जब मुस्लिम वोटों के लिए कांग्रेस ने रखा देश की सुरक्षा को 'गिरवी', अटल जी का आतंकवादियों के खिलाफ ब्रह्मास्त्र 'POTA कानून' हटाकर कांग्रेस ने किया देश का सबसे खौफनाक 'मजहबी सौदा'

जब मुस्लिम वोटों के लिए कांग्रेस ने रखा देश की सुरक्षा को ‘गिरवी’, अटल जी का आतंकवादियों के खिलाफ ब्रह्मास्त्र ‘POTA कानून’ हटाकर कांग्रेस ने किया देश का सबसे खौफनाक ‘मजहबी सौदा’

भारत के इतिहास का सबसे काला पन्ना वो है जिसे कांग्रेस ने 2004 से लेकर 2014 के बीच लिखा था। आज हम जिस आतंकवाद और जिहादी स्लीपर सेल्स के खतरे से जूझ रहे हैं, उसका सबसे पक्का और परमानेंट इलाज आज से दो दशक पहले ही ढूंढ लिया गया था।

लेकिन कांग्रेस की चंद मुस्लिम वोटों की भूख ने उस इलाज को ही कूड़ेदान में फेंक दिया।

बात 13 दिसंबर 2001 की उस खौफनाक सुबह की है। पाकिस्तान से आए लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के खूंखार जिहादी हथियारों से लैस होकर भारत के लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर- संसद भवन- के अंदर घुस गए थे।

उनका मकसद था देश के टॉप नेताओं को भून डालना और पूरे भारत की संसद को बंधक बनाना। हमारे जांबाज सुरक्षाकर्मियों ने अपनी जान देकर उन जिहादियों को वहीं ढेर कर दिया, लेकिन इस हमले ने पूरे देश को अंदर तक झकझोर कर रख दिया था।

उस वक्त केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी जी की प्रखर राष्ट्रवादी एनडीए (NDA) सरकार बैठी थी। अटल जी और उस समय के लौह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी जी को एक बात बहुत अच्छी तरह से समझ आ गई थी।

वो जान गए थे की इन खूंखार जिहादियों और देश के मोहल्लों में छुपकर बैठे इनके गद्दार स्लीपर सेल्स का इलाज आम क्रिमिनल कानूनों (IPC या CrPC) से कभी नहीं हो सकता।

ये जिहादी बम फोड़ते थे, पुलिस इन्हें पकड़ती थी, लेकिन आम कानूनों की कमज़ोरी का फायदा उठाकर ये कुछ ही महीनों में ज़मानत पर बाहर आ जाते थे और फिर से किसी हिंदू इलाके में बम फोड़ने की साज़िश रचने लगते थे।

अटल जी ने ठान लिया था की अब इन गद्दारों को ऐसा कानूनी डंडा दिया जाएगा की इनकी आने वाली पुश्तें भी भारत की तरफ आंख उठाने से पहले थर-थर कांपेंगी।

फिर मार्च 2002 में जो हुआ, वो इतिहास का वो सुनहरा दिन था जब भारत ने आतंकवाद पर अपना सीधा बूट रख दिया था।

संसद के दोनों सदनों का एक ऐतिहासिक संयुक्त सत्र बुलाया गया और डंके की चोट पर ‘प्रिवेंशन ऑफ टेररिज्म एक्ट 2002’ यानी ‘पोटा’ (POTA) नाम का वो खौफनाक कानून पास कर दिया गया।

ये वो ‘ब्रह्मास्त्र’ था जिसने भारत के अंदर पल रहे हर एक जिहादी और उसके आकाओं की नींदें हमेशा-हमेशा के लिए उड़ा दी थीं।

अटल जी का POTA का वो खौफनाक डंडा जिससे कांपने लगे थे स्लीपर सेल और आतंकवादियों को पनाह देने वाले गद्दार

अब ज़रा इस ‘पोटा’ कानून के उन जबरदस्त नियमों को समझिए, जिन्हें पढ़कर आज भी देश के गद्दारों की पैंट गीली हो जाती है। हमारे देश का आम कानून क्या कहता है?

