वामपंथी इतिहासकारों और इरफान हबीब जैसे ‘कलम के कसाइयों’ ने हमारे बच्चों के दिमाग में ऐसा ज़हर भरा है, जिसकी कोई हद नहीं। दशकों तक हमारे स्कूलों और कॉलेजों में एक बहुत ही चालाक और खौफनाक सेक्युलर फ्रॉड पढ़ाया गया।
हमें रटाया गया की 1919-1924 का ‘खिलाफत आंदोलन’ भारत की आज़ादी की लड़ाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा था। हमें पट्टी पढ़ाई गई की इस आंदोलन ने देश में ‘हिंदू-मुस्लिम एकता’ की एक महान मिसाल कायम की थी।
अरे भाई! ये इस देश के इतिहास का सबसे बड़ा, सबसे गंदा और सबसे खून से सना हुआ सफेद झूठ है। डंके की चोट पर ये बात कान खोलकर सुन लीजिए की ‘खिलाफत आंदोलन’ का भारत की आज़ादी, अंग्रेज़ों को भगाने या भारत के राष्ट्रवाद से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था।
ये पूरी तरह से एक इस्लामिक और जेहादी एजेंडा था, जिसका इकलौता मकसद एक विदेशी खलीफा की गद्दी को बचाना था।
इस खौफनाक आंदोलन में हिंदुओं को सिर्फ और सिर्फ एक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया गया और काटा गया। हमारे भोले-भाले सनातनी समाज को ‘भाईचारे’ की अफीम सुंघाकर इस जेहादी आग में झोंक दिया गया।
हिंदुओं को लगा की हम अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ रहे हैं, लेकिन उन कट्टरपंथी मौलवियों और उनके पीछे चलने वाली भीड़ के दिमाग में सिर्फ और सिर्फ ‘गज़वा-ए-हिंद’ और पूरे भारत को ‘दारुल इस्लाम’ बनाने का खौफनाक सपना चल रहा था।
गद्दार मुसलमानों का तुर्की के खलीफा के लिए अंधा प्रेम और देश की ज़मीन पर बोया गया जिहाद का ज़हर
अब ज़रा इस बात को समझिए की ये खिलाफत की आग भारत में भड़की क्यों थी। बात प्रथम विश्व युद्ध (World War I) की है। उस युद्ध में तुर्की (ऑटोमन साम्राज्य) अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ रहा था और बुरी तरह हार गया।
अंग्रेज़ों ने तुर्की के उस ‘खलीफा’ की गद्दी छीन ली जिसे दुनिया भर के कट्टरपंथी मुसलमान अपना सबसे बड़ा धार्मिक आका मानते थे।
अब ज़रा मुसलमानों की इस गद्दारी और विदेशी वफादारी को देखिए। तुर्की कहाँ है? हज़ारों किलोमीटर दूर! खलीफा कौन है? एक विदेशी इस्लामिक क्रूर शासक!
लेकिन उसके लिए दर्द किसे हो रहा था? भारत में बैठे उन मुस्लिम कट्टरपंथियों को, जो इस देश का नमक खा रहे थे। भारत के मुसलमानों ने उस विदेशी खलीफा की गद्दी वापस दिलाने के लिए पूरे देश में बगावत शुरू कर दी।
ये सीधे-सीधे ‘उम्माह’ (वैश्विक इस्लामिक भाईचारा) का वो खौफनाक सच है जो किसी भी देश की सीमाओं को नहीं मानता। इन लोगों ने साबित कर दिया की इनके लिए भारत की मिट्टी, भारत की संस्कृति और भारत की आज़ादी से कहीं ज़्यादा बड़ा उस विदेशी खलीफा का तख्त था।
अली बंधुओं (शौकत अली और मोहम्मद अली) और देश भर के मौलवियों ने अपनी मस्जिदों से खुलेआम जिहाद के फतवे जारी करने शुरू कर दिए।
इन मौलवियों ने सरेआम भारत को ‘दारुल हरब’ (काफिरों का देश) घोषित कर दिया। फतवे निकाले गए की अंग्रेज़ों की नौकरी करना हराम है, और जो मुसलमान इस काफिरों के देश में नहीं रहना चाहते, वो अफगानिस्तान (दारुल इस्लाम) की तरफ ‘हिज़रत’ (पलायन) कर जाएं।
उस वक्त पूरे देश के हिंदुओं को ये छलावा दिया जा रहा था की ये लोग अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ रहे हैं, लेकिन असलियत में ये भारत की छाती पर कट्टरपंथी इस्लाम का वो ज़हरीला बीज बो रहे थे, जिसका पहला और सबसे भयानक शिकार खुद सनातनी समाज होने वाला था।
