दोस्तों आज हम जिस भारत को देख रहे हैं ना, वो असल में बहुत विशाल, बहुत ताकतवर और रणनीतिक रूप से पूरी तरह से अभेद्य हो सकता था।
लेकिन इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये रहा की आज़ादी के तुरंत बाद सत्ता की चाबी एक ऐसे इंसान के हाथ में चली गई, जिसे भारत की ज़मीनी हकीकत और सुरक्षा से ज़्यादा अपनी ‘इंटरनेशनल इमेज’ की पड़ी थी।
नेहरू को दुनिया की नज़रों में एक महान ‘ग्लोबल पीसकीपर’ (शांति का फरिस्ता) बनना था। और अपनी इसी झूठी शान और अहंकार के चक्कर में उन्होंने भारत माता की उन बेशकीमती ज़मीनों, द्वीपों और सामरिक ठिकानों को मुफ्त में विदेशियों को बांट दिया, जिनकी कीमत आज भारत अपने जवानों के खून से चुका रहा है।
ये कोई छोटी-मोटी भूल-चूक नहीं थी.. ये वो ऐतिहासिक ब्लंडर्स थे जिन्होंने आज चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मनों को हमारे सर पे लाकर बिठा दिया है।
अगर आज हम चारों तरफ से एक ज़हरीली घेराबंदी का शिकार हैं, अगर आज हमारे बॉर्डर पर रोज़ गोलियां चल रही हैं, तो उसकी इकलौती वजह कांग्रेस की वो गद्दार नीतियां हैं जिन्होंने थाली में सजाकर भारत के टुकड़े विदेशियों के सामने परोस दिए। आज उस नकाब को नोचकर फेंकने का दिन है!
कश्मीर में जीती हुई बाज़ी हारने का ऐतिहासिक पाप, जब सेना को रोककर नेहरू ने पाकिस्तान की थाली में परोस दिया POK
चलिए इस खौफनाक इतिहास की शुरुआत करते हैं उस ज़ख्म से जो आज 75 सालों बाद भी भारत के सीने में रिस रहा है। बात 1947-48 की है।
आज़ादी मिले कुछ ही महीने हुए थे और पाकिस्तान ने अपनी फितरत के मुताबिक कश्मीर को हड़पने के लिए खूंखार कबायली जिहादियों की एक पूरी की पूरी फौज भेज दी। उन जिहादियों ने कश्मीर में घुसकर जो कत्लेआम मचाया, वो इतिहास का सबसे काला पन्ना है।
लेकिन जब कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी और कश्मीर का भारत में विलय (Accession) हो गया, तो हमारी भारतीय सेना के उन वीर जवानों ने जो खौफनाक पलटवार किया, उसने पाकिस्तानी जिहादियों को नेस्तनाबूद कर दिया था।
भारतीय सेना उन्हें खदेड़ते हुए मुज़फ्फराबाद और गिलगित-बाल्टिस्तान तक पहुंचने ही वाली थी। पूरे कश्मीर पर भारत का परचम लहराने में बस कुछ ही दिनों का वक्त बाकी था। पाकिस्तान घुटनों पर आ चुका था और उसके जिहादी अपनी जान बचाकर भाग रहे थे।
लेकिन ठीक उसी वक्त, नेहरू ने अचानक से रेडियो पर ‘सीज़फायर’ (Ceasefire) का ऐलान कर दिया! सेना के जनरलों ने माथा पीट लिया की “ये आप क्या कर रहे हैं? हमें बस कुछ दिन और दीजिए, हम पूरा कश्मीर खाली करा लेंगे।” लेकिन नेहरू को तो दुनिया के सामने शांति का मसीहा बनना था।
और हद तो तब हो गई जब नेहरू ने अपने ही देश के एक अंदरूनी मामले को उठाकर संयुक्त राष्ट्र (UN) में डाल दिया।
अरे भाई! जब कश्मीर आधिकारिक रूप से भारत का हिस्सा बन चुका था, तो विदेशियों के सामने जाकर भीख मांगने की क्या ज़रूरत थी?
