खुद को रामपुर का 'नवाब' समझने वाले गुंडे 'आज़म खान' का टूटेगा 'गुरूर', दलितों की ज़मीनें 'लूट' कर बनाये गए इस पाप के किले 'जौहर यूनिवर्सिटी' को मिट्टी में मिलाने आ रहा योगी बाबा का 'बुलडोज़र'

खुद को रामपुर का ‘नवाब’ समझने वाले गुंडे ‘आज़म खान’ का टूटेगा ‘गुरूर’, दलितों की ज़मीनें ‘लूट’ कर बनाये गए इस पाप के किले ‘जौहर यूनिवर्सिटी’ को मिट्टी में मिलाने आ रहा योगी बाबा का ‘बुलडोज़र’

यार, सत्ता का नशा भी ना बिल्कुल सस्ती शराब जैसा होता है, जब चढ़ता है तो आदमी खुद को खुदा समझ बैठता है, और जब उतरता है तो वो सीधा गटर में औंधे मुंह गिरता है!

एक वक़्त था जब उत्तर प्रदेश में ‘समाजवादी पार्टी’ की सरकार हुआ करती थी। और उस सरकार में रामपुर का एक ऐसा ‘स्वयंभू नवाब’ था, जिसकी हनक के आगे पुलिस और प्रशासन रेंगते हुए नज़र आते थे।

नाम तो आप समझ ही गए होंगे- आज़म खान!

भाई साहब, इस आदमी ने सत्ता के नशे में खुद को रामपुर का खुदा ही समझ लिया था। जिसे चाहा उठवा लिया, जिसकी ज़मीन चाही हड़प ली, और जो अधिकारी सामने बोला उसे रातों-रात ट्रांसफर करवा दिया।

लेकिन कहते हैं ना की जब पाप का घड़ा भरता है, तो वो फूटता भी बहुत भयानक आवाज़ के साथ है।

आज वैसे आज़म खान अपने पापों की सज़ा काटते हुए जेल की सलाखों के पीछे है। लेकिन उसने सत्ता की गुंडागर्दी, बेईमानी और दलितों का खून चूसकर रामपुर में जो अपना एक ‘अवैध किला’ खड़ा किया था- जिसे ये लोग बड़ी बेशर्मी से ‘जौहर यूनिवर्सिटी’ (Mohammad Ali Jauhar University) कहते हैं।

आज इस पाप के किले की ईंट से ईंट बजाने के लिए योगी बाबा का बुलडोज़र गियर डाल चुका है!

सपा सरकार में खुद को रामपुर का खुदा समझने वाले आज़म खान की हेकड़ी अब मिलेगी मिट्टी में

ज़रा ताज़ा अपडेट सुनिए, जिसे सुनकर इस इकोसिस्टम के पैरों तले ज़मीन खिसक गई है। रामपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी (RDA) ने अभी इसी महीने (जुलाई 2026) जौहर यूनिवर्सिटी का पूरा कच्चा-चिट्ठा खोल कर रख दिया है।

250 एकड़ में फैले इस आलीशान ‘किले’ की जांच हुई तो पता चला की 40 में से 38 इमारतें पूरी तरह से ‘अवैध’ हैं! जी हाँ, 38 इमारतें!

मतलब सिर्फ मेडिकल कॉलेज और एकाडमिक ब्लॉक का एक हिस्सा छोड़ दें, तो बाकी पूरे के पूरे कैंपस का कोई नक्शा ही पास नहीं है!

बिना किसी परमिशन, बिना किसी कानूनी कागज़ के आज़म खान ने धड़ल्ले से करोड़ों की इमारतें तान दीं। क्यों? क्योंकि उन्हें लगता था की “अरे हम तो सरकार हैं, हमें कौन रोकेगा!”

लेकिन नवाब साहब ये भूल गए थे की आगे चलकर यूपी में ‘भैया’ की सरकार नहीं, बल्कि वहाँ एक ऐसे संन्यासी का राज होगा जिसके बुलडोज़र में बैक गियर नहीं होता।

आरडीए (RDA) ने बाकायदा इन 38 इमारतों को ढहाने का नोटिस चस्पा कर दिया है। उधर, इनकम टैक्स वालों ने भी मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट का रजिस्ट्रेशन ही कैंसिल कर मार दिया है।

अब ना टैक्स में छूट मिलेगी और ना ही काले धन को सफ़ेद करने का खेल चलेगा। हाँ, ये सच है की अभी 27 जुलाई को मुरादाबाद के कमिश्नर ने अगली सुनवाई तक इस ध्वस्तीकरण पर एक ‘अस्थायी रोक’ (Stay) लगा दी है।

इसे देखकर कुछ सपाई गदगद हो रहे हैं, लेकिन भाई ये सिर्फ दो दिन की मोहलत है, कोई माफीनामा नहीं!

