कभी-कभी सोचकर दिमाग सुन्न हो जाता है की हम किस दौर में जी रहे हैं! दुनिया के किसी भी देश में चले जाओ, वहां के लोग अपने देश की मिट्टी, अपने झंडे और अपने राष्ट्रगीत के लिए जान देने को तैयार रहते हैं।
लेकिन हमारे हिंदुस्तान में एक ऐसा भी ‘खास’ ईकोसिस्टम पनप गया है, जिसे इसी देश का पानी पीने और मुफ़्त का राशन खाने में तो कोई परहेज़ नहीं!
लेकिन जैसे ही इस मिट्टी को ‘मां’ कहने या ‘वन्दे मातरम’ गाने की बात आती है, तो इनके गले में जैसे कांटे चुभने लगते हैं।
अभी 20 जुलाई 2026 को ही संसद का मानसून सत्र शुरू हुआ है।
और जैसे ही गृह मंत्री अमित शाह ने संसद के पटल पर ‘प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर (अमेंडमेंट) बिल, 2026’ रखा, लुटियंस दिल्ली से लेकर हैदराबाद तक एकदम मातम सा पसर गया है।
ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने इन लोगों के मुँह में खौलता हुआ पानी डाल दिया हो। और हो भी क्यों ना?
मोदी सरकार ने इस बार सीधा इनकी उस कट्टरपंथी सोच पर हथौड़ा जो मारा है, जिसकी आड़ में ये सालों से सरेआम देश के राष्ट्रगीत का अपमान करते आ रहे थे।
चलिए आज इस पूरे ईकोसिस्टम, इनकी वामपंथी राजनीति और इनके उस झूठे एजेंडे का पूरा कच्चा-चिट्ठा खोलते हैं, जिससे ये ‘धार्मिक आज़ादी’ के नाम पर पूरे देश में अपना मजहबी एजेंडा फैलाते हैं।
जिस मिट्टी का खाते नमक, उसे मां कहने में निकलती इनकी जान, 3 साल की जेल वाले ‘वन्दे मातरम कानून’ ने कैसे निकाल दी गद्दारों की हवा
ज़रा इतिहास उठाकर देखिए। बंकिम चंद्र चटर्जी के लिखे ‘वन्दे मातरम’ के नारों ने ही इस देश में आज़ादी की वो आग सुलगाई थी जिससे अंग्रेज़ों की रूह कांप जाती थी।
हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमने वाले भगत सिंह जैसे वीरों के होठों पर यही वन्दे मातरम होता था।
लेकिन कमाल की बात देखिए की आज़ादी के 75 सालों बाद तक, हमारे देश में इस पवित्र राष्ट्रगीत को वो कानूनी कवच नहीं मिल पाया जिसका ये हक़दार था।
अब तक नियम क्या था? अगर कोई राष्ट्रगान (जन-गण-मन) या तिरंगे का अपमान करता था, तो उस पर सख्त कानूनी कार्रवाई होती थी।
लेकिन वन्दे मातरम के मामले में एक अजीब सी छूट मिली हुई थी। इसी छूट का फायदा उठाकर कुछ कट्टरपंथी नेता, वामपंथी प्रोफेसर और तथाकथित लिबरल टीवी डिबेट्स में बैठकर सरेआम कहते थे की “हम वन्दे मातरम नहीं गाएंगे, कर लो जो करना है।”
लेकिन अब ये हेकड़ी हमेशा के लिए खत्म होने वाली है! अमित शाह जो नया अमेंडमेंट बिल (2026) लेकर आए हैं, उसने इस पूरे ईकोसिस्टम की हवा टाइट कर दी है।
इस नए कानून के तहत अब राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम’ का अपमान करना, उसे गाने वालों को रोकना, या उसे गाते समय बीच में कोई भी ड्रामा करके बाधा डालना सीधा-सीधा एक क्रिमिनल ऑफेंस (आपराधिक कृत्य) माना जाएगा।
और सज़ा? कोई छोटी-मोटी सज़ा नहीं… सीधे 3 साल की जेल, तगड़ा जुर्माना या दोनों!