आम कानून कहता है की अगर पुलिस ने किसी मुजरिम को पकड़ लिया और उसने पुलिस स्टेशन में अपना जुर्म कबूल भी कर लिया, तो उस बयान की कोर्ट में कोई कीमत नहीं होती।

मुजरिम कोर्ट में जाकर मुकर जाता था की “पुलिस ने तो मुझे पीट कर बयान लिया है।” इसी लूपहोल (Loophole) का फायदा उठाकर जिहादी आराम से बरी हो जाते थे।

लेकिन POTA ने इस गंदे खेल का परमानेंट इलाज कर दिया। पोटा में सीधा और कड़क नियम था की अगर किसी आतंकवादी ने किसी एसपी (SP) रैंक या उससे ऊपर के पुलिस अधिकारी के सामने अपना गुनाह कबूल कर लिया, तो वो बयान कोर्ट में पत्थर की लकीर माना जाएगा!

वो पक्का सबूत होगा और उसी के आधार पर उस जिहादी को फांसी के तख्ते तक पहुंचाया जा सकेगा।

इतना ही नहीं! पोटा लगने का सीधा सा मतलब था की अब तुम अपनी ज़मानत (Bail) भूल जाओ। इस कानून के तहत अगर कोई आतंकवादी या संदिग्ध पकड़ा गया, तो उसे 180 दिनों तक (यानी पूरे 6 महीने) किसी भी कोर्ट से कोई बेल नहीं मिल सकती थी।

पुलिस बिना चार्जशीट दायर किए उस जिहादी को 6 महीने तक जेल की अंधेरी कोठरी में सड़ा सकती थी, उससे पूछताछ कर सकती थी और उसके पूरे नेटवर्क की खाल उधेड़ सकती थी।

और सबसे बड़ा हथौड़ा तो उन लोगों पर पड़ा जो बम नहीं फोड़ते थे, लेकिन अपने घरों में आतंकवादियों को छुपाते थे।

पोटा में साफ़ लिखा था की जो भी गद्दार इन जिहादियों को पनाह देगा, जो इन्हें पैसा (हवाला फंड) भेजेगा, या जो इनके किसी भी खूनी मिशन में ज़रा सी भी मदद करेगा, उसे भी आतंकवादी ही माना जाएगा।

पुलिस और जांच एजेंसियों को पूरी छूट थी की वो ऐसे स्लीपर सेल्स और हमदर्दों की सारी प्रॉपर्टी, उनके घर, उनकी ज़मीनें और उनके बैंक अकाउंट रातों-रात ज़ब्त कर ले।

भाई साहब, POTA के लागू होते ही इस देश में जो गदर मचा, वो देखने लायक था। सिमी (SIMI) जैसे खूंखार और कट्टरपंथी संगठनों की कमर टूट कर हाथ में आ गई थी।

जो जिहादी कल तक सीना तानकर मोहल्लों में घूमते थे, वो पोटा के डर से अंडरग्राउंड हो गए थे। पुलिस का ऐसा खौफ था की आतंकवादियों को पनाह देने से पहले उनके अपने रिश्तेदार भी सौ बार सोचते थे की कहीं उनकी भी ज़मीन और घर ज़ब्त ना हो जाए।

अटल जी की सरकार ने इस देश को आतंकवाद से पूरी तरह मुक्त करने का वो अचूक कवच पहना दिया था, जिसे दुनिया की कोई भी ताकत भेद नहीं सकती थी।

2004 का वो काला साल जब मुस्लिम वोटबैंक के लिए कांग्रेस ने किया देश की सुरक्षा का खौफनाक मज़हबी सौदा, ‘POTA’ कानून को संसद से किया रद्द

लेकिन हमारे हिंदू समाज की सबसे बड़ी कमज़ोरी क्या है? हम बहुत जल्दी सब कुछ भूल जाते हैं।

जब पोटा के डंडे से जिहादी एनकाउंटर में मारे जाने लगे और देश भर की जेलों में कट्टरपंथियों की भीड़ लगने लगी, तो इस देश के ‘सेक्युलर’ और लिबरल इकोसिस्टम के पेट में भयंकर दर्द शुरू हो गया।

इनका एक ही रोना-धोना था की “हाय रे! पोटा के नाम पर एक विशेष समुदाय (मुसलमानों) को टारगेट किया जा रहा है। ये कानून तो अल्पसंख्यकों के खिलाफ है।”

मतलब ज़रा इस नीचता को देखिए! जो कानून बम फोड़ने वालों के खिलाफ बना था, उसे कांग्रेस ने बड़ी चालाकी से एक मज़हब के खिलाफ बता दिया। क्यों? क्योंकि 2004 के लोकसभा चुनाव सिर पर खड़े थे।

