आज मैं आपको उस दौर में ले जा रहा हूँ जब भारत पर एक ऐसा खौफनाक संकट मंडरा रहा था, जिसका अगर उसी वक्त इलाज नहीं किया जाता, तो शायद आज हमारी संस्कृति का नामोनिशान ही मिट चुका होता।
बात पहली शताब्दी (लगभग 106 ईस्वी) के आसपास की है। मध्य एशिया और यूनान की तरफ से आए शक (Scythians), यूनानी (यवन-Greeks) और पल्लव (Parthians) जैसे बर्बर कबीलों ने उत्तर और पश्चिम भारत पर अपने खूनी पंजे गाड़ दिए थे।
ये विदेशी लुटेरे बस्तियां जला देते थे, हमारी वैदिक संस्कृति को मिटाने की हर कोशिश किया करते थे और भारत के व्यापारिक रास्तों पर कब्ज़ा करके हमारे ही संसाधनों से अपनी तिजोरियां भर रहे थे।
ऐसा लगने लगा था की पश्चिम भारत (महाराष्ट्र, गुजरात, मालवा) अब हमेशा के लिए इन विदेशी आक्रांताओं का गुलाम बनकर रह जाएगा।
शकों के ‘क्षहरात’ वंश का एक बहुत ही क्रूर और घमंडी राजा था- नहपान! इस विदेशी लुटेरे ने अपने आतंक के दम पर पूरे पश्चिम भारत में ऐसा नंगा नाच कर रखा था की आम जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी।
उसने भृगुकच्छ (भरूच) और कल्याण जैसे भारत के सबसे बड़े बंदरगाहों पर कब्ज़ा कर लिया था और खुद को अजेय समझने लगा था।
लेकिन कहते हैं ना, जब-जब इस सनातन भूमि पर असुरों और म्लेच्छों का आतंक बढ़ता है, तब-तब इसी माटी से कोई ना कोई महापराक्रमी शेर जन्म लेता है।
सातवाहन वंश में उदय हुआ उस अजेय और महाप्रतापी योद्धा का, जिसके नाम से ही विदेशी आक्रांताओं के पसीने छूट जाते थे- सम्राट गौतमीपुत्र शातकर्णी!
ये वो शूरवीर था जिसके बारे में कहा जाता है की उसके युद्ध के घोड़े तीन समुद्रों का पानी पीते थे। गौतमीपुत्र ने कसम खा ली थी की जब तक इन विदेशी लुटेरों की लाशों से भारत की धरती को पाट नहीं दूंगा, तब तक अपनी तलवार म्यान में वापस नहीं रखूंगा।
खूंखार शक राजा ‘नहपान’ का पश्चिम भारत में वो क्रूर आतंक और सनातन पर विदेशियों का खौफनाक कब्ज़ा
अब ज़रा उस दुश्मन की औकात और उसके घमंड को समझिए जिसे मिट्टी में मिलाने के लिए गौतमीपुत्र शातकर्णी ने अपनी तलवार उठाई थी। शकों के ‘क्षहरात’ (Kshaharata) वंश का एक बहुत ही क्रूर, ज़ालिम और घमंडी राजा था- नहपान (Nahapana)।
इस विदेशी लुटेरे ने सिर्फ कुछ गांव या शहर नहीं जीते थे। उसने पूरे गुजरात, सौराष्ट्र, मालवा (अवंती), कोंकण और महाराष्ट्र के एक बहुत बड़े हिस्से पर अपना खौफनाक कब्ज़ा जमा लिया था।
उसने सातवाहनों को खदेड़ कर भृगुकच्छ (भरूच) और कल्याण जैसे भारत के सबसे बड़े और अमीर बंदरगाहों पर अपना नियंत्रण कर लिया था। जो पैसा भारत के खज़ाने में आना चाहिए था, वो इस विदेशी लुटेरे के खज़ाने में जा रहा था।
बात सिर्फ पैसों की लूट-पाट तक सीमित नहीं थी! ये विदेशी आक्रांता हमारे सनातन धर्म, हमारे वेदों और हमारे आश्रमों को भी भ्रष्ट करने पर तुले थे। इन शकों का कोई अपना धर्म या अपनी कोई महान संस्कृति तो थी नहीं।
ये बस तलवार के ज़ोर पर लोगों को डराते थे। नहपान को लगता था की अब उसे इस भारत भूमि से उखाड़ फेंकने वाला कोई पैदा ही नहीं हुआ है।
उसने अपने नाम के चांदी के सिक्के चलवा दिए और पूरे अहंकार के साथ खुद को महाराजा समझने लगा।
लेकिन नहपान ये भूल गया था की वो जिस धरती पर खड़ा होकर अपनी मूंछों पर ताव दे रहा है, वो शूरवीरों की धरती है।
दक्षिण की तरफ से गौतमीपुत्र शातकर्णी अपनी विशाल चतुरंगिणी सेना लेकर इस विदेशी के घमंड को जूतों तले कुचलने के लिए निकल चुका था।
गौतमीपुत्र ने साफ ऐलान कर दिया था की नहपान का कब्ज़ा सिर्फ ज़मीन पर नहीं, बल्कि भारत माता के स्वाभिमान पर है, और इस स्वाभिमान की कीमत अब नहपान को अपने खून से चुकानी पड़ेगी।
ये कोई मामूली युद्ध नहीं होने वाला था। ये एक ऐसा महासंग्राम था जो ये तय करने वाला था की भारत में विदेशी शकों का राज चलेगा या सनातन का वैदिक धर्म!
