मुस्लिम जज ने 14 गौ रक्षकों को थमाई खौफनाक 'उम्रकैद', और रिंकू शर्मा से लेकर चंदन गुप्ता के जिहादी हत्यारे आज भी घूम रहे 'आजाद', देश की न्याय व्यवस्था पर ये कैसा शांतिदूतों का 'कब्जा'

मुस्लिम जज ने 14 गौ रक्षकों को थमाई खौफनाक ‘उम्रकैद’, और रिंकू शर्मा से लेकर चंदन गुप्ता के जिहादी हत्यारे आज भी घूम रहे ‘आजाद’, देश की न्याय व्यवस्था पर ये कैसा शांतिदूतों का ‘कब्जा’

आज 2026 के इस खौफनाक दौर में हम किस मुहाने पर खड़े हैं? आज हमारी अदालतों में सबूत नहीं बोल रहे हैं, आज वहां काले कोट के पीछे छिपा हुआ ‘मज़हब’ और वो सड़ा हुआ सेक्युलर इकोसिस्टम बोल रहा है जो चुन-चुन कर हिंदुओं को खत्म करने की सुपारी ले चुका है।

ज़रा इस देश के न्याय के दोगलेपन को देखिए। इस देश में अगर कोई हिंदू अपनी जान पर खेलकर, आधी रात को तस्करों से हमारी गौ माता को कटने से बचाता है, तो उसे उम्र भर के लिए जेल की काली और सीलन भरी कोठरी में सड़ाने का फरमान सुना दिया जाता है।

उसे एक खूंखार आतंकवादी की तरह पेश किया जाता है। लेकिन दूसरी तरफ? दूसरी तरफ वो जिहादी हैं जो दिनदहाड़े, कैमरे के सामने हमारे हिंदू भाइयों का गला रेतते हैं।

उन शांतिदूतों को हमारी अदालतें क्या देती हैं? उन्हें बड़ी ही नरमी के साथ, ‘सबूतों की कमी’ या ‘जेल में बिताए समय’ का बहाना देकर ज़मानत दे दी जाती है!

ये क्या मज़ाक चल रहा है इस देश के बहुसंख्यक हिंदुओं के साथ? ये कोई साधारण अदालती फैसले नहीं हैं। ये सिस्टम के अंदर बैठ चुके उस खौफनाक ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ का नंगा सच है, जिसने अब न्यायपालिका की कुर्सी तक कब्ज़ा कर लिया है।

अगर आज हमने इस मज़हबी घुसपैठ को नहीं पहचाना, अगर आज हमने इन फैसलों पर सवाल नहीं उठाए, तो कल को हमें फांसी पर चढ़ाने के लिए इन्हें किसी हथियार की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

ये लोग बस कुर्सी पर बैठेंगे, कलम चलाएंगे और एक झटके में पूरे के पूरे हिंदू समाज को कुचल कर रख देंगे।

मध्य प्रदेश का वो खौफनाक फैसला, जब एक मुस्लिम जज ने अपनी मज़हबी नफरत से 14 हिन्दू गौ रक्षकों को सुना दी ‘उम्रकैद’ की सजा

ज़रा अभी हाल ही में आए मध्य प्रदेश के उस खौफनाक फैसले को देख लीजिए जिसने पूरे देश के गौ रक्षकों और सनातनियों को आक्रोश से भर दिया है। घटना अगस्त 2022 की है।

मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम (सिवनी मालवा) में रात के अंधेरे में कुछ गौ रक्षकों ने एक ट्रक को रोका था। उस ट्रक में बड़ी बेरहमी से हमारी गौ माताओं को ठूंस-ठूंस कर कटने के लिए ले जाया जा रहा था।

जब गौ रक्षकों ने उन तस्करों को रोका, तो ज़ाहिर सी बात है की अंधेरे में दोनों तरफ से झड़प हुई। उसी हाथापाई में नजीर अहमद नाम के एक शख्स की मौत हो गई।

अरे भाई, ये कोई सोची-समझी साज़िश या ‘प्लान्ड मर्डर’ थोड़ी था! वो गौ रक्षक कोई पेशेवर कातिल नहीं थे जो हथियारों से लैस होकर मारने गए थे। वो तो बस अपनी गौ माता को तस्करों के चंगुल से छुड़ा रहे थे।

लेकिन अभी 12 जून 2026 को वहां की एडिशनल सेशन जज ‘तबस्सुम खान’ ने इस केस में जो फैसला सुनाया, वो न्याय नहीं, बल्कि एक सीधा-सीधा मज़हबी बदला लगता है।

जज तबस्सुम खान ने एक ही झटके में उन 14 के 14 हिंदू गौ रक्षकों को सीधे ‘उम्रकैद’ की खौफनाक सज़ा सुना दी!

