हमारे पूर्वजों ने हज़ारों साल पहले ऐसे-ऐसे भव्य मंदिर और ऐसी अद्भुत मूर्तियां गढ़ी थीं, जिन्हें देखकर आज के बड़े-बड़े विदेशी इंजीनियर और वैज्ञानिक भी दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं।
लेकिन सदियों तक विदेशी लूटेरों, अंग्रेजों और आज के इन अंतरराष्ट्रीय स्मगलरों ने हमारी इसी आस्था को सरेआम लूटा।
उन्होंने हमारे मंदिरों के ताले तोड़े, हमारे गर्भगृह को सूना कर दिया और हमारे साक्षात भगवानों की मूर्तियों को चुराकर विदेशों के बाज़ारों में बेच दिया।
दशकों तक इस देश में ऐसी कमज़ोर और रीढ़विहीन सरकारें रहीं, जिन्होंने हमारी इन चुराई गई मूर्तियों को सिर्फ ‘पत्थर का टुकड़ा’ या ‘कलाकृति’ समझकर फाइलों में दबा दिया।
उन्हें कभी इस बात की परवाह ही नहीं हुई की जिस नंदी और जिस त्रिशूल के आगे करोड़ों सनातनी अपना माथा टेकते हैं, वो आज सात समंदर पार किसी विदेशी म्यूज़ियम में एक कांच के डिब्बे में कैद हैं और विदेशी लोग टिकट खरीदकर उन्हें बस एक ‘शो-पीस’ की तरह देख रहे हैं।
ये हमारे सनातन का घनघोर अपमान था।
लेकिन अब वक्त का पहिया पूरी तरह से घूम चुका है। अब देश में एक ऐसी कड़क राष्ट्रवादी सरकार है जो अपनी नई वैश्विक और कूटनीतिक ताकत के दम पर विदेशी सरकारों की आंखों में आंखें डालकर अपने भगवानों को वापस छीन कर ला रही है।
आज का ‘नया भारत’ अपने आराध्यों का ये अपमान और बर्दाश्त करने वाला नहीं है। हाल ही में सनातन का जो डंका ऑस्ट्रेलिया में बजा है, उसने पूरी दुनिया के चोर बाज़ारों और म्यूज़ियम्स के पसीने छुड़ा दिए हैं।
ऑस्ट्रेलिया को मोदी सरकार के कड़े कूटनीतिक दबाव के आगे घुटने टेकने पड़े हैं। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने खुद आकर ये ऐलान किया की वो भारत की तीन बेहद प्राचीन और पवित्र चोल-कालीन धरोहरों को पूरे सम्मान के साथ वापस कर रहे हैं।
भगवान कार्तिकेय, नंदी जी और माँ भद्रकाली के त्रिशूल की भव्य ‘घर वापसी’, 11वीं सदी के ‘चोल वैभव’ का वो साक्षात प्रमाण जो लौट रहा वापस
अब ज़रा उन तीन पवित्र और साक्षात देव-स्वरूप मूर्तियों की महिमा को समझिए जो विदेशी कैद से आज़ाद होकर अपने घर लौट रही हैं।
ये मूर्तियां नहीं हैं, ये हमारे वो भगवान हैं जिनकी प्राण-प्रतिष्ठा करके हमारे पूर्वजों ने पीढ़ियों तक उनकी पूजा की थी। ये वो धरोहर हैं जिनमें चोल साम्राज्य की रगों में दौड़ने वाला खून और उनकी बेजोड़ शिल्पकला साक्षात जीवित है।
सबसे पहले बात करते हैं उस दुर्लभ त्रिशूल की। ये कोई मामूली त्रिशूल नहीं है मेरे भाई। ये एक दुर्लभ धातु (Metal) से बना हुआ वो पवित्र त्रिशूल है जिसके ठीक बीचों-बीच माँ भद्रकाली की बेहद उग्र और दिव्य आकृति उकेरी गई है।