‘गौतमीपुत्र शातकर्णी’ ने नहपान की छाती चीरकर लिया भयंकर बदला, हासिल की “शक-यवन-पल्लव निषूदन” की उपाधि
जब गौतमीपुत्र शातकर्णी और खूंखार शक राजा नहपान की सेनाएं आमने-सामने आईं, तो जो युद्ध हुआ, उसका वर्णन सुनकर आज भी दुश्मनों का दिल दहल जाता है।
सातवाहन सेना ऐसे टूट पड़ी जैसे भूखे शेर शिकार पर टूटते हैं। गौतमीपुत्र की तलवार ने मैदान में वो खौफनाक कत्लेआम मचाया की शकों की उस विशाल सेना के चिथड़े उड़ गए।
गौतमीपुत्र ने नहपान को सिर्फ हराया नहीं था, उसने इस विदेशी राजा को ऐसी दर्दनाक मौत दी की ‘क्षहरात’ वंश का भारत की धरती से हमेशा-हमेशा के लिए नामोनिशान ही मिट गया।
जो शक भारत पर राज करने का सपना देख रहे थे, उनकी लाशें उसी भारत की मिट्टी में खाद बनकर रह गईं।
लेकिन इस कहानी का सबसे ज़बरदस्त और रोंगटे खड़े कर देने वाला हिस्सा तो सिक्कों की वो कहानी है, जो विदेशियों के मुंह पर एक करारा तमाचा थी।
महाराष्ट्र के ‘जोगलथेंबी’ इलाके से एक बहुत बड़ा खज़ाना मिला, जिसमें शक राजा नहपान के 8000 से ज़्यादा चांदी के सिक्के थे।
गौतमीपुत्र शातकर्णी ने उन सभी सिक्कों को पिघलाए बिना, उसी विदेशी राजा नहपान के चेहरे के ठीक ऊपर अपना नाम, अपना निशान और अपनी मोहर ज़बरदस्ती ठोक दी थी!
ये प्राचीन इतिहास का सबसे बड़ा ‘साइकोलॉजिकल वॉरफेयर’ था। गौतमीपुत्र ने साबित कर दिया की “तू खुद को बहुत बड़ा राजा समझता था ना? देख, तेरे ही पैसे पर, तेरे ही चेहरे को कुचलकर मैंने अपना नाम लिख दिया है!”
नहपान को मिट्टी में मिलाने के बाद इस हिंदू शेर ने एक खौफनाक उपाधि धारण की- “शक-यवन-पल्लव निषूदन”। इसका सीधा सा मतलब था- शकों, यवनों (यूनानियों) और पल्लवों की नस्ल को जड़ से मिटाने वाला!
उन्होंने अपनी सेना लेकर पश्चिम और मध्य भारत का ऐसा सघन अभियान चलाया की इन विदेशी लुटेरों को छुपने के लिए कोई बिल तक नहीं मिला।
गौतमीपुत्र ने सौराष्ट्र, अवंती, विदर्भ और राजपूताना को इन म्लेच्छों के चंगुल से पूरी तरह आज़ाद करा लिया।
‘एकब्राह्मण’ की वो दहाड़ जिसने सनातन संस्कृति को नष्ट होने से बचाया और पश्चिम भारत में वापस स्थापित किया ‘वैदिक धर्म’ का गौरव
गौतमीपुत्र शातकर्णी सिर्फ एक योद्धा नहीं थे, वो इस भारत भूमि और हमारी हज़ारों साल पुरानी वैदिक संस्कृति के साक्षात रक्षक थे। विदेशी शकों और यूनानियों का मकसद सिर्फ खज़ाना लूटना नहीं था।
वो हमारी मूल संस्कृति, हमारी सामाजिक व्यवस्था और हमारे गुरुकुलों को पूरी तरह से भ्रष्ट कर देना चाहते थे। इन विदेशियों ने भारत की वर्ण व्यवस्था में भयानक घालमेल (वर्णसंकर) करना शुरू कर दिया था।
लेकिन तब गौतमीपुत्र ने अपनी वो खौफनाक तलवार उठाई और डंके की चोट पर एक ऐसी उपाधि धारण की जिसने पूरे जंबूद्वीप में सनातन का डंका बजा दिया।
वो उपाधि थी- ‘एकब्राह्मण’! इसका असली मतलब है- वेदों का वो इकलौता और सबसे बड़ा रक्षक जिसके आगे दुनिया की कोई भी आसुरी शक्ति टिक नहीं सकती।
गौतमीपुत्र ने उन विदेशी लुटेरों का नाश करके समाज में फैल रहे उस खौफनाक वर्णसंकर को सख्ती से रोका।
