कभी जिहादियों को खुला संरक्षण, कभी आतंकवादियों की रिहाई, आज शांतिदूत काट रहे अखिलेश यादव के जन्मदिन का केक और रामभक्त याद कर रहे सनातन के खिलाफ वो दर्दनाक गद्दारी

कभी जिहादियों को खुला संरक्षण, कभी आतंकवादियों की रिहाई, आज शांतिदूत काट रहे अखिलेश यादव के जन्मदिन का केक और रामभक्त याद कर रहे सनातन के खिलाफ वो दर्दनाक गद्दारी

आज 1 जुलाई है। टीवी चैनलों, अखबारों और सोशल मीडिया पर एक खास इकोसिस्टम और एक ‘विशेष’ मज़हब के लोग बड़ी बेशर्मी से जश्न मना रहे हैं। आज समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव का जन्मदिन है।

जिहादी और उनके हमदर्द आज उनके लिए दुआएं मांग रहे हैं, उन्हें केक खिला रहे हैं और बधाइयां दे रहे हैं। लेकिन, इस देश के एक सच्चे सनातनी और एक रामभक्त के लिए आज का दिन कोई जश्न का दिन नहीं है।

हमारे लिए आज का दिन उन गहरे और खूनी ज़ख्मों को याद करने का दिन है, जब उत्तर प्रदेश की सत्ता पर बैठकर इसी आदमी ने जिहादियों को हिंदुओं के सरेआम शिकार की खुली छूट दे रखी थी।

अखिलेश यादव का वो 5 साल का कार्यकाल (2012 से 2017) उत्तर प्रदेश के इतिहास का सबसे काला, सबसे खौफनाक और सबसे खूनी दौर था।

वो एक ऐसा ‘मज़हबी सिंडिकेट’ था जिसका इकलौता मकसद सिर्फ और सिर्फ अपनी कुर्सी बचाने के लिए जिहादी वोटबैंक को पालना और बहुसंख्यक हिंदुओं को उनके ही प्रदेश में जूतों तले कुचलना था।

आज जब ये शांतिदूत अखिलेश यादव की लंबी उम्र की दुआएं मांग रहे हैं, तो हमें भी उस दर्दनाक गद्दारी का एक-एक पन्ना खोलना होगा।

हमें याद करना होगा की कैसे इस सत्ता के लालच में हमारे हिंदू भाइयों को उनके पुश्तैनी गांवों से खदेड़ा गया।

कैसे हमारी बेटियों की इज़्ज़त सरेआम नीलाम हुई और कैसे उन खूंखार जिहादी आतंकवादियों को सरकारी मेहमान बनाकर जेलों से रिहा करने की साज़िश रची गई, जिनके हाथों पर हमारे बेगुनाह हिंदुओं का खून लगा था।

आज का दिन उस समाजवादी नकाब को नोचकर फेंकने का दिन है, जिसके पीछे हिंदुओं की बर्बादी का खौफनाक तांडव रचा गया था।

मुजफ्फरनगर दंगे का वो खूनी नंगा नाच, जब हिन्दुओं की बर्बर हत्या करने वाले जिहादियों को अखिलेश सरकार ने रातों रात थाने से छुड़वा दिया

अगर आपको अखिलेश यादव के उस जिहादी तुष्टिकरण का सबसे खौफनाक और नंगा सच देखना है, तो 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के उस पन्ने को पलटिए जहाँ से इस पूरे खून-खराबे की शुरुआत हुई थी।

बात 27 अगस्त 2013 की है। मुजफ्फरनगर का एक शांत सा गांव- कवाल। वहां की एक हिंदू बेटी के साथ शाहनवाज़ नाम का एक जिहादी गुंडा सरेआम छेड़खानी करता है।

उस हिंदू बेटी की इज़्ज़त और सनातन के स्वाभिमान को बचाने के लिए उसके दो वीर भाई- सचिन और गौरव- सीना तानकर उस जिहादी के सामने खड़े हो जाते हैं।

उन दोनों भाइयों ने अपनी बहन की रक्षा करते हुए उस शाहनवाज़ को वहीं सबक सिखा दिया। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वो सुनकर आज भी हर हिंदू का खून खौल उठता है।

कवाल गांव में अचानक से हथियारों से लदी जिहादियों की एक खौफनाक भीड़ इकट्ठा हो जाती है और वो निहत्थे सचिन और गौरव को घेर लेते हैं।

