आज 8 अक्टूबर है। आज हमारा पूरा हिंदुस्तान गर्व से अपना 94वां भारतीय वायुसेना दिवस (Indian Air Force Day) मना रहा है।
पूरे 94 साल हो गए हमारे इस आसमान के रखवालों को! सच कहूं तो, जहां परिंदों के पर जवाब दे जाते हैं ना, जहां हवा इतनी पतली हो जाती है की सांस लेना दुश्वार हो जाए, ठीक उसी ऊंचाई से शुरू होता है हमारे वायुवीरों का असली आसमान।
गीता के 11वें अध्याय से लिया गया हमारा वो महावाक्य “नभः स्पृशं दीप्तम्” (गर्व के साथ आकाश को छुओ), महज़ एक नारा नहीं है।
ये वो आग है जो हमारे फाइटर पायलट्स की रगों में खून बनकर दौड़ती है। और इस बार 2026 की जो थीम रखी गई है ना, उसने तो दुश्मनों के खेमे में वैसे ही खलबली मचा दी है।
इस बार हमारी वायुसेना की हुंकार है- “अचूक, अभेद्य और सटीक” (Infallible, Impervious and Precise)।
ज़रा इन तीन शब्दों का वज़न महसूस कीजिए। ‘अचूक’ मतलब हमारा निशाना कभी खाली नहीं जाता। ‘अभेद्य’ मतलब दुनिया की कोई भी ताक़त हमारी सुरक्षा पंक्ति को भेद नहीं सकती।
और ‘सटीक’ मतलब जहां वार करना है, बम ठीक उसी इंच पर जाकर फटेगा! ये कोई हवा-हवाई बातें नहीं हैं। पिछले 94 सालों में हमारी वायुसेना ने हर मोर्चे पर अपना लोहा मनवाया है।
चाहे वो कड़कड़ाती ठंड में सियाचिन की वो जानलेवा चोटियां हों, या फिर थार के रेगिस्तान की झुलसा देने वाली गर्मी… हमारे वायुवीरों ने हमेशा साबित किया है की अगर हिंदुस्तान की तरफ किसी ने आँख भी उठाई, तो वो आँखें आसमान से ही निकाल ली जाएंगी।
तो चलिए, आज इस 94वें स्थापना दिवस पर, आपको उस गौरवशाली इतिहास के पन्नों में ले चलते हैं जहां से इस प्रचंड ताक़त की शुरुआत हुई थी।

1932 से 1947 का सफर, चार खटारा जहाज़ों से उठी चिंगारी और कश्मीर को बचाने का वो पहला अकल्पनीय चमत्कार
कभी-कभी सोचकर ही अजीब लगता है की आज जिस वायुसेना के पास राफेल और सुखोई जैसे दुनिया के सबसे खतरनाक फाइटर जेट्स की पूरी फौज है, उसकी शुरुआत कितनी मामूली थी।
बात उस दौर की है जब हमारे देश पर अंग्रेजों का कब्ज़ा था। 8 अक्टूबर 1932 को जब ‘रॉयल इंडियन एयर फोर्स’ बनाई गई, तो गोरे अफसरों को लगता था की हिंदुस्तानी लड़के जहाज़ थोड़ी उड़ा पाएंगे!
उस वक्त हमारे पास क्या था? सिर्फ ‘वेस्टलैंड वैपिटी’ (Westland Wapiti) नाम के 4 पुराने बायप्लेन… वही दो पंखों वाले लकड़ी और कैनवास से बने जहाज़ जो हवा में ऐसे कांपते थे जैसे अभी गिर जाएंगे।
और पायलट कितने थे? पूरी वायुसेना में सिर्फ 6 हिंदुस्तानी पायलट! अंग्रेजों ने इन्हें बस एक छोटे से कमरे जैसी जगह दे रखी थी। लेकिन उन 6 पायलट्स के सीने में जो आज़ादी और जज़्बे की आग सुलग रही थी, उसे अंग्रेज नहीं पढ़ पाए।
दूसरे विश्व युद्ध में जब जापान की खूंखार फौज बर्मा (म्यांमार) के रास्ते हिंदुस्तान की तरफ बढ़ रही थी, तो इन्हीं मुट्ठी भर हिंदुस्तानी पायलट्स ने उन वेस्टलैंड वैपिटी जहाज़ों से जापानियों की वो बखिया उधेड़ी की गोरे अफसर भी दांतों तले उंगली दबा कर रह गए।