कोर्ट और कानून की चक्की धीरे ज़रूर पीसती है, लेकिन जब पीसती है तो गुंडों का वजूद मिटा देती है। कमिश्नर का स्टे तो बस एक लीगल प्रोसीजर है, लेकिन तय मानिए, आज़म खान के इस घमंड के महल का मटियामेट होना अब पत्थर की लकीर है।

शिक्षा का मंदिर नहीं, ये है ज़मीन लूटने का अड्डा जहां दलितों का खून चूसकर खड़ी की गई ‘जौहर यूनिवर्सिटी’ की दीवारें

अब ज़रा बात कर लेते हैं उस ‘महान शिक्षा’ की, जिसका ढोंग रचकर ये पूरा इकोसिस्टम आज विक्टिम कार्ड खेल रहा है।

जब आप इस जौहर यूनिवर्सिटी की नींव में झांकेंगे ना, तो आपको वहां कोई किताबें या कलम नहीं मिलेगी।

वहां आपको उन गरीब, बेबस ‘दलितों’ के आंसू, उनका खून और उनकी आहें मिलेंगी, जिन्हें रातों-रात बिकाऊ पुलिस और गुंडों के दम पर उनकी ही ज़मीन से खदेड़ दिया गया था।

कानून तो सबको पता है ना? पूरे देश में नियम है की SC/ST (दलित) समुदाय की ज़मीन कोई गैर-दलित ऐसे ही नहीं खरीद सकता।

ये कानून इसलिए बना था ताकि कोई ताकतवर इंसान किसी गरीब दलित को डराकर उसकी ज़मीन ना हड़प ले। लेकिन समाजवादी गुंडाराज में कानून की औकात ही क्या थी?

आज़म खान के गुंडों ने रामपुर के गरीब दलित किसानों की कनपटी पर बंदूकें रखीं। जिन किसानों ने अपनी ज़मीन देने से मना किया, उन पर चोरी, डकैती और ना जाने कौन-कौन से फर्जी मुक़दमे ठोक दिए गए।

पुलिस खुद आज़म खान की प्राइवेट आर्मी बनकर दलितों को घरों से उठा ले जाती थी।

ज़रा सोचिए उस खौफनाक मंज़र के बारे में! पुलिस थाने में बैठकर दलितों को मजबूर किया जाता था की वो अपनी पुश्तैनी ज़मीनें कौड़ियों के भाव जौहर ट्रस्ट के नाम लिख दें।

और जो वामपंथी पत्रकार आज ‘माइनॉरिटी एजुकेशन’ के खतरे में पड़ने का रोना रो रहे हैं, वो तब एकदम गूंगे और बहरे हो गए थे जब दलितों की ज़मीनों पर कब्ज़ा करके इस प्राइवेट किले की बाउंड्री वाल खींची जा रही थी!

वो तो भला हो योगी सरकार का और उन अदालतों का, जिन्होंने बाद में मामले का संज्ञान लिया और दलितों की 100 बीघा से ज़्यादा ज़मीन वापस कब्ज़े में लेने का आदेश दिया।

लेकिन जिस तरह से शिक्षा का चोला ओढ़कर एक माफिया ने दलितों का हक़ मारा, ये अपने आप में आज़ाद भारत का सबसे शर्मनाक क्राइम सीन है।

शत्रु संपत्ति और कोसी नदी तक को डकार जाने वाले इस समाजवादी मगरमच्छ का पेट कभी नहीं भरा

गरीबों को तो छोडिए, इस नवाब की भूख इतनी भयंकर थी की इसने देश की सरकार और कुदरत को भी नहीं छोड़ा!

आप हैरान रह जाएंगे ये जानकर की इस यूनिवर्सिटी के अंदर 34 एकड़ (13.84 हेक्टेयर) ज़मीन ऐसी है जो ‘शत्रु संपत्ति’ (Enemy Property) थी।

अब ये शत्रु संपत्ति क्या बला है? दरअसल, बंटवारे के वक़्त इमामुद्दीन कुरैशी नाम का एक शख्स भारत छोड़कर पाकिस्तान भाग गया था।

कानून के हिसाब से उसकी छोड़ी हुई ज़मीन सीधे-सीधे भारत सरकार की संपत्ति हो गई। लेकिन आज़म खान की गिद्ध वाली नज़र उस ज़मीन पर भी पड़ गई।

मंत्री पद पर रहते हुए उन्होंने सिस्टम के कुछ जयचंदों के साथ मिलकर फर्जी कागज़ात बनवाए और भारत सरकार की उस 34 एकड़ शत्रु संपत्ति को उठाकर अपनी प्राइवेट जौहर यूनिवर्सिटी में मिला लिया!