केरल के मालाबार में भड़का जिहाद और खिलाफत के नाम पर शुरू हुआ हिंदुओं का कत्लेआम
तुर्की के खलीफा का वो अंधा प्रेम जब दक्षिण भारत के केरल पहुंचा, तो वहां इसने जो भयानक रूप लिया, वो याद करके आज भी रूह कांप जाती है। केरल के मालाबार इलाके में रहने वाले मोपला मुसलमानों ने खिलाफत आंदोलन के नाम पर बगावत शुरू कर दी। वामपंथी गद्दार आज भी इसे अंग्रेज़ों के खिलाफ बग़ावत बताते हैं।
लेकिन भाई, ज़रा ज़मीनी हकीकत तो देखिए! शुरू में इन मोपला जिहादियों ने कुछ पुलिस थानों और सरकारी दफ्तरों पर हमला किया। लेकिन जब अंग्रेज़ों ने अपनी बंदूकें और तोपें निकालीं, तो इन कट्टरपंथियों की पैंट गीली हो गई। इन्हें समझ आ गया की अंग्रेज़ों की गोलियों का सामना करना इनके बस की बात नहीं है।
फिर इन्होंने क्या किया? इन्होंने अपना पूरा का पूरा गुस्सा और अपनी जेहादी नफरत उन निहत्थे, सीधे-सादे और बेगुनाह हिंदुओं की तरफ मोड़ दी, जो उनके अपने पड़ोसी थे।
मालाबार के जंगलों और गांवों में रातों-रात खिलाफत आंदोलन एक खौफनाक ‘एंटी-हिंदू जिहाद’ में तब्दील हो गया। जो हिंदू कल तक ‘भाई-भाई’ का नारा लगा रहे थे, आज वही हिंदू इन जेहादियों की तलवारों का सबसे आसान शिकार बन गए।
अली मुसलियार और वरियामकुन्नथ कुंजाहम्मद हाजी जैसे खूंखार जिहादी दरिंदों ने मालाबार के एक बड़े इलाके पर कब्ज़ा करके खुद को वहां का ‘सुल्तान’ घोषित कर दिया।
उन्होंने डंके की चोट पर उस पूरे इलाके में इस्लामिक ‘शरिया कानून’ लागू कर दिया। और शरिया लागू होते ही सबसे पहला फरमान क्या निकला? “या तो इस्लाम कबूल करो, या फिर कटने के लिए तैयार हो जाओ!”
ये कोई आज़ादी की लड़ाई थी क्या? क्या हिंदुओं को काटना अंग्रेज़ों को भगाने का तरीका था? ये विशुद्ध रूप से हिंदुओं का एक ऐसा कत्लेआम था, जिसे इतिहास में जानबूझकर दबा दिया गया ताकि इस देश के हिंदू कभी अपने असली दुश्मनों को पहचान ना सकें।
कुओं में फेंकी गई हिन्दुओं की लाशें और हिंदू बहनों के साथ रूह कंपा देने वाली दरिंदगी
जब हम 1990 के कश्मीर के कश्मीरी पंडितों का दर्द सुनते हैं, तो हमारी आंखें भर आती हैं। लेकिन 1921 में मालाबार में मोपला मुसलमानों ने हिंदुओं के साथ जो दरिंदगी की थी, वो कश्मीर से सौ गुना ज़्यादा भयानक और खूंखार थी। ये कोई आम दंगे नहीं थे। ये हिंदुओं की नस्लकुशी थी।
मालाबार के गांवों में जो हुआ, वो सोचकर ही किसी भी संदेहवादी का खून खौल उठेगा। इन मोपला जिहादियों ने हज़ारों हिंदुओं के घरों को आग लगा दी। जो हिंदू पुरुष अपनी जान बचाने के लिए भागे, उन्हें पकड़-पकड़ कर उनके सिर धड़ से अलग कर दिए गए।
सबसे खौफनाक मंज़र तो वो था जिसे इतिहास में ‘तुव्वुर कुएं का नरसंहार’ (Tuvvur Well Massacre) कहा जाता है।
सितंबर 1921 में इन जिहादियों ने दर्जनों बेगुनाह हिंदुओं को पकड़ा, उनके हाथ-पैर बांधे, उनकी गर्दनों पर तलवारें चलाईं और उन्हें ज़िंदा या आधा कटा हुआ ही तुव्वुर के एक गहरे कुएं में फेंक दिया। वो कुआं हिंदुओं की लाशों से ऊपर तक भर गया था। वहां की ज़मीन आज भी उन सताए हुए सनातनियों के खून से लाल है।
और हमारी हिंदू बहन-बेटियों के साथ इन दरिंदों ने जो किया, वो तो कोई जानवर भी नहीं कर सकता। औरतों के सरेआम बलात्कार किए गए। गर्भवती महिलाओं के पेट तलवारों से चीर दिए गए और उनके अजन्मे बच्चों को उनकी आंखों के सामने मार डाला गया।