उन दोनों भाइयों को सरेआम, बीच सड़क पर चाकुओं से गोद-गोद कर, ईंट-पत्थरों से कुचल-कुचल कर बेरहमी से मार डाला जाता है। दोनों भाइयों की लाशें खून से लथपथ ज़मीन पर पड़ी रहती हैं।

पुलिस आती है और दबाव में आकर उन जिहादी कातिलों को गिरफ्तार करके थाने ले जाती है। लेकिन असली गद्दारी तो अब शुरू होती है।

लखनऊ में बैठे अखिलेश सरकार के आकाओं को जब पता चलता है की उनके जिहादी वोटबैंक के गुंडे पकड़े गए हैं, तो सत्ता के गलियारों में हड़कंप मच जाता है।

आरोप है की अखिलेश सरकार के एक बेहद रसूखदार मुस्लिम मंत्री के एक फोन कॉल पर पूरा का पूरा पुलिस प्रशासन उन जिहादियों के सामने नतमस्तक हो जाता है।

जिन कातिलों के हाथों से सचिन और गौरव का खून टपक रहा था, उन्हें रातों-रात बिना किसी कानूनी कार्रवाई के पुलिस स्टेशन से बाइज्ज़त रिहा कर दिया जाता है!

ज़रा सोचिए इस गद्दारी को! एक सरकार अपने ही दो नौजवान हिंदू बेटों के कातिलों को सिर्फ इसलिए छोड़ देती है क्योंकि वो कातिल उनके मज़हबी वोटबैंक का हिस्सा थे।

इसी सरकारी गद्दारी और तुष्टिकरण ने मुजफ्फरनगर के उस खौफनाक दंगे की आग भड़काई थी। जब हिंदुओं ने इंसाफ मांगा, तो उन पर गोलियां बरसाई गईं।

जाटों और हिंदुओं को उनके पुश्तैनी गांवों से अपना घर-बार छोड़कर भागना पड़ा। हमारी बहन-बेटियों को खौफ के साए में जीना पड़ा। और अखिलेश सरकार क्या कर रही थी?

वो दंगा करने वाले जिहादियों को सरकारी कैंपों में वीआईपी ट्रीटमेंट (VIP Treatment) दे रही थी, उन्हें लाखों रुपये का मुआवज़ा बांट रही थी और हिंदू युवाओं को झूठे मुकदमों में फंसाकर जेलों में सड़ा रही थी।

सचिन और गौरव की वो चीखें आज भी अखिलेश यादव के उस काले राज से इंसाफ मांग रही हैं।

कैराना से हिन्दुओं का खौफनाक पलायन जब जिहादी गुंडों के डर से अपने ही देश में शरणार्थी बन गया हिन्दू और खामोश रही अखिलेश सरकार

मुजफ्फरनगर का ज़ख्म अभी भरा भी नहीं था की 2016 में पश्चिमी यूपी के कैराना और कांधला (शामली) से ऐसी तस्वीरें सामने आईं जिसने पूरे देश के हिंदुओं की रूह कंपा दी।

वो तस्वीरें हमें 1990 के कश्मीर की याद दिला रही थीं, जब कश्मीरी पंडितों को जिहादियों ने उनके घरों से खदेड़ दिया था।

कैराना में भी बिल्कुल वही कश्मीर वाला जिहादी मॉडल लागू कर दिया गया था और सत्ता में बैठे अखिलेश यादव धृतराष्ट्र बनकर तमाशा देख रहे थे।

कैराना में मुकीम काला और फुरकान जैसे खूंखार जिहादी गैंगस्टरों का नंगा नाच चल रहा था। इन जिहादी गुंडों ने वहां के हिंदू व्यापारियों, डॉक्टरों और आम लोगों का जीना हराम कर रखा था।

दिनदहाड़े हिंदुओं की दुकानों में घुसकर रंगदारी मांगी जाती थी। जो हिंदू हफ्ता देने से मना करता, उसे बीच बाज़ार गोलियों से भून दिया जाता था। हिंदू बेटियों का घर से निकलना मुश्किल हो गया था।

प्रशासन इन गुंडों की जेब में था, क्योंकि इन जिहादियों को सीधे तौर पर लखनऊ की समाजवादी सत्ता का खुला संरक्षण मिला हुआ था।

जब पुलिस और सरकार ने हिंदुओं को मरने के लिए छोड़ दिया, तो खौफ और दहशत के साए में जी रहे उन हिंदुओं के पास क्या रास्ता बचा?

