैठकर ‘अकबर’ की जिहादी सेना के ‘सिर’ उड़ाने वाले खूंखार हिन्दू शूरवीर ‘जयमल और फत्ता’

सच कहूँ तो हमारे देश का इतिहास इतना शानदार और बारूदी है की अगर इसे बिना किसी वामपंथी मिलावट के पढ़ा जाए, तो मुर्दे के अंदर भी जान आ जाए।

हमें ये रटाया गया की ‘अकबर एक महान राजा था’। लेकिन कभी किसी ने ये नहीं बताया की उसी ‘महान’ अकबर की आधी से ज़्यादा जिहादी फौज को मेवाड़ के मुट्ठी भर राजपूती शेरों ने कैसे बेरहमी से काटकर चित्तौड़ की मिट्टी में मिला दिया था।

आज मैं तुम्हें राजपूताने के उस महासंग्राम की वो सच्ची कहानी सुनाने जा रहा हूँ, जिसे सुनकर तुम्हारा सीना गर्व से फूल जाएगा और मुगलों की असलियत देखकर खून खौल उठेगा।

ये कहानी है साल 1567 की, जब चित्तौड़गढ़ के अभेद्य किले पर दुनिया की सबसे विशाल और क्रूर मुगल सेना ने हमला किया था।

और मुगलों के उस खौफनाक गुरूर को अपने जूतों तले कुचलने के लिए किले के अंदर खड़े थे मेवाड़ के दो सबसे खूंखार शूरवीर- वीर जयमल राठौड़ और 16 साल का युवा शेर फत्ता (फतेह सिंह) सिसोदिया!

80 हज़ार मुगलों की फौज और सामने खड़े मेवाड़ के ‘जयमल और फत्ता’ के 8 हज़ार बब्बर शेर, चित्तौड़ के महासंग्राम की वो खौफनाक शुरुआत

माहौल 1567 का था। सत्ता, घमंड और खून के नशे में चूर मुगल बादशाह अकबर अपनी पूरी दरिंदगी के साथ चित्तौड़गढ़ की तरफ बढ़ रहा था।

इतिहास के पन्नों को पलटेंगे तो पता चलेगा की उस वक़्त अकबर के पास 80,000 से लेकर एक लाख तक की भयंकर जिहादी फौज थी। उसके पास भारी तोपखाने थे, बारूद था और वो हर हाल में मेवाड़ को कुचलना चाहता था।

सुरक्षा के लिहाज़ से और एक लंबी युद्ध-नीति के तहत, महाराणा उदय सिंह जी चित्तौड़ छोड़कर अरावली की घनी पहाड़ियों में चले गए थे।

लेकिन जाते वक़्त उन्होंने चित्तौड़ के इस अभेद्य और पवित्र किले की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी मेवाड़ के दो सबसे खूंखार और शूरवीर शेरों के कंधों पर छोड़ी थी।

ये दो शेर थे- मेड़ता के वीर जयमल राठौड़ (जो मीरा बाई के चचेरे भाई थे) और केलवा के एक बेहद युवा और आग उगलने वाले योद्धा फत्ता (फतेह सिंह) सिसोदिया।

ज़रा उस मंज़र की कल्पना कीजिए भाईसाब! किले के बाहर 80 हज़ार खूंखार जिहादी हथियार लेकर खड़े थे और किले के अंदर जयमल और फत्ता के पास सिर्फ और सिर्फ 8,000 राजपूत सैनिक थे!

एक तरफ 80 हज़ार की भेड़ों का झुंड और दूसरी तरफ सिर्फ 8 हज़ार राजपूती शेर। कोई और होता तो शायद इतनी बड़ी फौज देखकर ही सरेंडर कर देता या जान बचाकर भाग लेता।

लेकिन वो राजपूत थे यार! पीठ दिखाना तो उनके खून में ही नहीं था।

इन 8 हज़ार शेरों ने किले के दरवाज़े बंद कर लिए और मुगलों को ऐसी टक्कर दी की अकबर का पूरा गुरूर मिट्टी में मिल गया। पूरे 6 महीने बीत गए!

