हॉलीवुड की वो फिल्म ‘300 स्पार्टन्स’ तो आपने देखी ही होगी? पूरी दुनिया उस कहानी पर पागल रहती है की कैसे 300 योद्धाओं ने एक विशाल फौज का सामना किया था।
लेकिन सच कहूँ तो, जब बात हमारे हिन्दू इतिहास और मराठा शौर्य की आती है ना, तो ये हॉलीवुड की कहानियां भी एकदम फीकी और हवा-हवाई लगने लगती हैं।
ज़रा सोचिए, क्या आपने कभी किसी ऐसे पागलपन या ऐसे भयंकर साहस के बारे में सुना है जहाँ महज़ 7 लोग… जी हाँ, सिर्फ 7 योद्धा 15,000 की खूंखार और हथियारों से लैस जिहादी फौज के बीच नंगी तलवारें लेकर घुस जाएं?
ये कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं है दोस्तों! ये हमारे मराठा इतिहास का वो खौफनाक और खून से सना हुआ पन्ना है, जिसे पढ़कर आज भी महाराष्ट्र के गांव-गांव में लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
आज हम बात करने जा रहे हैं छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना के शूरवीर कमांडर ‘प्रतापराव गुजर’ की, जिसकी एक दहाड़ से दिल्ली के तख्त पर बैठे मुगलों के पसीने छूट जाते थे।
हम बात कर रहे हैं उसी महा-योद्धा की, जिसने अपने राजा के एक ताने की खातिर 15,000 जिहादियों के बीच मौत का वो क्रूर तांडव किया था जो इतिहास में अमर हो गया।
वो खूंखार मराठा शूरवीर जिसके नाम से कांपती थी मुगलिया सल्तनत, ‘कुड़तोजी’ कैसे बने शिवाजी महाराज के घातक सेनापति ‘प्रतापराव गुजर’
शुरुआत से शुरू करते हैं। इस महा-योद्धा का असली नाम प्रतापराव नहीं, बल्कि ‘कुड़तोजी गुजर’ (Kudtoji Gujar) था। कुड़तोजी एक भीमकाय, फौलादी सीने वाले और एकदम निडर योद्धा थे।
उनके बारे में कहा जाता है की जब वो युद्ध के मैदान में अपनी भारी-भरकम तलवार लेकर उतरते थे, तो मुगलों और पठानों की सेना में भगदड़ मच जाती थी।
उनका काम करने का तरीका एकदम आक्रामक था.. दुश्मन को सोचने का मौका ही मत दो, बस टूट पड़ो!
उस वक्त छत्रपति शिवाजी महाराज अपने स्वराज्य का विस्तार कर रहे थे।
महाराज के सबसे भरोसेमंद और खूंखार सेनापति नेताजी पालकर जब किसी कारणवश मुगलों के खेमे में चले गए (जिन्हें बाद में महाराज वापस स्वराज्य में ले आए थे), तो महाराज को अपनी विशाल मराठा सेना को लीड करने के लिए एक नए ‘सरसेनापति’ (Commander-in-Chief) की तलाश थी।
उन्हें एक ऐसा आदमी चाहिए था जिसके नाम में खौफ हो, जिसकी रगों में स्वराज्य के लिए आग दौड़ती हो और जो अपने राजा के लिए जान देने से एक पल भी पीछे ना हटे।
महाराज की पारखी नज़रों ने कुड़तोजी गुजर को चुन लिया। कुड़तोजी की वो भयंकर आक्रामकता और स्वराज्य के प्रति उनकी अंधी वफादारी देखकर ही शिवाजी महाराज ने उन्हें एक नया नाम और एक नई उपाधि दी- ‘प्रतापराव’!