हज़ारों हिंदुओं की गर्दन पर नंगी तलवार रखकर उन्हें कलमा पढ़ने पर मजबूर किया गया। जो नहीं माने, उनका वहीं सिर काट दिया गया और जो डर गए, उनका सरेआम खतना करके उन्हें मुसलमान बना दिया गया।
इतने से भी इन खिलाफत के गुंडों का मन नहीं भरा। इन्होंने मालाबार के 100 से ज़्यादा प्राचीन और भव्य हिंदू मंदिरों को ज़मीनदोज़ कर दिया। ये सिर्फ मंदिर तोड़कर नहीं रुके, इन्होंने उन पवित्र मंदिरों के अंदर गायों को काटा, उनका खून पूरे गर्भगृह में फैलाया और कटी हुई गायों की आंतें हमारे देवी-देवताओं की मूर्तियों के गले में डाल दीं।
ये दरिंदगी, ये वहशीपन! क्या ये स्वतंत्रता संग्राम था? क्या ये अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ाई थी? नहीं! ये इस्लाम के नाम पर भारत की छाती पर खेला गया वो खूनी खेल था, जिसे हमारे सेक्युलर गद्दारों ने ‘हिंदू-मुस्लिम एकता’ के झूठे पर्दे के पीछे हमेशा-हमेशा के लिए छुपा दिया।
डॉ अंबेडकर और एनी बेसेंट की वो खौफनाक गवाही जो खिलाफत के असली जिहादी चेहरे को बेनकाब करती है
जब भी हम मोपला नरसंहार का असली सच सामने रखते हैं, तो ये वामपंथी और सेक्युलर कीड़े तुरंत बिलबिलाने लगते हैं। ये कहते हैं की राइट-विंग वाले तो नफरत फैलाते हैं, इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं। अरे गद्दारों! अगर तुम्हें हमारी बातों पर यकीन नहीं है, तो ज़रा उन लोगों की गवाही सुन लो जिन्हें तुम खुद दिन-रात पूजने का नाटक करते हो।
आजकल जो लोग ‘जय भीम’ का झूठा नारा लगाकर दलितों और मुसलमानों के भाईचारे का फर्जी ढिंढोरा पीटते हैं, उन्हें डॉ. बी.आर. अंबेडकर की लिखी हुई किताब ‘पाकिस्तान या भारत का विभाजन’ के पन्ने खोलकर पढ़ने चाहिए।
डॉ. अंबेडकर कोई हवा में बात करने वाले नेता नहीं थे। उन्होंने इस मोपला नरसंहार पर जो लिखा है, वो पढ़कर किसी भी सच्चे भारतीय का खून खौल उठेगा।
डॉ. अंबेडकर ने डंके की चोट पर लिखा था की मालाबार में मोपलाओं ने जो किया, वो कोई आम दंगा या बग़ावत नहीं थी। वो हिंदुओं का एक ऐसा अकल्पनीय और खूंखार कत्लेआम था, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।
उन्होंने साफ लिखा की इन जिहादियों ने हिंदुओं का खून बहाया, उन्हें जबरन मुसलमान बनाया और उनकी औरतों के साथ वो दरिंदगी की जो कोई शैतान भी नहीं कर सकता।
डॉ. अंबेडकर ने इस पूरे खिलाफत आंदोलन की बखिया उधेड़ते हुए साफ कर दिया था की मुसलमानों के लिए ‘इस्लामिक भाईचारा’ (उम्माह) हमेशा भारत देश और उनके हिंदू पड़ोसियों से ऊपर रहेगा।
और अगर अंबेडकर जी की बात से भी इन सेक्युलरों का पेट ना भरे, तो एनी बेसेंट की वो रिपोर्ट पढ़ लें। एनी बेसेंट कोई हिंदूवादी नेता नहीं थीं, वो तो थियोसोफिकल सोसाइटी की विदेशी अध्यक्ष थीं।
लेकिन मालाबार का वो खौफनाक नंगा नाच देखकर उनकी भी रूह कांप गई थी। एनी बेसेंट ने अपनी रिपोर्ट्स में चीख-चीख कर लिखा की मालाबार के जंगलों में क्या हो रहा है।
उन्होंने बताया की कैसे हज़ारों हिंदू औरतें, जिनके कपड़े तक इन मोपला दरिंदों ने फाड़ दिए थे, वो नंगी और आधी-नंगी हालत में अपने भूखे और रोते हुए बच्चों को छाती से चिपकाए जंगलों में अपनी जान बचाने के लिए भाग रही हैं।
एनी बेसेंट ने पूछा था की उन बेगुनाह हिंदू औरतों का क्या कसूर था? उन छोटे-छोटे मासूम बच्चों का क्या कसूर था जिन्हें इन खिलाफत के गुंडों ने तलवारों से काट डाला? ये गवाहियां कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं हैं भाई!