मतलब साफ है। अब अगर कोई माइक पर आकर ये कहेगा की वो वन्दे मातरम का सम्मान नहीं करेगा, तो उसे मानवाधिकार या सेक्युलरिज्म की कोई ढाल नहीं बचा पाएगी।
पुलिस सीधा कॉलर पकड़ेगी और 3 साल के लिए कालकोठरी में डाल देगी। इसी 3 साल की जेल वाले डंडे ने आज इन सारे वोटबैंक के ठेकेदारों की रातों की नींद उड़ा रखी है।
जिस मिट्टी का नमक खाते हैं, जिस देश की सड़कों पर चलते हैं, उसी को प्रणाम करने में जिन्हें मौत आती थी, आज वो सब एक सुर में छाती पीट रहे हैं की “लोकतंत्र खतरे में आ गया है!” अरे भाई, लोकतंत्र तुम्हारे देश का अपमान करने के लिए नहीं बना है।
“कनपटी पर बंदूक रख दो, तब भी नहीं गाऊंगा वन्दे मातरम” बोलने वाले AIMIM के वारिस पठान की अब निकलेगी हेकड़ी
अब बात करते हैं उस इंसान की जिसे इस कानून से सबसे भयंकर मिर्ची लगी है- असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM!
AIMIM के सबसे बड़बोला नेता, वारिस पठान वही जनाब हैं जिन्हें अक्सर टीवी डिबेट्स में जहर उगलते हुए देखा जाता है।
जैसे ही वन्दे मातरम को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाने और अपमान पर सज़ा देने की बात सामने आई, वारिस पठान ने मीडिया के सामने आकर सरेआम धमकी दे डाली की “हम किसी भी कीमत पर वन्दे मातरम नहीं गाएंगे, हम इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएंगे।”
वारिस पठान का घमंड तो देखिए! ये वही नेता है जिसने पहले भी कई बार विधानसभा और कैमरों के सामने डंके की चोट पर कहा है की “कोई मेरी कनपटी पर रिवॉल्वर भी रख दे, तो भी मैं वन्दे मातरम या भारत माता की जय नहीं बोलूंगा।”
अरे भाई पठान साहब! रिवॉल्वर तो कोई क्रिमिनल रखता है। अब पुलिस रिवॉल्वर नहीं रखेगी, अब पुलिस सीधे हाथ में हथकड़ी डालेगी और इस नए कानून के तहत 3 साल के लिए अंदर कर देगी। तब देखते हैं की ये कनपटी वाला घमंड कहां जाता है!
इनका सबसे बड़ा पाखंड देखिए। जब भी देश के सम्मान की बात आती है, ये तुरंत संविधान की किताब के पीछे छिप जाते हैं।
वारिस पठान और ओवैसी जैसे लोग तर्क दे रहे हैं की देश का संविधान ‘अनुच्छेद 25’ (Article 25) के तहत हमें अपने धर्म का पालन करने की आज़ादी देता है, इसलिए सरकार हम पर ज़बरदस्ती वन्दे मातरम नहीं थोप सकती।
इनका रोना ये है की इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी और के आगे सिर झुकाना या किसी मातृभूमि की वंदना करना ‘शिर्क’ (पाप/कुफ्र) माना जाता है।
मतलब क्या मज़ाक चल रहा है देश में? जब इन्हें अपने राजनीतिक फायदे के लिए सड़क घेरकर नमाज़ पढ़नी होती है, लाउडस्पीकर बजाने होते हैं, या मुफ़्त की सब्सिडी लेनी होती है, तब इन्हें भारत का संविधान बहुत अच्छा लगता है।
लेकिन जब उसी संविधान के तहत देश के राष्ट्रगीत का सम्मान करने की बात आती है, तो इन्हें अचानक अपने मज़हब की याद आ जाती है!
इनका असली दर्द आर्टिकल 25 नहीं है दोस्त, इनका असली दर्द वो जिहादी मानसिकता है जो इन्हें बचपन से घुट्टी में पिलाई जाती है।
अगर तुम्हें इस मिट्टी को मां कहने से लगता है की तुम्हारा मज़हब खतरे में आ जाएगा, तो भाई ये तुम्हारा पर्सनल प्रॉब्लम है, देश का नहीं।
देश अपने राष्ट्रगीत की गरिमा से कोई समझौता नहीं करेगा। वारिस पठान जैसों को अब समझ लेना चाहिए की वो दौर लद गए जब तुम वन्दे मातरम का अपमान करके अपने जैसे दूसरे जिहादियों की तालियां बटोरते थे।
अब अगर संसद या सड़क पर ये गुंडागर्दी दिखाई, तो कानून का डंडा ऐसी जगह पड़ेगा की सारा ‘शिर्क’ और ‘आर्टिकल 25’ का ज्ञान भूल जाओगे।
मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए नेहरू ने किए थे वन्दे मातरम के टुकड़े, आज उसी बिल का विरोध करके कांग्रेस ने फिर दिखा दिया अपना मुस्लिम लीग वाला जिहादी चेहरा
अगर आपको लगता है की वन्दे मातरम से नफरत करने वाली ये बीमारी सिर्फ ओवैसी या वारिस पठान जैसे जिहादी नेताओं तक सीमित है, तो आप बहुत बड़े मुगालते में जी रहे हैं दोस्त!