उसी दिन से कुड़तोजी गुजर, पूरे स्वराज्य के सरसेनापति प्रतापराव गुजर बन गए। और यकीन मानिए, महाराज का ये फैसला मुगलों के लिए साक्षात काल बनकर साबित हुआ।
प्रतापराव गुजर ने किया सल्हेर के मैदान में मुगलों का भयंकर संहार, जब पहली बार खुले मैदान में किसी हिन्दू सेना ने तोड़ा था दिल्ली का गुरूर
1672 का ‘सल्हेर का महायुद्ध’ खुले मैदान (Open Field) में लड़ा गया दुनिया का वो सबसे खूंखार युद्ध था, जिसने मुगलिया सल्तनत की रीढ़ की हड्डी तोड़ कर रख दी थी।
और इस युद्ध में मराठा सेना को कौन लीड कर रहा था? हमारे प्रतापराव गुजर!
मुगलों ने इखलास खान और बहलोल खान जैसे अपने सबसे क्रूर और खतरनाक कमांडरों के नेतृत्व में 40,000 से ज़्यादा सैनिकों की एक विशाल शाही फौज सल्हेर के मैदान में उतार दी थी।
मुगलों को अपने गुरूर में लगता था की खुले मैदान में तो वो अजेय हैं, उन्हें कोई हिन्दू सेना नहीं हरा सकती। लेकिन उस दिन प्रतापराव गुजर और उनकी मराठा सेना ने जो कहर ढाया, वो दिल्ली दरबार कभी नहीं भूल पाया।
मराठे भूखे शेरों की तरह मुगलों पर टूट पड़े। तलवारों, भालों और हाथियों से ऐसा भयंकर कत्लेआम हुआ की 40,000 मुगलों की फौज बेरहमी से कटने लगी।
प्रतापराव गुजर ने खुद अपनी तलवार से जाने कितने जिहादी कमांडरों को मौत के घाट उतार दिया। उस खुले मैदान में पठानों और मुगलों की लाशों के पहाड़ लग गए।
इखलास खान और बहलोल खान जैसे क्रूर मुगलों को मराठों ने ज़िंदा बंदी बना लिया!
ये भारत के इतिहास का वो स्वर्णिम दिन था जब पहली बार किसी हिन्दू सेना ने खुले मैदान में दिल्ली के गुरूर को जूतों तले रौंद दिया था।
इस युद्ध के बाद तो प्रतापराव गुजर का नाम सुनते ही मुगलों की छावनियों में सन्नाटा छा जाता था।
उमरानी के युद्ध में प्रतापराव गुजर की गद्दार बहलोल खान को माफ़ करने की वो सबसे बड़ी भूल जिसने लिख दी इस खूनी इतिहास की पटकथा
सल्हेर में मिली उस भयंकर हार के बाद मुगलों और आदिलशाही को समझ आ गया था की प्रतापराव को सीधी लड़ाई में हराना नामुमकिन है।
लेकिन ये जिहादी अपनी फितरत से कहाँ बाज़ आने वाले थे!
अप्रैल 1673 के आस-पास, आदिलशाही का वही पुराना और धूर्त पठान सेनापति- बहलोल खान (Bahlol Khan) एक बहुत बड़ी फौज लेकर फिर से स्वराज्य के हिस्से में लूट-पाट करने निकल पड़ा।
जैसे ही ये खबर प्रतापराव गुजर को मिली, वो अपनी सेना लेकर आंधी की तरह वहां पहुँच गए। उमरानी (Umrani) नाम की जगह पर प्रतापराव ने बहलोल खान और उसकी पूरी खूंखार फौज को चारों तरफ से ऐसा घेरा की परिंदा भी पर ना मार सके।
और प्रतापराव ने सबसे तगड़ा मास्टरस्ट्रोक ये खेला की उन्होंने दुश्मनों के कैंप का पानी बंद कर दिया!
ज़रा सोचिए वो नज़ारा… अप्रैल की चिलचिलाती गर्मी, पठानों का पूरा कैंप मराठों के घेरे में और पीने के लिए पानी की एक बूंद नहीं!
