इतिहास के पन्ने पलट कर देखिए, सोलहवीं सदी का वो दौर पूरे भारत के लिए किसी खौफनाक बुरे सपने से कम नहीं था।
दिल्ली से लेकर बंगाल तक उन जिहादी सुल्तानों और अफगान लुटेरों का कोहराम मचा हुआ था। उनका एक ही मकसद था- हिंदुओं की गर्दनों को अपनी तलवारों से काटना।
बंगाल में बैठे ये खून के प्यासे अफगान सुल्तान अब अपनी नज़रें पूर्वोत्तर भारत (असम) के उन शांत और पवित्र हिंदू राज्यों पर गड़ाए बैठे थे।
उन्हें लगता था की पूरे उत्तर भारत को तो हमने कुचल दिया है, अब पूर्वोत्तर के इन छोटे-छोटे राज्यों को रौंदकर वहां भी अपना जिहादी परचम फहरा देंगे।
लेकिन इन घमंडी सुल्तानों को इस बात का रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था की असम की वो पावन माटी कोई बंजर ज़मीन नहीं है जहाँ आकर ये अपनी मज़हबी फसल उगा लेंगे।
उसी असम की धरती पर महान ‘कोच राजवंश’ के संस्थापक विश्व सिंह के घर एक ऐसा बच्चा पैदा हो चुका था, जिसके खून में सुल्तानों और जिहादियों का काल लिखा था। उस बच्चे का असली नाम था ‘शुक्लध्वज’।
जैसे-जैसे शुक्लध्वज जवान हुए, उनकी तलवारबाज़ी और युद्ध की फुर्ती देखकर बड़े-बड़े योद्धाओं के पसीने छूटने लगे थे।
युद्ध के मैदान में ये नौजवान हिंदू शेर दुश्मनों पर इतनी खौफनाक और भयानक स्पीड से झपटता था की दुश्मन को अपनी तलवार निकालने तक का मौका नहीं मिलता था।
आसमान से झपटने वाली ‘चील’ की तरह वार करने की इसी खूंखार फुर्ती के कारण उनका नाम पूरे पूर्वोत्तर में ‘चिलाराय’ (Chilarai) पड़ गया।
चिलाराय अपने बड़े भाई राजा नरनारायण के सेनापति बने। चिलाराय ने अपनी वो खूनी तलवार म्यान से बाहर निकाल ली थी जिसे अब सिर्फ और सिर्फ जिहादियों के खून से ही प्यास बुझानी थी।
जिहादी ‘कालापहाड़’ ने किया था मां कामाख्या मंदिर को खंडहर, चिलाराय ने शुद्ध घी की ईंटों से दोबारा खड़ा किया सनातन का अजेय शक्तिपीठ
बंगाल में उस वक्त सुलेमान कर्रानी नाम का एक बेहद क्रूर सुल्तान राज कर रहा था। उस सुल्तान ने असम और वहां के मंदिरों को तबाह करने के लिए अपने सबसे खूंखार जिहादी कमांडर ‘कालापहाड़’ को भेजा।
कालापहाड़ वो दरिंदा था जिसका एक ही काम था- हिंदू मंदिरों को ढूंढ-ढूंढ कर तोड़ना और वहां के पुजारियों का कत्लेआम करना।
इस कालापहाड़ ने असम पर एक अचानक और बहुत ही भारी हमला किया। उसकी जिहादी भीड़ ने सीधे तौर पर 51 शक्तिपीठों में से सबसे पवित्र ‘मां कामाख्या मंदिर’ पर धावा बोल दिया। उन दरिंदों ने हमारे पूरे मंदिर को मलबे में तब्दील कर दिया।
जब मां कामाख्या के मंदिर के टूटने की खबर सेनापति चिलाराय के कानों तक पहुंची, तो उस हिंदू शेर का गुस्सा ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा।
चिलाराय ने अपनी सेना के साथ उस कालापहाड़ और उसकी जिहादी फौज पर ऐसा भयानक पलटवार किया की उन लुटेरों को छुपने के लिए ज़मीन कम पड़ गई।
चिलाराय की तलवार उस दिन प्यासी चील की तरह उन जिहादियों की गर्दनों पर झपट रही थी।
जिहादियों को खदेड़ने के बाद चिलाराय अपने भाई राजा नरनारायण के साथ मां कामाख्या के उस टूटे हुए खंडहर के सामने खड़े हुए।
उनकी आंखों में आंसू थे और सीने में सनातन की आग! दोनों भाइयों ने ऐलान किया की ये मंदिर अब दोबारा बनेगा और ऐसा बनेगा की दुनिया का कोई जिहादी उसे दोबारा छूने की हिम्मत नहीं कर पाएगा।
साल 1565 में चिलाराय और राजा नरनारायण ने अपने खज़ाने के मुंह खोल दिए। इस मंदिर को दोबारा बनाने के लिए जो ईंटें पकाई गईं, उन्हें पकाने के लिए पानी का इस्तेमाल नहीं हुआ था।
उन ईंटों को पकाने के लिए लाखों लीटर ‘शुद्ध घी’ का इस्तेमाल किया गया था! जी हां, शुद्ध घी!