माँ भद्रकाली, जो दुष्टों का नाश करने और धर्म की रक्षा करने वाली साक्षात महाकाली का रूप हैं, उनका ये त्रिशूल तमिलनाडु के तिरुवरूर जिले के कोलुमंगुड़ी गांव स्थित ‘श्री काशी विश्वनाथस्वामी मंदिर’ की शान हुआ करता था।
और फिर एक रात कुछ नीच अंतरराष्ट्रीय तस्करों ने मंदिर का ताला तोड़ा और हमारी माँ भद्रकाली के इस त्रिशूल को चुरा लिया।
इसी श्री काशी विश्वनाथस्वामी मंदिर से इन डकैतों ने महादेव के परम भक्त और उनके वाहन ‘नंदी जी’ की एक बेहद प्राचीन पत्थर की मूर्ति भी चुरा ली थी।
ये नंदी जी की मूर्ति 13वीं से 16वीं सदी के बीच के उस महान विजयनगर और नायक काल की गवाह है, जब दक्षिण भारत ने इस्लामी लूटेरों की कमर तोड़कर सनातन धर्म का एक अभेद्य किला खड़ा किया था।
और तीसरी जो मूर्ति वापस लौट रही है, उसे देखकर तो किसी भी सनातनी की आंखें खुशी और भक्ति से छलक उठेंगी।
ये तंजावुर जिले के ऐतिहासिक मनंबाडी गांव के ‘नागनाथ स्वामी मंदिर’ से चुराई गई भगवान कार्तिकेय की 6-सिर वाली एक अति-दुर्लभ पत्थर की मूर्ति है।
भगवान कार्तिकेय (मुरुगन) जो देवताओं के सेनापति हैं, उनकी ये मूर्ति 11वीं सदी की है। ये वो दौर था जब चोल साम्राज्य के सबसे प्रतापी और खूंखार सम्राट ‘राजेंद्र चोल प्रथम’ का राज हुआ करता था।
राजेंद्र चोल वो महान हिंदू सम्राट थे जिनकी नौसेना ने समुद्र की छाती चीरकर दक्षिण पूर्व एशिया तक अपना भगवा झंडा गाड़ दिया था।
उस 11वीं सदी के चोल वैभव और उनके बेजोड़ शिल्प कौशल का साक्षात प्रमाण है ये भगवान कार्तिकेय की मूर्ति।
इस मूर्ति में जो नक्काशी की गई है, जो भगवान का तेज उकेरा गया है, वो दुनिया का कोई भी विदेशी मूर्तिकार आज की मॉडर्न मशीनों से भी नहीं बना सकता। और शायद इसी जलन और कुंठा के कारण इन विदेशियों ने हमारे इन भगवानों को चुरा लिया।
हमारे साक्षात भगवान कार्तिकेय, हमारे नंदी जी और माँ भद्रकाली का त्रिशूल दशकों तक ऑस्ट्रेलिया के उस ‘नेशनल गैलरी ऑफ ऑस्ट्रेलिया’ में कांच के पीछे कैद रहे।
वहां आने वाले विदेशी टूरिस्ट इन्हें सिर्फ एक पत्थर या पुरानी धातु का टुकड़ा समझकर इनकी तस्वीरें खींचते रहे।
उन्हें क्या पता की इनके अंदर हमारे सनातन की आत्मा बसती है! लेकिन कहते हैं ना की पाप का घड़ा एक दिन ज़रूर फूटता है। आज उन तस्करों का वो घड़ा फूट चुका है और हमारे भगवान वापस अपनी ज़मीन पर कदम रखने को तैयार हैं।
न्यूयॉर्क के आर्ट डीलर से लेकर मेक्सिको के चोर रास्तों तक, अंतरराष्ट्रीय तस्करों का वो नेटवर्क जिसने हमारी आस्था का किया था सौदा
अब ज़रा इस पूरी डकैती के उस काले सच को समझिए जो किसी भी आम हिंदुस्तानी का खून खौलाने के लिए काफी है।