मतलब सरेआम देश के खज़ाने पर डाका!

और हद तो तब हो गई यार, जब इस समाजवादी मगरमच्छ ने रामपुर से बहने वाली ‘कोसी नदी’ को भी डकार लिया।

आप किसी भी कानून की किताब उठाकर देख लो, नदी के किनारे (Riverbed) या बाढ़ क्षेत्र (Flood plain) पर कोई निर्माण नहीं हो सकता।

वो जगह प्रकृति और आम जनता की होती है। लेकिन गुंडाराज में प्रकृति का क्या काम?

आज़म खान ने कोसी नदी के किनारों की लगभग 5 हेक्टेयर सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया। वहां बाकायदा पक्की बाउंड्री वाल खड़ी कर दी गई।

नदी का रास्ता रोक दिया गया और रामपुर की आम जनता का नदी तक पहुंचना ही हमेशा के लिए बंद कर दिया गया।

क्या कोई आम आदमी ये करने की हिम्मत कर सकता है? अगर एक आम आदमी अपनी छत पर बिना नक़्शे के एक कमरा भी बना ले, तो नगर निगम वाले अगले दिन चालान लेकर पहुंच जाते हैं।

लेकिन यहां तो पूरी की पूरी नदी और 38 विशाल इमारतें खड़ी हो गईं, और समाजवादी प्रशासन आंखें मूंदकर आज़म खान के दरबार में मुजरा करता रहा!

जनता के 150 करोड़ का प्राइवेट फ्लाईओवर और चोरी की मशीनें उगल रही हैं इस गुंडाराज का सबसे गंदा सच

ज़मीन और नदी कब्ज़ा करने के बाद, नवाब साहब की नज़र पड़ी सरकारी खज़ाने पर। अब ज़रा इनके शौक और सत्ता की हनक देखिए!

जनता के टैक्स का, आपकी और हमारी गाढ़ी कमाई का 150 करोड़ रुपया फूंककर रामपुर में 5 किलोमीटर लंबा एक शानदार फ्लाईओवर बनाया गया।

आम तौर पर फ्लाईओवर क्यों बनते हैं? ताकि शहर में ट्रैफिक जाम ना लगे, हाईवे जुड़ सके या कोई रेलवे क्रॉसिंग पार की जा सके।

लेकिन भाई साहब, इस 150 करोड़ के फ्लाईओवर का ना तो किसी नेशनल हाईवे से कोई लेना-देना है और ना ही ये किसी रेलवे लाइन के ऊपर से गुज़रता है।

तो फिर ये बना क्यों? ये इसलिए बना क्योंकि आज़म खान को अपने घर से जौहर यूनिवर्सिटी जाने में ट्रैफिक ना झेलना पड़े!

जी हाँ, ये फ्लाईओवर सीधे आज़म खान के घर से शुरू होता है और जौहर यूनिवर्सिटी के पिछले गेट पर जाकर ख़त्म हो जाता है।

मतलब सरेआम, डंके की चोट पर जनता के 150 करोड़ रुपये लूटकर नवाब साहब ने अपना प्राइवेट वीआईपी (VIP) रास्ता बनवा लिया!

लेकिन इस ‘समाजवादी गुंडाराज’ का सबसे गंदा और घिनौना सच तो तब सामने आया, जब यूपी पुलिस ने इस यूनिवर्सिटी के अंदर रेड मारी।

आपने ‘अली बाबा और चालीस चोर’ की कहानी तो सुनी होगी, लेकिन यहाँ तो एक ही आदमी ने पूरा का पूरा सिस्टम ही चुरा लिया था!

रामपुर नगर पालिका की लाखों रुपये की सड़क साफ़ करने वाली सरकारी मशीनें (Sweeping machines) रातों-रात ग़ायब हो गई थीं। पता है वो कहाँ मिलीं?

वो इसी जौहर यूनिवर्सिटी के कैंपस में ज़मीन के नीचे गाड़ कर (Buried) छुपाई गई थीं! मतलब हद हो गई यार चोरी और सीनाजोरी की! आप एक यूनिवर्सिटी चला रहे हैं या कबाड़ और चोरी का गोदाम?

और जो वामपंथी आज इस जगह को ‘शिक्षा का मक्का-मदीना’ साबित करने पर तुले हैं, उनसे ज़रा पूछिए की रामपुर के ऐतिहासिक ‘मदरसा आलिया’ (Rampur Raza Library) की सैकड़ों साल पुरानी और बेशकीमती प्राचीन किताबें कहाँ से बरामद हुई थीं?

