जो पिछले 80 सालों के इतिहास में नहीं हुआ.. वो अब होगा! पहली बार 'लाल किले' पर गूंजेगा 'वंदे मातरम', दशकों के लंबे इंतजार के बाद इस 'स्वतंत्रता दिवस' वंदे मातरम को मिलेगा उसका असली और सर्वोच्च दर्जा

जो पिछले 80 सालों के इतिहास में नहीं हुआ.. वो अब होगा! पहली बार ‘लाल किले’ पर गूंजेगा ‘वंदे मातरम’, दशकों के लंबे इंतजार के बाद इस ‘स्वतंत्रता दिवस’ वंदे मातरम को मिलेगा उसका असली और सर्वोच्च दर्जा

कभी-कभी सोचकर ही अफ़सोस होता है की आज़ादी तो हमें 1947 में मिल गई थी.. लेकिन मानसिक आज़ादी मिलने में हमें पूरे 80 साल लग गए।

15 अगस्त 2026 की सुबह दिल्ली का आसमान जब थर्राएगा, तो वो सिर्फ आज़ादी का 80वां जश्न नहीं होगा.. इस बार लाल किले की प्राचीर पर कुछ ऐसा होने जा रहा है, जो पिछले आठ दशकों के इतिहास में कभी नहीं हुआ।

दशकों का वो लंबा और घुटन भरा इंतज़ार अब खत्म होने वाला है, और सनातनी भारत की आत्मा माने जाने वाले ‘वंदे मातरम’ को आखिरकार वो सर्वोच्च सम्मान मिलने जा रहा है, जिसका वो असल हक़दार था।

इस बार का प्रोटोकॉल ही बदल दिया गया है दोस्तों! 15 अगस्त की सुबह जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले की प्राचीर पर पहुंचेंगे, तो सबसे पहले देश का राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ पूरी शान और गूंज के साथ गाया जाएगा!

पहले क्या होता था? सीधे झंडा फहराया जाता था और राष्ट्रगान (जन गण मन) होता था। वंदे मातरम को हमेशा एक रस्म अदायगी के लिए इस्तेमाल किया जाता था।

लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। अब सबसे पहले इस गीत की हुंकार पूरे देश में गूंजेगी। मेहमानों के इन्विटेशन कार्ड तक पर इस बार वंदे मातरम के पूरे बोल छापे गए हैं ताकि लाल किले पर मौजूद हर एक हिंदुस्तानी एक सुर में इसे गा सके।

लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा होता है। जिस गीत ने आज़ादी की लड़ाई में मुर्दों में भी जान फूंक दी थी, जिस एक नारे ने अंग्रेज़ी हुकूमत की चूलें हिला दी थीं… उसे आज़ाद भारत में लाल किले की सीढ़ियां चढ़ने में पूरे 80 साल क्यों लग गए?

150 साल का लंबा सफर और बंकिम चंद्र का वो गीत जिससे कांपते थे अंग्रेज

इस बात को समझने के लिए हमें थोड़ा इतिहास में पीछे जाना होगा। इस साल यानी 2026 में ‘वंदे मातरम’ के लिखे जाने के पूरे 150 साल पूरे हो रहे हैं।

1875 में अक्षय नवमी के उस पवित्र दिन जब बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इस गीत की रचना की थी, तो किसी ने नहीं सोचा था की ये आगे चलकर भारत की आज़ादी का सबसे बड़ा महामंत्र बन जाएगा।

बाद में इसे उनके मशहूर नॉवेल ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया।

ये कोई मामूली कविता या सिर्फ कुछ शब्दों का जोड़ नहीं था। ये वो आग थी जिसे सुनकर गोरों की जिंदगी हराम हो जाती थी।

ज़रा याद कीजिए स्वदेशी आंदोलन का वो दौर! सड़कों पर हज़ारों की भीड़ निकलती थी और उनके मुंह से सिर्फ एक ही नारा निकलता था- ‘वंदे मातरम!’

अंग्रेज़ पुलिस इस नारे से इतना खौफ खाती थी की सड़कों पर ‘वंदे मातरम’ बोलने वालों पर सीधे लाठियां बरसाई जाती थीं, उन्हें जेलों में ठूंस दिया जाता था।

जब रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी फांसी के फंदे को चूमते थे, तो आख़िरी वक्त में उनके होठों पर क्या होता था? क्या वो कोई और गीत गाते थे? नहीं!