जी हाँ, पूरे 6 महीने तक 80 हज़ार की वो विशाल मुगल फौज किले का एक बाल भी बांका नहीं कर पाई।

किले के अंदर से जयमल राठौड़ और फत्ता सिसोदिया ऐसा खौफनाक काउंटर-अटैक कर रहे थे की मुगलों के खेमे में लाशों के अंबार लग गए थे।

राजपूत ऊपर से तीरों, भालों और गरम तेल की ऐसी बारिश करते की नीचे मुगल चीखें मार-मार कर मरते थे।

अकबर अपने तंबू में बैठा-बैठा हताशा में अपने बाल नोच रहा था। उसे समझ ही नहीं आ रहा था की आखिर इन मुट्ठी भर राजपूतों को हराएं तो हराएं कैसे!

6 महीने तक जब मुगलों की दाल नहीं गली तो कायर अकबर ने रात के अंधेरे में छिपकर चलाई संग्राम बंदूक

जब आमने-सामने की लड़ाई में अकबर को अपनी हार साफ नज़र आने लगी, तो उसने वही किया जो मुगल हमेशा से करते आए हैं- धोखेबाज़ी और कायरता।

दिन के उजाले में तो मुगलों की तोपें आग उगलती थीं। वो तोप के गोलों से चित्तौड़ के किले की मज़बूत दीवारों को तोड़ते थे ताकि किसी तरह अंदर घुस सकें।

लेकिन रात होते ही खेल पलट जाता था। जैसे ही अँधेरा होता, वीर जयमल राठौड़ खुद अपने सैनिकों और मज़दूरों के साथ मशालें लेकर पहुँच जाते और रातों-रात उस टूटी हुई दीवार को फिर से खड़ा कर देते।

सुबह जब अकबर अपनी लाल आँखें मलते हुए उठता, तो देखता की दीवार तो फिर से वैसी ही मज़बूत खड़ी है! ये देखकर मुगलों का खून खौल जाता था, लेकिन वो कुछ कर नहीं पाते थे।

मुगलों को लगने लगा था की ये राजपूत इंसान नहीं, बल्कि कोई जादूगर या भूत-प्रेत हैं।

जब अकबर को लगा की आमने-सामने की लड़ाई में वो इन राजपूती शेरों का मुकाबला कभी नहीं कर पाएगा, तो उसने एक बहुत ही नीच और कायरों वाला खेल खेला।

एक रात जब जयमल राठौड़ किले की टूटी दीवार पर खड़े होकर उसकी मरम्मत करवा रहे थे, तब अकबर किले के नीचे अँधेरे में भेड़िये की तरह घात लगाए बैठा था।

अकबर ने अपनी सबसे पसंदीदा और अचूक बंदूक ‘संग्राम’ (Sangram musket) निकाली। और अँधेरे का फायदा उठाते हुए, दूर से छिपकर कायरों की तरह गोली चला दी।

वो गोली सीधे जयमल राठौड़ के पैर में जाकर धंस गई। गोली लगते ही जयमल ज़मीन पर गिर पड़े। उनका पैर इतनी बुरी तरह से डैमेज हो गया था की उनका चलना-फिरना, यहाँ तक की खड़े होना भी नामुमकिन हो गया।

अकबर ने सोचा था की लीडर को गिरा दिया, अब राजपूत हिम्मत हार जाएंगे। लेकिन उसे क्या पता था की उसने राजपूतों के सीने में सुलग रही आग में घी डाल दिया है।

ये गोली जयमल के पैर में नहीं, बल्कि मुगलों के ताबूत में आखिरी कील साबित होने वाली थी।

जब 16 साल के फत्ता सिसोदिया की बूढ़ी माँ और नई-नवेली दुल्हन हंसते-हंसते कूद गईं जौहर की धधकती आग में

जयमल राठौड़ घायल हो चुके थे और दूसरी तरफ किले के अंदर राशन-पानी अब खत्म होने की कगार पर था। 6 महीने की घेराबंदी के बाद राजपूतों को समझ आ गया था की अब किले के दरवाज़े खोलने ही पड़ेंगे।

और जब राजपूती किलों के दरवाज़े ऐसे हालात में खुलते हैं, तो फिर कोई सरेंडर नहीं होता… फिर होता है ‘शाका’, यानी आर-पार की वो लड़ाई जिसमें या तो दुश्मन कटता है, या खुद कट जाते हैं।

