देश हुआ 'आजाद', लेकिन 'भोपाल' में चलता रहा जिहादियों की 'इस्लामिक रियासत' का खौफनाक राज, हिंदुओं के खून से रंग कर '1949' में ली भोपाल ने असली 'आजादी' की सांस

देश हुआ ‘आजाद’, लेकिन ‘भोपाल’ में चलता रहा जिहादियों की ‘इस्लामिक रियासत’ का खौफनाक राज, हिंदुओं के खून से रंग कर ‘1949’ में ली भोपाल ने असली ‘आजादी’ की सांस

हम सब जानते हैं की 15 अगस्त 1947 को पूरा भारत अंग्रेज़ों की गुलामी से आज़ाद हो गया था। लेकिन क्या आपको पता है की जब दिल्ली में आज़ादी के तराने गाए जा रहे थे, तब भारत के बिल्कुल बीचों-बीच, मध्य प्रदेश के ‘भोपाल’ में क्या हो रहा था?

भोपाल उस दिन आज़ाद नहीं हुआ था दोस्तों! भोपाल में उस वक्त एक ऐसे क्रूर और जिहादी नवाब का खौफनाक ‘इस्लामिक राज’ चल रहा था, जिसने लाखों हिंदुओं की ज़िंदगी को नर्क बना रखा था।

ज़रा वहां की ज़मीनी हकीकत को समझिए। भोपाल रियासत में 80 प्रतिशत से ज़्यादा आबादी हम सनातनियों की थी, हिंदुओं की थी।

लेकिन सत्ता की चाबी, पुलिस का पावर और खज़ाना उस एक प्रतिशत ‘नवाब’ और उसके कट्टरपंथी गुर्गों के हाथ में था।

वहां भारत का कोई नियम, कोई कानून और कोई संविधान काम नहीं करता था। 80 प्रतिशत हिंदुओं पर मुल्लों का शरिया कानून थोपा गया था।

हालत इतने खौफनाक थे की अगर कोई हिंदू अपने ही देश में, अपनी ही ज़मीन पर ‘भारत माता की जय’ बोल दे या अपने घर की छत पर ‘तिरंगा’ फहराने की जुर्रत कर ले, तो नवाब की पुलिस उसे घसीटकर काल कोठरी में डाल देती थी।

तिरंगा फहराना भोपाल में सीधा-सीधा मौत को दावत देना था। नवाब ने अपनी पुलिस और रज़ाकारों (कट्टरपंथी गुंडों) को खुली छूट दे रखी थी की जो भी हिंदू भारत के साथ जाने की बात करे, उसका ऐसा हश्र करो की उसकी आने वाली पुश्तें भी भारत माता का नाम लेने से कांप जाएं।

ये आज़ादी नहीं थी, ये हिंदुओं की वो खौफनाक मज़हबी गुलामी थी जो 1947 के बाद भी भोपाल में सीना तानकर चल रही थी।

जिन्ना का यार और हिन्दुओं का कातिल नवाब ‘हमीदुल्लाह खान’, भोपाल को तीसरा पाकिस्तान बनाने की थी खौफनाक साज़िश

अब ज़रा इस पूरे खौफनाक षड्यंत्र के उस मास्टरमाइंड को देखिए। वो था भोपाल का आखिरी नवाब- हमीदुल्लाह खान।

ये आदमी कोई साधारण शासक नहीं, बल्कि ये उस मोहम्मद अली जिन्ना का सबसे पक्का दोस्त और उठने-बैठने वाला यार था जिसने भारत के टुकड़े करवाकर लाखों हिंदुओं का कत्लेआम करवाया था।

हमीदुल्लाह खान उस वक्त अंग्रेज़ों द्वारा बनाए गए ‘चेंबर ऑफ प्रिंसेस’ का चांसलर भी था और उसकी नज़दीकियां सीधे पाकिस्तान के आकाओं से थीं।

जिन्ना ने इस गद्दार नवाब हमीदुल्लाह को खुला ऑफर दे रखा था की “तुम भोपाल को पाकिस्तान में मिला दो, हम तुम्हें पाकिस्तान का सेक्रेटरी जनरल बना देंगे।” नवाब किसी भी कीमत पर अपनी रियासत का विलय (Merger) भारत में नहीं करना चाहता था।

