NEET के नाम पर पब्लिक प्रॉपर्टी पर अंधाधुंध पत्थरबाजी, 118 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल, दिल्ली की सड़कों पर दंगे करने वाले क्या ये वाकई देश के ‘होनहार’ छात्र या देश तोड़ने वाले ‘मलीन तत्व’?

सच कहूं तो, कल 20 जुलाई को दिल्ली की सड़कों पर जो खौफनाक मंज़र देखने को मिला, उसने इस देश के हर सच्चे और शांति पसंद नागरिक का खून खौला कर रख दिया है।

सोशल मीडिया पर वामपंथी इकोसिस्टम हमें दिन-रात ये पट्टी पढ़ाने की कोशिश कर रहा है की ये “NEET पेपर लीक के सताए हुए बेचारे मासूम छात्र” हैं, जो सिस्टम से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं।

अरे भाई, एक असली छात्र, जिसे आगे चलकर डॉक्टर बनना है और लोगों की जान बचानी है, वो दिन-रात लाइब्रेरी में बैठकर किताबें पड़ता है।

वो सड़क पर आकर पुलिस की गाड़ियां नहीं फूंकता! वो महिला पुलिसकर्मियों पर डंडे नहीं चलाता और अफसरों के सिर पर ईंट-पत्थर नहीं मारता!

कल जंतर-मंतर से लेकर कनॉट प्लेस तक Cockroach Janta Party और लेफ्ट विंग के इन तथाकथित ‘छात्रों’ ने जो नंगा नाच किया है, वो NEET के नाम पर देश की राजधानी को दहलाने की एक बेहद नीच और सुनियोजित साजिश थी।

किताबों की जगह हाथों में पत्थर लेकर दिल्ली को दहलाने वाला ये कैसा ‘छात्र आंदोलन’

ज़रा दिमाग पर ज़ोर डालिए। एक छात्र, जिसे डॉक्टर बनकर लोगों की जान बचानी है, वो अचानक अपने हाथों में पेन और किताबें छोड़कर ईंट और पत्थर कैसे उठा सकता है?

कल दिल्ली की सड़कों पर जो बवाल काटा गया, उसका NEET पेपर लीक या शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं दिख रहा था। वो तो बस एक मुखौटा था, एक बहुत ही सस्ता और घटिया बहाना!

असली मकसद तो कुछ और ही था। कल मानसून सत्र (Monsoon Session) का पहला दिन था। पूरी दुनिया की नज़रें भारत की संसद पर थीं।

ऐसे मौके पर देश की राजधानी में दंगे भड़काकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को बदनाम करने का इससे बढ़िया मौका इन अर्बन-नक्सलों को और क्या मिलता?

ये जो सड़कों पर पुलिस वालों को गालियां बक रहे थे, बैरिकेड तोड़ रहे थे, ये कोई होनहार छात्र नहीं हैं दोस्त।

ये समाज के वो ‘मलीन तत्व’ हैं, जिन्हें विदेशी टूलकिट और एंटी-इंडिया ताकतों से देश में आग लगाने की बकायदा दिहाड़ी मिलती है।

आप खुद सोचिए ना, जिस उम्र में करियर की टेंशन होनी चाहिए, उस उम्र में ये चेहरे पर रुमाल बांधकर पुलिस पर पत्थर फेंकने की ट्रेनिंग कहां से लेकर आ रहे हैं?

संसद घेरने की आड़ में रची गई खून-खराबे की स्क्रिप्ट, CJP के गुंडों ने किया धारा 163 का सरेआम उल्लंघन

ये कोई अचानक फूटा हुआ छात्रों का गुस्सा नहीं था, बल्कि एक पूरी तरह से प्री-प्लांड स्क्रिप्ट थी। इस पूरी गुंडागर्दी का ठेका लिया था CJP (Cockroach Janta Party) नाम की एक ‘राजनीतिक दुकान’ ने।

इनके साथ कन्धा मिला रहे थे जेएनयू (JNU) और दिल्ली यूनिवर्सिटी में पलने वाले वो वामपंथी छात्र संगठन, जिनका काम पढ़ाई-वढ़ाई छोड़कर सिर्फ देश-विरोधी नारों पर ताली पीटना होता है।

इन लोगों ने बाकायदा सोशल मीडिया पर टूलकिट चलाकर ‘चलो संसद’ का ऐलान किया था। और वो भी तब, जब नई दिल्ली इलाके में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 (यानी पुरानी धारा 144) पहले से लागू थी।

साफ़ कानून है की 5 लोग एक जगह पर इकट्ठा नहीं हो सकते। लेकिन इन उपद्रवियों ने कानून को जूते की नोक पर रखा!