ज़रा सोचिए इस क्रूरता को! 14 नौजवान, 14 परिवार, एक ही झटके में हमेशा-हमेशा के लिए बर्बाद कर दिए गए।

आज पूरा देश और हर एक सनातनी डंके की चोट पर ये सवाल पूछ रहा है की क्या एक मुस्लिम जज ने सिर्फ गौ तस्करों से अपनी मज़हबी हमदर्दी और हिंदुओं से अपनी नफरत के चलते इतनी कठोर सज़ा दी है? इसे सिर्फ सज़ा नहीं, इसे ‘ज्यूडिशियल लिंचिंग’ कहा जा रहा है।

अगर उन गौ रक्षकों की जगह गोकशी करने वाले तस्कर होते और किसी हिंदू की जान गई होती, तो क्या तब भी यही जज उम्रकैद की सज़ा सुनातीं? बिल्कुल नहीं! तब ये मानवाधिकार का रोना रोकर उन्हें ज़मानत दिलवा देते।

अभी तो सिस्टम में इन मुसलमानों की आबादी मुट्ठी भर है, तब ये कुर्सी पर बैठकर ऐसा तांडव कर रहे हैं।

ज़रा सोचिए, जब ये सेक्युलर इकोसिस्टम के सहारे ऊपर की अदालतों में भर जाएंगे, तो ये हिंदुओं का क्या हश्र करेंगे? ये तो हमें अपने ही देश में सांस तक नहीं लेने देंगे!

चंदन गुप्ता और रिंकू शर्मा का सरेआम कत्ल, तिरंगा उठाने और राम का नाम लेने वाले हिन्दुओं के जिहादी कातिल ‘ज़मानत’ पर बाहर

अब ज़रा पलट कर तस्वीर का दूसरा हिस्सा देखिए। जब कोई सनातनी मारा जाता है, जब किसी हिंदू बेटे का खून सड़क पर बहता है, तो इस देश के कानून की आंखों में मोतियाबिंद कैसे हो जाता है?

2018 का कासगंज का वो खौफनाक चंदन गुप्ता कांड किसे याद नहीं है! 22 साल का एक होनहार नौजवान सिर्फ तिरंगा हाथ में लेकर और ‘वंदे मातरम’ बोलते हुए तिरंगा यात्रा निकाल रहा था।

वो कोई दंगा नहीं कर रहा था, वो किसी के घर में नहीं घुसा था। लेकिन सलीम और उसके जिहादी साथियों ने छत से उस 22 साल के हिंदू बेटे की छाती में सरेआम गोली उतार दी। चंदन की जान चली गई।

और आज उस केस का क्या हाल है? इस खौफनाक मर्डर के मुख्य आरोपी सलीम और उसके गुर्गों को कुछ ही महीनों बाद हाई कोर्ट से एकदम मजे में ज़मानत मिल गई।

चंदन का परिवार आज भी कोर्ट के चक्कर काट रहा है, वकीलों की फीस भर रहा है, पर किसी जज ने सलीम को पकड़कर तुरंत ‘उम्रकैद’ नहीं सुनाई।

और फरवरी 2021 का मंगोलपुरी (दिल्ली) का वो रिंकू शर्मा का कत्ल! 25 साल का रिंकू शर्मा जो राम मंदिर के लिए चंदा इकट्ठा करता था, जो जय श्री राम का नारा लगाता था।

उस बेचारे नौजवान की उसके ही घर में घुसकर, उसकी मां के सामने चाकुओं से गोद-गोद कर निर्मम हत्या कर दी गई। मारने वाले ताजुद्दीन, ज़ाहिद और महताब कोई अजनबी नहीं थे।

ये वही एहसान फरामोश थे जिनके घर वालों को रिंकू ने अपना खून देकर अस्पताल में बचाया था।

जब रिंकू को मारा गया, तो पूरा देश रोया था। लेकिन क्या उन कातिलों को तुरंत फांसी के फंदे पर लटकाया गया? नहीं!

पुलिस और कोर्ट की वही ढीली-ढाली और थकाऊ प्रक्रिया शुरू हो गई। कोई फास्ट ट्रैक कोर्ट नहीं बैठा। हत्यारों को आराम से बेल मिलने लगी।

हत्यारों के परिवार वाले आराम से रह रहे हैं, लिबरल इकोसिस्टम उन्हें कानूनी मदद दे रहा है, और रिंकू का परिवार आज भी खून के आंसू रोने पर मजबूर है।

क्या हिंदू की जान इतनी सस्ती है की उसका कातिल आराम से जेल में रोटियां तोड़े और फिर एक दिन चुपचाप ज़मानत लेकर बाहर आ जाए?