नेहरू की इसी एक बेवकूफी, इसी एक अहंकार के कारण कश्मीर का वो एक-तिहाई हिस्सा हमेशा-हमेशा के लिए पाकिस्तान के अवैध कब्ज़े में चला गया, जिसे आज हम POK (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर) कहते हैं।
नेपाल को भारत में मिलाने का वो प्रस्ताव जिसे नेहरू ने अपनी इंटरनेशनल इमेज वाली बेवकूफी के चक्कर में ठुकरा दिया
अगर आपको लग रहा है की नेहरू की बेवकूफियों का सिलसिला सिर्फ कश्मीर तक था, तो ज़रा अपनी सांसें थाम लीजिए। अब मैं आपको उस ऐतिहासिक सच्चाई के बारे में बताने जा रहा हूं जिसे सुनकर आप अपना सिर पकड़ लेंगे।
बात 1950 के दशक की शुरुआत की है। उस वक्त नेपाल में राणा शासन के खिलाफ भारी बगावत चल रही थी और वहां के राजा त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह को अपनी जान बचाकर भारत में शरण लेनी पड़ी थी।
उस वक्त राजा त्रिभुवन ने खुद भारत सरकार के सामने एक ऐसा ऐतिहासिक और सुनहरा प्रस्ताव रखा था जिसे कोई भी देशभक्त नेता कभी नहीं ठुकराता।
राजा त्रिभुवन ने नेहरू के सामने डंके की चोट पर कहा था की “नेपाल को आधिकारिक रूप से भारत का एक राज्य (Province) बनाकर भारत में मिला लिया जाए।”
ज़रा एक मिनट के लिए इस बात को समझिए! एक देश का राजा खुद आकर अपना मुकुट और अपना देश भारत माता के चरणों में रख रहा था।
भारत के तत्कालीन गृह मंत्री और लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल इस विलय (Merger) के पूरी तरह से पक्ष में थे।
सरदार पटेल बहुत अच्छी तरह से जानते थे की नेपाल भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से भारत का ही हिस्सा है, और अगर नेपाल भारत में मिल गया, तो उत्तर की तरफ से भारत की सुरक्षा हमेशा के लिए अभेद्य हो जाएगी।
चीन कभी भी हिमालय पार करके भारत की तरफ आंख उठाने की हिम्मत नहीं कर पाएगा।
लेकिन हमारे ‘चाचा नेहरू’ के दिमाग में तो कुछ और ही फितूर चल रहा था। नेहरू को लग रहा था की अगर उन्होंने नेपाल को भारत में मिला लिया, तो दुनिया भर के देश उन्हें एक ‘साम्राज्यवादी’ (Imperialist) और कब्ज़ा करने वाला नेता मानेंगे।
उनकी वो जो ‘नेबरहुड पॉलिसी’ और ‘पंचशील’ वाली फर्जी छवि थी, वो टूट जाएगी। अपनी उसी सड़ी हुई इंटरनेशनल इमेज और अहंकार के चक्कर में नेहरू ने नेपाल के उस ऐतिहासिक विलय प्रस्ताव को सीधा-सीधा ठुकरा दिया!
उन्होंने राजा त्रिभुवन से कहा की “नहीं, हम नेपाल को एक आज़ाद और संप्रभु देश ही रहने देंगे।” और आज उस महान उदारता का खौफनाक नतीजा क्या है?
