जिस कांग्रेस ने राम मंदिर 'शिलान्यास' के दिन 'काले कपड़े' पहन कर मनाया था 'काला दिवस', आज वही लोग 'राम मंदिर' के चंदे की कर रहे 'चिंता', इन नेताओं की 'पाखंडी' रामभक्ति को अब अच्छे से जान चुका हिंदू समाज

जिस कांग्रेस ने राम मंदिर ‘शिलान्यास’ के दिन ‘काले कपड़े’ पहन कर मनाया था ‘काला दिवस’, आज वही लोग ‘राम मंदिर’ के चंदे की कर रहे ‘चिंता’, इन नेताओं की ‘पाखंडी’ रामभक्ति को अब अच्छे से जान चुका हिंदू समाज

जब भी मैं इन कांग्रेसी नेताओं को राम मंदिर और हिंदू आस्था की बातें करते हुए सुनता हूं, तो मेरा अपना माथा पीटने का मन करता है!

दशकों तक इस देश के करोड़ों सनातनियों ने जिस राम मंदिर के लिए खून बहाया, जिस मंदिर के लिए हमारे कोठारी बंधुओं ने गोलियां खाईं, उस 500 साल के संघर्ष का इन कांग्रेसी हरामखोरों ने हमेशा मज़ाक ही तो उड़ाया है।

ज़रा याद कीजिए वो दौर, जब हमारे आराध्य दशकों तक एक तिरपाल के नीचे, सर्दी, गर्मी और बारिश में भीगते रहे।

तब ये कांग्रेसी दिल्ली में बैठकर सत्ता की मलाई चाट रहे थे। तब इनके मुंह से कभी ये नहीं निकला की “हमारे प्रभु टेंट में क्यों हैं?” तब इनकी कोई रामभक्ति नहीं जागी। तब इन्हें सिर्फ बाबरी मस्जिद के पैरोकारों की चिंता सताती थी।

लेकिन आज 2026 में क्या हो रहा है? अचानक से इन कांग्रेसी दरबारियों के सीने में रामभक्तों के लिए एक अजीब सा ‘दर्द’ उठने लगा है।

जो पार्टी कल तक राम मंदिर शिलान्यास के दिन काले कपड़े पहन कर काला दिवस मनाती थी, जो पार्टी इस मंदिर को बनने से रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपने वकीलों की फौज खड़ी कर देती थी, आज वही पार्टी अचानक से ‘राम मंदिर के चंदे’ की सबसे बड़ी रक्षक बन बैठी है!

अब ये लोग संसद में, प्रेस कॉन्फ्रेंस में गला फाड़-फाड़ कर चिल्ला रहे हैं की “अरे, राम मंदिर के चंदे में धांधली हो गई! करोड़ों रामभक्तों की आस्था के साथ खिलवाड़ हो गया! हमें चंदे का हिसाब चाहिए!”

वाह रे मगरमच्छों! क्या गज़ब का फ्रॉड है तुम्हारा! ये तुम्हारी कोई चिंता-विंता नहीं है, और न ही तुम्हारे अंदर अचानक से कोई रामभक्ति जाग उठी है।

ये बस हिन्दुओं की आस्था का इस्तेमाल करके अपनी राजनीती की रोटियां सेकने का काम है।

जो लोग राम के वजूद को ही नहीं मानते थे, वो आज उस राम के दरबार का मुनीम बनकर हिसाब मांग रहे हैं। इस पाखंड को अब डंके की चोट पर नंगा करने का वक्त आ गया है।

5 अगस्त 2022 का वो कांग्रेसी ‘काला दिवस’, जब राम मंदिर शिलान्यास के दिन ‘काले कपड़े’ पहन कर सड़क पर उतरी बेशर्म कांग्रेस

अगर कोई भी सीधा-सादा हिंदू इस कांग्रेस पार्टी की ‘चुनावी रामभक्ति’ के झांसे में आ रहा है, तो उसे बस इतिहास का एक पन्ना पलट कर 5 अगस्त की उस गद्दारी भरी तारीख को याद कर लेना चाहिए।

5 अगस्त 2020! ये वो ऐतिहासिक और सुनहरी तारीख है, जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अयोध्या की उस पवित्र ज़मीन पर साष्टांग दंडवत होकर हमारे भव्य राम मंदिर का शिलान्यास (भूमि पूजन) किया था।