ये इतिहास के वो पत्थर की लकीर जैसे सच हैं, जो साबित करते हैं की खिलाफत आंदोलन के नाम पर भारत में जो हुआ, वो सीधे-सीधे हिंदुओं की नस्लकुशी थी। ये वो भयानक जिहाद था जिसे आज़ादी की लड़ाई का मुखौटा पहनाकर हमारे सामने पेश किया गया।
वामपंथी इतिहासकारों की सबसे बड़ी गद्दारी, जिहादी हत्यारों को बता दिया ‘महान किसान’ और ‘स्वतंत्रता सेनानी’
अब ज़रा इस देश के उस सबसे सड़े हुए वामपंथी इकोसिस्टम की बात करते हैं, जिसने हमारे इतिहास का सबसे गंदा चीरहरण किया है। इतिहास लिखने वाले इरफान हबीब, और बिपन चंद्रा जैसे ‘कलम के कसाइयों’ ने इस पूरे मोपला नरसंहार को एक ऐसा स्पिन दिया की झूठ भी शर्म से पानी-पानी हो जाए।
जब इन वामपंथियों से पूछा गया की मोपला मुसलमानों ने हज़ारों हिंदुओं को क्यों काटा, तो पता है इन्होंने क्या थ्योरी दी? इन्होंने बड़ी बेशर्मी से अपनी किताबों में लिख दिया की अरे, ये तो ‘किसान विद्रोह’ था!
इनकी दलील थी की मालाबार में हिंदू ज़मींदार थे, जो गरीब मुस्लिम किसानों पर अत्याचार करते थे। इसलिए उन गरीब मुसलमानों ने गुस्से में आकर विद्रोह कर दिया।
अरे लानत है ऐसी पढ़ाई और ऐसे इतिहासकारों पर! ज़रा अपना थोड़ा सा भी दिमाग लगाइए भाई। अगर ये सिर्फ ज़मींदारों के खिलाफ किसानों का गुस्सा था, तो फिर मालाबार के उन गरीब, दलित और अछूत हिंदुओं को क्यों काटा गया? उनका तो कोई ज़मीन-ज़ायदाद का चक्कर नहीं था!
अगर ये किसानों का विद्रोह था, तो हिंदू औरतों का सरेआम बलात्कार क्यों किया गया? क्या टैक्स या लगान माफ करवाने के लिए औरतों के साथ दुष्कर्म किया जाता है? अगर ये ज़मींदारों की लड़ाई थी, तो 100 से ज़्यादा प्राचीन हिंदू मंदिरों को ज़मीनदोज़ क्यों कर दिया गया?
क्या मंदिरों के अंदर छुपकर कोई लगान वसूल रहा था? मूर्तियों के गले में कटी हुई गायों की आंतें डालने का किसानी से क्या लेना-देना है भाई? और सबसे बड़ा सवाल- अगर ये किसानों की लड़ाई थी, तो हिंदुओं की गर्दन पर तलवार रखकर उनका ज़बरन खतना क्यों किया गया? क्या खतना करने से ज़मीन के कागज़ बदल जाते हैं?