आज नेपाल पूरी तरह से चीन की गोद में जाकर बैठ चुका है। चीन ने नेपाल में अपने बेस बना लिए हैं, नेपाल की राजनीति को हैक कर लिया है, और वहां से भारत के खिलाफ रोज़ नया ज़हर उगला जाता है।
अगर उस दिन नेहरू ने वो मूर्खता नहीं की होती, तो आज पशुपतिनाथ का वो पवित्र नेपाल हमारे भारत का मुकुट होता और चीन कभी भी हमारे सिर पर बैठकर हमें आंखें नहीं दिखा पाता।
अंडमान के पास हमारी सुरक्षा की सबसे बड़ी ढाल ‘कोको आइलैंड’, जिसे नेहरू ने चीन के फायदे के लिए म्यांमार को मुफ्त में गिफ्ट कर दिया
नेहरू की ‘गिफ्ट बांटने’ वाली इस बीमारी ने भारत को समंदर में भी एक ऐसा खौफनाक ज़ख्म दिया है, जिसका दर्द आज हमारी नौसेना (Navy) रोज़ भुगत रही है। हम सब अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के बारे में जानते हैं।
इसी उत्तरी अंडमान से महज़ 20 से 30 किलोमीटर की दूरी पर एक बेहद बेशकीमती और सामरिक (Strategic) रूप से अहम द्वीप समूह है- ‘कोको आइलैंड’ (Coco Islands)।
आज़ादी के वक्त और उसके कुछ सालों बाद तक ये द्वीप भारत के ही नियंत्रण में था। ये एक तरह से समंदर में भारत की सबसे बड़ी ढाल और एक ‘सोने की खदान’ थी।
अगर भारत वहां अपना नेवल बेस बनाता, तो हम पूरे मलक्का स्ट्रेट (Malacca Strait) और बंगाल की खाड़ी पर एकछत्र राज कर सकते थे।
लेकिन 1950 के दशक में नेहरू ने अपनी वही पुरानी बेवकूफी भरी ‘दरियादिली’ दिखाने का फैसला किया।
नेहरू ने म्यांमार (उस वक्त का बर्मा) के तत्कालीन प्रधानमंत्री उ नू (U Nu) के साथ अपनी दोस्ती चमकाने के लिए, बिना किसी दबाव के, बिना किसी युद्ध के और बिना देश की संसद से पूछे, भारत का वो बेशकीमती ‘कोको आइलैंड’ म्यांमार को मुफ्त में गिफ्ट कर दिया!
जी हां, अपने ही देश का एक अटूट हिस्सा किसी विदेशी देश को तोहफे में दे दिया गया, जैसे वो कोई इनके बाप की जागीर हो।
और आज उस कांग्रेसी गद्दारी का कितना भयंकर नतीजा भारत भुगत रहा है, ज़रा वो सुन लीजिए। म्यांमार ने अपनी औकात दिखाते हुए उस कोको आइलैंड को चीन के हाथों लीज़ पर सौंप दिया है।
आज वहां चीन ने अपना एक बहुत ही खौफनाक और हाई-टेक रडार स्टेशन (SIGINT Facility), मिलिट्री रनवे और नेवल बेस बना लिया है।
अब चीन उसी कोको आइलैंड पर बैठकर दिन-रात भारत की जासूसी करता है।
जब भी हम ओडिशा के अब्दुल कलाम आइलैंड से कोई नई अग्नि मिसाइल टेस्ट करते हैं, या श्रीहरिकोटा से इसरो (ISRO) अपना कोई रॉकेट लॉन्च करता है, तो चीन कोको आइलैंड के उसी रडार से हमारी एक-एक हरकत को मॉनिटर करता है।
चीन के युद्धपोत आज हमारी अंडमान कमांड के बिल्कुल नज़दीक आकर खड़े हो जाते हैं।
अरे भाई! जो द्वीप हमारी सुरक्षा का कवच होना चाहिए था, आज वो भारत के ही सीने पर तनी हुई चीन की एक लोडेड बंदूक बन चुका है।
और ये सब किसकी वजह से हुआ? सिर्फ और सिर्फ नेहरू के उस ‘गिफ्ट बांटने’ वाले शौक की वजह से।
इन कांग्रेसी दरबारियों ने दशकों तक इस सच को भारत के आम नागरिक से इसलिए छुपा कर रखा ताकि इनके ‘चाचा’ का वो महानता वाला फर्जी गुब्बारा कभी ना फूटे। लेकिन आज का हिंदुस्तान सब जान चुका है।
ग्वादर पोर्ट का वो 1 मिलियन डॉलर का ऑफर जिसे ठुकरा कर कांग्रेस ने पाकिस्तान और चीन को सौंप दिया भारत की घेराबंदी का हथियार
आज के उस खौफनाक नज़ारे के बारे में सोचिए जहाँ से चीन और पाकिस्तान मिलकर भारत को अरब सागर (Arabian Sea) में घेरने की साज़िश रच रहे हैं।
मैं बात कर रहा हूँ पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में मौजूद उस ‘ग्वादर पोर्ट’ (Gwadar Port) की।
आज इसी ग्वादर पोर्ट पर चीन ने अपना सबसे बड़ा और खतरनाक नेवल बेस बना रखा है। चीन का वो खरबों डॉलर का ‘सीपीईसी’ (CPEC – China Pakistan Economic Corridor) प्रोजेक्ट इसी पोर्ट से होकर गुज़रता है, जो सीधे हमारे POK से निकलता है।
आज इसी ग्वादर बंदरगाह पर चीन की न्यूक्लियर पनडुब्बियां और युद्धपोत तैनात रहते हैं ताकि युद्ध के वक्त भारत की नेवी का गला घोंटा जा सके।
लेकिन क्या आपको पता है की ये ग्वादर पोर्ट पाकिस्तान के पास गया कैसे? दरबारी इतिहासकारों ने इस खौफनाक सच पर ऐसा पर्दा डाला की इस देश का आम आदमी कभी जान ही नहीं पाया की ये ग्वादर पोर्ट असल में भारत का हो सकता था!