प्यास के मारे पठानों के गले सूखने लगे, उनके घोड़े और हाथी तड़प-तड़प कर मरने लगे। जो पठान घेरा तोड़कर भागने की कोशिश करता, मराठों की तलवारें तुरंत उसका सिर धड़ से अलग कर देतीं।
जब बहलोल खान को लगा की अब उसका और उसकी पूरी फौज का यहाँ से ज़िंदा बचकर जाना नामुमकिन है, तो उसने अपना सबसे गंदा हथियार इस्तेमाल किया- ‘माफ़ी का नाटक’।
ये धूर्त पठान प्रतापराव गुजर के पैरों में गिर पड़ा। वो गिड़गिड़ाने लगा और रोते-रोते कुरान की कसमें खाने लगा।
उसने कहा की “मुझे इस बार ज़िंदा छोड़ दो, मैं कसम खाता हूँ की आज के बाद कभी स्वराज्य की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखूंगा।”
और बस… यहीं पर प्रतापराव गुजर से वो एक गलती हो गई जिसने आगे चलकर इतिहास का सबसे खूनी पन्ना लिख दिया।
हमारे हिन्दू धर्म में हमेशा से ये सिखाया गया है- ‘क्षमा वीरस्य भूषणम्’ (क्षमा करना वीरों का आभूषण है)। प्रतापराव एक निहायत ही सीधे और संस्कारी हिन्दू योद्धा थे।
उन्हें लगा की जब दुश्मन हथियार डालकर पैरों में गिर गया है और अपनी पवित्र किताब की कसम खा रहा है, तो उसे मारना धर्म के खिलाफ होगा।
इसी दया और हिन्दू संस्कार के चलते प्रतापराव ने उस गद्दार बहलोल खान और उसकी फौज को ज़िंदा छोड़ दिया।
लेकिन प्रतापराव ये भूल गए थे की इन जिहादियों की कसमों का कोई मोल नहीं होता। पीठ में खंजर घोंपना तो इनके खून में शामिल है।
और जैसे ही ये बात छत्रपति शिवाजी महाराज के कानों तक पहुँची… महाराज का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया!
मुझे अपना मुँह मत दिखाना… छत्रपति शिवाजी महाराज का वो एक खत जिसने प्रतापराव गुजर के दिल के आर-पार कर दिया तीर
जैसा की मैंने आपको पहले बताया, जिहादियों की फितरत ही धोखेबाज़ी की होती है। गद्दार बहलोल खान ने कुरान की कसमें खाकर अपनी जान तो बचा ली, लेकिन जैसे ही वो मराठों के घेरे से आज़ाद हुआ और अपनी सीमा में पहुँचा, वो अपनी सारी कसमें भूल गया।
कुछ ही महीनों के भीतर, इस नीच इंसान ने मुगलों और आदिलशाही से और भी बड़ी फौज मांगी और नए हथियारों के साथ फिर से स्वराज्य को लूटने की तैयारी शुरू कर दी।
जब छत्रपति शिवाजी महाराज के तेज़-तर्रार खुफिया तंत्र ने महाराज को ये खबर दी की बहलोल खान फिर से स्वराज्य पर हमला करने आ रहा है, तो महाराज का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया।
वो बहुत अच्छे से जानते थे की इन आक्रांताओं के लिए कसमों और वादों का कोई मतलब नहीं होता। उन्होंने प्रतापराव गुजर को बहलोल खान को छोड़ने के लिए कभी नहीं कहा था।
शिवाजी महाराज अपने इस सेनापति से बेइंतहा प्यार करते थे, लेकिन जब बात स्वराज्य और उसकी सुरक्षा की आई, तो महाराज ने एक बेहद कड़ा, सख्त और चुभने वाला खत प्रतापराव गुजर को भेजा।
उस खत में महाराज ने जो लिखा था, उसने प्रतापराव की आत्मा को छलनी कर दिया। महाराज ने लिखा था- “तुमने उस गद्दार को छोड़कर बहुत बड़ी भूल की है।
बहलोल खान ने फिर से स्वराज्य पर हमला कर दिया है। अब जब तक तुम उस गद्दार का सिर काटकर मेरे सामने नहीं लाते, मुझे अपना मुँह मत दिखाना!”