कांग्रेस दशकों से सत्ता से बाहर थी और उसे किसी भी कीमत पर अपना वो पुराना और वफादार ‘मुस्लिम वोटबैंक’ वापस चाहिए था।

कांग्रेस ने इस देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को चंद वोटों के लिए नीलाम करने की सबसे खौफनाक साज़िश रची। 2004 के चुनाव में कांग्रेस ने अपने मेनिफेस्टो (घोषणापत्र) में डंके की चोट पर इस देश के जिहादियों से एक वादा किया।

उन्होंने लिखा की “हमें वोट देकर सत्ता में लाओ। हम कसम खाते हैं की सत्ता में आते ही हम इस पोटा कानून को हमेशा के लिए उखाड़ कर कूड़ेदान में फेंक देंगे।”

ये कोई चुनावी वादा नहीं था मेरे भाई, ये सीधे-सीधे आतंकवादियों के आकाओं के साथ किया गया एक खूनी सौदा था। और देश का दुर्भाग्य देखिए की 2004 के चुनाव में अटल जी की सरकार हार गई।

सोनिया गांधी के रिमोट कंट्रोल से चलने वाली मनमोहन सिंह की यूपीए (UPA) सरकार सत्ता की मलाई खाने के लिए गद्दी पर बैठ गई। और गद्दी पर बैठते ही इस सरकार ने अपना वो जिहादी वादा पूरा किया।

सितंबर 2004 का वो महीना इस देश के इतिहास का सबसे काला महीना है। जिहादियों को खुश करने के लिए, उन्हें पालने-पोसने के लिए कांग्रेस सरकार ने इस कड़क ‘POTA’ कानून को संसद से रद्द (Repeal) कर दिया!

जो ब्रह्मास्त्र इस देश की ढाल था, उसे सिर्फ इसलिए तोड़ दिया गया ताकि कांग्रेस का वोटबैंक खुश रहे। ये भारत की सुरक्षा का वो खौफनाक ‘मज़हबी सौदा’ था जिसकी कीमत इस देश के आम हिंदुओं को अपने खून से चुकानी पड़ी।

POTA हटते ही पूरे देश में हुआ जिहादियों का नंगा नाच, मुंबई से लेकर दिल्ली तक बिछ गईं बेगुनाह हिन्दुओं की लाशें

जैसे ही कांग्रेस ने पोटा को डस्टबिन में डाला, इस देश के स्लीपर सेल्स और बॉर्डर पार बैठे जिहादियों के आकाओं को एक खुला मैसेज मिल गया।

उन्हें समझ आ गया की अब दिल्ली के तख्त पर वो डरपोक और आतंकवादी प्रेमी सरकार बैठी है, जो उन्हें पकड़ने के बजाय उन्हें बिरयानी खिलाएगी और कोर्ट में उन्हें ‘मानवाधिकार’ के नाम पर बचा लेगी। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के हाथ बांध दिए गए।

और फिर शुरू हुआ 2004 से लेकर 2014 तक का वो खूनी और भयानक दशक, जिसकी यादें आज भी हमारी रूह कंपा देती हैं। पोटा हटने के तुरंत बाद जिहादियों ने जो नंगा नाच पूरे देश में किया, वो आज के युवाओं को जानना बहुत ज़रूरी है।

अक्टूबर 2005 का वो दिन याद है? दीवाली का समय था। दिल्ली का सरोजिनी नगर और पहाड़गंज मार्केट आम हिंदुओं, महिलाओं और छोटे-छोटे बच्चों से भरा हुआ था।

लोग दीवाली की खरीदारी कर रहे थे। तभी लश्कर के जिहादियों ने भीड़ के बीच तीन भयंकर सीरियल ब्लास्ट किए। पलक झपकते ही 60 से ज़्यादा बेगुनाह लोगों के चीथड़े उड़ गए! दीवाली की वो खुशी मातम और खून में बदल गई।

फिर आया जुलाई 2006 का वो मनहूस दिन। मुंबई की लाइफलाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेनों में शाम के वक्त खचाखच भीड़ थी। आम मिडिल क्लास आदमी अपने काम से घर लौट रहा था।