उन्होंने ऐलान कर दिया की भारत की धरती पर कोई विदेशी कानून या विदेशी संस्कृति नहीं चलेगी, यहाँ सिर्फ और सिर्फ सनातन का वैदिक धर्म चलेगा।
उन्होंने उन तमाम टूटे हुए मंदिरों और गुरुकुलों को फिर से खड़ा किया जिन्हें शकों ने नुकसान पहुंचाया था।
वेदों की ऋचाओं का गान करने वाले ऋषियों और विद्वानों को इस हिंदू सम्राट ने अथाह ज़मीनें दान में दीं और पश्चिम भारत में वैदिक धर्म का भगवा एक बार फिर पूरे खौफ और गौरव के साथ आसमान चूमने लगा।
तीन समुद्रों का पानी पीते थे गौतमीपुत्र शातकर्णी के घोड़े, माता गौतमी बलश्री का नासिक अभिलेख जो चीख चीख कर देता है गवाही
अब ज़रा इस महापराक्रमी हिंदू सम्राट की उस ताकत और उस खौफनाक साम्राज्य की बात करते हैं, जिसका नाम सुनते ही विदेशी राजाओं की रूह कांप जाती थी।
अगर आपको लगता है की मैं सम्राट की तारीफ में सिर्फ किस्से-कहानियां सुना रहा हूँ, तो महाराष्ट्र के नासिक चले जाइए।
वहां के पहाड़ों में उकेरा गया माता गौतमी बलश्री का वो ऐतिहासिक ‘नासिक अभिलेख’ (Nashik Prashasti) आज भी पत्थर पर मौजूद है। ये अभिलेख चीख-चीख कर पूरी दुनिया को गौतमीपुत्र शातकर्णी की उस अजेय ताकत की गवाही देता है।
एक मां ने अपने बेटे के शौर्य का जो बखान उन पत्थरों पर करवाया है, उसे पढ़कर किसी भी मुरदा इंसान के खून में भी उबाल आ जाए। नासिक अभिलेख में इस हिंदू शेर को एक बहुत ही भयंकर और खौफनाक उपाधि दी गई है- “त्रि-समुद्र-तोय-पीत-वाहन”!
ज़रा इस एक लाइन का मतलब समझने की कोशिश कीजिए। इसका अर्थ है- वो शक्तिशाली और अजेय सम्राट, जिसके युद्ध के घोड़े तीन समुद्रों का पानी पीते थे!
ये कोई कहावत नहीं है भाई, ये एक बहुत बड़ी ज़मीनी और भौगोलिक हकीकत है। ये तीन समुद्र थे- पश्चिम में अरब सागर, पूर्व में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में हिंद महासागर।
सोचिए उस सातवाहन सेना का क्या खौफनाक खौफ रहा होगा! जब गौतमीपुत्र की चतुरंगिणी सेना अपनी विजय यात्रा पर निकलती थी, तो उनके घोड़ों की टापों की गूंज से पूरी धरती धक-धक कांपती थी।
पूरब से लेकर पश्चिम तक, और उत्तर के मालवा से लेकर दक्षिण के समंदरों तक, जहाँ तक भी गौतमीपुत्र की नज़र जाती थी, वहां तक सिर्फ और सिर्फ उसी का भगवा झंडा लहराता था।
उसके घोड़े अरब सागर में भी अपनी प्यास बुझाते थे और बंगाल की खाड़ी में भी अपने खुर (पैर) धोते थे।
नासिक अभिलेख में इस सम्राट के शरीर और उसके बाहुबल का जो वर्णन है, वो किसी भी हॉलीवुड के सुपरहीरो को बौना साबित कर दे। उन्हें भगवान राम, केशव (श्रीकृष्ण), अर्जुन और भीम के समान शूरवीर बताया गया है।
उनका शरीर विंध्य और हिमालय के पहाड़ों जैसा विशाल और कठोर था। उनका चेहरा पूर्णिमा के चांद की तरह चमकता था, लेकिन जब वो युद्ध के मैदान में अपनी तलवार लेकर उतरते थे, तो उनका वही चेहरा यमराज से भी ज़्यादा खौफनाक हो जाता था।
वो दुश्मनों के लिए साक्षात काल थे और अपनी प्रजा के लिए एक दयालु पिता। ऐसा महाप्रतापी और अजेय सम्राट इस दुनिया के इतिहास में शायद ही कोई दूसरा पैदा हुआ हो।