ताकि मां कामाख्या का वो शक्तिपीठ पूरी तरह से पवित्र हो सके और उन जिहादियों के नापाक पैरों के निशान हमेशा-हमेशा के लिए धुल जाएं।
जब वो भव्य कामाख्या मंदिर दोबारा बनकर खड़ा हुआ, तो वो चिलाराय की तलवार और सनातन धर्म की उस अजेय विजय का साक्षात प्रतीक था जिसने इस्लाम की उस जेहादी आंधी के मुंह पर करारा तमाचा मारा था।
जिहादी सुल्तानों को काटने के लिए चिलाराय ने खड़ी की ‘कोच राजवंश’ की विशाल हिन्दू फौज और पूरे पूर्वोत्तर में गाड़ दिया सनातन का भगवा
चिलाराय बहुत अच्छे से जानते थे की अगर इन बंगाल और दिल्ली के सुल्तानों को पूर्वोत्तर में घुसने से रोकना है, तो पूरा हिंदू समाज अलग-अलग बंटा नहीं रह सकता।
उन्हें पता था की जब तक ये सारी छोटी-छोटी रियासतें एक झंडे के नीचे नहीं आएंगी, तब तक ये जिहादी बार-बार हमला करते रहेंगे।
इसी रणनीति के तहत इस खूंखार सेनापति ने अपने राज्य के विस्तार का वो अभियान शुरू किया, जिसकी गूंज से पूरे इलाके की ज़मीन कांपती थी।
1563 में चिलाराय ने अपनी बिजली जैसी फुर्ती वाली सेना के साथ अहोम साम्राज्य की राजधानी ‘गढ़गांव’ पर ऐसा भयानक हमला किया की वहां की सत्ता को घुटने टेकने पड़े।
इसके बाद चिलाराय रुके नहीं। उनकी तलवार कछारी, दिमासा, मणिपुर, जयंतिया, त्रिपुरा और सिलहट तक गई।
एक-एक करके उन्होंने सभी शासकों को कोच राजवंश के अधीन कर लिया और पूरे पूर्वोत्तर भारत में एक विशाल, मजबूत और अखंड हिंदू साम्राज्य खड़ा कर दिया।
अब बंगाल के सुल्तानों के सामने छोटी-छोटी रियासतें नहीं, बल्कि चिलाराय की वो खूंखार और एकजुट हिंदू फौज खड़ी थी जिसके नाम से ही सुल्तानों को पसीने आने लगते थे।
लेकिन चिलाराय सिर्फ एक लड़ैया या सिर्फ खून बहाने वाले योद्धा नहीं थे। वो सनातन धर्म के सबसे बड़े और सच्चे रक्षक थे।
उस वक्त असम में महान वैष्णव संत श्रीमंत शंकरदेव जी सनातन की अलख जगा रहे थे। कुछ विरोधियों और दुश्मनों ने शंकरदेव जी की जान के पीछे हाथ धोकर पड़ना शुरू कर दिया था।
जब चिलाराय को इसका पता चला, तो वो खुद शंकरदेव जी के सबसे बड़े ढाल बनकर खड़े हो गए। चिलाराय ने उन्हें अपने राज्य में ससम्मान पनाह दी, उनके लिए मठ बनवाए और उन्हें पूरी सुरक्षा दी।
चिलाराय ने बंगाल के जिहादी सुल्तानों के घर में घुसकर किया खौफनाक कत्लेआम और घोराघाट पर लहरा दिया अपना भगवा परचम
अब बात सिर्फ अपनी ज़मीन बचाने की नहीं रह गई थी। चिलाराय का उसूल बहुत साफ था- “अगर दुश्मन तुम्हारे घर पर पत्थर फेंके, तो उसके घर में घुसकर आग लगा दो!”