ये जो विदेशी तस्कर और बड़े-बड़े आर्ट डीलर (Art Dealers) हैं ना, ये कोई सड़क छाप चोर नहीं हैं।
ये सूट-बूट पहनने वाले वो अंतरराष्ट्रीय सफेदपोश डकैत हैं जिन्होंने हमारी आस्था और हमारे भगवानों का करोड़ों डॉलरों में सौदा किया है।
इन तस्करों ने तमिलनाडु के उन प्राचीन मंदिरों के तालों को तोड़ा और उन भारी-भरकम मूर्तियों को अपनी गाड़ियों में लाद कर गायब हो गए।
इन डकैतों ने बड़ी ही चालाकी से हमारे भगवानों को लकड़ी के बक्सों में पैक किया, कस्टम अधिकारियों की आंखों में धूल झोंकी और ‘फर्जी हैंडीक्राफ्ट’ (Handicrafts) या सजावट के सामान का ठप्पा लगाकर इन्हें भारत के बाहर स्मगल कर दिया।
अब आप सोचेंगे की ये मूर्तियां सीधे ऑस्ट्रेलिया पहुंच गईं? बिल्कुल नहीं! इन अंतरराष्ट्रीय तस्करों का नेटवर्क इतना बड़ा और खौफनाक है की ये सीधे माल नहीं बेचते।
हमारी माँ भद्रकाली का वो दुर्लभ त्रिशूल और 11वीं सदी के भगवान कार्तिकेय की वो मूर्ति भारत से निकालकर सीधे न्यूयॉर्क (New York) पहुंचाई गई।
न्यूयॉर्क की वो चमचमाती हुई आर्ट गैलरियां, जहाँ दुनिया भर के अमीर लोग शैंपेन के गिलास हाथ में लेकर कला की नीलामियों में हिस्सा लेते हैं, वहां हमारे साक्षात भगवानों की बोली लगाई जा रही थी।
उन गोरे लोगों को क्या पता की जिस मूर्ति को वो अपने ड्रॉइंग रूम में सजाने के लिए खरीद रहे हैं, उसके आगे भारत में करोड़ों लोग दंडवत प्रणाम करते हैं।
न्यूयॉर्क के इन लालची और मक्कार आर्ट डीलरों ने हमारी आस्था का खून चूसकर अपनी तिजोरियां भरीं।
और नंदी जी की मूर्ति का जो रूट सामने आया है, उसे सुनकर तो जांच एजेंसियों के भी होश उड़ गए थे।
भगवान शिव के वाहन नंदी महाराज की उस पवित्र मूर्ति को तो बाकायदा मेक्सिको (Mexico) के उन खौफनाक और विवादित चोर रास्तों से होते हुए स्मगल किया गया था।
मेक्सिको, जो दुनिया भर में अपने ड्रग कार्टेल और ब्लैक मार्केट के लिए कुख्यात है, वहां के अंधेरे रास्तों से होते हुए हमारे नंदी जी को ले जाया गया।
इन तस्करों ने एक देश से दूसरे देश, एक एजेंट से दूसरे एजेंट के हाथों में हमारी मूर्तियों को ऐसे बेचा जैसे वो कोई बाज़ारू सामान हों।
और आखिर में, घूम-फिर कर ये तीनों पवित्र मूर्तियां ऑस्ट्रेलिया के उन दो बड़े म्यूज़ियम्स- ‘नेशनल गैलरी ऑफ ऑस्ट्रेलिया’ और ‘आर्ट गैलरी ऑफ न्यू साउथ वेल्स’- के कब्ज़े में पहुंच गईं।
ये विदेशी म्यूज़ियम वाले दुनिया भर में खुद को ‘इतिहास और कला का रक्षक’ बताते हैं। ये टीवी पर बैठकर ज्ञान बांटते हैं की हम धरोहरों को बचा रहे हैं।
लेकिन सच तो ये है की ये म्यूज़ियम असल में चोरी के माल के सबसे बड़े रिसीवर हैं। इन्हें बहुत अच्छे से पता होता है की जो हज़ारों साल पुरानी मूर्ति ये करोड़ों डॉलर देकर खरीद रहे हैं, वो ज़रूर किसी ना किसी मंदिर को तोड़कर या वहां से चुराकर ही लाई गई होगी।