वो इसी ‘वंदे मातरम’ को गाते हुए हंसते-हंसते अपनी जान इस मिट्टी पर कुर्बान कर देते थे। आज़ादी की लड़ाई में अगर किसी एक मंत्र ने पूरे हिंदुस्तान को एक धागे में पिरोया था, तो वो यही गीत था।

लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ की 1947 के बाद इस महामंत्र को किनारे कर दिया गया?

वोट बैंक और तुष्टिकरण की गंदी राजनीति ने दशकों तक इसे लाल किले से क्यों रखा दूर

यहाँ से शुरू होता है आज़ाद भारत का वो सबसे घिनौना और शर्मनाक राजनीतिक खेल, जिसे ‘सेक्युलरिज्म’ का नाम दिया गया।

जब देश आज़ाद हुआ, तो ये तय माना जा रहा था की आज़ादी का जो मंत्र था, वही हमारा राष्ट्रगान बनेगा। 1950 में संविधान सभा ने इसे ‘जन गण मन’ के बराबर का दर्ज़ा तो दे दिया, लेकिन असलियत में इसे कभी वो सम्मान नहीं मिला।

क्यों? क्योंकि दिल्ली में बैठे तत्कालीन नेताओं और सत्ताधीशों को वोट बैंक खिसकने का डर सता रहा था। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने इस गीत पर ‘आपत्ति’ जतानी शुरू कर दी।

उनका तर्क था की इस गीत में ‘भारत माता’ की वंदना की गई है, और उनके मज़हब में किसी ज़मीन या मूर्ति की वंदना करना हराम है।

अब ज़रा इन कायर नेताओं की मानसिकता देखिए! जिन लाखों हुतात्माओं ने वंदे मातरम गाकर अपनी छाती पर गोलियां खाईं, उनके बलिदान को एक झटके में भुला दिया गया।

मुट्ठी भर कट्टरपंथियों और मुस्लिम वोट बैंक को खुश रखने के लिए करोड़ों हिंदुस्तानियों की भावनाओं का बेरहमी से गला घोंट दिया गया।

दशकों तक इसी तुष्टिकरण की गंदी राजनीति के चलते ‘वंदे मातरम’ को ‘विवादित’ बताकर लाल किले के मुख्य मंच से दूर रखा गया।

इन ‘सेक्युलर’ नेताओं की हिम्मत तो देखिए, जिस मिट्टी का ये अन्न खाते थे, जिस मिट्टी पर राजनीति करके ये सत्ता की मलाई चाट रहे थे, उसी मिट्टी की वंदना करने से इन्हें सांप सूंघ जाता था।

सालों-साल तक लाल किले पर 15 अगस्त के जश्न मनाए गए, बड़ी-बड़ी कसमें खाई गईं, लेकिन इस ऐतिहासिक प्राचीर से कभी उस गीत को सीना ठोक कर गाने की हिम्मत नहीं दिखाई गई जिसने असल में हमें ये आज़ादी दिलाई थी।

ये हमारे पुराने सिस्टम का वो डरा हुआ और कायर चेहरा है, जिसे आजतक ‘धर्मनिरपेक्षता’ की चादर में लपेट कर रखा गया था।

लेकिन कहते हैं ना की पाप का घड़ा एक न एक दिन फूटता ज़रूर है।

80 सालों तक इन वामपंथियों और तुष्टिकरण के ठेकेदारों ने जिस राष्ट्रगीत को दबाकर रखने की कोशिश की, आज वही ‘वंदे मातरम’ पूरे 150 साल बाद एक ऐसी हुंकार भरने जा रहा है की दिल्ली के लुटियंस ज़ोन में बैठे इन गद्दारों के कानों के पर्दे फट जाएंगे।

15 अगस्त का ऐतिहासिक नज़ारा जब 2500 युवा रचेंगे लाल किले पर नया इतिहास

अब ज़रा दिल थाम कर बैठिए और 15 अगस्त की उस सुबह की कल्पना कीजिए। इस बार रक्षा मंत्रालय ने जो तैयारियां की हैं, उनके आंकड़े सुनकर ही आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे।

इस बार इतिहास सिर्फ मंच से नहीं, बल्कि लाल किले के ठीक सामने मैदान से भी रचा जाएगा।

लाल किले के ठीक सामने जो ‘ग्यानपथ’ है, वहां का नज़ारा इस बार पूरी दुनिया देखेगी।

वहां 2,500 से ज़्यादा एनसीसी (NCC) कैडेट्स और ‘माई भारत’ (My Bharat) के युवा वॉलंटियर्स अपने शरीर से ‘वंदे मातरम्’ की एक विशाल और भव्य आकृति (Human Formation) बनाएंगे।