इस नफरत का असली बीज तो दशकों पहले उसी पार्टी ने बोया था, जो आज खुद को देश की सबसे पुरानी और ‘सेक्युलर’ पार्टी कहती है- यानी हमारी कांग्रेस पार्टी।
आज जब संसद में इस राष्ट्रगीत को सम्मान दिलाने वाला बिल पेश हुआ है, तो कांग्रेस के नेता जिस तरह से सर पीट-पीट कर इसका विरोध कर रहे हैं, उसने एक बार फिर साबित कर दिया है की इनका डीएनए आज भी वही ‘मुस्लिम लीग’ वाला ही है।
ज़रा इतिहास के पन्नों पर जमी धूल हटाकर देखिए, आपको कांग्रेस के तुष्टिकरण का सबसे खौफनाक और घिनौना सच नज़र आएगा। बात 1937 की है।
आज़ादी की लड़ाई अपने चरम पर थी और पूरे देश को एक सूत्र में बांधने वाला सिर्फ एक ही नारा था- ‘वन्दे मातरम’।
लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना और उसकी मुस्लिम लीग को इस गीत से बड़ी भयंकर मिर्ची लग गई।
जिन्ना का वही पुराना रोना था की इस गीत में मातृभूमि की वंदना (खासकर देवी दुर्गा के रूप में) की गई है, जो इस्लाम के खिलाफ है।
अब कायदे से तो उस वक्त के कांग्रेसी नेताओं को जिन्ना को दो टूक जवाब देना चाहिए था की भाई, ये देश का गीत है, तुम्हें गाना है तो गाओ, नहीं गाना है तो भाड़ में जाओ!
लेकिन हमारे ‘चाचा’ जवाहरलाल नेहरू जी ने क्या किया? मुस्लिम वोटबैंक और जिन्ना को खुश करने के लिए उन्होंने देश के राष्ट्रगीत के टुकड़े कर दिए!
जी हाँ, कांग्रेस ने एक समिति बनाई और फैसला किया की वन्दे मातरम के सिर्फ शुरुआती दो पैरे (Stanzas) ही गाए जाएंगे, और बाकी का वो हिस्सा हटा दिया जाएगा जिसमें हिन्दू देवी-देवताओं का ज़िक्र है।
सोचिए ज़रा! जिस गीत को गाते हुए हज़ारों क्रन्तिकारी फांसी पर चढ़ गए, उस गीत को कांग्रेस ने महज़ जिहादियों को खुश करने के लिए काट-छांट दिया।
तुष्टिकरण की राजनीति का इससे नंगा नाच और क्या हो सकता है?
और आज 2026 में जब मोदी सरकार और अमित शाह उसी वन्दे मातरम को उसका पूरा हक़ और कानूनी सुरक्षा (3 साल की जेल का प्रावधान) देने जा रहे हैं, तो कांग्रेस फिर से उसी जिहादी मानसिकता के साथ खड़ी हो गई है।
संसद के अंदर कांग्रेसी नेता तर्क दे रहे हैं की संविधान सभा ने जन-गण-मन और वन्दे मातरम का दर्जा अलग-अलग रखा था, सरकार सिर्फ अपना ‘हिन्दुत्व का एजेंडा’ थोप रही है।
लेकिन फिर बीजेपी के प्रवक्ता शहज़ाद पूनावाला ने बिल्कुल सही आईना दिखाया इन कांग्रेसियों को। उन्होंने सरेआम याद दिलाया की कैसे कांग्रेस ने हमेशा से मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए राष्ट्र के स्वाभिमान से समझौता किया है।
आज कांग्रेस का ये विरोध किसी लोकतंत्र को बचाने के लिए नहीं है, बल्कि उस जिहादी वोटबैंक को बचाने के लिए है जो भारत की मिट्टी को मां कहने से कतराता है।
आज कांग्रेस ने साबित कर दिया है की जिन्ना तो चला गया, लेकिन उसकी सोच आज भी कांग्रेस के दफ्तरों में ज़िंदा है।