जी हां, 1950 के दशक तक ग्वादर पोर्ट पर पाकिस्तान का कोई कब्ज़ा नहीं था। ये बेशकीमती और सामरिक जगह असल में ‘ओमान के सुल्तान’ (Sultan of Oman) की प्रॉपर्टी हुआ करती थी। ओमान का सुल्तान भारत के बहुत करीब था और वो ग्वादर को बेचना चाहता था।
उसने सबसे पहले भारत सरकार यानी जवाहरलाल नेहरू के सामने ये शानदार और ऐतिहासिक ऑफर रखा।
ओमान के सुल्तान ने कहा की भारत इस ग्वादर पोर्ट को मात्र 1 मिलियन डॉलर (करीब 10 लाख डॉलर) की मामूली सी रकम देकर हमेशा के लिए खरीद ले।
अरे भाई, उस वक्त के हिसाब से भी 1 मिलियन डॉलर किसी देश की सरकार के लिए मूंगफली के दाने के बराबर था!
अगर भारत वो पोर्ट खरीद लेता, तो आज हम सीधा सेंट्रल एशिया और मिडिल ईस्ट के व्यापार पर कब्ज़ा करके बैठे होते।
और सबसे बड़ी बात, हम पाकिस्तान को पीछे से घेर कर उस पर हमेशा के लिए एक पिस्तौल तान कर रख सकते थे।
लेकिन हमारे महान ‘शांतिदूत’ नेहरू के दिमाग में तो दुनिया का दादा बनने का फितूर सवार था। उन्हें लगा की अगर भारत ने ये बंदरगाह खरीदा, तो दुनिया भर के देश उन्हें ‘साम्राज्यवादी’ कहेंगे।
उनकी वो जो सफेद कबूतर उड़ाने वाली इमेज थी, वो खराब हो जाएगी। इसी झूठे अहंकार और मूर्खता में नेहरू ने ओमान के सुल्तान के उस 1 मिलियन डॉलर के ऐतिहासिक ऑफर को सीरे से ठुकरा दिया!
और जैसे ही भारत ने इसे ठुकराया, उस खूंखार और जिहादी मुल्क पाकिस्तान की बांछें खिल गईं। पाकिस्तान ने बिना एक सेकंड की भी देरी किए 1958 में ओमान के सुल्तान को करीब 3 मिलियन डॉलर दिए और वो ग्वादर पोर्ट हमेशा-हमेशा के लिए खरीद लिया।
नेहरू की उस एक मूर्खता ने भारत के गले में एक ऐसा फंदा डाल दिया जिसे आज चीन और पाकिस्तान मिलकर रोज़ कस रहे हैं। ये कोई गलती नहीं थी मेरे भाई, ये इस देश की आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा के साथ किया गया एक ऐतिहासिक और अक्षम्य अपराध था!