लेकिन उन क्षत्राणियों का क्या, जो किले के अंदर थीं? मुगलों और जिहादियों की दरिंदगी किसी से छिपी नहीं थी। वो औरतों को माल-ए-गनीमत (लूट का माल) समझते थे।

अपनी आबरू, अपने सतित्व और अपने धर्म को इन वहशी दरिंदों से बचाने के लिए चित्तौड़ की वीरांगनाओं ने एक ऐसा फैसला लिया जिसे सुनकर आज भी दिल दहल जाता है। उन्होंने चुना- ‘जौहर’।

ज़रा 16-17 साल के उस युवा शेर फत्ता सिसोदिया के बारे में सोचिए। उस लड़के की तो अभी मूंछें भी ठीक से नहीं आई थीं। कुछ ही दिन पहले उसकी शादी हुई थी।

लेकिन जब धर्म पर संकट आया, तो फत्ता की बूढ़ी माँ और उनकी नई-नवेली दुल्हन (फूल कंवर) ने जो किया, वो पूरी दुनिया के इतिहास में कहीं और नहीं मिलेगा।

उन दोनों क्षत्राणियों की आँखों में रत्ती भर भी खौफ नहीं था। फत्ता की माँ और पत्नी ने खुद अपने हाथों से उस 16 साल के लड़के को केसरिया बाना पहनाया, माथे पर तिलक लगाया और उसे मुगलों का खून पीने के लिए तैयार किया।

और फिर… वो दोनों औरतें, फत्ता के ही सामने, हंसते-हंसते जौहर की उस धधकती हुई आग में कूद गईं!

अपनी ही आँखों के सामने अपनी बूढ़ी माँ और अपनी जीवनसंगिनी को आग की लपटों में जलता हुआ देखकर फत्ता सिसोदिया और बाकी राजपूतों का खून इस कदर खौल उठा की उनकी आँखों में सिर्फ और सिर्फ मौत का तांडव नज़र आने लगा।

अब उन्हें ना जीने की इच्छा थी और ना मौत का खौफ। अब उनके अंदर सिर्फ मुगलों का मांस नोचने और उनका खून पीने की एक खूंखार प्यास बाकी थी।

किले के दरवाज़े खोल दिए गए, और मेवाड़ के वो भूखे शेर जिहादियों की उस 80 हज़ार की भीड़ में मौत बनकर टूट पड़े!

साक्षात चार हाथों वाला काल बनकर मैदान में उतरे जयमल और कल्ला राठौड़ जिन्होंने मुगलों की लाशों से पाट दिया चित्तौड़

किले के दरवाज़े खुल चुके थे और राजपूती शेर मुगलों की उस जिहादी भीड़ में घुस चुके थे। लेकिन जयमल राठौड़ का क्या?

अकबर की उस कायरता भरी गोली की वजह से जयमल का पैर बिल्कुल बेकार हो चुका था, वो ज़मीन पर खड़े भी नहीं हो पा रहे थे।

पर यार, एक सच्चा क्षत्रिय बिस्तर पर लेटकर मौत का इंतज़ार थोड़ी करता है! जब जयमल ज़मीन पर तड़प रहे थे की वो इस धर्मयुद्ध में कैसे लड़ें, तब वहां एंट्री होती है उनके भतीजे वीर ‘कल्ला राठौड़’ की।

कल्ला जी ने अपने काका की ये तड़प देखी और बिना एक पल सोचे जयमल को सीधा अपने मजबूत कंधों पर बैठा लिया!

ज़रा उस खौफनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाले सीन को इमेजिन करो भाईसाब! नीचे कल्ला राठौड़ के दोनों हाथों में तलवारें मुगलों की टांगें और पेट फाड़ रही थीं, और ऊपर उनके चौड़े कंधों पर बैठे जयमल की दो तलवारें हवा में लहराते हुए जिहादियों की गर्दनें उड़ा रही थीं।

80 हज़ार मुगलों की वो फौज उस दिन खौफ से कांप उठी थी। उन्हें लग रहा था जैसे चित्तौड़ के इस मैदान में कोई इंसान नहीं, बल्कि साक्षात ‘चार हाथों वाले महाकाल’ ने जन्म ले लिया है जो आज इन सबका खून पीकर ही शांत होगा।

जिहादी मुगलों के खेमे में ऐसी भगदड़ मची की वो एक-दूसरे को ही कुचलने लगे। जो भी मुगल उस ‘चार हाथों वाले काल’ के सामने आता, वो दो सेकंड में कटकर ज़मीन पर गिर जाता।

उस दिन जयमल और कल्ला राठौड़ ने मिलकर मुगलों की लाशों के ऐसे पहाड़ खड़े किए की अकबर के भी पसीने छूट गए।

आज भी आप राजस्थान चले जाइए, कल्ला जी को वहां कोई आम इंसान नहीं मानता, लोग आज भी उन्हें ‘चार हाथों वाले लोकदेवता’ के रूप में पूजते हैं!