तभी 11 मिनट के अंदर 7 अलग-अलग ट्रेनों में आरडीएक्स (RDX) के भयंकर धमाके हुए। 200 से ज़्यादा आम नागरिक उसी ट्रेन के डब्बों में कट कर मर गए, 700 से ज़्यादा लोग ज़िंदगी भर के लिए अपाहिज हो गए। ट्रेनों के दरवाज़ों से खून ऐसे टपक रहा था जैसे कोई कसाईखाना हो।

और 2008 का वो सीरियल ब्लास्ट कौन भूल सकता है? अहमदाबाद, जयपुर, बेंगलुरु और दिल्ली। हर जगह साइकिलों पर, डस्टबिन में बम रखे गए।

‘इंडियन मुजाहिदीन’ नाम के खूंखार जिहादी संगठन ने खुलेआम पुलिस और सरकार को ईमेल भेजकर चुनौती दी थी की “हम हिंदुओं को मार रहे हैं, रोक सको तो रोक लो।”

जयपुर के हनुमान मंदिर के बाहर धमाका हुआ, अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में धमाका हुआ जहाँ खून देने आए लोग मारे गए। सैकड़ों बेगुनाह हिंदू मारे गए।

और ये सारे धमाके सिर्फ और सिर्फ इसलिए हुए क्योंकि कांग्रेस ने अपना मज़हबी वोटबैंक बचाने के लिए देश की सुरक्षा से खिलवाड़ किया था।

अगर पोटा कानून ज़िंदा होता, अगर पुलिस को उन स्लीपर सेल्स की ज़मीनें ज़ब्त करने का अधिकार होता, तो इन आतंकियों की हिम्मत नहीं होती की वो हमारे शहरों में खुलेआम बम फोड़ सकें।

कांग्रेस ने हमारे देश के बेगुनाहों का खून बहाकर अपने वोटबैंक की खेती की। पोटा को हटाना कोई पॉलिसी का फैसला नहीं था, वो सीधे-सीधे इस देश के नागरिक की छाती पर बंदूक रखकर किया गया एक राजनीतिक कत्ल था!

‘स्लीपर सेल्स’ की मदद से किया गया 26/11 का आतंकी हमला और आतंकवादियों की लाश पर रोने वाली कांग्रेस का वो घिनौना राज

अगर आपको लग रहा है की ट्रेनों और बाज़ारों में हुए वो सीरियल ब्लास्ट ही कांग्रेस की इस मज़हबी गद्दारी का चरम थे, तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं।

जिहादियों के हौसले इतने बुलंद हो चुके थे की उन्हें पता था की इस देश का सिस्टम अब पूरी तरह से नकारा और बिकाऊ हो चुका है।

और इसी का नतीजा था भारत के इतिहास का वो सबसे खौफनाक और दिल दहला देने वाला दिन, जिसे याद करके आज भी मुंबई की सड़कों पर सन्नाटा छा जाता है।

तारीख थी 26 नवंबर 2008। पाकिस्तान के लश्कर-ए-तैयबा के 10 खूंखार जिहादी समुद्र के रास्ते मायानगरी मुंबई में घुस आते हैं।

उन जिहादियों ने मुंबई के 160 से ज़्यादा बेगुनाह लोगों को मार दिया, जिनमें छोटे-छोटे बच्चे, महिलाएं और हमारे जांबाज पुलिस अफसर शामिल थे।

अब ज़रा एक बहुत ही सीधा और कड़वा सवाल अपने दिमाग से पूछिए। क्या पाकिस्तान से आए वो 10 अनपढ़ जिहादी, जो पहली बार मुंबई आए थे, बिना किसी लोकल सपोर्ट के इतनी बड़ी तबाही मचा सकते थे?

उन्हें मुंबई की एक-एक गली का चप्पा-चप्पा कैसे पता था? उन्हें कैसे पता था की ताज होटल के किस कमरे में कौन रुका है?

अरे भाई, ये सब बिना इस देश में बैठे उन गद्दार ‘स्लीपर सेल्स’ की मदद के बिल्कुल नामुमकिन था! और इन स्लीपर सेल्स की इतनी हिम्मत कैसे हुई?