सोचिए ज़रा! जिस गीत को गाने से कुछ नेताओं की ज़बान को लकवा मार जाता था, आज उसी गीत को हमारे देश का युवा अपने सीने और शरीर पर उकेर कर लाल किले के सामने खड़ा होगा।

और बात सिर्फ ज़मीन तक सीमित नहीं रहेगी, आसमान भी इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनेगा।

जैसे ही नीचे पीएम मोदी के सामने वंदे मातरम की गूंज उठेगी, ठीक उसी वक्त भारतीय वायुसेना (IAF) के स्वदेशी Mi-17 हेलिकॉप्टर लाल किले के ठीक ऊपर से उड़ान भरेंगे।

इन हेलिकॉप्टरों पर ‘150 इयर्स ऑफ़ वंदे मातरम’ (150 Years of Vande Mataram) का एक बहुत विशाल बैनर आसमान में लहरा रहा होगा और नीचे खड़ी जनता पर आसमान से गुलाब के फूलों की भयंकर बारिश की जाएगी।

सिर्फ दिल्ली ही क्यों? इस बार पूरे हिंदुस्तान का कोना-कोना इस देशभक्ति की आग में तपेगा।

रक्षा मंत्रालय ने बाकायदा ये निर्देश दिया है की 15 अगस्त के दिन देश भर में 343 अलग-अलग ऐतिहासिक और अहम जगहों पर हमारी तीनों सेनाओं (आर्मी, नेवी और एयरफोर्स) के बैंड्स पूरे शौर्य के साथ ‘वंदे मातरम’ की धुन बजाएंगे।

80 साल का जो सूखा इन लिबरल सरकारों ने पैदा किया था, वो इस 15 अगस्त को एक ही झटके में हमेशा के लिए खत्म होने जा रहा है।

विपक्षी पार्टियों का रोना-धोना शुरू, लिबरल ईकोसिस्टम के पेट में उठा भयंकर दर्द

अब जहाँ देशभक्ति का इतना बड़ा सैलाब आ रहा हो, वहाँ हमारे देश के ‘सेक्युलर’ कीड़ों को मिर्ची न लगे, ऐसा तो हो ही नहीं सकता!

जैसे ही सरकार ने इस नए प्रोटोकॉल का ऐलान किया, इन तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले दलों के पेट में भयंकर मरोड़ उठने लगे हैं।

विपक्षी पार्टियों और उनके साथ पूंछ बनकर घूमने वाले लिबरल पत्रकारों ने टीवी डिबेट्स में रोना-धोना शुरू कर दिया है।

इनका घिसा-पिटा रोना फिर से चालू हो गया है। बेशर्मी की हद देखिए!

ये लोग कह रहे हैं की सरकार का यह कदम “देश को बांटने वाला” है! हाल ही में जब संसद में ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान (जन गण मन) के बराबर कानूनी सुरक्षा देने का बिल पास हुआ, तब भी इन्हीं पार्टियों ने संसद में सबसे ज़्यादा हो-हल्ला मचाया था।

अरे भाई, जो गीत पूरे देश को एक धागे में पिरोता है, जो गीत मातृभूमि की वंदना करता है, वो देश को कैसे बांट सकता है? सच तो ये है की तुम्हारा वो गंदा वोट बैंक बंट रहा है जिसे तुम दशकों से ‘धर्मनिरपेक्षता’ की अफ़ीम चटाकर बेवकूफ़ बना रहे थे।

इन वामपंथियों और तुष्टिकरण की दुकान चलाने वालों को भारत के गौरव से हमेशा ही तकलीफ़ क्यों होती है?

विदेशी फंडिंग पर पलने वाला इनका लिबरल इकोसिस्टम देश को गालियां दें, तो वो ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ है, लेकिन इस देश के लोग अगर लाल किले से अपनी ही मातृभूमि को ‘वंदे मातरम’ कहकर नमन कर ले, तो इनका सेक्युलरिज्म खतरे में पड़ जाता है।

इन अर्बन-नक्सलों को इस बात का खौफ सता रहा है की अगर देश का युवा एक बार अपनी संस्कृति और इस गीत की असली ताकत को समझ गया, तो फिर इनकी वो ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ वाली गैंग कभी सड़क पर खड़ी नहीं हो पाएगी।

लेकिन अब इनका रोना-धोना किसी काम का नहीं है। वो पुराना डरा हुआ सिस्टम अब दफ़न हो चुका है।

अब ये नया और आक्रामक भारत है, जो अपनी संस्कृति, अपने इतिहास और अपने शहीदों का सम्मान करना भी जानता है और इन लिबरलों के पाखंड को जूते की नोक पर रखना भी जानता है।

वंदे मातरम! जय हिन्द!

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