इन्हें लगा की ये दिल्ली को अपनी जागीर समझते हैं। जब पुलिस ने इन्हें जंतर-मंतर के पास रोकने की कोशिश की, तो ये सीधा बैरिकेड फांदकर संसद की तरफ बढ़ने लगे।

और इस आग में घी डालने का काम कौन कर रहा था? पर्दे के पीछे से इस पूरे तमाशे को हवा दे रहे थे सोनम वांगचुक जैसे एक्टिविस्ट, जो अपनी भूख हड़ताल का ड्रामा करके इन दंगाइयों को सहानुभूति बटोरने का मौका दे रहे थे।

उधर CJP का फाउंडर अभिजीत दिपके और उसके गुर्गे लगातार भड़काऊ बयानबाजी करके इन भाड़े के गुंडों को पुलिस पर हमला करने के लिए उकसा रहे थे।

मतलब साफ़ है, इन्हें इंसाफ नहीं चाहिए था, इन्हें दिल्ली की सड़कों पर लाशें गिरानी थीं ताकि उनका राजनीतिक धंधा चमक सके।

खाकी वर्दी पर फेंके गए पत्थर, और 118 घायल पुलिसकर्मी चीख-चीख कर बता रहे इन ‘नक्सल’ छात्रों का असली एजेंडा

अब ज़रा उस दर्दनाक मंज़र की बात कर लेते हैं जिसे वामपंथी मीडिया बहुत ही सफाई से छुपाने की कोशिश कर रहा है।

दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवानों का गुनाह क्या था? वो सिर्फ अपनी ड्यूटी कर रहे थे। उन्होंने इन उपद्रवियों को बैरिकेड लगाकर शांति से रोकने की कोशिश की थी।

लेकिन जवाब में इन ‘मलीन तत्वों’ ने क्या किया? इन्होंने पुलिस फोर्स पर ईंट-पत्थरों की ऐसी भयंकर बारिश कर दी जैसे कोई आतंकी हमला हो रहा हो।

गूगल और पुलिस के लेटेस्ट आंकड़े चीख-चीख कर बता रहे हैं की इस नंगे नाच में 118 से ज्यादा पुलिसकर्मी बुरी तरह लहूलुहान हुए हैं!

118 पुलिसवाले यार! ये कोई छोटा नंबर नहीं है। और सबसे खौफनाक बात तो ये है की इन दंगाइयों ने सिर्फ कांस्टेबलों को नहीं बख्शा।

जॉइंट सीपी (Joint CP), स्पेशल सीपी और डीसीपी लेवल के बड़े अधिकारियों तक के सिर पत्थरों से फोड़े गए। कई पुलिसवालों के हाथ-पैर टूट गए हैं।

और तो और, इन गुंडों की बेशर्मी तो देखिए! महिला पुलिसकर्मियों तक को नहीं छोड़ा गया। ड्यूटी पर तैनात महिला जवानों की वर्दी फाड़ने की कोशिश की गई, उन्हें डंडों से पीटा गया।

दंगे रोकने गए जवानों के हेलमेट और दंगा-रोधी जैकेट (Riot gear) तक छीन लिए गए! अब आप अपने दिल पर हाथ रखकर बताइए, क्या देश का कोई भी ‘असली और होनहार छात्र’ किसी महिला पुलिसकर्मी पर हाथ उठा सकता है?

क्या कोई पढ़ा-लिखा युवा किसी अफसर का सिर फाड़ सकता है? बिल्कुल नहीं! ये हरकतें तो उन खूंखार दंगाइयों की हैं जिन्हें सिर्फ खून-खराबा और गुंडागर्दी की भाषा समझ आती है।

आम जनता की गाड़ियां तोड़ीं और टैक्सपेयर्स की बसों को फूंका क्या देश को जलाकर मिलेगा इन उपद्रवियों को NEET का इंसाफ

दिल्ली का दिल कहे जाने वाले राजीव चौक, कनॉट प्लेस और जनपथ के आउटर सर्कल का जो हाल इन लोगों ने कल किया है, उसे देखकर किसी को भी रोना आ जाए।

पूरी दिल्ली को इन्होंने बंधक बना लिया था। जो पत्थर पुलिस को नहीं लगे, वो इन्होंने आम जनता पर बरसाए।

सड़क के बीच लगे लोहे के भारी-भरकम डिवाइडर उखाड़कर फेंक दिए गए। जो पुलिस की बसें इन्हें डिटेन करने के लिए लाई गई थीं, उनके शीशे चकनाचूर कर दिए गए।

सरकारी गाड़ियों में तो तोड़फोड़ की ही, साथ ही वहां से गुज़र रही आम पब्लिक की गाड़ियों और दुकानों को भी नहीं छोड़ा।

कनॉट प्लेस के व्यापारियों का क्या कसूर था भाई? क्या वो NEET का पेपर सेट करते हैं? फिर उनकी दुकानों के शीशे क्यों तोड़े गए?