वो नायाब किताबें और पांडुलिपियां, जो पूरे देश की धरोहर थीं, उन्हें चुराकर जौहर यूनिवर्सिटी की दीवारों में चुनवा दिया गया था! पुलिस के छापों में वो किताबें लिफ्ट के शाफ़्ट (Shaft) और दीवारों की दरारों से निकली थीं।

शिक्षा के नाम पर इससे बड़ा कलंक और क्या हो सकता है? जो इंसान ज्ञान बांटने की बात करता हो, वो खुद ही देश की ऐतिहासिक धरोहर और ज्ञान को चुराकर दीवारों में दफन कर रहा था!

ये कोई यूनिवर्सिटी नहीं थी दोस्त, ये असल में आज़म खान की काली कमाई, चोरी के सामान और हड़पी हुई ज़मीनों को सेफ रखने वाला एक ‘लॉकर रूम’ था, जिसके बाहर बस ‘शिक्षा’ का एक बोर्ड टांग दिया गया था।

अब जब पाप के इस किले पर गरजने वाला है बुलडोज़र, तो रज़ा अकादमी और कांग्रेसी इकोसिस्टम का शुरू हो गया रोना धोना

अब आते हैं इस पूरे ड्रामे के क्लाइमैक्स पर। आज जब रामपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी (RDA) ने इन 38 अवैध इमारतों पर लाल निशान लगा दिया है, जब इनके ढहने का वक़्त करीब आ गया है, तो ये पूरा का पूरा वामपंथी, सपाई और कांग्रेसी इकोसिस्टम ऐसे छाती पीट रहा है जैसे देश में कोई राष्ट्रीय आपदा आ गई हो।

मुंबई में बैठी कट्टरपंथी ‘रज़ा अकादमी’ (Raza Academy) अचानक नींद से जाग गई है। वही रज़ा अकादमी, जिसके गुंडों ने आज़ाद मैदान में दंगे किए थे और पुलिसवालों को पीटा था, वो आज ‘अल्पसंख्यकों की शिक्षा’ और ‘संविधान’ बचाने के नाम पर धरने दे रही है।

समाजवादी पार्टी के नेता कैमरे के सामने आकर ‘बच्चों के भविष्य’ का ऐसा झूठा विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं की किसी को भी उल्टी आ जाए।

इनका रोना है की “सरकार शिक्षा के खिलाफ है, यूनिवर्सिटी तोड़कर बच्चों का भविष्य बर्बाद किया जा रहा है!”

अरे बेशर्मों! जब रामपुर के उन बेबस और गरीब दलितों की कनपटी पर बंदूक रखकर उनकी पुश्तैनी ज़मीनें छीनी जा रही थीं, तब तुम्हारा ये ‘बच्चों का भविष्य’ और ‘संविधान’ कहाँ तेल लेने गया था?

जब कोसी नदी का किनारा कब्ज़ा किया जा रहा था, तब तुम्हारे ये सेक्युलर पत्रकार किस बिल में घुसे बैठे थे? जब प्राचीन किताबें चुराकर दीवारों में छिपाई जा रही थीं, तब तुम्हारी ये ‘रज़ा अकादमी’ अंधी हो गई थी क्या?

तुम्हें ना तो शिक्षा से कोई मतलब है और ना ही किसी बच्चे के भविष्य से! तुम्हारा असली दर्द ये है की तुम्हारे एक आका का, तुम्हारे एक माफिया का गुरूर मिट्टी में मिलने जा रहा है।

ये इकोसिस्टम हमेशा से ऐसे ही अपराधियों की चौखट पर मुजरा करता आया है। लेकिन इन्हें अब एक बात बहुत अच्छी तरह से अपने दिमाग में बैठा लेनी चाहिए की दौर बदल चुका है।

अब यूपी में किसी नवाब, किसी माफिया या किसी गुंडे की हनक नहीं चलती। अब वहां बाबा का राज है, कानून का राज है।

तुम चाहे कितने भी धरने दे लो, कितना भी विक्टिम कार्ड खेल लो, मुरादाबाद कमिश्नर का वो स्टे (Stay) बस दो-चार दिन की सांसें है। जिस दिन वो स्टे हटेगा, उस दिन योगी का बुलडोज़र इस पाप के किले को मटियामेट करके ही दम लेगा।

आज़म खान ने गरीबों की आहों पर जो ये अवैध साम्राज्य खड़ा किया था, उसका अंत अब आ चुका है।

क्योंकि इतिहास गवाह है, जब गरीबों और मज़लूमों की बद्दुआ लगती है, तो बड़े-बड़े नवाबों के महल भी खंडहर में तब्दील हो जाते हैं। और यहाँ तो खुद बाबा का बुलडोज़र न्याय करने के लिए दरवाज़े पर खड़ा है!

जय हिन्द! सत्यमेव जयते!

Scroll to Top