वो दिन पूरे देश के सनातनियों के लिए एक दीवाली से कम नहीं था। पूरे देश ने उस रात अपने घरों में घी के दीये जलाए थे।

लेकिन ज़रा याद कीजिए की इस वामपंथी इकोसिस्टम के सीने पर उस दिन कितने सांप लोट रहे थे।

वो दर्द कांग्रेस के अंदर ऐसा बैठा की ठीक दो साल बाद, 5 अगस्त 2022 को इस पार्टी ने अपनी वो खौफनाक और सड़ी हुई मानसिकता पूरे देश के सामने नंगी कर दी।

5 अगस्त 2022 की वो सुबह! राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे से लेकर कांग्रेस का हर छोटा-बड़ा नेता सड़क पर उतरा।

और ये कैसे उतरे थे? सिर से लेकर पैर तक काले कपड़ों में! काली शर्ट, काला कुर्ता, काली साड़ी, यहाँ तक की मुंह पर मास्क भी काले रंग का!

इन्होंने पूरी दिल्ली की सड़कों पर काले कपड़े पहनकर एक भयंकर बवाल काटा और संसद से लेकर विजय चौक तक मार्च निकाला।

जब मीडिया ने पूछा की भई आज अचानक से ये ‘ब्लैक फ्राइडे’ (Black Friday) क्यों मना रहे हो? तो कांग्रेस ने बड़ी मक्कारी से बहाना बना दिया की “हम तो महंगाई, जीएसटी (GST) और बेरोज़गारी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं।”

लेकिन इस देश के गृह मंत्री अमित शाह और यूपी के फायरब्रांड सीएम योगी आदित्यनाथ ने उसी दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कांग्रेस के इस ‘काले नकाब’ को बेरहमी से नोच डाला।

अमित शाह जी ने डंके की चोट पर पूरे देश को बताया था की कांग्रेस रोज़ आम कपड़ों में प्रदर्शन करती है, तो फिर आज 5 अगस्त के दिन ही ये काले कपड़े पहनकर मातम क्यों मना रहे हैं?

ये कोई इत्तेफाक नहीं था मेरे भाई! ये सीधे-सीधे राम मंदिर निर्माण और करोड़ों रामभक्तों का सरेआम किया गया अपमान था।

अमित शाह ने साफ कह दिया था की कांग्रेस खुलेआम राम मंदिर का विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है, इसलिए वो इस ‘काले लिबास’ की आड़ में अपने उस कट्टरपंथी और जिहादी वोटबैंक को एक ‘हिडन मैसेज’ दे रही थी।

वो मैसेज था- “घबराओ मत, भले ही आज वहां राम मंदिर बन रहा है, लेकिन हम आज भी तुम्हारे साथ खड़े हैं और हम इस 5 अगस्त को एक ‘काले दिवस’ (Black Day) के रूप में मना रहे हैं।”

ज़रा सोचिए इस नीचता को! जिस दिन देश का हिंदू अपने रामलला के घर वापसी का जश्न मना रहा हो, उस दिन ये गद्दार इकोसिस्टम मातम मना रहा था।

और आज यही काले कपड़े पहनने वाले लोग सफेद खादी पहनकर हमसे राम मंदिर के चंदे का हिसाब मांग रहे हैं? धिक्कार है ऐसी राजनीति पर!

सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल के बहाने और राम को काल्पनिक बताने वाला हलफनामा, कांग्रेस के डीएनए में घुसा है सनातन विरोध

इन कांग्रेसी दरबारियों का इतिहास खंगालेंगे तो आपको पता चलेगा की सनातन विरोध और हिंदू आस्था को जूतों तले कुचलना कोई आज की बात नहीं है, ये इनके डीएनए (DNA) में बसा हुआ कैंसर है।

जो लोग आज टीवी पर बैठकर ‘चंदा चोरी, आस्था से धोखा’ का ड्रामा कर रहे हैं, ज़रा उनका वो 2007 वाला खौफनाक पाप याद कर लीजिए।

उस वक्त केंद्र में मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के रिमोट वाली यूपीए (UPA) की सरकार बैठी थी। रामसेतु के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही थी।

और इस देश की उसी ‘सेक्युलर’ कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के मुंह पर एक एफिडेविट (हलफनामा) दे मारा था। जानते हैं उस हलफनामे में क्या लिखा था?

