दोस्तों हमें लगता था की नेपाल दुनिया का इकलौता और सबसे शांत हिन्दू राष्ट्र है। वहां पशुपतिनाथ की कृपा है और वहां के लोग अपनी संस्कृति को जान से ज्यादा प्यार करते हैं।
लेकिन जब से इस देवभूमि में ‘सेक्युलरिज्म’ का कीड़ा घुसा है, तब से वहां के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं।
आज नेपाल के तराई इलाकों में जो खूनी नंगा नाच चल रहा है, उसे देखकर किसी भी सच्चे सनातनी का खून खौल उठेगा।
ये जिहादी मानसिकता वाली कौम दुनिया के किसी भी कोने में चली जाए, चाहे वो धर्मनिरपेक्ष भारत हो या शांत नेपाल, ये कभी शांति और भाईचारे से नहीं रह सकते।
जहां इनकी आबादी थोड़ी सी बढ़ती है, वहां दंगे, पत्थरबाजी, और दूसरे धर्मों के त्योहारों पर हमले अपने आप शुरू हो जाते हैं।
जो नेपाल कभी अपनी शांति के लिए जाना जाता था, आज उसी नेपाल को इन मुस्लिम कट्टरपंथियों ने ‘सीरिया’ बनाने की पूरी ठान ली है।
आज नेपाल जल रहा है, और वजह सिर्फ एक है- इनकी कट्टरपंथी और सनातनी-विरोधी नफरत!
नेपाल के सुनसरी जिले में पवित्र कांवड़ यात्रा में ‘बोलबम’ बजते ही जिहादियों ने शुरू कर दिया खूनी खेल
अब ज़रा इस पूरे बवाल की असली जड़ को समझिए। तारीख थी 26 जुलाई 2026 और दिन था रविवार। सावन का पवित्र महीना चल रहा था।
नेपाल के कोशी प्रदेश के सुनसरी जिले के देवानगंज (कप्तानगंज) इलाके में हिन्दू युवा सोमवार के जलाभिषेक के लिए कोशी नदी से जल लेकर ‘बोलबम’ (कांवड़ यात्रा) के लिए शांति से निकल रहे थे।
शिव भक्तों का जत्था था, और स्वाभाविक सी बात है की कांवड़ यात्रा में भगवान शिव के भजन डीजे (DJ) पर बज रहे थे।
लेकिन भाई साहब, 365 दिन और दिन में 5-5 बार अपने अवैध लाउडस्पीकरों पर अज़ान का कान फाड़ू शोर मचाने वाले इन जिहादियों को हिन्दुओं के एक दिन बजने वाले डीजे से भयंकर मिर्ची लग गई।
कांवड़ यात्रा जैसे ही एक मुस्लिम आबादी वाले इलाके से गुज़री, इन जिहादियों ने अल्लाह-हू-अकबर के नारों के साथ हिन्दुओं पर खौफनाक पत्थरबाजी शुरू कर दी।
लेकिन इस पत्थरबाजी के पीछे का एक और भयानक सच है। विवाद सिर्फ डीजे का नहीं था। इस दंगे की स्क्रिप्ट एक महीने पहले ही लिख दी गई थी।
लगभग एक महीने पहले ‘मुहर्रम’ के जुलूस के दौरान इन जिहादी मुसलमानों ने कप्तानगंज के हिंदू मंदिर के सामने अपना एक धार्मिक झंडा (Muharram flag) लगा दिया था।
मुहर्रम का त्योहार खत्म हो गया, हफ्तों बीत गए, लेकिन इन लोगों ने वो झंडा वहां से नहीं हटाया।
हिन्दू समुदाय के लोगों और स्थानीय वार्ड अध्यक्ष तक ने कई बार इनसे हाथ जोड़कर निवेदन किया की “भाई, त्योहार खत्म हो गया है, अब इस झंडे को हटा लो।”
लेकिन नहीं! इनकी तो नीयत में ही दादागिरी और इलाका कब्ज़ा करने की भूख है। मुहर्रम का झंडा लगाए रखकर ये हिन्दुओं को अपनी धौंस दिखाना चाहते थे।
इसी झंडे वाले विवाद को लेकर दोनों समुदायों में पहले से भारी तनाव था। और जब रविवार की रात हिन्दू युवा अपनी कांवड़ यात्रा लेकर निकले, तो पहले से छतों पर पत्थर जमा करके बैठे इन जिहादियों ने डीजे का बहाना बनाकर सीधा खूनी हमला बोल दिया।
ये कोई अचानक हुआ विवाद नहीं था, ये हिन्दुओं का कत्लेआम करने की एक सोची-समझी साज़िश थी।
सुनसरी के कप्तानगंज में हिन्दू कांवड़ियों पर भयंकर पत्थरबाजी और तीन बेगुनाह हिन्दुओं की निर्मम हत्या
हमले का वो मंज़र इतना खौफनाक था की जिसने भी देखा उसकी रूह कांप गई। कांवड़ियों की गाड़ियों और डीजे को तोड़ दिया गया।
चारों तरफ से ईंट-पत्थर और कांच की बोतलें बरस रही थीं। हालात इतने बेकाबू हो गए की नेपाल पुलिस और आर्म्ड पुलिस फोर्स (APF) को बीच-बचाव के लिए आना पड़ा।
लेकिन इन जिहादियों का दुस्साहस तो देखिए! इन्हें पुलिस की वर्दी या कानून का रत्ती भर भी खौफ नहीं था। इन्होने पुलिस वालों पर भी जानलेवा हमला कर दिया।
इस बवाल में नेपाल पुलिस के इंस्पेक्टर राकेश राई सहित लगभग 15 से ज्यादा पुलिस और APF के जवान बुरी तरह घायल हो गए। इंस्पेक्टर के सिर पर पत्थर मारा गया जिससे उन्हें पांच टांके लगे हैं।
लेकिन सबसे बड़ा दर्द और त्रासदी तो हिन्दू समाज के हिस्से में आई। इस सुनियोजित हमले, अँधेरे का फायदा उठाकर की गई हिंसा और उसके बाद हुई पुलिस फायरिंग में हमारे तीन बेगुनाह हिन्दू भाइयों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
जी हाँ! 24 साल का एक नौजवान ओम प्रकाश मेहता, जिसके सीने में गोली लगी और उसने वहीं दम तोड़ दिया।
उसके बाद अस्पताल में ज़िंदगी और मौत से लड़ते हुए 20 वर्षीय जय प्रकाश मेहता ने भी प्राण त्याग दिए। और इस जिहादी आग की लपटें जब आगे बढ़ीं, तो सिरहा जिले में 15 साल के एक किशोर गणेश यादव की भी निर्मम हत्या कर दी गई।
ज़रा सोचिए! तीन-तीन सनातनी हिन्दुओं की लाशें बिछ गईं। उनका गुनाह क्या था? यही ना की वो अपने ही देश में, अपनी ही देवभूमि में शांति से अपने भगवान शिव की कांवड़ यात्रा निकाल रहे थे?