उसका खौफनाक सपना था की भारत के एकदम बीचों-बीच एक ‘स्वतंत्र इस्लामिक रियासत’ बनाई जाए। सोचिए, एक पाकिस्तान बॉर्डर के उस पार था, दूसरा पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) था।

और ये जिहादी नवाब भारत के बिल्कुल सीने में एक ‘तीसरा पाकिस्तान’ बनाने की साज़िश रच रहा था! अगर ये साज़िश कामयाब हो जाती, तो भारत को अंदर से खोखला करना इन जिहादियों के लिए बहुत आसान हो जाता।

और इस नवाब की गद्दारी का आलम तो देखिए। जब इसे लगा की भोपाल की हिंदू जनता इसके खिलाफ खड़ी हो रही है, तो इसने छुप-छुप कर भोपाल रियासत का करोड़ों रुपये का खज़ाना, सोना और बेशकीमती संपत्तियां पाकिस्तान भेजना शुरू कर दिया था।

ये भारत की ज़मीन का नमक खाकर, भारत के हिंदुओं का खून चूसकर पाकिस्तान को मज़बूत कर रहा था।

ये कोई शासक नहीं था, ये भारत की पीठ में खंजर घोंपने वाला वो गद्दार था जो अपनी जिहादी इस्लामिक मानसिकता के अंधेपन में इस देश के टुकड़े-टुकड़े करना चाहता था।

इस्लामिक क्रूरता के खिलाफ सनातनियों का विद्रोह, तिरंगे के लिए भोपाल के हिन्दू शेरों का प्रचंड शंखनाद

लेकिन ये नवाब शायद एक बात भूल गया था की वो जिन 80 प्रतिशत हिंदुओं को अपनी जूतियों के नीचे कुचलने का ख्वाब देख रहा था, वो उसी सनातन धर्म के वंशज थे जिन्होंने बड़े-बड़े मुगलों के तंबू उखाड़ फेंके थे।

जब भोपाल के सनातनी हिंदुओं और नौजवानों को नवाब के इस ‘जिहादी स्टेट’ बनाने के एजेंडे और पाकिस्तान से उसकी सांठगांठ का पता चला, तो उनका खून खौल उठा।

भोपाल की सड़कों पर वो खौफनाक रणनाद गूंजा जिसने नवाब के महल की नींव हिला दी। हिंदुओं ने डंके की चोट पर ऐलान कर दिया की “हम पाकिस्तान में नहीं जाएंगे, हम इस शरिया राज के गुलाम नहीं बनेंगे।”

और यहीं से शुरुआत हुई उस ऐतिहासिक और खून से सने हुए ‘विलीनीकरण आंदोलन’ (Merger Movement) की।

इस आंदोलन की अगुवाई करने के लिए भोपाल के वो हिंदू शेर आगे आए जिन्होंने मौत का खौफ अपने जूतों से कुचल दिया था।

भाई रतन कुमार गुप्ता, पंडित उद्धवदास मेहता, मास्टर लाल सिंह, और डॉ. शंकर दयाल शर्मा जैसे देशभक्तों ने अपनी जान हथेली पर रखकर नवाब की उस क्रूर और हथियारों से लैस पुलिस से सीधा पंगा ले लिया।

जैसे ही हिंदुओं ने तिरंगा फहराना शुरू किया, नवाब का वो खौफनाक जिहादी तांडव शुरू हो गया। हिंदू नेताओं को रातों-रात उनके घरों से घसीटकर जेलों में ठूंस दिया गया। उन पर बर्बर अत्याचार किए गए, कोड़े मारे गए, और उनकी पुश्तैनी संपत्तियां ज़ब्त कर ली गईं।

नवाब को लगा की डंडे के ज़ोर से वो इन काफिरों की आवाज़ दबा देगा। लेकिन उसे नहीं पता था की जब हिंदू अपनी मातृभूमि के लिए सिर पर कफन बांध लेता है, तो उसे दुनिया की कोई तोप नहीं डरा सकती।

हिंदू समाज ने कसम खा ली थी की चाहे कितनी भी लाशें क्यों न बिछ जाएं, लेकिन भोपाल की ज़मीन पर अब चांद-तारे वाला झंडा नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ भारत का तिरंगा लहराएगा।

बोरास घाट का वो खूनी नरसंहार, जब तिरंगा फहराने पर भोपाल की जिहादी पुलिस ने निहत्थे हिन्दू युवाओं की छाती कर दी छलनी

और फिर इतिहास में वो काली तारीख आई जिसने भोपाल की माटी को हमेशा-हमेशा के लिए हमारे हिंदू शेरों के खून से लाल कर दिया। तारीख थी 14 जनवरी 1949!