मुग़लों के मदिरा पिलाये हुए हाथियों की सूंड को बेरहमी से काटने वाले वीर फत्ता सिसोदिया का वो खूंखार तांडव

दूसरी तरफ चित्तौड़ के मैदान में 16 साल का वो युवा शेर फत्ता सिसोदिया मौत का नंगा नाच कर रहा था। अपनी आँखों के सामने अपनी बूढ़ी माँ और अपनी नई-नवेली दुल्हन को जौहर की आग में जलते देखने के बाद, उस लड़के के अंदर इंसानी भावनाएं खत्म हो चुकी थीं।

वो अब सिर्फ एक किलिंग मशीन बन चुका था। वो मुगलों की भारी भीड़ में ऐसे घुस गया जैसे भेड़ों के झुंड में कोई भूखा शेर घुस गया हो।

जब अकबर ने देखा की उसके सैनिकों से बात नहीं बन रही है, तो उसने राजपूतों को कुचलने के लिए शराब पिलाए हुए खूंखार और पागल हाथी (जैसे उसका खूंखार ‘मधुकर’ हाथी) मैदान में छोड़ दिए।

आम इंसान तो हाथी को देखकर ही दुम दबाकर भाग ले, लेकिन फत्ता सिसोदिया ने जो किया वो सुनकर मुगलों के होश उड़ गए।

वो 16 साल का लड़का बिल्कुल नंगी तलवार लेकर उन पागल हाथियों के सामने खड़ा हो गया। जैसे ही हाथी ने उसे कुचलने के लिए अपनी सूंड आगे बढ़ाई, फत्ता ने अपनी तलवार के एक ही झटके में उस भीमकाय हाथी की सूंड को काट कर फेंक दिया!

सूंड कटते ही हाथी दर्द से चिंघाड़ता हुआ उल्टे पैर मुगलों की ही सेना को कुचलने लगा।

फत्ता के इस भयंकर रौद्र रूप को देखकर मुगलों की रूह कांप गई थी। कोई भी जिहादी फत्ता के सामने जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

अंततः लड़ते-लड़ते, मुगलों के खून से अपनी प्यास बुझाते हुए मेवाड़ के ये शूरवीर शेर (जयमल, फत्ता और कल्ला जी) वीरगति को प्राप्त हुए। उन्होंने हार नहीं मानी, बल्कि मौत को अपनी शर्तों पर गले लगाया।

अकबर महान नहीं बल्कि एक वहशी दरिंदा था जिसने अपनी खुन्नस मिटाने के लिए 30 हज़ार निहत्थे हिन्दुओं का खून पिया

अब आता है इतिहास का वो सबसे काला पन्ना, जिसे ‘अकबर महान’ का ढोल पीटने वाले वामपंथी इतिहासकारों ने बहुत ही चालाकी से हमसे छिपा कर रखा।

जब जयमल और फत्ता वीरगति को प्राप्त हो गए, तो मुगलों ने चित्तौड़ के किले में प्रवेश किया। अकबर अंदर इस उम्मीद से घुसा था की उसे बहुत सारा खजाना मिलेगा और राजपूती औरतें उसके हरम की शोभा बढ़ाएंगी।

लेकिन किले के अंदर उसे क्या मिला? सिर्फ और सिर्फ क्षत्राणियों के जौहर की वो राख, जो अकबर के मुँह पर एक करारा तमाचा थी।

राजपूतानियों ने आग में जलना मंज़ूर किया लेकिन किसी जिहादी का हाथ खुद पर नहीं पड़ने दिया।

जयमल और फत्ता के इस भयंकर प्रतिरोध और जौहर की राख को देखकर अकबर का ईगो बुरी तरह हर्ट हो गया। उसका सारा ‘महानता’ का नाटक उतर गया और उसके अंदर का वो क्रूर, असली जिहादी दरिंदा जाग उठा।