अक्साई चिन से लेकर UNSC की सीट तक, अपनी झूठी शान के लिए नेहरू ने कैसे नीलाम कर दी भारत की वैश्विक ताकत
नेहरू की ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ वाली उस बीमारी ने इस देश को ऐसे-ऐसे खौफनाक ज़ख्म दिए हैं जिनका दर्द आज 70 साल बाद भी इस देश की नस-नस में महसूस होता है।
जब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को ताकतवर बनने का मौका मिला, तब-तब इस कांग्रेसी इकोसिस्टम ने भारत के हकों का कत्ल कर दिया।
ज़रा 1950 और 1955 के उस दौर को याद कीजिए। दूसरा विश्व युद्ध खत्म हो चुका था और संयुक्त राष्ट्र (UN) बन चुका था। अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ (रूस) दोनों ही भारत की अहमियत समझते थे।
इन दोनों ग्लोबल ताकतों ने भारत के सामने ‘संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद’ (UNSC – UN Security Council) में वीटो पावर के साथ स्थायी सदस्य (Permanent Seat) बनने का खुला ऑफर रखा था।
ये वो सीट थी जो किसी भी देश को दुनिया का बॉस बना देती है। लेकिन नेहरू ने क्या किया? उन्होंने बड़ी बेशर्मी से उस वीटो पावर और UNSC की सीट को ठुकराते हुए कहा की “नहीं, भारत से पहले ये सीट कम्युनिस्ट चीन को मिलनी चाहिए।”
अरे ज़रा इस पागलपन को देखिए! अपने देश का हक़ मारकर, अपनी थाली का खाना चीन जैसे गद्दार और विस्तारवादी देश को परोस दिया गया। और आज उसका नतीजा क्या है?
आज वही चीन उस वीटो पावर का इस्तेमाल करके हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की टांग खींचता है।
जब भी भारत किसी बड़े जिहादी आतंकवादी (जैसे मसूद अज़हर या हाफिज़ सईद) को ग्लोबल आतंकी घोषित करवाना चाहता है, तो चीन उसी वीटो पावर से पाकिस्तान को बचा लेता है।
नेहरू के उस एक पाप की सज़ा आज पूरा हिंदुस्तान भुगत रहा है।
और सबसे खौफनाक गद्दारी तो 1962 में हुई। नेहरू दिन-रात ‘पंचशील’ के गीत गाते रहे, चीन के प्रीमियर चाउ एन लाई को गले लगाते रहे, और उधर चीन भारत की सीमाओं में घुसकर सड़कें बनाता रहा।
हमारी सेना बार-बार नेहरू को चेतावनी दे रही थी की चीन युद्ध की तैयारी कर रहा है, लेकिन नेहरू अपनी ‘शांति’ की अफीम खाकर सोए रहे।
उन्होंने हमारे वीर जवानों को बर्फीली चोटियों पर बिना गर्म कपड़ों, बिना अच्छे जूतों और बिना आधुनिक हथियारों के मरने के लिए छोड़ दिया।
नतीजा क्या हुआ? 1962 के युद्ध में भारत ने अपनी 38,000 वर्ग किलोमीटर की बेशकीमती ज़मीन (अक्साई चिन) चीन के हाथों हमेशा के लिए गंवा दी!
38,000 वर्ग किलोमीटर! ये कोई छोटा-मोटा खेत नहीं था, ये एक पूरे राज्य के बराबर का इलाका था जो चीन ने हमसे नोच लिया।
और हद तो तब हो गई जब संसद में इस शर्मनाक हार पर बवाल मचा। जब विपक्ष के नेताओं ने नेहरू से पूछा की अक्साई चिन कैसे चला गया, तो इस इंसान ने संसद में खड़े होकर जो बेशर्म बयान दिया, वो किसी भी देशभक्त का खून खौलाने के लिए काफी है।
नेहरू ने कहा था- “वो तो एक बंजर ज़मीन है, वहां घास का एक तिनका भी नहीं उगता, तो उसके जाने पर इतना दुख कैसा?”
उस वक्त संसद में मौजूद एक महान देशभक्त नेता महावीर त्यागी जी से ये सुना नहीं गया। उन्होंने गुस्से में अपना सिर दिखाते हुए नेहरू से कहा- “नेहरू जी, मेरे सिर पर भी बाल का एक तिनका नहीं उगता, तो क्या मैं अपना सिर काटकर चीन को दे दूं?”
ये वो तमाचा था जिसने नेहरू के उस घमंड को तार-तार कर दिया था। लेकिन ज़मीन तो जा चुकी थी भाई। जिन वीर जवानों ने माइनस 30 डिग्री में अपनी जान दी थी, उनकी शहादत का इस बेशर्म कांग्रेस ने सरेआम मज़ाक उड़ा दिया था।