क्योंकि कांग्रेस ने पोटा (POTA) कानून हटाकर इन गद्दारों के अंदर से पुलिस और कानून का सारा खौफ हमेशा के लिए खत्म कर दिया था।

अगर पोटा कानून ज़िंदा होता, तो इन स्लीपर सेल्स को पता होता की जिहादियों को एक रात पनाह देने के जुर्म में उनके घर और संपत्तियां ज़ब्त कर ली जाएंगी और वो ज़िंदगी भर जेल की चक्की पीसेंगे। लेकिन कांग्रेस ने तो उन्हें बचा लिया था।

और इस पूरे 26/11 हमले के बाद कांग्रेस ने जो नीचता दिखाई, उसने तो गद्दारी की सारी हदें पार कर दीं।

जब पूरी दुनिया को पता था की हमला पाकिस्तान के जिहादियों ने किया है, तब कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता (जैसे दिग्विजय सिंह) इस पूरे हमले को ‘हिन्दू आतंकवाद’ (RSS Ki Saazish) का नाम देने की खौफनाक साज़िश रच रहे थे!

बाकायदा एक किताब लॉन्च की गई ताकि असली जिहादियों को बचाया जा सके और इस हमले का ठीकरा सनातनियों के सिर फोड़ा जा सके।

सोचिए, हमारे देश के लोग मारे जा रहे थे, हमारे पुलिस वाले शहीद हो रहे थे, और सत्ता में बैठे ये दरबारी नेता जिहादियों को बचाने के लिए हिंदुओं को ही फंसाने का ब्लूप्रिंट तैयार कर रहे थे।

कसाब जैसे खूंखार आतंकी को फांसी देने के बजाय सालों तक हमारे ही टैक्स के पैसों से बिरयानी खिलाकर पाला गया। क्या इस गद्दारी की कोई माफी हो सकती है?

बाटला हाउस पर छलकते आंसू और हिन्दू खून पर सन्नाटा, कांग्रेस की इस जिहादी तुष्टिकरण वाली राजनीति का नंगा सच

अगर आपको कांग्रेस के उस ‘मज़हबी सौदे’ और जिहादी तुष्टिकरण का सबसे घिनौना और नंगा सच देखना है, तो 26/11 से ठीक दो महीने पहले हुए उस ‘बाटला हाउस एनकाउंटर’ (Batla House Encounter) के पन्ने पलट कर देख लीजिए।

सितंबर 2008 का महीना था। दिल्ली में हुए खौफनाक सीरियल ब्लास्ट के बाद, दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को खबर मिली की धमाके करने वाले ‘इंडियन मुजाहिदीन’ के जिहादी जामिया नगर के बाटला हाउस इलाके में छुपे हुए हैं।

देश के सबसे जांबाज और वीर पुलिस इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा अपनी टीम के साथ वहां पहुंचते हैं। जिहादियों के साथ भयंकर मुठभेड़ होती है।

उस एनकाउंटर में मोहन चंद शर्मा अपनी जान पर खेलकर उन खूंखार जिहादियों को मार गिराते हैं और खुद इस देश के लिए शहीद हो जाते हैं। एक सच्चा हिंदुस्तानी क्या करेगा?

वो अपने उस शहीद पुलिस अफसर के चरणों में शीश झुकाएगा जिसने बम फोड़ने वाले आतंकियों को जहन्नुम पहुंचा दिया।

लेकिन कांग्रेस पार्टी ने क्या किया? एनकाउंटर के तुरंत बाद कांग्रेस के नेता ये चिल्लाने लगे की “एनकाउंटर फर्जी है, पुलिस ने बेगुनाह मुस्लिम लड़कों को मार दिया है।”

इस पूरी नौटंकी और जिहादी प्रेम का सबसे खौफनाक सच तो खुद कांग्रेस के बड़े नेता सलमान खुर्शीद ने एक चुनाव रैली में उगला था।

उन्होंने खुलेआम मंच से कहा था की “जब बाटला हाउस एनकाउंटर में मारे गए उन लड़कों की तस्वीरें सोनिया गांधी जी को दिखाई गईं, तो वो तस्वीरें देखकर वो फूट-फूट कर रोई थीं।”

ज़रा इस बात की गंभीरता को समझिए। इस देश की सत्ता चलाने वाली पार्टी की सुप्रीमो, जिहादी आतंकवादियों की लाशें देखकर फूट-फूट कर रो रही थी! अरे, ये आंसू किस लिए थे?

क्या ये उन जिहादियों के लिए थे जिन्होंने दिल्ली में बम फोड़े थे? या ये उस खिसकते हुए मुस्लिम वोटबैंक के लिए थे जो एनकाउंटर के बाद कांग्रेस से नाराज़ हो रहा था?

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