उसमें लिखा था की “भगवान राम, सीता, हनुमान और वाल्मीकि रामायण का कोई ऐतिहासिक सबूत नहीं है। ये सब सिर्फ काल्पनिक कहानियां (Fictional Characters) हैं।”

अरे बेशर्मों! जिस राम के नाम से इस देश की सुबह होती है, जिस राम के नाम से इस देश में इंसान अपनी आखिरी सांस लेता है, तुमने कोर्ट में खड़े होकर उसी राम को काल्पनिक बता दिया?

अगर किसी दूसरे मज़हब के खिलाफ तुमने कोर्ट में ऐसा हलफनामा दिया होता, तो अब तक पूरे देश में आग लग चुकी होती।

लेकिन चूँकि हिंदू सहिष्णु है, तो तुमने उसकी आस्था को लात मारना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ लिया।

और ये तो सिर्फ एक पाप था। ज़रा सुप्रीम कोर्ट के उस 2017 वाले खौफनाक नज़ारे को भी याद कीजिए जब राम जन्मभूमि केस की सुनवाई अपने अंतिम दौर में थी।

पूरा देश आस लगाए बैठा था की अब हमारे रामलला को न्याय मिलेगा। तब कांग्रेस पार्टी के सबसे बड़े वकील और नेता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में खड़े होकर क्या दलील दी थी?

उसने बेशर्मी से जज की आंखों में देखकर कहा था की “माई लॉर्ड, इस राम जन्मभूमि केस की सुनवाई को 2019 के आम चुनावों तक के लिए टाल दीजिए (Postpone कर दीजिए)।”

क्यों टाल दीजिए भाई? क्या कोर्ट किसी नेता के चुनाव के हिसाब से चलता है? असल में ये वामपंथी इकोसिस्टम और कांग्रेस की एक बहुत बड़ी साज़िश थी।

ये जानते थे की अगर कोर्ट ने राम मंदिर के पक्ष में फैसला सुना दिया, तो देश में हिंदुओं की एकता का वो सैलाब आएगा जो इन्हें हमेशा के लिए सत्ता से बाहर फेंक देगा।

ये किसी भी कीमत पर उस बाबरी ढांचे वाली ज़मीन को बचाना चाहते थे।

दशकों तक इन लोगों ने कोर्ट-कचहरी में तारीख-पे-तारीख का वो खौफनाक खेल खेला जिसने हमारे रामलला को सालों तक तिरपाल के नीचे तड़पने पर मजबूर किया।

जो पार्टी अपने वकीलों की पूरी की पूरी फौज खड़ी करके मंदिर निर्माण को 70 साल तक अटकाती रही, जो पार्टी राम के अस्तित्व को ही दरकिनार करने की वकालत कर रही थी, क्या उस पार्टी के नेताओं को आज राम मंदिर के पवित्र चंदे पर एक भी शब्द बोलने की औकात है?

ये सिर्फ और सिर्फ एक चुनावी पाखंड है जिसे अब देश का हर सनातनी बहुत अच्छी तरह से समझ चुका है।

रामभक्तों के चंदे पर नीच कांग्रेसी राजनीति, तुमने तो एक रुपया नहीं दिया फिर आज अचानक हिसाब क्यों मांग रहे हो

अब ज़रा आज के इस ताज़ा ड्रामे पर आते हैं जिसे इस मॉनसून सत्र में कांग्रेस पार्टी ने एक बहुत बड़े एजेंडे के तहत खड़ा किया है।

जो लोग कल तक राम मंदिर के नाम से ही चिढ़ते थे, वो आज अचानक से प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कह रहे हैं की “राम मंदिर के चंदे में चोरी हो गई, ज़मीन खरीद में घोटाला हो गया, हमें एसआईटी (SIT) जांच चाहिए!”

अरे लुटियंस दिल्ली के इन वामपंथी दलालों से कोई ये पूछे की जब विश्व हिंदू परिषद (VHP) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के लाखों कार्यकर्ता गांव-गांव, गली-गली जाकर राम मंदिर निर्माण के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे थे, तब तुम लोग क्या कर रहे थे?