लेकिन इनका अहंकार इतना बड़ा था की ये चोरी का माल अपने शीशे के शो-केस में सजाकर पूरी दुनिया को भारत की लाचारी का तमाशा दिखाते थे। पर इन्हें नहीं पता था की भारत अब बदल चुका है।
‘म्युचुअल लीगल असिस्टेंस ट्रीटी’ और नए भारत की वो कूटनीतिक धाक जिसके आगे टेकने पड़े ऑस्ट्रेलिया को घुटने
एक वक्त था जब हमारी सरकारें सिर्फ विदेशों को चिट्ठियां लिखती थीं की “जनाब, हमारी मूर्ति आपके पास है, प्लीज़ उसे लौटा दीजिए।”
और वो गोरे लोग हमारी चिट्ठी को कूड़ेदान में फेंक कर हंसते थे। लेकिन आज का ‘नया भारत’ किसी के आगे गिड़गिड़ाता नहीं है।
आज का भारत उनकी आंखों में आंखें डालता है, उन्हें सबूतों के हथौड़े से मारता है और डंके की चोट पर अपनी चीज़ वापस छीन कर लाता है।
जब हमारी जांच एजेंसियों (खासकर तमिलनाडु की आइडल विंग और एएसआई) ने इन मूर्तियों की तलाश शुरू की, तो उन्होंने बिल्कुल शेर की तरह शिकार किया।
हमारे जांचकर्ताओं ने पुराने आर्काइव, मंदिरों के 50-60 साल पुराने ब्लैक एंड व्हाइट फोटो और फ्रेंच इंस्टीट्यूट के रिकॉर्ड्स को खंगाल मारा।
उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के म्यूज़ियम में रखी मूर्तियों के हर एक निशान, हर एक टूट-फूट और बेस को हमारे मंदिरों की पुरानी तस्वीरों से ऐसे मैच किया की उन विदेशी डायरेक्टरों के पसीने छूट गए।
हमने दुनिया के सामने साफ कर दिया की ये मूर्तियां ऑस्ट्रेलिया की किसी खदान से नहीं निकलीं, बल्कि ये हमारे तंजावुर और तिरुवरूर के मंदिरों की साक्षात धरोहर हैं।
और जब सबूत पक्के हो गए, तो भारत सरकार ने अपना सबसे खौफनाक कूटनीतिक ब्रह्मास्त्र निकाला- ‘पारस्परिक कानूनी सहायता संधि’ (Mutual Legal Assistance Treaty – MLAT)।
ये कोई मामूली कागज़ नहीं है भाई! भारत ने ऑस्ट्रेलिया को सीधा और कड़क संदेश दे दिया की या तो तुम शांति से, इज़्ज़त के साथ हमारे भगवानों को वापस कर दो, या फिर हम तुम्हें अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में घसीटेंगे और पूरी दुनिया के सामने तुम्हारे इस ‘चोरी का माल खरीदने’ वाले फ्रॉड को बेनकाब कर देंगे।
भारत की इस धाकड़ विदेश नीति और कूटनीतिक धमक के आगे ऑस्ट्रेलिया के पास घुटने टेकने के अलावा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं बचा।
जो म्यूज़ियम कल तक हमारी मूर्तियों को अपनी जागीर समझते थे, उन्हें अपने हाथों से वो मूर्तियां बक्सों में वापस पैक करनी पड़ीं।
और इस कूटनीतिक विजय का सबसे बड़ा नज़ारा तो तब देखने को मिला जब ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज खुद सामने आए।
उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बातचीत के दौरान खुद ये ऐलान किया की वो इन तीनों चोल-कालीन मूर्तियों को भारत को वापस सौंप रहे हैं।
ज़रा सोचिए इस पल की अहमियत को! एक विदेशी प्रधानमंत्री, जिसका देश कभी हमारी चुराई हुई आस्था का मज़ाक उड़ा रहा था, वो आज हमारे देश के सामने खड़े होकर हमारी धरोहरें ससम्मान वापस लौटा रहा है।
अल्बनीज ने बाकायदा कहा की ऑस्ट्रेलिया ‘एथिकल कलेक्शन’ (नैतिक संग्रह) के वादे को पूरा कर रहा है। अरे भाई, ये कोई उनकी महानता नहीं है, ये आज के भारत का वो खौफ है जिसने उन्हें ‘नैतिकता’ याद दिला दी है।
ये भारत की विदेश नीति की एक ऐसी ज़बरदस्त और ऐतिहासिक विजय है जिसने पूरी दुनिया के म्यूज़ियम्स की रातों की नींद हराम कर दी है।
आज लंदन से लेकर न्यूयॉर्क तक, जिन-जिन म्यूज़ियम्स में हमारी चुराई हुई सनातन धरोहरें कैद हैं, वो सब खौफ में हैं की कल को भारत का ये कूटनीतिक हथौड़ा उन पर भी चलने वाला है।
ये सिर्फ तीन मूर्तियों की वापसी नहीं है, ये इस बात का शंखनाद है की अब इस देश की आस्था का सौदा करने वाले किसी भी विदेशी स्मगलर को पाताल में भी छुपने की जगह नहीं मिलेगी।
चोल साम्राज्य की वो समुद्री और सांस्कृतिक दहाड़ जिसे मिटाने के लिए सदियों तक विदेशियों ने रची थी साज़िश
जब हम इन चोल-कालीन मूर्तियों की बात करते हैं, तो हमें उस चोल साम्राज्य का वो खूंखार शौर्य भी याद कर लेना चाहिए जिसके नाम से समंदर की लहरें भी रास्ता छोड़ देती थीं।
ज़रा याद कीजिए सम्राट राजराज चोल और उनके महापराक्रमी पुत्र ‘राजेंद्र चोल प्रथम’ का वो दौर!
11वीं सदी का वो स्वर्णिम काल, जब भारत की नौसेना (Navy) इतनी खौफनाक और विशाल थी की उसने बंगाल की खाड़ी को ‘चोलों की झील’ में तब्दील कर दिया था।
राजेंद्र चोल के जंगी जहाज़ों ने समंदर का सीना चीरकर श्रीलंका, मालदीव, मलेशिया, इंडोनेशिया (श्रीविजय साम्राज्य) तक अपना भगवा झंडा गाड़ दिया था।
उन्होंने पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में सनातन धर्म का वो डंका बजाया जिसकी गूंज आज भी वहां के मंदिरों और संस्कृति में सुनाई देती है।
चोल सम्राट सिर्फ युद्ध के मैदान के शेर नहीं थे, वो कला और संस्कृति के सबसे महान रक्षक थे। उन्होंने ऐसे-ऐसे भव्य और गगनचुंबी मंदिर बनवाए (जैसे तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर), जिनकी वास्तुकला देखकर आज भी दुनिया भर के वैज्ञानिक सिर खुजाते रह जाते हैं।
बिना किसी क्रेन या मशीन के 80 टन का पत्थर मंदिर के शिखर पर कैसे रखा गया, ये चोलों की उस इंजीनियरिंग का साक्षात चमत्कार है।