चीन के तलवे चाटने वाले वामपंथियों को भारत माता की जय से होती भयंकर एलर्जी, ‘जॉन ब्रिटास’ और कम्युनिस्टों की ये कैसी देश विरोधी सोच
कांग्रेस का रोना-धोना तो फिर भी समझ आता है की उन्हें चुनाव जीतने हैं, लेकिन इस देश में एक ऐसी भी प्रजाति पाई जाती है जिसे भारत की हर उस चीज़ से नफरत है जिस पर हमें गर्व है।
ये प्रजाति है- हमारे देश के लाल सलाम वाले वामपंथी यानी कम्युनिस्ट! जैसे ही वन्दे मातरम बिल मानसून सत्र में आया, इन वामपंथियों के खेमे में ऐसा भूकंप आ गया जैसे किसी ने इनकी कोई विदेशी फंडिंग रोक दी हो।
सीपीआई-एम (CPI-M) के सांसद जॉन ब्रिटास का नाम तो आपने सुना ही होगा। ये जनाब संसद में इस ऐतिहासिक बिल को रुकवाने के लिए बाकायदा रूल 67 (Rule 67) के तहत नोटिस लेकर खड़े हो गए।
और इनका तर्क सुनेंगे तो आप अपना सिर पीट लेंगे! ब्रिटास महोदय का कहना है की वन्दे मातरम को अनिवार्य बनाना और इसके अपमान पर जेल भेजना पूरी तरह से “असंवैधानिक” है।
इनका ज्ञान ये है की इससे भारत के “प्लुरलिज़्म” (Pluralism – बहुलवाद) और अंतरात्मा की आज़ादी (Freedom of Conscience) को बहुत बड़ा खतरा है।
अरे ब्रिटास बाबू! थोड़ा अपने गिरेबान में झांक कर तो देखो! तुम उस कम्युनिस्ट विचारधारा से आते हो जो रूस और चीन में पलती-बढ़ती है।
तुम्हारे लिए चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के आगे दुम हिलाना ‘आज़ादी’ है, लेकिन जब अपने ही देश की मातृभूमि को सम्मान देने की बात आती है, तो तुम्हें अचानक ‘प्लुरलिज़्म’ और लोकतंत्र याद आ जाता है?
इन वामपंथियों की ये कैसी देश विरोधी सोच है भाई? इनके हिसाब से देश की सड़कों पर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के नारे लगाना तो ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ (Freedom of Speech) है!
लेकिन अगर देश की संसद राष्ट्रगीत का अपमान करने वालों को जेल भेजने का कानून बना दे, तो इनके लिए लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है। सच तो ये है की कम्युनिस्टों को कभी भी भारत की सांस्कृतिक पहचान पची ही नहीं।
तमिलनाडु के एक और ऐसे ही लिबरल हैं- पी.बी. प्रिंस गजेंद्र बाबू, जो SPCSS-TN नाम का कोई संगठन चलाते हैं।
इन महाशय ने तो बाकायदा सभी सांसदों को चिट्ठी लिख मारी की भाई किसी भी तरह इस बिल को पास होने से रोको!
इनका तर्क सुनेंगे तो आपको समझ आएगा की हिन्दुओं से इन्हें कितनी भयंकर नफरत है। ये प्रोफेसर कह रहे हैं की ‘वन्दे मातरम’ बंकिम चंद्र चटर्जी की नोवेल ‘आनंदमठ’ से लिया गया है।
और ‘आनंदमठ’ पूरी तरह से हिन्दू सन्यासियों के विद्रोह और हिन्दू विचारधारा पर आधारित किताब है। इसलिए इसे पूरे देश पर थोपना संविधान के खिलाफ है।
मतलब समझ रहे हैं आप? इस देश में हिन्दुओं की बात करना, उनके साहित्य को पढ़ना, या अपनी ही धरती की वंदना करना इन लिबरलों के लिए गुनाह हो गया है!