तब यही कांग्रेसी और वामपंथी नेता टीवी पर बैठकर उन रामभक्तों का मज़ाक उड़ा रहे थे। ये बेशर्म लोग उन्हें ‘चंदा जीवी’ कहकर ज़लील करते थे।

उस वक्त इस देश के एक गरीब रिक्शेवाले ने, एक मज़दूर ने, एक दिहाड़ी करने वाली बूढ़ी मां ने अपनी जीवन भर की गाढ़ी कमाई में से 10 रुपये, 100 रुपये या 1000 रुपये रामलला के चरणों में अर्पित किए थे।

उस चंदे में इस देश के करोड़ों सनातनियों का खून-पसीना और उनकी वो आस्था जुड़ी है जिसे तुम्हारे जैसा बिकाऊ इकोसिस्टम कभी नहीं समझ सकता।

देश के हिंदुओं ने अपनी श्रद्धा से 3000 करोड़ से ज़्यादा का वो पहाड़ खड़ा कर दिया जिसने बता दिया की राम काज के लिए हिंदू समाज को किसी सरकारी खज़ाने या किसी सेक्युलर पार्टी की भीख की ज़रूरत नहीं है।

और आज तुम हिसाब मांग रहे हो? तुमने तो राम मंदिर की एक ईंट के लिए एक फूटी कौड़ी का चंदा नहीं दिया! तुमने तो बाबरी मस्जिद बचाने वाले वकीलों को अपनी जेबें भर-भर कर पैसे दिए, लेकिन रामलला के नाम पर तुम्हारी तिजोरियों पर सांप लोट गए।

तो फिर तुम कौन होते हो रामभक्तों और उनके भगवान के बीच में आने वाले? तुम कौन होते हो उस ट्रस्ट से हिसाब मांगने वाले?

अगर किसी हिंदू को लगेगा की उसके पैसे का गलत इस्तेमाल हुआ है, तो वो खुद मंदिर के ट्रस्टियों का कॉलर पकड़ने की औकात रखता है।

लेकिन जिन गद्दारों ने राम मंदिर को रोकने के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी लगा दी, उनके गंदे और खूनी मुंह से ‘राम मंदिर के चंदे की चिंता’ बिल्कुल शोभा नहीं देती।

ये तो ऐसा ही है जैसे कोई कसाई अचानक से गौ रक्षा की बात करने लगे!

राम मंदिर चंदे के नाम पर करोड़ों हिन्दुओं को ‘बांटने’ का कांग्रेसी ब्लूप्रिंट

अगर कोई सीधा-सादा हिंदू ये सोच रहा है की कांग्रेस को सच में चंदे के पैसे की चिंता है, तो वो इस सेक्युलर फ्रॉड की गहराई को अभी तक समझ ही नहीं पाया है।

अरे भाई, ये पूरा का पूरा खेल चंदे या पैसे का है ही नहीं! ये एक बहुत ही ज़हरीला साइकोलॉजिकल वॉर है जिसे वामपंथी इकोसिस्टम और कांग्रेस ने मिलकर डिज़ाइन किया है।

इन गद्दारों को बहुत अच्छे से पता है की आज की तारीख में राम मंदिर भारत के करोड़ों हिंदुओं की ‘सनातन एकता’ का सबसे बड़ा और सबसे अभेद्य प्रतीक बन चुका है।

500 सालों के इंतज़ार के बाद जब हिंदू ने अपने रामलला को भव्य मंदिर में विराजमान होते देखा, तो वो जात-पात की बेड़ियों को तोड़कर एक ‘विराट हिंदू’ बन गया।

और यही वो हिंदू एकता है जिससे इन वामपंथियों और जिहादी तुष्टिकरण करने वाले नेताओं की पैंट गीली हो रही है।

इन्हें पता है की अगर हिंदू ऐसे ही राम के नाम पर एक रहा, तो इनकी वो पुरानी ‘बांटो और राज करो’ वाली राजनीति हमेशा के लिए दफन हो जाएगी।

इसलिए इन्होंने ये ‘चंदा चोरी’ का नया शिगूफा छोड़ा है। इनका सीधा सा ब्लूप्रिंट है- आम हिंदू के दिमाग में ज़हर घोलो। उसके मन में शक के बीज बो दो की “अरे, तुमने जो पैसा दिया था, वो तो पुजारियों और ट्रस्टियों ने खा लिया।”