चिलाराय ने ऐलान कर दिया की अब ये युद्ध असम में नहीं, बल्कि जिहादियों के गढ़ यानी बंगाल में लड़ा जाएगा।
चिलाराय ने अपनी खूंखार हिंदू फौज के साथ सीधे बंगाल के सुल्तान सुलेमान कर्रानी के खिलाफ युद्ध का बिगुल फूंक दिया।
वो सुल्तानों के घर में घुस गए और वहां जो कत्लेआम मचना शुरू हुआ, उसने अफगान सेना की जड़ें हिला दीं।
लेकिन युद्ध हमेशा सीधी चाल से नहीं लड़े जाते। 1568 के एक युद्ध के दौरान इन जिहादियों ने अपनी पुरानी और गंदी फितरत दिखाई। उन्होंने धोखे से, पीठ पीछे वार करके चिलाराय को बंदी बना लिया।
सुल्तान को लगा की उसने पूर्वोत्तर के इस सबसे बड़े हिंदू शेर को पिंजरे में कैद कर लिया है और अब वो आसानी से असम पर कब्ज़ा कर लेगा।
लेकिन वो मूर्ख भूल गया था की शेर को पिंजरे में रखना मौत को दावत देना है। चिलाराय सुल्तान की कैद से उसी चालाकी और फुर्ती से आज़ाद होकर वापस अपनी ज़मीन पर लौट आए।
लौटते ही उस शेर ने अपनी बची हुई फौज को दोबारा खड़ा किया। अब उनके दिल में पहले से भी ज़्यादा खौफनाक आग धधक रही थी।
1576-77 का वो दौर आया जब चिलाराय ने एक ज़बरदस्त कूटनीतिक चाल चली।
मुगलों के साथ रणनीति बनाकर उन्होंने बंगाल के अफगान सुल्तानों पर वो खौफनाक और निर्णायक पलटवार किया जो इतिहास के पन्नों में अमर हो गया।
चिलाराय की सेना ने सीधे घोराघाट (Ghoraghat) और गौड़ पर वो भयंकर धावा बोला की बंगाल की जिहादी सेना के चिथड़े उड़ गए।
घोराघाट के उस किले पर चिलाराय ने अपना भगवा परचम लहरा दिया। उन्होंने जिहादी सुल्तानों की सत्ता को उनके ही घर में घुसकर हमेशा के लिए दफन कर दिया।
किसी जिहादी तलवार में नहीं थी इस हिन्दू शेर को काटने की औकात, गंगा के तट पर ली अंतिम सांस और छोड़ गए अजेय इतिहास
इस दुनिया में, बंगाल से लेकर दिल्ली तक, किसी भी खूंखार से खूंखार जिहादी की तलवार में इतनी औकात नहीं थी की वो युद्ध के मैदान में आमने-सामने खड़े होकर इस हिंदू शेर का बाल भी बांका कर सके। चिलाराय जीवन भर अजेय रहे।
लेकिन होनी को कुछ और ही मंज़ूर था। जब चिलाराय बंगाल में अपने फतह के झंडे गाड़ रहे थे, तभी वो चेचक (Smallpox) जैसी भयानक बीमारी की चपेट में आ गए।
और उसी बंगाल की ज़मीन पर, पवित्र गंगा नदी के तट पर, इस महान और खूंखार हिंदू सेनापति ने अपनी अंतिम सांस ली। वो लड़ते-लड़ते मरे, लेकिन कभी किसी विदेशी लुटेरे या सुल्तान के सामने अपने घुटने नहीं टेके।
आज असम सरकार और वहां का हिंदू समाज उनकी याद में ‘बीर चिलाराय दिवस’ (Bir Chilarai Divas) बहुत ही गर्व और शान के साथ मनाता है। वहां के सबसे बहादुर सिपाहियों को आज भी ‘चिलाराय अवार्ड’ से सम्मानित किया जाता है।