कन्हैया लाल से लेकर कमलेश तिवारी तक, गर्दनें काटने वाले कातिलों और साज़िशकर्ताओं को अदालतों ने कैसे दे दी ज़मानत

अगर आपको लग रहा है की ये सिर्फ निचली अदालतों का खेल है, तो ज़रा देश की सबसे बड़ी अदालतों का वो डरावना चेहरा भी देख लीजिए जिसने सनातनियों की आत्मा को छलनी कर दिया है।

राजस्थान के उदयपुर का कन्हैया लाल हत्याकांड! 2022 में जिस तरह से रियाज़ और गौस मोहम्मद ने दिनदहाड़े एक निहत्थे हिंदू टेलर की दुकान में घुसकर उसका गला रेता और उसका वीडियो बनाकर पूरे देश को डराया.. वो सीधा-सीधा भारत के खिलाफ एक आतंकी हमला था।

उस पूरे कत्ल की रेकी करने वाला, उस कन्हैया लाल की लोकेशन उन कातिलों तक पहुंचाने वाला और उनकी मदद करने वाला जो मुख्य साज़िशकर्ता था- मोहम्मद जावेद!

उसे राजस्थान हाई कोर्ट ने बड़ी ही आसानी से ज़मानत (Bail) दे दी! और तो और, जब कन्हैया लाल का परिवार और एनआईए (NIA) सुप्रीम कोर्ट गए, तो सितंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने भी उस ज़मानत को रद्द करने से साफ मना कर दिया!

अरे भाई, जिस आदमी के हाथ एक बेगुनाह हिंदू के खून से रंगे हों, जिसने कातिलों की पूरी मदद की हो, उसे कोर्ट खुला कैसे छोड़ सकता है? वो मोहम्मद जावेद आज सड़कों पर आज़ाद घूम रहा है। ये कन्हैया लाल के परिवार के मुंह पर इस न्याय व्यवस्था का सीधा तमाचा है।

और 2019 का लखनऊ का कमलेश तिवारी हत्याकांड! हिंदू समाज पार्टी के उस शेर नेता की उनके ही दफ्तर में घुसकर गला रेतकर हत्या कर दी गई थी।

इस पूरे मर्डर की साज़िश रचने वाले और कातिलों को उकसाने वाले मुख्य आरोपी ‘सैयद आसिम अली’ को क्या सज़ा मिली? जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने उसे ज़मानत दे दी!

ज़रा इस खौफनाक दोगलेपन को देखिए और अपना माथा पीट लीजिए। जो हिंदू गौ माता को बचाते हुए किसी हाथापाई में अनजाने में किसी तस्कर की मौत का कारण बन जाएं, उन्हें एक मुस्लिम जज बिना किसी रहम के सीधे ‘उम्रकैद’ दे देती है।

लेकिन जो कट्टरपंथी बकायदा पूरी प्लानिंग के साथ, हथियारों से लैस होकर हिंदुओं का सरेआम गला काटते हैं, उनकी साज़िश रचते हैं, उन्हें ये देश की बड़ी-बड़ी अदालतें ‘सबूतों की कमी’ या ‘जेल में काफी समय बिताने’ का अजीब सा बहाना देकर ज़मानत बांट देती हैं!

ये इंसाफ नहीं है, ये इस देश के हिंदुओं का वो ‘सिस्टेमेटिक चीरहरण’ है जो न्याय के काले कोट के पीछे बैठकर किया जा रहा है।

कर्नाटक के हर्षा की हत्या और तमिलनाडु का यूएपीए केस, दक्षिण भारत में जिहादियों को अदालतों से खुली ‘जमानत’

अगर आपको लग रहा है की न्याय व्यवस्था का ये दोगलापन सिर्फ उत्तर भारत या दिल्ली-यूपी तक सीमित है, तो ज़रा दक्षिण भारत की तरफ नज़र घुमाइए।

वहां तो इन जिहादियों को अदालतों से जो खुला संरक्षण मिल रहा है, उसे देखकर किसी भी आम इंसान का खून खौल उठेगा।

फरवरी 2022 का वो कर्नाटक के शिमोगा (Shivamogga) का खौफनाक मंज़र याद कीजिए। हर्षा नाम का 28 साल का एक सीधा-सादा हिंदू नौजवान, जो बजरंग दल से जुड़ा था, जो गौ माता की सेवा करता था और अपनी सनातन संस्कृति के लिए जीता था।