और यही वो बात थी जो इन विदेशी लूटेरों और अंग्रेज़ों को कांटे की तरह चुभती थी। विदेशियों को पता था की भारत की असली ताकत हथियारों में नहीं, बल्कि उसकी इन सांस्कृतिक जड़ों और इन मंदिरों में बसी आस्था में है।
वो हमारी इस अजेय कला और हमारी सनातन पहचान से चिढ़ते थे। जब वो चोलों के उस सांस्कृतिक किले को आमने-सामने से नहीं तोड़ पाए, तो उन्होंने चोर दरवाज़े से हमारे मंदिरों को लूटना शुरू कर दिया।
हमारी मूर्तियों को चुराकर, उन्हें म्यूज़ियम का शो-पीस बनाकर ये गोरे लोग असल में हमारे सनातन गौरव को नीचा दिखाना चाहते थे।
लेकिन चोलों का वो खून आज भी इस देश की मिट्टी में ज़िंदा है, और आज उसी खून ने उबाल मारकर अपनी धरोहरों को वापस छीन लिया है।
जब तक हमारे आखिरी आराध्य अपनी धरती पर नहीं लौटते वापस, तब तक जारी रहेगा सनातन का ये प्रचंड महाभियान
ऑस्ट्रेलिया से हमारे भगवानों का वापस आना कोई अंत नहीं है भाई, ये तो बस उस बड़े और खौफनाक धर्मयुद्ध की शुरुआत है।
आज का भारत अब वो पुराना भारत नहीं रहा जो विदेशों में जाकर सिर्फ हाथ जोड़कर खड़ा रहता था। आज हम डंके की चोट पर अपनी शर्तें मनवाते हैं।
ऑस्ट्रेलिया तो बस एक झांकी है! असली निशाना तो वो लंदन का ‘ब्रिटिश म्यूज़ियम’ और अमेरिका की वो बड़ी-बड़ी आर्ट गैलरियां हैं जो आज भी हमारी हज़ारों करोड़ की सनातन संपदा पर कुंडली मारकर बैठी हैं।
अंग्रेज़ों ने 200 सालों तक भारत को सिर्फ लूटा नहीं, बल्कि हमारे मंदिरों से ऐसे-ऐसे नायाब हीरे, मूर्तियां और ग्रंथ चुराकर ले गए, जिनसे आज उनके म्यूज़ियम्स की चमक बनी हुई है।
वो बेशर्म आज भी ‘कोहिनूर’ से लेकर हमारी वाग्देवी (मां सरस्वती) की मूर्ति तक सब कुछ दबा कर बैठे हैं।
लेकिन उन गोरे लुटेरों को अब ये बात अच्छे से समझ लेनी चाहिए की ‘नया भारत’ ना तो अपना इतिहास भूलता है और ना ही अपने भगवानों का अपमान बर्दाश्त करता है।
हमारी विदेश नीति और हमारे जांचकर्ताओं ने अब वो खौफनाक गियर पकड़ लिया है की हम दुनिया के किसी भी कोने में छुपे अपने भगवानों को ढूंढ निकालेंगे।
ये भारत के 140 करोड़ सनातनियों का एक सीधा और खुला अल्टीमेटम है उन तमाम विदेशी सरकारों को, की तुम्हारे म्यूज़ियम्स की शोभा हमारे चुराए हुए भगवानों से नहीं बढ़ेगी। जो हमारा है, वो तुम्हें हर हाल में लौटाना पड़ेगा।
चोल साम्राज्य का जो गौरवशाली झंडा हमारे सम्राटों ने समंदर पार फहराया था, आज उसी झंडे की छांव में हमारे भगवान वापस अपने घर लौट रहे हैं।
जब तक आखिरी लूटी गई सनातन धरोहर, जब तक आखिरी चुराई गई मूर्ति वापस इस पवित्र भारत माता की मिट्टी पर कदम नहीं रख लेती, तब तक ये महाभियान, ये धर्मयुद्ध और ये हुंकार रुकने वाली नहीं है।
हर हर महादेव!