मकर संक्रांति का वो पवित्र दिन, जब पूरा देश सूर्य देवता की आराधना कर रहा था। भोपाल के रायसेन जिले की उदयपुरा तहसील में नर्मदा नदी के किनारे एक छोटी सी जगह है- ‘बोरास घाट’।

वहां के हिंदू युवाओं और देशभक्तों ने तय किया की आज इस मकर संक्रांति के दिन नर्मदा के तट पर हम भारत का तिरंगा फहराएंगे और नवाबशाही को सीधी चुनौती देंगे। हज़ारों की संख्या में लोग वहां इकट्ठे होने लगे।

लेकिन नवाब के उस जिहादी सिस्टम को ये कैसे बर्दाश्त होता? नवाब हमीदुल्लाह का सबसे वफादार, सबसे क्रूर और दरिंदा थानेदार ‘जफर अली’ अपनी पूरी हथियारों से लैस पुलिस फोर्स लेकर वहां पहुंच गया। उसने आते ही उन निहत्थे हिंदुओं और देशभक्तों को चारों तरफ से घेर लिया।

जैसे ही उन हिंदू शेरों ने ‘भारत माता की जय’ और ‘नवाबशाही मुर्दाबाद’ के नारों के साथ तिरंगे को आसमान की तरफ बढ़ाना शुरू किया, उस दरिंदे जफर अली का मज़हबी गुरूर भड़क उठा।

बिना किसी चेतावनी के, बिना कोई बात किए, उसने अपनी जिहादी पुलिस को सीधा ऑर्डर दे दिया- “फायर!”

भाई साहब, बोरास घाट पर वो जो नंगा नाच हुआ, वो जलियांवाला बाग से भी ज़्यादा खौफनाक था। क्योंकि यहां तो गोलियां चलाने वाले अपने ही देश को लूटने वाले गद्दार थे।

जैसे ही पहली गोली चली, भगदड़ मच गई। लेकिन उन गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच हमारे वो चार अमर हिंदू शेर- रामप्रसाद, धन सिंह, मंगल सिंह और छोटे सिंह- पीछे नहीं हटे।

उन्होंने देखा की जफर अली की पुलिस तिरंगे को गिराना चाहती है। वो चारों शेर अपनी जान की परवाह किए बिना उस तिरंगे को पकड़ने के लिए आगे बढ़ गए।

नवाब की उस कातिल पुलिस ने उन निहत्थे जवानों की छातियों पर सीधे मशीनगनों की बौछार कर दी। उन चारों की छातियां छलनी हो गईं। खून का फव्वारा फूट पड़ा।

वो लहूलुहान होकर ज़मीन पर गिर पड़े, लेकिन मरते दम तक, अपनी आखिरी सांस तक उन्होंने उस तिरंगे को ज़मीन पर नहीं गिरने दिया। एक को गोली लगती तो दूसरा तिरंगा थाम लेता, दूसरे को लगती तो तीसरा आगे आ जाता।

बोरास की उस लाल मिट्टी ने उस दिन जो शहादत देखी, वो इतिहास में अमर हो गई। 14 जनवरी 1949 की उस दोपहर को उन चार हिंदू शेरों के खून ने नवाब हमीदुल्लाह की उस ‘इस्लामिक रियासत’ का जनाज़ा निकाल कर रख दिया था।

उन नौजवानों की लाशें वहां पड़ी थीं, लेकिन उनके खून की एक-एक बूंद चीख कर कह रही थी की अब नवाबशाही का अंत नज़दीक है।

तिरंगे को गिरने नहीं दिया और हंसते हंसते सीने पर खाई गोलियां, अमर सनातनियों के खून से कांप उठी थी नवाब की सत्ता

जब उन चार वीर हुतात्माओं की खून से लथपथ लाशें बोरास की मिट्टी पर गिरीं, तो वो सिर्फ चार लाशें नहीं थीं। वो एक ऐसा खौफनाक ज्वालामुखी था जिसके फटने की आवाज़ ने भोपाल के उस जिहादी महल की चूलें हिला कर रख दीं।