खैर, 1947 में जब हमें आज़ादी मिली, तो असली परीक्षा शुरू हुई। बँटवारा हो चुका था और हमारी वायुसेना के कई जहाज़ और साजो-सामान पाकिस्तान के हिस्से में चले गए थे।
हम अभी अपने पैरों पर ठीक से खड़े भी नहीं हुए थे की पाकिस्तान ने अपनी नीचता दिखा दी। कबाइलियों के भेस में पाकिस्तानी फौज ने अक्टूबर 1947 में कश्मीर पर धावा बोल दिया।
वो मंज़र सच में रोंगटे खड़े कर देने वाला था। पाकिस्तानी घुसपैठिए मार-काट मचाते हुए बिल्कुल श्रीनगर एयरपोर्ट के दरवाज़े तक पहुँच चुके थे।
अगर वो एयरपोर्ट उनके कब्ज़े में चला जाता, तो कश्मीर हमेशा के लिए हिंदुस्तान के हाथ से निकल जाता। सड़क के रास्ते वहां पहुंचना बिल्कुल नामुमकिन था क्योंकि रास्ते कटे हुए थे।
तब हमारी वायुसेना ने जो किया, वो किसी हॉलीवुड की थ्रिलर फिल्म से भी दस कदम आगे की चीज़ थी।
हमारे पास उस वक्त लड़ाकू जहाज़ कम थे, लेकिन ट्रांसपोर्ट के लिए पुराने ‘डकोटा’ (Dakota DC-3) जहाज़ थे। वायुसेना के जांबाज़ों ने बिना एक पल की देरी किए सिख रेजीमेंट के जवानों को उन डकोटा जहाज़ों में ठूंस-ठूंस कर भर लिया।
कोई मॉडर्न रडार नहीं था, कोई नेविगेशन सिस्टम नहीं था, और सामने कश्मीर की वो बर्फीली और खतरनाक पहाड़ियां थीं जहां पल-पल मौसम बदलता है।
लेकिन हमारे वायुवीरों ने जान की बाज़ी लगा दी। रातों-रात डकोटा जहाज़ों ने उड़ान भरी और श्रीनगर की उस कच्ची और धूल भरी हवाई पट्टी पर अपने जवानों को उतार दिया, जिसके बिल्कुल नज़दीक दुश्मन गोलियां बरसा रहे थे।
अगर उन पायलट्स के हाथ ज़रा भी कांप जाते, या वो डकोटा जहाज़ 10 मिनट भी लेट पहुँचते, तो आज कश्मीर का नक़्शा कुछ और ही होता!
उन्हीं वायुवीरों ने आसमान से मुस्तैदी दिखाई और ज़मीन पर हमारे जवानों ने पाकिस्तानी घुसपैठियों को परस्त कर कश्मीर को बचा लिया।
वो 1947 का दिन था, जिसने पूरी दुनिया को बता दिया कि हिंदुस्तान की ये नई वायुसेना भले ही साधनों में कम हो, लेकिन हौसले में इसके आगे कोई नहीं टिक सकता।

1965 और 1971 के महासंग्राम, जब हमारे छोटे नैट जहाज़ों ने काटे अमेरिका के ‘Sabre Jets’ के पंख
अगर आपको लगता है की जंग सिर्फ बेहतरीन और एडवांस हथियारों से जीती जाती है, तो आपको 1965 का वो युद्ध ज़रूर याद करना चाहिए।
उस वक्त पाकिस्तान गुरूर में अंधा हो चुका था। उसकी वजह था अमेरिका! अमेरिका ने उस समय पाकिस्तान को खैरात में अपने सबसे खतरनाक और एडवांस ‘F-86 सेबर’ (Sabre) फाइटर जेट्स दे रखे थे।
पाकिस्तानियों को बड़ा घमंड था की भारत के पास तो पुराने और छोटे जहाज़ हैं, हम तो हवा में ही इन्हें कच्चा चबा जाएंगे।
लेकिन भाईसाहब, उन्हें क्या पता था की मशीन कितनी भी तगड़ी हो, आसमान में असली खेल उस जिगरे का होता है जो उस मशीन को उड़ा रहा होता है!