किले के अंदर अब कोई सैनिक नहीं बचे थे। वहां सिर्फ 30,000 निहत्थे हिन्दू नागरिक थे- जिनमें गरीब किसान, औरतें, बूढ़े और छोटे-छोटे बच्चे शामिल थे।

मुगलों के खिलाफ लड़ाई में इन आम लोगों ने राजपूतों का साथ दिया था। गुस्से और खुन्नस में अंधे हो चुके अकबर ने अपनी फौज को फरमान सुना दिया की किले के अंदर मौजूद हर एक इंसान को काट डालो!

जी हाँ! 30,000 निहत्थे बेगुनाह हिन्दुओं का बेरहमी से कत्लेआम किया गया। मुगलों ने बच्चों तक को नहीं बख्शा। पूरा चित्तौड़गढ़ खून से लथपथ हो गया।

क्या यही था वो ‘अकबर महान’ जिसकी कसमें हमारे देश के सेक्युलर बुद्धिजीवी खाते हैं? एक ऐसा दरिंदा जिसने 30 हज़ार बेगुनाह हिन्दुओं का सिर्फ इसलिए कत्ल करवा दिया क्योंकि मुट्ठी भर राजपूतों को हराने में उसकी 80 हज़ार की फौज ने 6 महीने लगा दिए थे।

ये वो कलंक है, जिसे अकबर जीते-जी कभी नहीं धो सका!

खौफ और सम्मान में जब अकबर को भी झुकना पड़ा और आगरा के किले पर लगवाईं ‘जयमल और फत्ता’ की मूर्तियां

मुगलों ने भले ही चित्तौड़ पर कब्ज़ा कर लिया था, लेकिन जयमल और फत्ता की उस खौफनाक लड़ाई ने अकबर को अंदर तक हिला कर रख दिया था।

कहा जाता है की इस लड़ाई के बाद अकबर रातों को डर कर उठ जाता था। उसके दिमाग में जयमल और फत्ता का वो खूंखार रूप बैठ गया था।

अकबर ने अपनी ज़िंदगी में इतने युद्ध लड़े, लेकिन मेवाड़ के इन शेरों जैसा जिगरा उसने कहीं नहीं देखा था।

उनकी बहादुरी का वो इतना बड़ा मुरीद हो गया (या यूं कह लें की अपने खौफ को छिपाने के लिए) उसने आगरा के किले के मुख्य दरवाज़े पर हाथी पर सवार जयमल और फत्ता की दो विशाल मूर्तियां लगवाईं!

ज़रा सोचिए, एक जीता हुआ मुगल बादशाह, हारने वाले हिन्दू शूरवीरों की मूर्तियां अपने महल के दरवाज़े पर लगवा रहा है।

यही तो राजपूती खून की असली ताकत थी। (हालांकि बाद में जब औरंगज़ेब आया, तो उसकी कट्टर जिहादी आँखों को ये हिन्दू मूर्तियां चुभने लगीं और उसने इन्हें तुड़वा दिया)।

खैर, इतिहास के पन्नों से भले ही इन मुगलों और वामपंथियों ने हमारे शूरवीरों का नाम मिटाने की कोशिश की हो, लेकिन जयमल राठौड़, फत्ता सिसोदिया और कल्ला जी का नाम हम हिन्दुओं के डीएनए में बसा है।

जब-जब हमारी धरती, हमारे धर्म या हमारी आबरू पर कोई जिहादी ताकत बुरी नज़र डालेगी, तब-तब इसी मिट्टी से जयमल और फत्ता जैसे शेर पैदा होंगे जो कंधे पर बैठकर दुश्मनों के सिर धड़ से अलग कर देंगे।

चित्तौड़ का वो जौहर और वो शाका आज भी चीख-चीख कर कहता है की हम वो हैं जो हारना नहीं जानते, हम बस अपने उसूलों के लिए मर मिटना जानते हैं!

जब तक हिन्दू समाज की रगों में जयमल और फत्ता का ये उबलता हुआ खून है, दुनिया की कोई भी ताकत हमारे वजूद को नहीं मिटा सकती।

जय राजपूताना! जय मेवाड़!

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