अपना खून-पसीना लगाकर जो घर और दुकानें उन्होंने बनाई थीं, उनके दरवाज़ों पर भारी मन और रोती हुई आंखों से उन्होंने लिख दिया- “यह मकान बिकाऊ है।”

सैकड़ों हिंदू परिवार अपनी ज़मीनें, अपना व्यापार और अपनी यादें पीछे छोड़कर रातों-रात कैराना से पलायन कर गए। वो अपने ही देश में, अपनी ही ज़मीन पर शरणार्थी (Refugees) बन गए।

जब कैराना के तत्कालीन सांसद हुकुम सिंह जी ने दर्द से भरी हुई 346 पलायन करने वाले हिंदू परिवारों की एक पूरी लिस्ट पूरे देश के सामने रखी, तो इस देश के छद्म-सेक्युलर सिस्टम में भूचाल आ गया।

लेकिन उस वक्त के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने क्या किया? क्या उन्होंने उन जिहादी गुंडों का एनकाउंटर करने का आदेश दिया? क्या उन्होंने उन रोते हुए हिंदुओं को सुरक्षा दी? बिल्कुल नहीं!

अखिलेश यादव ने बड़ी बेशर्मी से कैमरे के सामने आकर कह दिया की “ये कोई पलायन नहीं है, लोग तो रोज़गार के लिए बाहर जाते रहते हैं, इसे फालतू का सांप्रदायिक मुद्दा बनाया जा रहा है।”

अरे भाई! क्या कोई रोज़गार के लिए अपनी पुश्तैनी ज़मीन, अपना चालू व्यापार छोड़कर और घर के बाहर ‘मकान बिकाऊ है’ लिखकर भागता है? ये सीधे-सीधे जिहादी गुंडों को बचाने और हिंदुओं के दर्द पर नमक छिड़कने का काम था।

अखिलेश यादव ने उस खौफनाक पलायन को सिर्फ इसलिए झुठला दिया क्योंकि अगर वो सच मानते, तो उन्हें अपने ही जिहादी वोटबैंक के गुंडों पर डंडा चलाना पड़ता।

कैराना के उन हिंदुओं का वो दर्द और वो बेबसी आज भी समाजवादी पार्टी के माथे पर लगा वो कलंक है जो कभी नहीं धुल सकता।

संकट मोचन मंदिर में बम फोड़ने वाले आतंकवादियों को रिहा करने की अखिलेश की खौफनाक साज़िश, हाई कोर्ट ने मारा करारा तमाचा

अगर आपको लगता है की अखिलेश यादव का जिहादी तुष्टिकरण सिर्फ दंगाइयों और गुंडों तक सीमित था, तो अब मैं आपको उनके उस सबसे खौफनाक और देशद्रोही फैसले के बारे में बताता हूं जिसे सुनकर किसी भी देशभक्त इंसान का खून खौल उठेगा।

ये वो साज़िश थी जहाँ एक सरकार सीधे तौर पर बम फोड़ने वाले खूंखार जिहादी आतंकवादियों को सरकारी दामाद बनाकर जेल से रिहा करने जा रही थी।

साल 2006 और 2007 का वो खूनी दौर याद कीजिए। जब वाराणसी के पवित्र संकट मोचन मंदिर, कैंट रेलवे स्टेशन, और लखनऊ, फैज़ाबाद, गोरखपुर की अदालतों में एक के बाद एक खौफनाक सीरियल ब्लास्ट हुए थे।

इन बम धमाकों में दर्ज़नों बेगुनाह हिंदू मारे गए थे, सैकड़ों लोग ज़िंदगी भर के लिए अपाहिज हो गए थे। संकट मोचन मंदिर के प्रांगण में हमारे श्रद्धालुओं का खून और शरीर के लोथड़े बिखरे पड़े थे।

देश की सुरक्षा एजेंसियों और यूपी एटीएस (ATS) ने अपनी जान पर खेलकर इन बम धमाकों के मास्टरमाइंड- तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद जैसे खूंखार जिहादी आतंकवादियों को गिरफ्तार किया था।

इनके पास से विस्फोटक और हथियार बरामद हुए थे। ये लोग सीधे तौर पर इंडियन मुजाहिदीन (IM) और हुजी (HuJI) जैसे आतंकी संगठनों से जुड़े हुए थे।

लेकिन 2012 में जैसे ही अखिलेश यादव मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे, उनके अंदर का वो ‘मज़हबी तुष्टिकरण’ वाला कीड़ा जाग उठा।

अपने मुस्लिम वोटबैंक को ये संदेश देने के लिए कि ‘हम तुम्हारे साथ हैं’, अखिलेश सरकार ने एक ऐसा लिखित सरकारी आदेश जारी किया जो आज़ाद भारत के इतिहास का सबसे शर्मनाक आदेश था।

अखिलेश सरकार ने अदालतों में अर्ज़ी लगा दी की वो इन खूंखार जिहादी आतंकवादियों पर से ‘देशद्रोह और हत्या’ के सारे मुकदमे वापस लेना चाहते हैं और इन्हें बाइज्ज़त रिहा करना चाहते हैं!