ज़रा सोचिए यार… एक वो सेनापति जिसके लिए उसका राजा ही उसका साक्षात भगवान हो, जिसने अपनी पूरी जवानी उस राजा के लिए खून बहाने में निकाल दी हो, जब उसी राजा की तरफ से ऐसे शब्द आएं की “मुझे अपना मुँह मत दिखाना,” तो उस सेनापति के दिल पर क्या गुज़री होगी?
प्रतापराव गुजर इस खत को पढ़कर अंदर तक टूट गए। पश्चाताप की आग उनके सीने में धधकने लगी। उनके लिए ये सिर्फ एक खत नहीं था, ये उनके सम्मान और वफादारी पर उठा एक सवाल था।
प्रतापराव ने उसी पल कसम खा ली की अब या तो बहलोल खान का सिर कटेगा, या प्रतापराव का धड़ वापस नहीं लौटेगा।
15000 हथियारबंद खूंखार जिहादी और सामने सिर्फ 7 मराठा वीर, जब नेसरी के मैदान में मौत को दावत देने निकल पड़े हिन्दू शेर प्रतापराव गुजर
महीना था फरवरी, और साल था 1674। प्रतापराव गुजर पागलों की तरह बहलोल खान को ढूंढ रहे थे।
तभी उनके गुप्तचरों ने आकर खबर दी की गद्दार बहलोल खान कोल्हापुर के पास नेसरी (Nesari) नाम की जगह पर डेरा डाले हुए है। लेकिन खबर में एक बहुत भयानक पेंच था।
बहलोल खान इस बार कोई छोटी-मोटी सेना लेकर नहीं आया था, उसके साथ 15,000 खूंखार और भारी हथियारों से लैस अफगानी पठानों की विशाल फौज थी!
प्रतापराव गुजर उस वक्त नेसरी के बहुत करीब थे, लेकिन उनकी मुख्य मराठा सेना अभी उनसे काफी पीछे थी।
किसी भी आम सेनापति या युद्ध नीति के हिसाब से प्रतापराव को क्या करना चाहिए था? उन्हें अपनी मुख्य सेना के आने का इंतज़ार करना चाहिए था। 15,000 की फौज पर बिना पूरी तैयारी के हमला करना साक्षात मौत के मुँह में जाने जैसा था।
लेकिन भाईसाब, प्रतापराव के दिमाग में उस वक्त कोई युद्ध नीति नहीं चल रही थी। उनके कानों में सिर्फ और सिर्फ अपने भगवान (शिवाजी महाराज) के वो शब्द गूंज रहे थे- “मुझे अपना मुँह मत दिखाना।”
उनका खून खौल रहा था। उनका स्वाभिमान उन्हें एक पल भी रुकने की इजाज़त नहीं दे रहा था।
प्रतापराव ने एक ऐसा फैसला लिया जिसे सुनकर आज भी दुनिया के बड़े-बड़े सैन्य विशेषज्ञ दाँतों तले उंगली दबा लेते हैं। उन्होंने अपनी बाकी सेना को कड़ा आदेश दिया की “तुम लोग यहीं रुकोगे, कोई भी मेरे पीछे नहीं आएगा।”
उन्होंने अपने खेमे से सिर्फ अपने 6 सबसे खूंखार, वफादार और जान छिड़कने वाले सरदारों को चुना। उनके नाम इतिहास में अमर हैं- विसाजी बल्लाल, दिपाजी राउतराव, विठ्ठल पिल्लाजी अत्रे, कृष्णाजी भास्कर, सिद्दी हिलाल और विठोजी।
कुल मिलाकर ये हुए 7 मराठे! इन सातों वीरों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। आँखों ही आँखों में बात हो गई। ये कोई युद्ध जीतने की रणनीति नहीं थी, ये अपने राजा के लिए किया जाने वाला ‘प्रायश्चित’ था।
ये एक सुसाइड मिशन था जहाँ मौत 100 प्रतिशत पक्की थी, लेकिन पीछे हटना मराठों के खून में नहीं था। इन सातों ने अपनी नंगी तलवारें खींचीं, भवानी माता का नाम लिया और 15,000 जिहादियों की फौज की तरफ अपने घोड़े दौड़ा दिए!