उस नौजवान की सिर्फ इसी बात पर सरेआम हत्या कर दी गई की वो अपने धर्म के लिए आवाज़ उठाता था।

जिहादियों की एक पूरी की पूरी भीड़ ने हथियारों से लैस होकर उस हिंदू शेर को बीच सड़क पर बेरहमी से काट डाला।

लेकिन इस देश के सिस्टम का नंगा सच देखिए! उस खौफनाक कत्ल में उन जिहादियों की मदद करने वाला, उन्हें पनाह देने वाला और उनको गाड़ियां मुहैया कराने वाला जो मुख्य आरोपी था- जफर सादिक।

उस जफर सादिक को कुछ ही महीनों बाद (अक्टूबर 2022 में) कर्नाटक की अदालत से बड़ी ही आसानी से ज़मानत मिल जाती है!

और ज़रा तमिलनाडु का वो खौफनाक ‘यूएपीए’ (UAPA) केस देखिए जिसने पूरे देश के होश उड़ा दिए थे।

यूएपीए इस देश का सबसे कड़क और सबसे खौफनाक आतंकवाद-निरोधी कानून है, जिसमें ज़मानत मिलना लगभग नामुमकिन होता है।

कोयंबटूर में हिंदू मुन्नानी (Hindu Munnani) के नेताओं को जान से मारने और पूरे इलाके में दंगे भड़काने की एक बहुत भयंकर साज़िश रची गई थी।

इस साज़िश का मास्टरमाइंड था एक कट्टरपंथी- सद्दाम हुसैन। पुलिस ने उसे हथियारों और पुख्ता सुबूतों के साथ अरेस्ट किया था।

लेकिन अगस्त 2022 में मद्रास हाई कोर्ट ने जो फैसला सुनाया, वो सुनकर आप अपना माथा पीट लेंगे। कोर्ट ने सद्दाम हुसैन को यह कहकर ज़मानत दे दी की “हमें नहीं लगता की ये कोई आतंकी गतिविधि थी!”

वाह रे हमारे देश का न्याय! मतलब हिंदू नेताओं को मारने की साज़िश रचना, हथियारों के साथ पकड़े जाना, ये सब कोई आतंकी गतिविधि नहीं है? क्या ये इनके लिए कोई ‘दोस्ताना खेल’ है?

जब हमारी अदालतें ही आतंकवाद के ऐसे खूंखार मुजरिमों को ‘मासूम’ मानकर छोड़ देंगी, तो फिर ये शांतिदूत हिंदुओं का कत्ल करने से क्यों डरेंगे?

इन्हें तो पता है की चाहे ये किसी का भी गला रेत दें, कोर्ट में कोई ना कोई ‘सेक्युलर’ दलील देकर ये लोग आराम से बाहर आ ही जाएंगे।

अक्षरधाम मंदिर का वो खौफनाक हमला और सुप्रीम कोर्ट का फैसला, 30 हिन्दुओं की लाशें बिछाने वाले आतंकियों को कैसे कर दिया गया था ‘बरी’

ये जो ज़मानत और बरी करने का खेल है, ये सिर्फ छोटी-मोटी घटनाओं तक सीमित नहीं है। अगर आपको इस देश के न्याय सिस्टम का सबसे क्रूर और सबसे डरावना चेहरा देखना है, तो इतिहास के पन्नों को पलटकर 2002 के उस खौफनाक अक्षरधाम मंदिर (Akshardham Temple) हमले को याद कर लीजिए।

सितंबर 2002 की वो खूनी शाम! गुजरात के गांधीनगर में भगवान स्वामीनारायण के उस बेहद पवित्र अक्षरधाम मंदिर में जिहादी आतंकवादी घुस जाते हैं।

उन्होंने किसी से कोई सवाल नहीं पूछा, किसी को कोई चेतावनी नहीं दी। उन्होंने सीधे अपनी मशीनगनें खोलीं और भगवान के दर्शन करने आए मासूम और निहत्थे हिंदुओं पर अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दीं।

उस दिन मंदिर के पवित्र प्रांगण में खून की नदियां बह गई थीं। औरतों, बच्चों और बुजुर्गों समेत 30 मासूम हिंदुओं की लाशें वहां बिछा दी गई थीं। 80 से ज़्यादा लोग बुरी तरह घायल हुए थे।