ज़रा सोचिए इस भयानक गद्दारी को! जिन आतंकियों ने हमारे मंदिरों में बम फोड़े, हमारे लोगों को मारा, उन्हें एक राज्य का मुख्यमंत्री खुद जेल के ताले खोलकर बाहर निकालना चाहता था। क्या उन बेगुनाह मृतकों की जान की कोई कीमत नहीं थी?

लेकिन वो तो भला हो हमारे देश की न्यायपालिका का! जब मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट में पहुंचा, तो जजों ने अखिलेश सरकार की इस देशद्रोही साज़िश को पकड़ लिया।

हाई कोर्ट ने अखिलेश सरकार के मुंह पर ऐसा करारा तमाचा मारा की उनकी सारी हेकड़ी निकल गई। कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए सरकार से पूछा-

“आज आप राजनीतिक फायदे के लिए आतंकवादियों पर से केस वापस लेकर इन्हें छोड़ रहे हैं, क्या कल को आप इन्हें पद्म भूषण भी दे देंगे?”

हाई कोर्ट ने इस खौफनाक रिहाई पर तुरंत रोक लगा दी और उन आतंकवादियों को वापस काल कोठरी में धकेल दिया।

लेकिन इस घटना ने पूरे देश को ये दिखा दिया था की समाजवादी पार्टी की सरकार जिहादियों को खुश करने के लिए देश की सुरक्षा को भी दांव पर लगा सकती है और हिंदू खून का सरेआम सौदा कर सकती है।

कब्रिस्तान की बाउंड्री पर लुटाए गए हजारों करोड़ और हिन्दू त्योहारों पर चला पुलिस का डंडा, अखिलेश राज का वो सबसे बड़ा सेक्युलर फ्रॉड

ज़रा अखिलेश यादव के उस आर्थिक और प्रशासनिक फ्रॉड को देखिए जिसने इस प्रदेश के बहुसंख्यक हिंदुओं को खून के आंसू रुला दिए थे।

अखिलेश यादव का पूरा का पूरा पांच साल का कार्यकाल इस बात का जीता-जागता सबूत है की कैसे सरकारी खज़ाने और पुलिस के डंडे का इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ हिंदुओं को कुचलने और जिहादियों को सिर पर बिठाने के लिए किया गया।

ज़रा याद कीजिए उस खौफनाक दौर को! एक हिंदू गधे की तरह मेहनत करके टैक्स भरता था, और उस टैक्स के पैसों से अखिलेश सरकार क्या करती थी?

उस पैसे से पूरे उत्तर प्रदेश में सिर्फ और सिर्फ ‘कब्रिस्तानों की बाउंड्रीवॉल’ बनाने के लिए सरकारी खज़ाने से करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए गए! हर गांव, हर शहर में जिहादियों के कब्रिस्तानों को पक्की दीवारों से घेर दिया गया।

लेकिन हमारे शमशान घाटों का क्या हुआ? जिस शमशान में एक हिंदू अपने मृत परिजनों को अंतिम विदाई देने जाता था, उन्हें लावारिस छोड़ दिया गया। वहां ना तो टीन शेड था, ना बारिश से बचने की जगह और ना ही बैठने का कोई इंतज़ाम।

एक हिंदू टैक्सपेयर अपने ही पैसे से बने हुए उन VIP कब्रिस्तानों के पास से गुज़रता था और अपने जर्जर श्मशान घाट को देखकर खून के घूंट पीकर रह जाता था।

ये अखिलेश यादव की तरफ से हिंदुओं को दिया गया वो संदेश था की “इस प्रदेश में तुम सिर्फ दूसरे दर्जे के नागरिक हो, यहाँ असली राज हमारे मज़हबी वोटबैंक का है।”

और ये सौतेलापन सिर्फ खज़ाने तक नहीं था। जब-जब हिंदू का कोई त्योहार आता था, अखिलेश की पुलिस के हाथों में अचानक से डंडे आ जाते थे।