हमारे पायलट्स के पास उस वक्त ‘नैट’ (Folland Gnat) नाम के फाइटर जहाज़ हुआ करते थे। ये जहाज़ साइज़ में इतने छोटे और हल्के थे की पाकिस्तानी इन्हें मज़ाक में ‘मच्छर’ बुलाते थे।
लेकिन जब आसमान में जंग शुरू हुई, तो इन्हीं ‘मच्छरों’ ने पाकिस्तान के उन भीमकाय सेबर जेट्स की ऐसी धज्जियां उड़ाईं की उनका सारा गुरूर एक झटके में खाक हो गया।
हमारे नैट जहाज़ इतने फुर्तीले थे की वो सेबर जेट्स की मिसाइलों को चकमा देकर उनके पीछे से वार करते थे।
ट्रेवर कीलर और डेंज़िल कीलर (Keelor Brothers) नाम के हमारे जांबाज़ भाइयों ने तो आसमान में ऐसा भौकाल काटा की पाकिस्तानी पायलट हमारे जहाज़ों को देखते ही दुम दबाकर भागने लगे।
खौफ इतना भयंकर था की पाकिस्तानियों ने खुद ही हमारे नैट जहाज़ों का नाम “सेबर स्लेयर” (Sabre Slayer – मतलब सेबर का शिकार करने वाला) रख दिया था।
और फिर आया 1971 का वो महासंग्राम! ये तो वो जंग थी जिसमें वायुसेना ने पाकिस्तान की हवा निकाल कर रख दी थी। आसमान पर 100% भारत का कब्ज़ा था।
आपको बॉर्डर (Border) फिल्म का वो सीन तो याद ही होगा ना? राजस्थान के लोंगेवाला में जब रात के अंधेरे में पाकिस्तान की पूरी की पूरी टैंक रेजिमेंट घुस आई थी, तो हमारे जवानों ने रात भर उन्हें रोके रखा।
जैसे ही सुबह की पहली किरण फूटी, आसमान से मौत बनकर हमारे महज़ 4 ‘हंटर’ (Hunter) लड़ाकू जहाज़ वहां पहुँच गए।
उन 4 हंटर जहाज़ों ने सुबह-सुबह पाकिस्तानी टैंकों को ऐसा भूना, ऐसा गर्दा उड़ाया की पूरा रेगिस्तान पाकिस्तानियों के लिए शमशान बन गया। टैंक छोड़-छोड़ कर भागे थे वो लोग!
इसी 1971 की जंग में हमारी वायुसेना ने ‘पूर्वी पाकिस्तान’ (जो अब बांग्लादेश है) के ढाका में गवर्नर हाउस पर एकदम पिन-पॉइंट बमबारी की थी।
वहां अंदर पाकिस्तान के बड़े-बड़े अफसर मीटिंग कर रहे थे और तभी छत फाड़कर बम अंदर गिरा। इसके बाद तो पाकिस्तानियों की ऐसी रूह कांपी की उनके 93 हज़ार सैनिकों ने घुटने टेक दिए।
दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा सरेंडर और एक नए देश ‘बांग्लादेश’ का जन्म, हमारी वायुसेना के इसी खौफ का नतीजा था।
18 हज़ार फुट ऊंचे कारगिल से लेकर ऑपरेशन सिंदूर तक, नया भारत जो सीधा घर में घुसकर ठोकता है

वक्त बदला, जंग के तरीके बदले और हमारी वायुसेना का अवतार भी और ज़्यादा खूंखार हो गया। 1999 के कारगिल युद्ध (ऑपरेशन सफेद सागर) ने तो दुनिया भर के मिलिट्री एक्सपर्ट्स का दिमाग हिला कर रख दिया था।
आप खुद सोचिए, 18,000 फुट की ऊंचाई! वहां हवा इतनी पतली होती है, ऑक्सीजन इतनी कम होती है की जहाज़ का इंजन कभी भी ‘स्टॉल’ (बंद) हो सकता है। पाकिस्तानियों को लगा था की इंडियन एयर फोर्स इतनी ऊंचाई पर कभी जहाज़ उड़ा ही नहीं पाएगी।
लेकिन हमारे जांबाज़ों के डिक्शनरी में ‘नाममुकिन’ शब्द तो है ही नहीं। भारतीय वायुसेना के Mirage 2000 जहाज़ों ने उस बर्फीले आसमान को चीरते हुए एंट्री मारी।
उन जहाज़ों में लेज़र गाइडेड बम (Laser Guided Bombs – LGB) फिट किए गए और इतनी भयंकर ऊंचाई से पहाड़ियों की चोटियों पर बैठे दुश्मनों के बंकरों को ऐसे उड़ाया गया जैसे दीवाली के पटाखे फूट रहे हों!
दुश्मन को समझ ही नहीं आ रहा था की मौत आसमान के किस कोने से उन पर बरस रही है।
और फिर आया वो दिन, जिसने पाकिस्तान को ये बता दिया की अब ये वो पुराना भारत नहीं है जो सिर्फ पलटवार का इंतज़ार करता है। पुलवामा हमले के बाद पूरे देश का खून खौल रहा था। फिर आई 26 फरवरी 2019 की वो खामोश रात।
हमारे 12 मिराज-2000 जेट्स ने सीधा बॉर्डर (LoC) पार किया। वो सिर्फ PoK तक नहीं रुके, बल्कि सीधे पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के बालाकोट में घुसे।
जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी ठिकानों को रडार पर लॉक किया, ‘स्पाइस 2000’ बम गिराए, आतंकियों के परखच्चे उड़ाए और बिना एक भी खरोंच खाए, पाकिस्तानी रडार सिस्टम को धता बताते हुए वापस अपने एयरबेस पर लौट आए।
पाकिस्तानी एयरफोर्स तो बस सोती ही रह गई! सुबह उन्हें पता चला की ‘नया भारत’ घर में घुसकर ठोक कर जा चुका है। इस एक सर्जिकल एयरस्ट्राइक ने दुनिया को बता दिया की हमारी वायुसेना की सटीकता और टाइमिंग से बच पाना किसी के भी बाप के बस की बात नहीं है।
अब बात हमारी एयर फोर्स की हो रही हो, और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का जिक्र न हो, ऐसा हो सकता है क्या?