आनंदमठ से इन्हें चिढ़ इसलिए है क्योंकि वो किताब जिहादियों और विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ सनातनी विद्रोह का सबसे बड़ा प्रतीक है।
ये अर्बन नक्सल चाहते हैं की हमारे बच्चे बस बाबर, औरंगज़ेब और अंग्रेज़ों की झूठी महानता पढ़ें।
याद कीजिए, मार्च 2026 में जब गृह मंत्रालय ने स्कूलों और सरकारी कार्यक्रमों में वन्दे मातरम गाना अनिवार्य करने का फैसला लिया था, तब मोहम्मद सईद नूरी नाम के एक शख्स ने सीधा सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ अर्ज़ी डाल दी थी।
ये लोग इस बात से बौखलाए हुए हैं की अब तक ये बड़ी आसानी से अपने विश्विद्यालयों (जैसे JNU और जादवपुर) में बैठकर राष्ट्रगीत का मज़ाक उड़ा लेते थे।
कभी डिबेट्स में वन्दे मातरम गाने से इनकार करके खुद को बहुत बड़ा ‘इंटेलेक्चुअल’ (Intellectual) साबित करते थे। लेकिन अब सरकार ने इनके इस ‘इंटेलेक्चुअल आतंकवाद’ पर सीधा कानून का हथौड़ा मार दिया है।
अब अगर किसी वामपंथी प्रोफेसर या नेता ने वन्दे मातरम का अपमान किया या इसे गाने वालों को रोका, तो उसे कोई रूल 67 नहीं बचा पाएगा।
सीधा 3 साल के लिए अंदर जाएगा और वहीं बैठकर अपना कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो पढ़ता रहेगा। इनकी बौखलाहट ही इस बात का सबसे बड़ा सुबूत है की मोदी सरकार ने एकदम सही नब्ज़ पर चोट की है।
अगर ‘वन्दे मातरम’ गाना इनके मजहब में ‘कुफ्र’ है तो फिर इसी ‘काफिर धरती’ का ‘अनाज’ क्यों चबाते हो
अब एक सीधा, सच्चा और बहुत ही तीखा सवाल है जो आज देश का हर सनातनी नागरिक इन शांतिदूतों से पूछना चाहता है।
अरे भाई, अगर तुम्हें हमारी मातृभूमि से इतनी ही नफरत है, अगर तुम्हें इस मिट्टी को प्रणाम करने में ‘शिर्क’ या ‘कुफ्र’ (पाप) नज़र आता है, तो फिर इसी काफिर धरती का अनाज क्यों चबाते हो?
इसी मिट्टी पर बने मकानों में क्यों रहते हो? इसी देश के टैक्सपेयर्स के पैसों से चलने वाली मुफ़्त की योजनाओं, राशन और सब्सिडी का मज़ा क्यों लेते हो?
जब तुम्हें भारत माता की जय बोलने में मौत आती है, तो फिर यहां छाती पीटने का क्या मतलब है? चले जाओ ना किसी ऐसे देश में जहां तुम्हारा मज़हब तुम्हें अपनी धरती से गद्दारी करना ना सिखाता हो!
इनका दोगलापन तो देखिए। जब यही शांतिदूत नौकरी या मज़दूरी करने के लिए खाड़ी देशों (जैसे सऊदी अरब, कतर, ओमान या दुबई) में जाते हैं, तो वहां जाकर एकदम भीगी बिल्ली बन जाते हैं।
वहां का शेख अगर इन्हें 50 कोड़े मारने का कानून बना दे, तो ये चुपचाप अपनी पीठ आगे कर देते हैं। वहां के किसी कानून के खिलाफ इनके मुंह से उफ़ तक नहीं निकलती!
वहां कोई वारिस पठान जाकर ये नहीं कहता की “मेरी कनपटी पर बंदूक भी रख दो तो मैं सऊदी का कानून नहीं मानूंगा।” वहां इनकी सारी ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ और ‘आर्टिकल 25’ बुर्के के अंदर छिप जाता है।
लेकिन जैसे ही ये लौटकर भारत आते हैं, इन्हें अचानक लोकतंत्र का बुखार चढ़ जाता है। ऐसा क्यों? क्योंकि ये जानते हैं की भारत का समाज सहिष्णु (Tolerant) है।
इन्हें पता है की यहाँ का हिन्दू बहुसंख्यक होकर भी सबको गले लगाता है। और इसी सहिष्णुता को इन्होंने हमारी कमज़ोरी समझ लिया है।
इन्होंने सोच लिया की हिन्दू चुप बैठा रहेगा और ये सरेआम हमारी आस्था, हमारे राष्ट्रगीत और हमारी मां (मातृभूमि) का अपमान करते रहेंगे।
लेकिन मोदी सरकार के इस एक कानून ने इनके इस घमंड को बीच चौराहे पर लाकर चकनाचूर कर दिया है।
भारत माता की जय! वन्दे मातरम!
