साल 1665 का वो खौफनाक दौर याद करिए जब दिल्ली के लाल किले में बैठा क्रूर औरंगजेब छत्रपति शिवाजी महाराज के बढ़ते ‘हिंदू स्वराज्य’ के नाम से ही थर-थर कांपता था।
मुगलों की रातों की नींद हराम हो चुकी थी। मराठों को कुचलने और सनातन के इस उभरते सूरज को बुझाने के लिए औरंगजेब ने 10,000 से ज़्यादा मुगलों और खूंखार पठानों की एक विशाल जिहादी फौज दक्कन भेज दी।
इस फौज की कमान एक बेहद खूंखार मुगल कमांडर दिलेर खान के हाथ में थी। इन जिहादियों का सबसे बड़ा टारगेट था मराठा साम्राज्य की शान ‘पुरंदर का किला’।
वज्रगढ़ पर कब्ज़ा और पुरंदर पर तोपों की बारिश, मुगलों की वो भूल जिसने खौला दिया मराठा शेर ‘मुरारबाजी देशपांडे’ का खून
दिलेर खान ने अपने 10,000 से ज़्यादा खूंखार पठानों और जिहादी मुगलों के साथ पुरंदर को चारों तरफ से घेर लिया।
उसने बड़ी मक्कारी और चालाकी दिखाते हुए बगल के एक छोटे किले ‘वज्रगढ़’ पर कब्ज़ा कर लिया।
वहां से इस जिहादी सेना ने पुरंदर किले पर तोपों के बड़े-बड़े गोले बरसाने शुरू कर दिए। तोपों की आग से पुरंदर किले की मजबूत दीवारें दरकने लगीं।
पत्थरों के परखच्चे उड़ने लगे। हाथी के हौदे पर बैठा दिलेर खान ये नज़ारा देखकर अपनी मूंछों पर ताव दे रहा था। उसे लगा की अब मराठे डर कर घुटने टेक देंगे या रोते हुए संधि की भीख मांगेंगे।
लेकिन वो भूल गया था की मुरारबाजी मिट्टी के नहीं, फौलाद के बने हुए वो सनातनी योद्धा थे जिनकी रगों में मातृभूमि का उबलता हुआ खून दौड़ रहा था।
उन्होंने तय कर लिया की मराठे इस किले के अंदर चूहों की तरह घुट-घुट कर नहीं मरेंगे। उन्होंने किले के दरवाज़े खोलकर मुगलों को उनके ही खून से नहलाने का वो खौफनाक फैसला लिया।
700 मराठों का 10 हज़ार जिहादियों पर सुसाइड अटैक, दोनों हाथों में तलवार लिए साक्षात महाकाल बन गए ‘मुरारबाजी’
किले के दरवाज़े खुले और साक्षात मौत मुगलों के सामने आकर खड़ी हो गई। मुरारबाजी देशपांडे ने अपने साथ महज़ 700 सबसे खूंखार ‘मावलों’ (मराठा सैनिकों) को लिया और ‘हर-हर महादेव’ की उस दहाड़ के साथ सीधे मुगलों के बेस कैंप पर भूखे शेरों की तरह टूट पड़े।
सिर्फ 700 मराठा और सामने 10,000 से ज़्यादा खूंखार जिहादी मुगल! मावलों ने मुगलों की उस विशाल फौज को जानवरों की तरह काटना शुरू कर दिया।
मुरारबाजी देशपांडे अपने दोनों हाथों में भवानी तलवारें लेकर साक्षात महाकाल की तरह लड़ रहे थे। जो भी मुगल या पठान उनके सामने आता, वो दो टुकड़ों में कटकर सीधा ज़मीन पर गिर जाता।
चारों तरफ सिर्फ जिहादियों की कटी हुई गर्दनें और खून की नदियां बह रही थीं।
अपने ही सुरक्षित बेस कैंप में यह खौफनाक तांडव देखकर हाथी पर बैठा वो घमंडी दिलेर खान थर-थर कांपने लगा। उसे अपनी मौत बिल्कुल अपने सामने नाचती हुई नज़र आ रही थी।
मुगलों की जागीर का लालच और मुरारबाजी देशपांडे की वो खौफनाक दहाड़ जिसने दिखा दी औरंगजेब की औकात
जब दिलेर खान अच्छी तरह समझ गया की इस हिंदू शेर को आमने-सामने की लड़ाई में हराना दुनिया की किसी भी जिहादी फौज के बस की बात नहीं है, तो उसने मुगलों वाली अपनी असली और नीच मक्कारी दिखाई।
उसने हाथी पर से चिल्लाकर लड़ाई रोकने की कोशिश की। उस कायर ने मुरारबाजी को लालच देते हुए कहा-
“ऐ वीर! तू बहुत बहादुर है। ये लड़ाई छोड़ दे, शिवाजी का साथ छोड़ दे और हमसे आकर मिल जा। मैं तुझे दिल्ली ले जाकर औरंगजेब से बहुत बड़ी जागीर और मुगल दरबार में सबसे ऊँचा पद दिलवाऊंगा।”
इस बकवास को सुनकर मुरारबाजी देशपांडे ने जो दहाड़ लगाई, वो आज भी सह्याद्रि की पहाड़ियों और महाराष्ट्र की माटी में गूंजती है।
उन्होंने अपनी भवानी तलवार से मुगलों का खून टपकाते हुए उस दिलेर खान के मुंह पर थूका और चिल्लाकर कहा-
“मी शिवाजी राजांचा शिपाई, तुझा कौल घेतो की काय!” (अरे मूर्ख! मैं छत्रपति शिवाजी महाराज का वफादार सिपाही हूँ। मैं तेरे औरंगजेब के फेंके हुए टुकड़ों पर नहीं पलता। हमारी जागीर हमारा हिंदू स्वराज्य है। तू बातें मत कर, तू वार कर!)
मुरारबाजी देशपांडे का ये जवाब सुनकर दिलेर खान को समझ आ गया की इस हिंदू योद्धा को ना तो डराया जा सकता है और ना ही खरीदा जा सकता है।
जब वो आमने-सामने मर्द की तरह नहीं लड़ सका, तो उस कायर मुगल ने हाथी पर सुरक्षित बैठे-बैठे अपने धनुष से एक तीर चलाया।
वो तीर सीधे मुरारबाजी देशपांडे के गले और सीने को चीरता हुआ पार हो गया। वो महान हिंदू शेर अपनी मातृभूमि और सनातन धर्म की रक्षा करते हुए वहीं पुरंदर की मिट्टी में वीरगति को प्राप्त हो गया।
लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई! मुरारबाजी के गिरने के बाद भी उन 700 मावलों ने हार नहीं मानी। उन्होंने जिहादी मुगलों को काटना जारी रखा।
मुगलों की लाखों की फौज की असली औकात बस यही थी की वो 700 हिंदुओं के सामने भी कांपते थे और सिर्फ धोखे से जीतते थे।