हालात इतने भयंकर और बेकाबू हो गए थे की सरकार और प्रशासन को सेंट्रल दिल्ली के 150 से ज्यादा इलाकों में मजबूरन इंटरनेट शटडाउन (Internet Shutdown) करना पड़ा।

ये जो पब्लिक प्रॉपर्टी जला रहे हैं, बसें तोड़ रहे हैं, ये किसी नेता के बाप की जागीर नहीं है। ये हमारे और आपके, यानी इस देश के ईमानदार टैक्सपेयर्स के खून-पसीने की कमाई से खरीदी गई संपत्तियां हैं।

एक तरफ आप कह रहे हो की हमें शिक्षा में रिफॉर्म चाहिए, इंसाफ चाहिए… और दूसरी तरफ आप उसी देश की संपत्ति को आग लगा रहे हो!

क्या टैक्सपेयर्स की बसों को फूंक कर इन्हें NEET का इंसाफ मिल जाएगा? ये सीधा-सीधा देशद्रोह और अर्बन-नक्सलवाद का सबसे घिनौना रूप है जो कल दिल्ली की सड़कों पर देखा गया।

ड्रोन कैमरे से हो रही एक-एक दंगाई की पहचान, अब इनका इलाज करेगी पुलिस की लाठी और पक्की FIR

खैर, जब पानी सिर के ऊपर से गुज़र जाता है, तो कानून को भी अपनी भाषा बदलनी पड़ती है। और कल दिल्ली पुलिस ने वही किया।

जब ये उपद्रवी पुलिसवालों की जान लेने पर उतारू हो गए, तब पुलिस ने अपना रौद्र रूप दिखाया। बहुत हो गया इनका ‘शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट’ का ढोंग!

पुलिस ने दौड़ा-दौड़ा कर इन मलीन तत्वों पर लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोलों से इनकी सारी गर्मी शांत कर दी। कल शाम तक 70 से ज्यादा उपद्रवियों को हिरासत में लिया जा चुका है।

संसद मार्ग और कनॉट प्लेस थानों में दंगा भड़काने, सरकारी काम में बाधा डालने, पब्लिक प्रॉपर्टी तोड़ने और पुलिस पर जानलेवा हमला करने की 5 एकदम पक्की और गैर-ज़मानती FIRs दर्ज़ कर ली गई हैं।

और जो लोग कल पत्थर मारकर गलियों में छुप गए हैं और सोच रहे हैं की वो बच जाएंगे, तो वो भी सुन लें! पुलिस ने कल पूरे इलाके में ड्रोन उड़ाए थे। 250 से ज्यादा CCTV फुटेज और ड्रोन वीडियो पुलिस के पास सुरक्षित हैं।

अब दिल्ली पुलिस साइबर सेल के साथ मिलकर वीडियो को ज़ूम कर-करके एक-एक पत्थरबाज़ की शक्ल की पहचान कर रही है। चुन-चुन कर निकाले जाएंगे ये सारे अर्बन-नक्सल!

अब बस इस देश के हर सच्चे नागरिक की सरकार और सिस्टम से एक ही मांग है- इन पर कोई रहम नहीं होना चाहिए! बहुत हो चुका ये मानवाधिकार का रोना।

जिसने भी कल दिल्ली में पत्थर उठाया है, जिसने भी 118 पुलिसवालों का खून बहाया है और टैक्सपेयर्स की बसों को तोड़ा है, उन पर सीधे तौर पर ‘दंगा-रोधी कानून’ (Anti-Riot Law) ठोकना चाहिए।

ये दिल्ली है, देश की राजधानी! यहां गुंडागर्दी करके अगर तुम सोच रहे हो की हीरो बन जाओगे, तो याद रखना… कानून जब अपना हथौड़ा मारता है, तो ऐसे मलीन तत्वों की सारी हेकड़ी एक ही झटके में निकल जाती है।

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