बोरास में बहे उस हिंदू खून ने पूरे भोपाल की जनता की रगों में वो आग लगा दी कि लोग अपनी जान और मौत का सारा खौफ भूलकर सड़कों पर उतर आए।

‘नवाबशाही मुर्दाबाद’ और ‘भारत माता की जय’ के उन गगनभेदी नारों से पूरा भोपाल गूंज उठा। जो हिंदू कल तक नवाब की पुलिस से छुपकर बात करते थे, वो आज हाथों में लाठियां और मशालें लेकर उस जिहादी रियासत से आर-पार की लड़ाई लड़ने के लिए सड़कों पर खड़े थे।

नवाब हमीदुल्लाह खान और उसके उन कट्टरपंथी रज़ाकारों की पैंट गीली हो गई। उन्हें समझ आ गया की जिस हिंदू को वो बकरियों की तरह हांकने का सपना देख रहे थे, वो हिंदू अब जाग चुका है और अब इस जिहादी हुकूमत का जनाज़ा निकलना तय है।

और सबसे बड़ी शर्म की बात तो ये थी की जब बोरास में हमारे 4 नौजवान तिरंगे के लिए अपनी जान दे रहे थे, तब दिल्ली में बैठे कुछ सेक्युलर कांग्रेसी नेता इस खूनी खेल पर पूरी तरह से खामोश थे।

वो नवाब हमीदुल्लाह को अपना दोस्त मानते थे और उस जिहादी शासक को नाराज़ नहीं करना चाहते थे।

लौह पुरुष सरदार पटेल का खौफनाक अल्टीमेटम और जिहादी नवाब का सरेंडर, 1 जून 1949 को मिली भोपाल को असली आज़ादी

लेकिन इस देश के कुछ गद्दारों की खामोशी से वो खौफनाक सच छुपने वाला नहीं था। जब बोरास के इस जिहादी नरसंहार और हिंदू युवाओं के कत्ल की गूंज दिल्ली के गलियारों तक पहुंची, तो वहां एक ऐसा ‘लौह पुरुष’ बैठा था जिसकी नज़रों से नवाबों की कोई मक्कारी नहीं छुप सकती थी।

सरदार वल्लभभाई पटेल! जब पटेल साहब को पता चला की जिन्ना का वो यार हमीदुल्लाह खान भारत के बीचों-बीच बैठकर तिरंगा फहराने वालों की छातियों पर गोलियां चलवा रहा है, तो सरदार पटेल का खून खौल उठा।

पटेल कोई ऐसा सेक्युलर नेता नहीं थे जो इन जिहादियों को शांति का पाठ पढ़ाने के लिए खत लिखते। सरदार पटेल ने सीधा अपना हंटर उठाया।

उन्होंने अपने सबसे भरोसेमंद अधिकारी वी.पी. मेनन (V. P. Menon) को तुरंत भोपाल भेजा और नवाब हमीदुल्लाह के लिए एक ऐसा खौफनाक और सीधा अल्टीमेटम भिजवा दिया की नवाब की रूह कांप गई।

पटेल का मैसेज बिल्कुल साफ था- “या तो चुपचाप भारत में विलय के कागज़ पर साइन कर दो, या फिर मैं तुम्हारी रियासत में सेना भेजकर तुम्हें तुम्हारी असली औकात याद दिला दूंगा।”

सरदार पटेल का वो खौफ ऐसा था की जिन्ना के उस जिहादी यार की सारी हेकड़ी रातों-रात हवा हो गई।

जो नवाब भोपाल को भारत का ‘तीसरा पाकिस्तान’ बनाने का सपना देख रहा था, जो नवाब हिंदुओं पर शरिया थोप रहा था, वो डर के मारे अपने ही महल में दुबक कर बैठ गया।

उसे पता था की अगर सरदार पटेल ने आर्मी भेज दी, तो उसे छुपने के लिए पाकिस्तान में भी जगह नहीं मिलेगी।

आखिरकार उस खौफनाक दबाव और भोपाल की सड़कों पर मचे हिंदू विद्रोह के सामने उस गद्दार नवाब ने घुटने टेक दिए।

कांपते हुए हाथों से, 30 अप्रैल 1949 को नवाब हमीदुल्लाह खान ने ‘विलय पत्र’ (Merger Agreement) पर साइन कर दिए। और फिर वो ऐतिहासिक दिन आया जिसका भोपाल के हिंदुओं ने खून के आंसू रोकर इंतज़ार किया था।