जब एनएसजी (NSG) कमांडो आए, तो उन्होंने उन आतंकियों को ढेर किया। पुलिस और खुफिया एजेंसियों ने उस पूरे हमले की साज़िश रचने वाले, उन्हें हथियार और पैसा देने वाले 6 कट्टरपंथी जिहादियों (आदम अजमेरी, शान मियां आदि) को अरेस्ट किया।

निचली अदालत (POTA Court) और गुजरात हाई कोर्ट ने सारे सबूतों को देखा, सारी गवाहियों को परखा और डंके की चोट पर उन जिहादी साज़िशकर्ताओं को ‘फांसी’ और ‘उम्रकैद’ की सज़ा सुना दी।

लेकिन भाई साहब, 2014 में अचानक से ऐसा क्या हुआ जिसने पूरे देश की आत्मा को झकझोर कर रख दिया? मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है, और सुप्रीम कोर्ट उन सभी 6 के 6 आतंकियों को एक झटके में ‘क्लीन चिट’ (Acquit) देकर पूरी तरह से बरी कर देता है!

ज़रा सोचिए इस बात को! कोर्ट ने कहा की “पुलिस ने सबूत ठीक से जमा नहीं किए, इसलिए हम इन्हें सज़ा नहीं दे सकते।

मतलब 30 हिंदुओं की लाशें बिछ गईं, मंदिर की दीवारों पर आज भी गोलियों के निशान हैं, तो क्या उन 30 लोगों को किसी भूत ने मारा था? अगर पुलिस की गलती थी, तो पुलिस वालों को सज़ा देते, लेकिन उन कातिलों को बाइज्ज़त बरी करके खुला क्यों छोड़ दिया गया?

ये है इस देश के सिस्टम की असली और सबसे खौफनाक औकात। जहाँ 30 हिंदुओं की सरेआम हत्या करने वाले आतंकवादी आराम से कोर्ट से बरी होकर अपने घर चले जाते हैं, और जहाँ गाय माता को तस्करों से बचाने वाले 14 निहत्थे हिंदू नौजवानों को एक मुस्लिम जज सीधा ‘उम्रकैद’ की सज़ा देकर जेल की काल कोठरी में सड़ाने का फरमान सुना देती है।

क्या ऐसे सिस्टम पर अब कोई आम सनातनी कभी भरोसा कर सकता है?

इस सड़े हुए न्याय सिस्टम से आर पार की लड़ाई का वक्त

मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम में जज ‘तबस्सुम खान’ का वो फैसला इस पूरे सड़े हुए इकोसिस्टम की उस नफरत का साक्षात प्रमाण है जो इन शांतिदूतों के दिलों में हिंदुओं के लिए कूट-कूट कर भरी हुई है।

जो लोग दिन-रात संविधान और सेक्युलरिज्म का झुनझुना बजाते हैं, उन्हें आज जवाब देना होगा की क्या न्याय की कुर्सी पर बैठकर कोई इंसान अपने ‘मज़हब’ और अपने ‘हिंदुओ से नफरत’ के आधार पर किसी की ज़िंदगी तबाह कर सकता है?

अगर एक जज अपने मज़हब को देखकर, सिर्फ गौ तस्करों से हमदर्दी जताते हुए 14 हिंदू बेटों को उम्रकैद दे सकती है, तो फिर हिंदुओं को भी अपने धर्म और अपने भाइयों की रक्षा के लिए सीधा मोर्चा खोलना ही पड़ेगा।

हम इस देश की न्यायपालिका से, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से ये मांग करते हैं की नर्मदापुरम के उस खौफनाक फैसले को तुरंत प्रभाव से रद्द किया जाए। उन 14 गौ रक्षकों को बाइज्ज़त बरी करके उनके घर भेजा जाए।

और सबसे बड़ी मांग ये है की उस जज के पूरे ट्रैक रिकॉर्ड की और उनके पुराने सभी फैसलों की एक उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए! हमें ये जानना है की कुर्सी पर बैठकर कहीं जानबूझकर हिंदुओं को कुचलने का कोई एजेंडा तो नहीं चलाया जा रहा है।

इसके साथ ही, हम सरकार से ये भी मांग करते हैं की रिंकू शर्मा, चंदन गुप्ता, कमलेश तिवारी और हर्षा के जो हत्यारे आज ज़मानत पर खुलेआम घूम रहे हैं, उनकी ज़मानत को रातों-रात कैंसल किया जाए।

ये कोई राजनीतिक लड़ाई नहीं है। ये ‘कुर्सी के जिहाद’ को उखाड़ फेंकने का सबसे बड़ा धर्मयुद्ध है।

जय श्री राम!

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