क्या हिन्दू होना इतना बड़ा अपराध हो गया है की मुहर्रम का झंडा न हटाने वाले जिहादियों के सामने सरकार और सिस्टम भी घुटने टेक दे?
सिरहा से लेकर सप्तरी तक नेपाल में जिहादी आग और कायर सेक्युलर सिस्टम ने हिन्दुओं को ही घरों में कर दिया कैद
सुनसरी के कप्तानगंज से भड़की ये जिहादी आग देखते ही देखते पूरे दक्षिणी नेपाल में फैल गई। मधेश प्रदेश के सिरहा, सप्तरी, धनुषा और सर्लाही जिलों तक दंगे भड़क उठे। सड़कों पर गाड़ियां फूंकी जाने लगीं, हिन्दुओं की दुकानों और शॉपिंग मॉल्स को निशाना बनाया गया।
और ऐसे समय में नेपाल की सरकार और प्रधानमंत्री बालेन शाह का कायर सेक्युलर सिस्टम क्या कर रहा था? वही जो हमेशा से भारत में कांग्रेसी सरकारें करती आई हैं- तुष्टिकरण!
जब जिहादी सड़कों पर नंगा नाच कर रहे थे, तब नेपाल सरकार ने हरिनगरा, भुटाह, कप्तानगंज, घुस्की और देवानगंज जैसे इलाकों में अनिश्चितकालीन ‘कर्फ्यू’ ठोक दिया। चप्पे-चप्पे पर सेना (Army) उतार दी गई।
मतलब खेल देखिए! पत्थर भी हिन्दू खाए, कांवड़ यात्रा भी हिन्दुओं की रोकी जाए, हत्या भी हिन्दुओं की हो, और अंत में कर्फ्यू लगाकर हिन्दुओं को ही उनके घरों में कैद कर दिया जाए! यह कहां का न्याय है?
जब जनकपुरधाम और अन्य इलाकों में हिन्दू संगठन अपने भाइयों की हत्या के विरोध में सड़कों पर उतरे, जब उन्होंने मांग की कि नेपाल को वापस हिन्दू राष्ट्र घोषित किया जाए और मुस्लिम आयोग को भंग किया जाए..
तो इसी सेक्युलर पुलिस ने जिहादियों के घर से पत्थर और हथियार बरामद करने के बजाय, उल्टे हिन्दू प्रदर्शनकारियों पर ही आंसू गैस के गोले दाग दिए।
ये दोगलापन चीख-चीख कर बता रहा है की जब देश ‘सेक्युलर’ होता है, तो सबसे पहले बहुसंख्यक हिन्दुओं के मानवाधिकारों का ही गला घोंटा जाता है।
भारत के सनातनियों के लिए सबसे बड़ा अलर्ट क्योंकि जिहाद की ये खौफनाक आग अब हमारे बॉर्डर तक पहुंच चुकी है
दोस्त, नेपाल में जो कुछ भी हो रहा है, उसे सिर्फ एक पड़ोसी देश की खबर समझकर इग्नोर करने की भूल बिल्कुल मत करना। यह भारत के हर एक सनातनी के लिए सबसे बड़ा अलर्ट है, एक बहुत भयंकर खतरे की घंटी है!
सुनसरी, सिरहा और सप्तरी- ये वो जिले हैं जिनका बॉर्डर सीधे तौर पर भारत के बिहार (सुपौल, मधुबनी और सीतामढ़ी) से सटा हुआ है।
भारतीय सुरक्षा बल (SSB) और बिहार पुलिस को हाई अलर्ट पर रखा गया है ताकि वहां का दंगाई वायरस हमारे देश में ना घुसे।
लेकिन असली जंग बॉर्डर पार करने वालों से नहीं, बल्कि उस ‘जिहादी मानसिकता’ से है जो हमारे देश के भीतर भी कूट-कूट कर भरी हुई है।
कश्मीर, बंगाल, केरल और मेवात के बाद अब नेपाल जल रहा है।
जो नेपाल अपनी शांति और हिन्दू एकता के लिए विश्व विख्यात था, जब डेमोग्राफी बदलने पर वहां हिन्दुओं का ये हाल हो सकता है, तो सोचिए जिस भारत में इन शांतिदूतों की आबादी इतनी तेज़ी से बड़ रही है, वहां कल क्या होगा?