1 जून 1949! यही वो दिन था जब भारत सरकार ने पूरी ताकत के साथ भोपाल का कंट्रोल अपने हाथ में लिया। नवाब की उस जिहादी पुलिस और रज़ाकारों को उनकी मांद में खदेड़ दिया गया।

15 अगस्त 1947 को जो आज़ादी पूरे देश को मिली थी, वो आज़ादी भोपाल के हिंदुओं को पूरे दो साल के खूनी संघर्ष और बोरास के अमर बलिदानियों के खून की कीमत चुकाने के बाद 1 जून 1949 को नसीब हुई।

बॉलीवुड का तथाकथित छोटा नवाब ‘सैफ अली खान’ उसी गद्दार और जिहादी ‘नवाब हमीदुल्लाह खान’ का है सगा परपोता

अगर आपको लग रहा है की उस गद्दार नवाब हमीदुल्लाह खान की वो जिहादी कहानी और उसका वो क्रूर वंश 1949 में ही खत्म हो गया था, तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं।

बॉलीवुड फिल्मों में ‘छोटे नवाब’ बनकर घूमने वाला और मीडिया में हमेशा सेक्युलरिज़्म का ज्ञान बांटने वाला एक्टर ‘सैफ अली खान’ कोई और नहीं, बल्कि उसी जिहादी नवाब हमीदुल्लाह खान का सगा परपोता है!

जी हां, बिल्कुल सही सुना आपने। नवाब हमीदुल्लाह खान, जिसने भारत को धोखा देकर भोपाल का खज़ाना पाकिस्तान भेजा था और जिसके इशारे पर तिरंगा फहराने वाले हमारे चार हिंदू शेरों को मशीनगन से भून दिया गया था, उसी हमीदुल्लाह की बेटी साजिदा सुल्तान का पोता है ये सैफ अली खान।

आज ये सेक्युलर मीडिया बड़ी बेशर्मी से इसे ‘पटौदी का नवाब’ और ‘भोपाल रियासत का वारिस’ कहकर बुलाता है। अरे भाई! जिस रियासत की नींव ही हिंदुओं के खून और उनकी कटी हुई लाशों पर टिकी हो, उस नवाबशाही का ये कैसा घिनौना महिमामंडन है?

इनके पहने हुए डिज़ाइनर कपड़ों और इनकी अंग्रेज़ी के झांसे में मत आइए। इनके अंदर का वो खौफनाक जिहादी DNA आज भी ज़िंदा है और इसका सबसे नंगा और घिनौना सबूत है इनके बच्चों के नाम!

ज़रा सोचिए, एक इंसान अपने बच्चों का नाम क्या रखता है? वो ऐसे नाम रखता है जो उसके आदर्श हों। और सैफ अली खान ने अपने बच्चों के नाम क्या रखे? इब्राहिम, जहांगीर और सबसे खौफनाक नाम- ‘तैमूर’

ये तैमूर कौन था? ये वही खूंखार और दरिंदा इस्लामी लुटेरा था जिसने दिल्ली पर हमला करके एक ही दिन में लाखों निहत्थे हिंदुओं को काट डाला था।

तैमूर ने दिल्ली की सड़कों पर हिंदुओं की खोपड़ियों के पहाड़ खड़े कर दिए थे। उस जल्लाद का नाम सुनकर आज भी इतिहास की रूह कांप जाती है। और इस बॉलीवुड के सेक्युलर नवाब ने अपने ही बेटे का नाम उस हिंदुओं के कातिल ‘तैमूर’ के नाम पर रख दिया!

क्या इस देश के अंदर कोई ऐसा हिंदू है जो अपने बेटे का नाम जनरल डायर रखेगा? तो फिर इस देश का हिंदू इतना अंधा कैसे हो सकता है की वो उस नवाब की फिल्में देखने के लिए अपनी जेब से पैसे खर्च करे?

आज के हिंदू को ये समझना ही होगा की ये नवाबों का खानदान उसी खौफनाक गज़वा-ए-हिंद की साज़िश का एक मीठा और सफेदपोश हिस्सा है। जिस खून ने बोरास घाट पर हमारे तिरंगे का अपमान किया था, उस खून से तुम कभी देशभक्ति की उम्मीद नहीं कर सकते!

Scroll to Top