ये चाहते हैं की हिंदू समाज एक बार फिर से टूट जाए, वो मंदिर ट्रस्ट को गालियां देने लगे, वो राम मंदिर से ही नफरत करने लगे और वापस इनकी उसी सेक्युलर गुलामी में लौट आए।

और ये सब किसके लिए किया जा रहा है? ये सब कुछ सिर्फ और सिर्फ अपने उस खास ‘जिहादी वोटबैंक’ को खुश करने के लिए किया जा रहा है, जिसे अयोध्या की उस ज़मीन पर राम मंदिर का वो भव्य शिखर आज भी अपनी आंखों में कांटे की तरह खटकता है।

ये 5 अगस्त को काले कपड़े पहनने वाले लोग आज चंदे का बहाना बनाकर उसी मुस्लिम वोटबैंक के सामने अपनी वफादारी साबित कर रहे हैं-

की “देखो, हम आज भी राम मंदिर को बदनाम करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे।” ये एक एजेंडा है, और हिंदू को इस एजेंडे को जूतों से कुचलना होगा।

चुनाव आते ही कोट के ऊपर जनेऊ पहनने वाले इन गिरगिटों को अब अच्छे से पहचान गया हिंदू समाज

इस देश की राजनीति में कांग्रेस ने जो पाखंड और जो नीचता दिखाई है, उसका कोई मुकाबला नहीं है। ज़रा इन कांग्रेसी नेताओं का वो चुनावी ‘हिंदू अवतार’ याद कीजिए।

जब पांच साल तक इन्हें सत्ता से बाहर रहना पड़ता है, तो ये इफ्तार पार्टियों में जाकर जालीदार टोपियां पहनते हैं और ‘भाईचारे’ का ज़हर उगलते हैं। लेकिन जैसे ही चुनाव की तारीखें पास आती हैं, इनके अंदर अचानक से एक ‘पार्ट-टाइम हिंदू’ जाग उठता है।

फिर शुरू होता है इनका वो पाखंड! ये बड़े-बड़े नेता अचानक से अपने विदेशी कोट के ऊपर ‘जनेऊ’ पहन कर रैलियों में घूमने लगते हैं।

कोई खुद को ‘दत्तात्रेय गोत्र का ब्राह्मण’ बताने लगता है, तो कोई माथे पर बड़ा सा त्रिपुंड लगाकर शिव भक्त होने का नाटक करने लगता है।

चुनावों के दौरान इन्हें देश का हर बड़ा मंदिर याद आ जाता है। ये कैमरों की फौज लेकर मंदिरों में मत्था टेकने जाते हैं ताकि सीधा-सादा हिंदू इनके इस जाल में फंस जाए।

लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं, इनका वो जनेऊ उतर कर वापस उसी अलमारी में बंद हो जाता है और ये फिर से अपने उसी जिहादी इकोसिस्टम की गोद में जाकर बैठ जाते हैं।

जो नेता कल तक खुद को राम और शिव का भक्त बता रहा था, वही नेता संसद में खड़े होकर राम मंदिर के खिलाफ ज़हर उगलना शुरू कर देता है।

लेकिन अब भारत का हिंदू वो 1990 वाला बेचारा हिंदू नहीं है जिसे तुम अपने झूठे वादों और चुनावी जनेऊ से बेवकूफ बना लोगे।

आज का सनातनी बहुत अच्छी तरह से जाग चुका है। उसे 5 अगस्त का वो ‘ब्लैक फ्राइडे’ भी याद है और सुप्रीम कोर्ट में दिया गया वो ‘काल्पनिक राम’ वाला हलफनामा भी याद है।

कांग्रेसी गिद्धों को समझ लेना चाहिए की रामलला हमारे हैं, राम मंदिर हमारा है, और उस मंदिर में लगा एक-एक पत्थर और चंदे का एक-एक रुपया भी हमारा है।

जो लोग बाबरी मस्जिद की पैरवी करते-करते बूढ़े हो गए, वो हमारे मंदिर के मामलों से अपनी नापाक और गंदी राजनीति को मीलों दूर रखें।

तुम्हारा ये चंदे के नाम पर हमारे समाज में फूट डालने का ज़हरीला एजेंडा बंद करो!

जय श्री राम!

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