22 अप्रैल 2025 को जब पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने कश्मीर के पहलगाम में 26 बेगुनाह नागरिकों को मारा, तो भारत ने इस बार सिर्फ निंदा नहीं की।
7 मई 2025 की रात को हमारी तीनों सेनाओं ने मिलकर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ लॉन्च किया, जिसमें वायुसेना का रोल सबसे भयंकर था।
महज़ 23 मिनट के अंदर हमारी 17 स्क्वाड्रन (गोल्डन एरोज) के ‘राफेल’ (Rafale) लड़ाकू विमानों ने SCALP मिसाइलों और AASM हैमर (Hammer) बमों से पाकिस्तान के बहावलपुर और मुरीदके में जैश और लश्कर के ठिकानों को श्मशान बना दिया।
आज 94वें वायुसेना दिवस पर जब एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने इस अचूक स्ट्राइक का ज़िक्र किया, तो पूरी दुनिया समझ गई की ‘ऑपरेशन सिंदूर’ कोई ट्रेलर नहीं था।
यह उस नए भारत का दहकता हुआ प्रमाण है जो दुश्मन के उकसाने पर सीधा उसके घर में घुसता है, और माथे के बीचों-बीच ठोककर आता है!
94वें वायुसेना दिवस का प्रचंड जश्न, गाजियाबाद के हिंडन एयरबेस से लेकर काशी के नमो घाट तक गूंज रहा हमारा आसमान
आज 8 अक्टूबर 2026 के दिन अगर आप दिल्ली-एनसीआर के आसमान की तरफ देखेंगे, तो आपको बादलों को चीरती हुई वो गड़गड़ाहट साफ़ सुनाई देगी जो हमारे दुश्मनों के कानों के पर्दे फाड़ने के लिए काफी है।
आज गाजियाबाद के ‘हिंडन एयर बेस’ पर हमारी वायुसेना का जो शक्ति प्रदर्शन चल रहा है, उसने पूरी दुनिया की आँखें चकाचौंध कर दी हैं।
आसमान में हमारे जांबाज़ ‘सूर्यकिरण’ (Suryakiran) और ‘सारंग’ (Sarang) टीम के हेलिकॉप्टर तिरंगे के रंगों से आसमान को रंग रहे हैं।
हाल ही में हमने ‘तरंग शक्ति 2026’ (Tarang Shakti) जैसा विशाल बहुराष्ट्रीय युद्धाभ्यास करके दुनिया भर की एयरफोर्स को अपनी ताक़त का जो ट्रेलर दिखाया है, आज उसी ताक़त की पूरी पिक्चर हिंडन एयरबेस पर रिलीज़ हो रही है।
लेकिन भाई, असली सरप्राइज़ तो इस बार वायुसेना ने कुछ और ही दिया है! 94 साल के इतिहास में ये एक बहुत बड़ा और नया प्रयोग है।
इस बार वायुसेना दिवस का जश्न सिर्फ हिंडन एयरबेस तक सीमित नहीं है। हिंडन की परेड के बाद, हमारे ये वायुवीर महादेव की नगरी बनारस (काशी) के आसमान में शिव तांडव करने वाले हैं!
जी हाँ, 22, 24 और 25 अक्टूबर को काशी के भव्य ‘नमो घाट’ पर गंगा नदी के ठीक ऊपर भारतीय वायुसेना अपना सबसे विशाल ‘एरियल डिस्प्ले’ (हवाई करतब) करने जा रही है।
ये सिर्फ एक एयर शो नहीं होगा, ये पूरी दुनिया के लिए एक बहुत बड़ा मैसेज है कि जो भारत अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों से जुड़ा है, वो आसमान में आग उगलना भी बहुत अच्छी तरह जानता है।
परिंदों की उड़ान भले ही बादलों के नीचे थक जाती हो, लेकिन हमारे वायुवीरों की उड़ान सीधे दुश्मनों के सीने को चीरती हुई अनंत आसमान तक जाती है।
भारतीय वायुसेना को 94वें स्थापना दिवस की करोड़ों-करोड़ शुभकामनाएं!
वन्दे मातरम! जय हिन्द!