ये कोई किसानों का विद्रोह नहीं था, ये सीधे-सीधे इस्लाम की तलवार के दम पर भारत को ‘दारुल इस्लाम’ बनाने की एक खौफनाक जिहादी साज़िश थी। लेकिन इन वामपंथी गद्दारों ने अपने सेक्युलर एजेंडे को बचाने के लिए उन हत्यारों और बलात्कारियों को रातों-रात ‘स्वतंत्रता सेनानी’ घोषित कर दिया।
और सबसे बड़ा खून के आंसू रुलाने वाला दर्द तो तब होता है, जब हमें पता चलता है की आज़ादी के बाद हमारी ही सरकारों ने उन मोपला हत्यारों को, जिन्होंने हमारी ही परदादी-परनानियों का चीरहरण किया था, उन्हें ‘स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन’ देना शुरू कर दिया।
मतलब, जिन जेहादी हाथों से हिंदुओं का खून टपक रहा था, उन्हीं हाथों में हमने टैक्सपेयर का पैसा पेंशन के रूप में थमा दिया! इससे बड़ा सेक्युलर फ्रॉड दुनिया के किसी इतिहास में नहीं मिलेगा।
केरल की वामपंथी सरकारों ने तो उन हत्यारों (जैसे अली मुसलियार) के नाम पर स्मारकों और बस स्टैंड्स का नाम तक रख दिया। ये सीधे तौर पर मरे हुए हिंदुओं की चिता पर थूकने जैसा था।
आज के सोए हुए सनातनियों के लिए एक खौफनाक चेतावनी, इस मुस्लिम भाईचारे के धोखे से बाहर निकलो
इतिहास कभी पुराना नहीं होता, वो बस खुद को दोहराने के मौके तलाशता है। 1921 के उस खौफनाक खिलाफत आंदोलन और मोपला नरसंहार ने हमें जो कीमत चुका कर जो सबक सिखाया था, आज का सोया हुआ हिंदू समाज उस सबक को भूलता जा रहा है।
इस आंदोलन ने डंके की चोट पर ये साबित कर दिया था की जब बात ‘उम्माह’ (इस्लामिक भाईचारे) और मज़हब की आती है, तो इनके लिए ना तो देश की कोई सीमा मायने रखती है, और ना ही पड़ोस में रहने वाले किसी हिंदू का सालों पुराना रिश्ता।
तुर्की में बैठे एक खलीफा की गद्दी खिसकी, और इन्होंने केरल में अपने ही हिंदू पड़ोसियों के गले काट दिए, जिनके साथ ये रोज़ उठते-बैठते थे।
आज भी तो यही हो रहा है! ज़रा आंखें खोलकर देखिए। आज अगर फिलीस्तीन में कुछ होता है, तो भारत की सड़कों पर अचानक से हज़ारों की भीड़ उतर आती है।
अगर म्यांमार में रोहिंग्याओं पर एक्शन होता है, तो मुंबई के आज़ाद मैदान में अमर जवान ज्योति को तोड़ दिया जाता है। फ्रांस में कोई कार्टून छपता है, तो भारत के शहरों में ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगने लगते हैं और कन्हैया लाल या उमेश कोल्हे जैसे बेगुनाह हिंदुओं का गला रेत दिया जाता है।
क्या बदला है 1921 से लेकर 2026 तक? कुछ भी नहीं! मानसिकता बिल्कुल वही है, सिर्फ तारीखें बदल गई हैं। इनका भाईचारा सिर्फ तब तक है जब तक ये अल्पसंख्यक हैं। जैसे ही इनकी भीड़ बढ़ती है, इनका असली शरिया वाला चेहरा बाहर आ जाता है।
आज के हिंदू को इस ‘सेक्युलरिज्म’ और ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ की अफीम को उठाकर नाले में फेंक देना चाहिए। ये भाईचारा सिर्फ एक तरफा बेवकूफी है जिसका ठेका सिर्फ हिंदुओं ने ले रखा है।
हमें अपनी आंखों से इस वामपंथी और लिबरल इकोसिस्टम का चश्मा उतारना होगा, जो हमें हमारे ही कातिलों से प्यार करना सिखाता है।
सनातनियों, अब जाग जाओ! जिनकी वफादारी विदेशी आकाओं और विदेशी मज़हब के लिए है, उन पर अगर तुमने भरोसा किया, तो तुम्हारा मिटना तय है।
अब आर-पार की बात है। या तो तुम एक एकजुट और कट्टर हिंदू समाज बनकर अपना वजूद बचाओगे, या फिर ऐसे ही झूठे आंदोलनों और जिहादी साजिशों का शिकार होकर इतिहास के पन्नों से हमेशा के लिए मिटा दिए जाओगे। फैसला तुम्हारा है!
जय श्री राम! भारत माता की जय!