वेडात मराठे वीर दौडले सात… जब जिहादियों की भीड़ में घुसकर इन 7 मराठों ने मचाया भयंकर कत्लेआम और लिख दी महा-बलिदान की गाथा
अब जो नेसरी के मैदान में हुआ, वो किसी इंसानी सोच के परे की बात है। जब इन 7 भूखे शेरों ने पठानों के कैंप में धावा बोला, तो धूल का ऐसा गुबार उठा की पठानों को लगा जैसे मराठों की कोई 50 हज़ार की फौज आ गई है। ‘हर हर महादेव’ के नारों से पूरा नेसरी का मैदान गूंज उठा।
15,000 पठान कुछ समझ पाते, हथियार उठा पाते, उससे पहले ही इन 7 मराठों ने उनके बीच घुसकर वो भयंकर नरसंहार मचाया की जिहादियों में भगदड़ मच गई।
ये सातों वीर किसी इंसान की तरह नहीं लड़ रहे थे, ये साक्षात काल बनकर टूट पड़े थे। प्रतापराव की तलवार बिजली की तरह चमक रही थी।
जो भी पठान उनके सामने आ रहा था, वो सीधा दो टुकड़ों में कटकर ज़मीन पर गिर रहा था। बाकी के छह सरदारों ने भी पठानों को काटना शुरू कर दिया।
बहलोल खान के तो पसीने छूट गए। उसे समझ ही नहीं आ रहा था की आखिर ये हो क्या रहा है! जब धूल थोड़ी छंटी और पठानों ने देखा की अरे… ये कोई विशाल फौज नहीं, ये तो सिर्फ 7 लोग हैं, तब उन्होंने इन सातों वीरों को चारों तरफ से घेर लिया।
लेकिन वो 7 मराठे घिरे होने के बावजूद पीछे नहीं हटे। वो लगातार आगे बढ़ रहे थे, बहलोल खान के तंबू की तरफ!
उनके जिस्म पर तीरों और भालों के अनगिनत घाव लग चुके थे। खून से उनके घोड़े लाल हो चुके थे। लेकिन उनकी तलवारें एक सेकंड के लिए भी नहीं रुकीं।
15,000 की भीड़ बहुत बड़ी होती है यार! एक-एक मराठे पर सैकड़ों जिहादी टूट पड़े। लड़ते-लड़ते, पठानों की लाशों के ढेर बिछाते हुए, आख़िरकार वो समय आ गया।
छत्रपति शिवाजी महाराज का वो फौलादी सेनापति प्रतापराव गुजर और उनके 6 वफादार साथी, दुश्मन की फौज के बिल्कुल बीचों-बीच, अनगिनत घाव खाने के बाद ज़मीन पर गिर पड़े।
उन्होंने वीरगति प्राप्त कर ली थी। लेकिन अपनी आख़िरी सांस तक उन्होंने दिखा दिया की एक हिन्दू योद्धा अपने राजा के लिए, अपने स्वराज्य के लिए मौत की आँखों में आँखें डालकर कैसे हँसता है।
उन्होंने इतिहास को बता दिया की मराठे कभी अपनी पीठ नहीं दिखाते।
ये कहानी उस ‘हिन्दू DNA’ की है जो धर्म, राष्ट्र और अपने राजा के लिए असंभव से असंभव काम कर गुज़रता है।
जय भवानी! जय शिवाजी!