सावन के महीने में जब हमारे शिवभक्त कांवड़िए अपनी कांवड़ लेकर निकलते थे, तो ये सरकार डीजे (DJ) बंद करवाने, लाउडस्पीकर की आवाज़ कम करवाने और कांवड़ियों के रूट बदलने के लिए पूरी की पूरी पुलिस फोर्स सड़कों पर उतार देती थी।

दुर्गा पूजा और रामनवमी के जुलूसों पर पत्थरबाज़ी होती थी, लेकिन पुलिस पत्थरबाज़ों को पकड़ने के बजाय हिंदू आयोजकों पर ही केस ठोक देती थी की तुमने ‘शांति’ भंग की है। मूर्तियों के विसर्जन के वक्त हिंदुओं पर लाठियां भांजी जाती थीं।

लेकिन ज़रा इसी सरकार का दूसरा चेहरा देखिए! जब मुहर्रम का जुलूस निकलता था, तो पुलिस वाले खुद आगे-आगे चलकर रास्ता साफ करवाते थे।

जुमे की नमाज़ के लिए पूरे के पूरे नेशनल हाईवे रोक दिए जाते थे, ट्रैफिक डायवर्ट कर दिया जाता था, लेकिन तब इस सेक्युलर सिस्टम का ना तो कोई नियम टूटता था और ना ही किसी को कोई ‘शांति भंग’ होने का खतरा दिखता था।

अखिलेश राज में हिंदू होना एक ऐसा अपराध बन गया था जिसकी सज़ा रोज़ सड़क पर जलालत सहकर चुकानी पड़ती थी।

निहत्थे रामभक्तों और कारसेवकों के खून से सनी है समाजवादी पार्टी की नींव, आज भी उसी जिहादी तुष्टिकरण को आगे बढ़ा रहे अखिलेश

आज 1 जुलाई को जब अखिलेश यादव अपना जन्मदिन मना रहे हैं और उनके जिहादी समर्थक उन्हें बधाइयां दे रहे हैं, तो हमें ये कतई नहीं भूलना चाहिए की जिस ‘समाजवादी’ सिंहासन पर वो बैठे हैं, उस सिंहासन की नींव में इस देश के निहत्थे रामभक्तों और कारसेवकों का पवित्र खून मिला हुआ है।

भले ही 1990 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे, लेकिन अखिलेश यादव उसी खूनी और हिंदू-विरोधी विरासत के वारिस हैं। वो खौफनाक मंज़र आज भी हर सच्चे रामभक्त के सीने में शूल की तरह चुभता है।

जब अयोध्या की पवित्र धरती पर रामलला के दर्शन करने के लिए पूरे देश से निहत्थे कारसेवक गए थे, तो उस समाजवादी सरकार ने क्या किया था?

अपने जिहादी वोटबैंक को खुश करने के लिए, उन्हें ये दिखाने के लिए की हम हिंदुओं को कीड़े-मकोड़ों की तरह कुचल सकते हैं, मुलायम सिंह यादव ने उन रामभक्तों की छातियों पर अंधाधुंध गोलियां चलवा दी थीं।

और उसके बाद कितनी बेशर्मी से कहा गया था की “अगर और भी परिंदे पर मारते, तो मैं और गोलियां चलवाता!”

और आज अखिलेश यादव क्या कर रहे हैं? क्या उन्होंने आज तक कभी भी अपने पिता के उस खौफनाक पाप के लिए, उन रामभक्तों के नरसंहार के लिए हिंदू समाज से माफी मांगी? बिल्कुल नहीं! उल्टे वो आज भी उसी घमंड में जी रहे हैं।

जब पूरी दुनिया ने अयोध्या में 500 सालों के संघर्ष के बाद रामलला को उनके भव्य मंदिर में विराजमान होते देखा, तो यही अखिलेश यादव और इनकी पार्टी राम मंदिर का मज़ाक उड़ा रही थी।

इनके नेता आज भी हिंदू धर्मग्रंथों का सरेआम अपमान करते हैं और अखिलेश यादव उन्हें मंच पर बिठाकर बढ़ावा देते हैं।

ये वही पार्टी है जिसके नारे हुआ करते थे- ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम।’ इस पार्टी का डीएनए (DNA) ही हिंदू विरोध से बना है।

जब आज अखिलेश यादव अपने घर में मोमबत्तियां बुझाकर केक काट रहे होंगे, तो इस देश के हर सच्चे सनातनी को ये याद रखना चाहिए की उस केक की मिठास में हिंदुओं का खून मिला हुआ है।

जय श्री राम!

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